Cover Image for Saut (सौत) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1915•32 मिनट

सौत

Saut

प्रेमचंद की कहानी 'सौत' निःसंतानता, सौतिया डाह और आत्मत्याग के दुखांत परिणामों को दर्शाती एक मार्मिक कहानी है।

पात्र:गोदावरी, पंडित देवीदत्त, गोमती
स्थान:एक पारंपरिक भारतीय घर और गंगा तट

सौत का मूल पाठ

पंडित देवीदत्त का विवाह हुए बहुत दिन हुए, पर उनके संतान न हुई। जब तक उनके मां-बाप जीवित थे तब तक वे उनसे सदा दूसरा विवाह कर लेने के लिए आग्रह किया करते थे पर वे राजी न हुए। उन्हें अपनी पत्नी गोदावारी से अटल प्रेम था। संतान से होने वाले सुख के निमित्त वे अपना वर्तमान पारिवारिक सुख नष्ट न करना चाहते थे। इसके अतिरिक्त वे कुछ नए विचार के मनुष्य थे। कहा करते थे कि संतान होने से मां-बाप की जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं। जब तक मनुष्य में यह सामर्थ्य न हो कि वह उसका भली प्रकार पालन पोषण और शिक्षण आदि कर सके तब तक उसकी संतान से देश, जाति और निज का कुछ भी कल्याण नहीं हो सकता। पहले तो कभी-कभी बालकों को हंसते-खेलते देखकर उनके हृदय पर चोट भी लगती थी, परंतु अब अपने अनेक देश-भाइयों की तरह वे भी शारीरिक व्याधियों से ग्रस्त रहने लगे। अब किस्से कहानियों के बदले धार्मिक काव्यों से उनका अधिक मनोरंजन होता था। अब संतान का खयाल करते ही उन्हें भय-सा लगता था।

पर, गोदावरी इतनी जल्दी निराश होने वाली न थी। पहले तो वह देवी देवता, गंडे-ताबीज और यंत्र-मंत्र आदि की शरण लेती रही, परंतु जब उसने देखा कि ये औषधियां कुछ काम नहीं करती तब वह एक महौषधि की फिक्र में लगी जो कायाकल्प से कम नहीं थी। उसने महीनों, बरसों इसी चिंता-सागर में गोते लगाते काटे। उसने दिल को बहुत समझाया, परन्तु मन में जो बात समा गयी थी वह किसी तरह न निकली। उसे बड़ा भारी आत्मत्याग करना पड़ेगा। शायद पति-प्रेम के सदृश अनमोल रत्न भी उसके हाथ से निकल जाये, पर क्या ऐसा हो सकता है? पंद्रह वर्ष तक लगातार जिस प्रेम के वृक्ष की उसने सेवा की है क्या वह हवा का एक झोंका भी न सह सकेगा।

गोदावरी ने अंत में अपने प्रबल विचारों के आगे सिर झुका दिया। अब सौत का शुभागमन करने के लिए वह तैयार हो गयी थी।

पंडित देवीदत्त गोदावरी का यह प्रस्ताव सुनकर स्तम्भित हो गये। उन्होंने अनुमान किया कि या तो यह प्रेम की परीक्षा कर रही है या मेरा मन लेना चाहती है। उन्होंने उसकी बात हंसकर टाल दी। पर जब गोदावरी ने गंभीर भाव से कहा, तुम इसे हंसी मत समझो, मैं अपने हृदय से कहती हूं कि संतान का मुंह देखने के लिए मैं सौत से छाती पर मूंग दलवाने के लिए भी तैयार हूं तब तो उनका संदेह जाता रहा। इतने ऊंचे और पवित्र भाव से भरी हुई गोदावरी को उन्होंने गले से लिपटा लिया। वे बोले, मुझसे यह न होगा। मुझे संतान की अभिलाषा नहीं।

गोदावरी ने जोर देकर कहा, तुमको न हो, मुझे तो है। अगर अपनी खातिर से नहीं तो तुम्हें मेरी खातिर से यह काम करना ही पड़ेगा।

पंडितजी सरल स्वभाव के आदमी थे। हामी तो उन्होंने न भरी, पर बार-बार कहने से वे कुछ-कुछ राजी अवश्य हो गये। उस तरफ से इसी की देर थी। पंडित जी को कुछ भी परिश्रम न करना पड़ा। गोदावरी की कार्य-कुशलता ने सब काम उनके लिए सुलभ कर दिया। उसके इस काम के लिए आपने पास से केवल रुपए ही नहीं निकाले, किंतु अपने गहने और कपड़े भी अर्पण कर दिए। लोक-निंदा का भय इस मार्ग में सबसे बड़ा कांटा था। देवीदत्त मन में विचार करने लगे कि जब मैं मौर सजा कर चलूंगा। तब लोग मुझे क्या कहेंगे? मेरे दफ्तर के मित्र मेरी हंसी उड़ायेंगे और मुस्कुराते हुए कनखियों से मेरी ओर देखेंगे। उनके वे कटाक्ष छुरी से भी ज्यादा तेज होंगे। उस समय मैं क्या करूंगा?

