न डोमिनियन मांगे से मिलेगा, न स्वराज्य। जो शक्ति डोमिनियन छीनकर ले सकती है, वह स्वराज्य भी ले सकती है। इंग्लेण्ड के लिए दोनों समान हैं। डोमिनियन स्टेट्स में गोलमेज- कांफ्रेंस का उलझावा है, इसलिए वह भारत को इस उलझावे में डालकर भारत पर बहुत दिनों तक राज्य कर सकता है। फिर उसमें किस्तों की गुंजाइश है और किस्तों की अवधि एक हजार वर्षों तक बढाई जा सकती है। इसलिए इंलैण्ड का डोमिनियन स्टेट्स के नाम से न घबडाना समझ में आता है। स्वराज्य में किस्तों की गुंजाइश नहीं, न गोलमेज का उलझावा है इसीलिए वह स्व॒राज्य क नाम से कानों पर हाथ रखता है। लेकिन हमार ही भाइयों म॑ इस प्रएन पर क्यों मतभेद है, इसका रहस्य आसानी से समझ में नहीं आता। वे इतने देसमझ तो हैं नहीं कि इंलेंड की इस चाल को न समझते हों। अनुमान यही होता है कि इस चाल को समझकर भी वे डोमिनियन के पक्ष में हैं, तो इसका कुछ और आशय है। डोमिनियन पक्ष को गौर से देखिए, तो उममे हमार राजे-महाराजे, हमारे जमीदार, हमारे धनी-मानी भाई ही ज्यादा नजर आते हैं। क्या इसका यह कारण है कि वे समझते हैं कि स्वराज्य की दशा में उन्हें बहुत-कुछ दबकर रहना पड़ेगा? स्वराज्य में मजदूरों और किसानों की आवाज इतनी निर्बल न रहेगी? क्या यह लोग उस आवाज के भय से थरथरा रहे हैं? हमें तो ऐसा ही जान पडता है। वे अपने दिल में समझ रहे हैं कि उनक हितों की रक्षा अंग्रेजी-शासन ही से हो सकती है। स्वराज्य कभी उन्हें गरीबों को कुचलने और उनका रक्त चूसने न देगा। डोमिनियन का अर्थ उनके लिए यही है कि दो-चार गवर्नरियां, दो-चार बड़े-बड़े पद, उन्हें ओर मिल जाएंगे। इनका डोमिनियन स्टेट्स इसके सिवा और कुछ नहीं है। ताल्लुकेदार और राजे इसी तरह गरीबों को चूसते चले जाएंगे। स्वराज्य गरीबों की अलग आवाज है, डोमिनियन गरीबों की कमाई पर
मोटे होने वालों की। सम्भव है, अभी अमीरों की आवाज कुछ दिन और गरीबों को दबाये रक्खे। गरीबों के सब्र का प्याला अब भर गया है। इंग्लैंड को अगर अपना रोजगार प्यारा हे, आगर अपने मजदूरों की प्राण-रक्षा करनी है, तो उसे गरीबों की आवाज को ठुकराना नहीं चाहिए, वरना भारत के राजों और शिक्षित-समाज के ऊंचे ओहदेदारों के संभाले उसका रोजगार न संभलेगा। जब एक बार गरीब समझ जाएंगे कि इंगलैंड उनका दुश्मन है, तो फिर इंग्लैंड की खैरियत नहीं। इंग्लैंड अपनी संगठित शक्ति से उनका संगठित होना रोक सकता है, लेकिन बहुत दिनों तक नहीं।
प्रकाशन इतिहास
[सम्पादकीय। 'हंस', मार्च, 1930 में प्रकाशित। 'साहित्य का उद्देश्य' (प्रथम संस्करण) में संकलित। परन्तु बाद के संस्करणों में इसे हटा दिया गया। 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य' खण्ड-2 में संकलित।]
