दारू-ए-तल्ख़ का मूल पाठ
यूनिवर्सिटी के इम्तहान ख़त्म हो गये थे और क्वींस कॉलेज का बोर्डिंग हाउस बिल्कुल सुनसान नज़र आता था। सिर्फ दो मुत्फक्कर (चिन्तामग्न) सूरतें एक कमरे में बैठी हुई दिखायी देती थीं। इनमें बहुत गाढ़ी दोस्ती थी। चार साल की रफाकृत (निकटत/ ने दोस्ती की जड़ मजबूत कर दी थी। आज इम्तहान को ख़त्म हुए पूरा एक हफ़्ता गुजर गया था, मगर जुदाई का खौफ इन्हें जुदा नहीं होने देता। कई बार इनका असबाब बाँधा गया, रेल का वक्त देखा गया, कई बार फाटक तक किराये की गाड़ी बुलायी गयी, मगर चलने का वक्त आया तो दोनों दोस्त गले लिपट गये और रवानगी का इरादा मंसख (बदल) हो गया। रात को यह सलाह करके सोये कि अब सुबह को जरूर चलेंगे। यह जुदाई की मुसीबत तो एक दिन झेलनी ही है! आखिर कब तक टालेंगे, मगर कल आते ही उनके दिलों की वही कैफीयत हो जाती, जो मौत को बुलाने वाले लकड़हारे की होती थी। आखिर जब खुश-नसीब लक्ष्मीदत्त के वालिद डॉक्टर हरिदत्त ने झाड़कर लिखा, “तुम्हारे इस ताख़ीर (विलम्ब) में मुझे अन्देशा होता है कि तुम वहाँ अपने पैरों में कोई नयी जंजीर ना डाल बैठो ।” तो गोविन्दराम को अपना दिल छोटा करना पड़ता। गोविन्दराम के घर थे भी ऐसे ही मजमून का ख़त आया। बाप तो कब के सिधार चुके थे। बीवी ने लिखा, “प्थः-, तुम क्यों नहीं आते ? मुझे यह इत्मिनान दिलाओ कि मुझे सीकन का जलापा तो न सहना पड़ेगा ?”!
अब बनारस में रुकना गैरमुमकिन था। तीस अप्रैल को इम्तहान ख़त्म हुआ था। पन्द्रह मई को उनकी रवानगी की साअत (कार्यक्रम) आयी। दोनों के चेहरे अफ्सुर्दा (दुखी) थे और गोविन्द की आँखों में आँसू थे, मगर किनारा-ए-सागर की खुश्क ब।लू की तरह उन्हें सिर्फ झाड़ने की देर थी, सतह के नीचे पानी छुपा हुआ था।
लक्ष्मीदत्त अपने मकान पर पहुँचकर अपने वालिद के साथ नेनीताल गया। डॉक्टर हरिदत्त बहुत वारसूख आदमी थे। बेटे को जंगलात के सींगा में एक अच्छी जगह दिला ३; और आपाढ़ के महीना में जब कि आसमान बादलों से सियाह और जमीन पानी से लबरेज थी, उसे तराई में जाना पड़ा। आबादी से सैकड़ों मील दूर, जहाँ महीने में मुश्किल से चार मरतवा ही डाक पहुँच सकती थी। तनख़्वाह माकूल और अख़्तियारात वसीह थे। कुछ दिनों तक तो वह बहुत घबराया और गोौविन्दराम की सोहबतों को याद करके वह कई बार रोया। ना कोई सोसाइटी, न कोई मुरब्बी (दोस्त), तमाम दिन एक जंगली मुकाम में मकीद (कैद) रहना पड़ता, मगर बाला आख़िर कारगुजारी की ख़्वाईश और तरक्की की उम्मीद और दुनिया की तरगीबात (प्रेरणा), दोस्ती और मुआफृकृत (अनुकूल बातें) की दिलगुदाज जज्बात (मन को आकर्षित करने वाली भावनाएँ) पर गालिब (अधिकार) आ गयीं। दोस्तों की याद और रफीको की दिलजोइयां फरामोश (विस्तृत) हो गई। दिल में लज्जते-दर्द का जोक बाकी ना रहा और दुनियाबी आम अरहाज़ (दैनिक व्यय) की आख़िरी किस्त वसूल कर ली।