गोदावरी ने अपने गांव में जाकर इस कार्य को आरम्भ कर दिया और इसे निर्विघ्न समाप्त कर डाला। नयी बहू घर में आ गयी। उस समय गोदावरी ऐसी प्रसन्न मालूम हुई मानों वह बेटे का ब्याह कर लायी हो। वह खूब गाती बजाती रही। उसे क्या मालूम था कि शीघ्र ही उसे इस गाने के बदले रोना पड़ेगा।

कई मास बीत गये। गोदावरी अपनी सौत पर इस तरह शासन करती थी मानो वह उसकी सास हो, तथापि वह यह बात कदापि न भूलती थी कि मैं वास्तव में उसकी सास नहीं हूं। उधर गोमती को अपनी स्थिति का पूरा ख्याल रहता था। इसी कारण सास के शासन की तरह कठोर न रहने पर भी गोदावरी का शासन उसे अप्रिय होता था। उसे अपनी छोटी-मोटी जरूरतों के लिए भी गोदावरी से कहते संकोच होता था।

कुछ दिनों बाद गोदावरी के स्वभाव में एक विशेष परिवर्तन दिखाई देने लगा। वह पंडितजी को घर में आते-जाते बड़ी तीव्र दृष्टि से देखने लगी। उसकी स्वाभाविक गंभीरता अब मानो लोप-सी हो गयी, जरा-सी बात भी उसके पेट में नहीं पचती। अब पंडितजी दफ्तर से आते तब गोदावरी उनके पास घंटे बैठी गोमती का वृत्तांत सुनाया करती। वृत्तांत-कथन में बहुत-सी ऐसी छोटी-मोटी बातें भी होती थी कि जब कथा समाप्त होती तब पंडितजी के हृदय से बोझ-सा उतर जाता। गोदावरी क्यों इतनी मृदुभाषिणी हो गयी थी, इसका कारण समझना मुश्किल है। शायद अब वह गोमती से डरती थी। उसके सौंदर्य से, उसके जीवन से, उसके लज्जायुक्त नेत्रों से शायद वह अपने को पराभूत समझती। बांध को तोड़कर वह पानी की धारा को मिट्टी के ढेलों से रोकना चाहती थी।

एक दिन गोदावरी ने गोमती से मीठा चावल पकाने को कहा। शायद वह रक्षाबंधन का दिन था। गोमती ने कहा, शक्कर नहीं है। गोदावरी यह सुनते ही विस्मित हो उठी। उतनी शक्कर इतनी जल्दी कैसे उठ गयी। जिसे छाती फाड़कर कमाना पड़ता है, उसे अखरता है, खाने वाले क्या जाने?

जब पंडितजी दफ्तर से आये तब जरा-सी बात बड़ा विस्तृत रूप धारण करके उनके कानों में पहुंची। थोड़ी देर के लिए पंडितजी के दिल में भी यह शंका हुई कि गोमती को कहीं भस्मक रोग तो नहीं हो गया।

ऐसी ही घटना एक बार फिर हुई। पंडितजी को बवासीर की शिकायत थी। लाल मिर्च वह बिलकुल न खाते थे। गोदावरी जब रसोई बनाती थी तब वह लाल मिर्च रसोई घर में लाती ही न थी। गोमती ने एक दिन दाल में मसाले के साथ थोड़ी-सी लाल मिर्च भी डाल दी। पंडितजी ने दाल कम खायी। पर गोदावरी गोमती के पीछे पड़ गई। ऐंठ कर वह बोली - ऐसी जीभ जल क्यों नहीं जाती?

पंडितजी बड़े ही सीधे आदमी थे। दफ्तर से आये, खाना खाया, पड़ कर सो रहे। वे एक साप्ताहिक पत्र मंगाते थे। उसे कभी-कभी महीनों खोलने की नौबत न आती थी। जिस काम में जरा भी कष्ट या परिश्रम होता, उससे वे कोसों दूर भागते थे। कभी उनके दफ्तर में थियेटर के ‘पास' मुफ्त मिला करते थे। पर पंडितजी उनसे कभी काम नहीं लेते, और ही लोग उनसे मांग ले जाया करते। रामलीला या कोई मेला तो उन्होंने शायद नौकरी करने के बाद फिर कभी देखा वहीं। गोदावरी उनकी प्रकृति का परिचय अच्छी तरह पा चुकी थी। पंडित जी भी प्रत्येक विषय में गोदावरी के मतानुसार चलने में अपनी कुशल समझते।