मगर गोविन्दराम की ज़िन्दगी का रास्ता ऐसा हमवार (समतल) न था। ऐसा कोई सींगा (विभाग) न था, जहाँ उसने मुलाजमत (नौकरी) के लिए दस्ते-सवाल (हाथ फैलाना, प्रार्थना-पत्र) ना फेलाया हो। महीनों उसका यही काम था कि सुबह को अहकाम (अधिकारियों) के बँगलों पर हाजिरी देता | दिन भर सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाता, शाम को मायूस और मग्मूम (दुःखित) मुँह लपेटकर पड़ा रहता। न कोई बसीला (आधार) था, न कोई सिफारिश | कॉलेज की आला तालीम ने मिजाज में खुद्दारी (आत्म-गौरव, स्वाभिमान) का वह अहसास पैदा कर दिया था, जो उसकी मौजूदा हैसियत में ऊँचा था। इसलिए जब उसे रूखे और दिलशिकन अल्फाज में इन्कार में जवाब मिलते, या अपनी जमीर का खून करके दूसरों की तारीफ में रत्वुल्लिसान (प्रशंसक, खुशामद) होना पड़ता तो उसकी रू को बहुत सदमा होता।
कभी-कभी उसे लक्ष्मीदत्त पर रश्क आता, “मैं उससे किस बात में कम था ? मेरी मदद से ही उसने डिग्री पायी, मगर वह तीन सौ रुपये माहवार का अफसर है, और मैं तीन रुपये की गुलामी के लिए ठोकरें खाता फिरता हूँ। रसूख़ और अहकाम के मुकाबले में लियाकृत की यह गुलामी ?”
एक बार सख्त मायूसी के आलम में उसने ललिता से इन्हीं अल्फाज में अपनी तकदीर का शिकवा किया, मगर ललिता ने उसकी तरफ कुछ ऐसी निगाहों से देखा कि गोविन्दराम पर घड़ों पानी पड़ गया। मारे नदामत (शर्म) के सर न उठा सका। आखिर तीन महीने की दौड़-धूप के बाद एक मदरसा में उसे पचास रुपये की जगह मिल गयी।
गोविन्दराम ने यह खिलअत (बख़्शीश) बहुत खुशी से मंजूर की। फूला न समाया, गोया कोई दफीना (खजाना) हाथ आ गया। तकदीर को सलवातों (गालियों, कोसने) से नजात मिली, मगर बहुत थोड़े दिनों के लिए। खड़े होने की जगह पायी थी, बैठने की फिक्र हुई। तमनन्नाओं ने पाँव फैलाया, नौजवान आदमी था, दिल में उमंग मौजूद थी, कानून का इम्तहान देने का इरादा मुसम्म॥म (पक्का) हो गया, मगर कलील तनख़्वाह (कम वेतन), उसमें कानूनी फीस और किताबों का खर्च निकालकर खांगी मुसारफ (घरेलू खर्च) के लिए इतनी बचत न होती कि आये-दिन की उलझनों से छूटे। यह कानून का जोश यहाँ तक बढ़ा कि कभी-कभी उसमें फ्रायजे-मनसबी (करणीय कर्त्तव्य) में हर्ज वाका होता। एक बार हेडमास्टर साहब बरहम (क्रोधित) भी हुए, मगर गोविन्दराम वकालत का ख़्वाब देख रहा था। उसने हेडमास्टर की कुछ परवा न की, बल्कि उनके कमरे में से गाता हुआ निकला और बाहर आकर दूसरे मास्टरों में डींग मारने लगा, “अजी, हमने कौन-सा हमेशा गुलामी करनी है। यहाँ तो चन्द दिनों के और मेहमान हैं, फिर तो इस मदरसे में आग लगा दूँगा।
चार घण्टे का नौकर हूँ, कुछ काम का ठेका नहीं लिया है। तर्जमा की कॉपियाँ घर पर नहीं ले जा सकता। मदरसा का काम मदरसा में होगा। ख़्याह, किसी को बुरा ज्ञगे या भला । चेखुश मेरा तो कापियाँ देखते ही जी भर गया है।'
मास्टरों ने बढ़ावा दिया, “शेर है, शेर। इसका नाम जवॉमर्दी (शूरता) है ।” मगर जब क्रनकइयों में देखा कि हेडमास्टर साहब आ रहे हैं, तो मैदान साफ हो गया।
तीन साल गोविन्दराम ने यूँ ही काढ़े, मगर इन्हीं दिनों में उसे स॒वसे बड़ा जो तजुर्बा हुआ, वह यह था कि दुविधा में न माया मिलती है न राम | वह यकसोई (एकाग्रता), जोश, जवॉमर्दी, जो कामयाबी का राज-मन्त्र है, किसी-न-किसी वजह से मुझमें बकट्रे जरूरत मौजूद नहीं। आये-दिन ऐसी फिक्रें पैदा होती रहती थीं, जो इत्मिनाने कल्ब (मन की शान्ति) के मुनाफी (विरोधी) हैं। उसकी आँखों के सामने ऐसी कितनी ही जिन्दा मिसालें मौजूद थीं, जिन्होंने सिलसिलाए-मुदर्रस (अध्यापन-कार्य) को वकालत का जीना बनाया धा। यह कोई अनहोनी बात न थी। जोश में आकर वह दो-चार दिन :!₹-मामूली मेहनत से काम करना मगर फिर जोश कमजोर हो जाता। हौसला बुलन्द मजबूत इरादे के बगैर बुढ़ापे का ही इश्क है। जब किताब खोलकर बैठता तो उसका दिमाग मुतालहा (अध्ययन) के मुकाबले में वकालत की बरकतों के ख़्याल से ज्यादा खुश होता । यह मकान मसमार (ध्वस्त) कर दूंगा, इस जगह एक आलीशान मकान बनाऊँगा। उसका नक्शा उसकी निगाहों में खिंचा हुआ था। कई बार वह सचमुच पेंसिल और कागज लेकर इस मजूजा (विचारणीय) मकान का नक्शा बनाने लगता। ऐसा मकान हो कि हर एक मौसम में आराम मिले, मेहमान आयें तो उन्हें आसाइश (आराम) के साथ ठहराया जा सके। इस तरह खझख़्याली किले बनाने में उसका वकक्कूषतत सर्फ़ हो जाता और मदरसा का वक्त आ पहुँचता ।
यह तीन साल तपस्या के दिन थे। ललिता को घर का सत्र काम-काज ऊथने ही हाथों करना पड़ता, पर चूड़ियाँ बहुत टूटहीं और उसकी चूड़ियों का हफ़्तावार छू भी तनख्वाह से कुछ ज़्यादा ही हो जाता था। गोविन्दरान मुँह-अँधेरे उठता और पानी की कलसी खीच लाता। रोटी खाते-खाते और मोटे कपड़े पहनते, मगर मोटेपन का जिस्म पर उलटा असर होता था। कभी-कभी खासकर त्योहारों के दिन ललिता झुँझला उठती और अपना गुस्सा अपनी किस्मत पर उतारती, क्योंकि इससे ज़्यादा कमजोर उसे और कोई चीज नजर न आती थी। यूँ ही ललिता काम करती, गाढ़ा पहनती और जरा भी मन ना मैला होता, मगर अपनी सुबुकी (अपमान, लज्जा) उससे ज़रा भी बरदाश्त न हो सकती थी। एक बार उसने अपनी पड़ोसिन से कुछ दुपट्टे कर्ज लिये, तनख़्वाह का वायदा था, मगर गोविन्दराम ने जिद की कि मुझे कानून की चन्द किताबें मँँगरगी ज़रूरी हैं। मुबाहसा (वाद-विवाद) शुरू हुआ और हस्वेमामूल (पूर्ववत्) कानून ने हक पर फृतह पायी। ललिता का वायदा झूठा पड़ गया, फिर क्या था ? लड़ाई शुरू हो गयी, मगर खुले मैदान में नहीं । ललिता ने मुकाबला मज्हूल (काहिली) को ज़्यादा कारगर समझा, जो दौरे-जदीद (आधुनिक युग) की बेहतरीन हर्बी-ईजाद (लड़ाई का आविष्कार) है।
तीन दिन घर में आग न जली और पड़ोसियों ने यह फैसला किया कि आजकल लौजियात (बादामों) पर बसर हो रही है। ऐसे भी लोगों के नसीब में इफ़्लास (कंगाली) अपने असली रूप में उबर (उतर) कर आया, मगर फ्रागत (फुर्सत, खुशहाली) का भेस बदलकर । वह बड़ा जालिम और बेरहम होता है।
[प्रथम प्रकाशन उर्दू में। 'हमदर्द! (उर्दू पत्रिका) 17 जुलाई, 1993 में प्रकाशित। हिन्दी रूप 'दारू-ए-तल्ख' (कड़वी सचाई) शीर्षक से 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य” खण्ड-1 में संकलित ।]
दारू-ए-तल्ख़ का सारांश
क्वींस कॉलेज, बनारस के छात्रावास में विश्वविद्यालय की परीक्षाएँ समाप्त हो जाने के बाद सन्नाटा पसरा हुआ है। केवल एक कमरे में दो अभिन्न मित्र—गोविन्दराम और लक्ष्मीदत्त—उदास बैठे हैं। चार वर्षों के गहरे साहचर्य ने उनकी मित्रता को अत्यंत प्रगाढ़ बना दिया था, जिससे अलग होने के विचार मात्र से दोनों का दिल दहल जाता था। कई बार जाने का सामान बंधा और गाड़ियाँ बुलाई गईं, पर विछोह के भय से प्रस्थान टलता रहा। अंततः लक्ष्मीदत्त के पिता डॉक्टर हरिदत्त की डाँट और गोविन्दराम की पत्नी ललिता के व्याकुल पत्र के बाद पंद्रह मई को दोनों भारी मन से विदा होते हैं।
इसके बाद दोनों मित्रों का जीवन सर्वथा भिन्न दिशाओं में मुड़ जाता है। साधन-संपन्न पिता के प्रभाव और रसूख के बल पर लक्ष्मीदत्त को तुरंत वन विभाग में एक शानदार पद और ऊँचा वेतन मिल जाता है। प्रारंभ में उसे एकांत में अपने मित्र की याद सताती है, लेकिन धीरे-धीरे पद, प्रतिष्ठा, सांसारिक सुख और तरक्की की चाहत में वह पुराने संबंधों और मित्रता के दर्द को भुला बैठता है।
इसके विपरीत, गोविन्दराम का जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण हो जाता है। वह पढ़ाई में लक्ष्मीदत्त से अधिक योग्य था और उसी की मदद से लक्ष्मीदत्त ने डिग्री हासिल की थी, किंतु बिना किसी सिफारिश और रसूख के गोविन्दराम को कहीं नौकरी नहीं मिलती। वह महीनों तक अधिकारियों के बंगलों और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटता है। आत्म-सम्मान और स्वाभिमान से भरा होने के कारण उसे अधिकारियों की खुशामद करना और अपमान सहना बहुत भारी पड़ता है। जब वह हताश होकर अपनी पत्नी ललिता से भाग्य का रोना रोता है, तो ललिता की मूक दृष्टि उसकी आत्मा को झकझोर देती है।
तीन महीने की कड़ी दौड़-धूप के बाद गोविन्दराम को एक मदरसे में पचास रुपये की मामूली शिक्षक की नौकरी मिल जाती है। शुरू में वह इसे बहुत बड़ी राहत समझता है, किंतु जल्द ही उसकी महत्वाकांक्षाएँ जाग उठती हैं। वह कानून की परीक्षा देकर वकील बनने का निश्चय करता है। परंतु पचास रुपये की सीमित आय में गृहस्थी के खर्च के साथ वकालत की महँगी फीस और किताबों का बोझ उठाना नामुमकिन हो जाता है। वह अध्यापन के काम में लापरवाही बरतने लगता है और दिन-रात वकालत के बाद बनने वाले आलीशान मकान के खयाली पुलाव पकाने में समय बर्बाद करता है। तीन साल इसी असमंजस में बीत जाते हैं; मजबूत संकल्प और एकाग्रता के अभाव में वह न शिक्षक के रूप में सफल होता है और न ही कानून की पढ़ाई पूरी कर पाता है।
घर में उसकी पत्नी ललिता असहनीय दरिद्रता और अभावों से जूझती है। वह गाढ़ा कपड़ा पहनकर और घर का सारा कठोर काम करके भी स्वाभिमान बनाए रखती है। एक बार उसने पड़ोसन से कुछ दुपट्टे उधार लिए थे जिनका भुगतान वेतन मिलने पर होना था। किंतु गोविन्दराम उस पैसे से कानून की किताबें खरीदने की जिद करता है और ललिता का वादा झूठा साबित हो जाता है। इससे आहत होकर ललिता मौन असहयोग का मार्ग चुनती है। तीन दिन तक घर में चूल्हा नहीं जलता। कहानी यह दर्शाती है कि साधनहीनता और कोरी कल्पनाओं के बीच फँसा व्यक्ति जब जीवन की कड़वी सच्चाई (दारू-ए-तल्ख़) का सामना नहीं कर पाता, तो उसका दांपत्य और जीवन दोनों बिखर जाते हैं।
प्रकाशन इतिहास
यह कहानी सर्वप्रथम उर्दू में उर्दू पत्रिका हमदर्द में प्रकाशित हुई थी। बाद में इसका हिन्दी रूपांतर 'दारू-ए-तल्ख़' (कड़वी सचाई) शीर्षक से प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य (खण्ड-1) में संकलित किया गया।
महत्त्व और विषय-विमर्श
- योग्यता बनाम सामाजिक रसूख की विडंबना: कहानी समाज की उस कटु सच्चाई को उजागर करती है जहाँ विशुद्ध प्रतिभा और योग्यता की तुलना में पारिवारिक रसूख और सिफारिश को प्राथमिकता मिलती है। कम प्रतिभाशाली लक्ष्मीदत्त उच्च पद पा लेता है, जबकि मेधावी गोविन्दराम दर-दर भटकता है।
- कोरी महत्वाकांक्षा और व्यावहारिक अक्षमता: गोविन्दराम बड़े सपने देखता है और खयाली महल बनाता है, परंतु उसमें कठोर परिश्रम, एकाग्रता और दृढ़ इच्छाशक्ति का अभाव है। प्रेमचंद दिखाते हैं कि बिना संकल्प के महत्वाकांक्षा केवल मानसिक भटकाव पैदा करती है।
- मध्यमवर्गीय आर्थिक संकट और दांपत्य तनाव: सीमित आमदनी में बड़े लक्ष्य साधने की कोशिश कैसे परिवार की बुनियादी जरूरतों पर भारी पड़ती है, इसका मार्मिक चित्रण है। किताबों की जिद में पत्नी का उधार न चुका पाना दांपत्य में दरार पैदा करता है।
- मौन प्रतिरोध का स्वरूप: ललिता का उग्र झगड़ा करने के बजाय चूल्हा न जलाकर 'मौन असहयोग' करना स्त्री के आत्म-सम्मान और मूक विद्रोह का प्रतीक है। यह आधुनिक समय के अहिंसक प्रतिरोध की अभिव्यक्ति है।
- कहानी का व्यापक महत्त्व: 'दारू-ए-तल्ख़' (कड़वी औषधि/सच्चाई) जीवन के उस कठोर यथार्थ की पड़ताल करती है जहाँ गरीबी, बेरोजगारी और खोखले सपने मनुष्य के नैतिक बल और पारिवारिक शांति को लील जाते हैं। यह कहानी शिक्षित युवाओं को खयाली पुलाव पकाने के बजाय यथार्थवादी दृष्टि अपनाने की सीख देती है।