पर रुई-सी मुलायम वस्तु भी दबकर कठोर हो जाती है। पंडितजी को यह आठों पहर की चह-चह असह्य सी प्रतीत होती, कभी-कभी मन में झुंझलाने भी लगते। इच्छा-शक्ति जो इतने दिनों तक बेकार पड़ी रहने से निर्बल-सी हो गयी थी, अब कुछ सजीव-सी होने लगी थी। पंडितजी यह मानते थे कि गोदावरी ने सौत को घर लाने में बड़ा भारी त्याग किया है। उसका यह त्याग अलौकिक कहा जा सकता है, परन्तु उसके त्याग का भार जो कुछ है, वह मुझ पर है, गोमती पर उसका क्या एहसान? यहां उसे कौन-सा सुख है जिसके लिए वह फटकार-पर-फटकार सहे? पति मिला है, वह बूढ़ा और सदा रोगी, घर मिला है वह ऐसा कि अगर नौकरी छूट जाये तो कल चूल्हा न जले। इस दशा में गोदावरी का यह स्नेह-रहित बर्ताव उन्हें बहुत अनुचित मालूम होता।

गोदावरी की दृष्टि इतनी स्थूल न थी कि उसे पंडितजी के मन के भाव नजर न आवें। उनके मन में जो विचार उत्पन्न होते थे, वे सब गोदावरी को उनके मुख पर अंकित-से दिखाई पड़ते। यह जानकारी उसके हृदय में एक ओर गोमती के प्रति ईर्ष्या की प्रचंड अग्नि दहका देती, दूसरी ओर पंडित देवीदत्त पर निष्ठुरता और स्वार्थप्रियता का दोषारोपण कराती। फल यह हुआ कि मनोमालिन्य दिन-दिन बढ़ता गया।

गोदावरी ने धीरे-धीरे पंडितजी से गोमती की बातचीत करनी छोड़ दी, मानो उसके निकट गोमती घर में थी ही नहीं। न उसके खाने-पीने की वह सुधि लेती, न कपड़े-लत्ते की। एक बार कई दिनों तक उसे जलपान के लिए कुछ भी न मिला। पंडितजी तो आलसी जीव थे। वे इन अत्याचारों को देखा करते, पर अपने शांति-सागर में घोर उपद्रव मच जाने के भय से किसी से कुछ न कहते। तथापि इस छिछले अन्याय ने उनकी महती सहन-शक्ति को भी मथ डाला। एक दिन उन्होंने गोदावरी से डरते-डरते कहा, क्या आजकल जलपान के लिए मिठाई-विठाई नहीं आती?

गोदावरी ने कुद्ध होकर जवाब दिया, तुम लाते ही नहीं तो आए कहां से! कोई नौकर बैठा है?

देवीदत्त को गोदावरी के ये कठोर वचन तीर-से लगे। आज तक गोदावरी ने उनसे ऐसी रोष-पूर्ण बात कभी न की थी।

वे बोले, धीरे बोलो, झुंझलाने की तो कोई बात बही है। गोदावरी ने आंखें नीची करके कहा, मुझे तो जैसा आता है वैसे बोलती हूं। दूसरी की सी मधुर बोली कहां से लाऊं। देवीदत्त ने जरा गरम होकर कहा, आजकल मुझे तुम्हारे मिज़ाज का कुछ रंग ही नहीं मालूम होता। बात-बात पर उलझती रहती हो।

गोदावरी का चेहरा क्रोधाग्नि से लाल हो गया। वह बैठी थी, खड़ी हो गई। उसके होंठ फड़कने लगे। वह बोली, मेरी कोई बात अब तुमको क्यों अच्छी लगेगी। अब मैं सिर से पैर तक दोषों से भरी हुई हूं, अब और लोग तुम्हारे मन का काम करेंगे। मुझसे नहीं हो सकता।यह लो संदूक की कुंजी! अपने रुपये-पैसे संभाली, यह रोज-रोज की झंझट मेरे मान की नहीं। जब तक निभा, निभाया। अब नहीं निभ सकता।

पंडित देवीदत्त मानो मूर्च्छित-से हो गए। जिस शांति-भंग का उन्हें भय था उसने अत्यंत भयंकर रूप धारण करके घर में प्रवेश किया। वह कुछ भी न बोल सके। इस समय उनके अधिक बोलने से बात बढ़ जाने का भय था। वह बाहर चले आए और सोचने लगे कि मैंने गोदावरी के साथ कौन-सा अनुचित व्यवहार किया है। उनके ध्यान में आया कि गोदावरी के हाथ से निकलकर घर का प्रबंध कैसे हो सकेगा? इस थोड़ी-सी आमदनी में वह न जाने किस प्रकार काम चलाती थी? क्या-क्या उपाय वह करती थी? अब न जाने नारायण कैसे पार लगाएंगे उसे मनाना पड़ेगा, और हो ही क्या सकता है। गोमती भला कर सकती है, सारा बोझ मेरे ही सिर पड़ेगा। मानेगी तो, पर मुश्किल से।

परंतु पंडितजी की ये शुभकामनाएं निष्फल हुई। संदूक की कुंजी विषैली नागिन की तरह वहीं आंगन में ज्यों-की-त्यों तीन दिन तक पड़ी रही। किसी को उसके निकट जाने का साहस न हुआ। चौथे दिन पंडितजी ने मानों जान पर खेलकर उस कुंजी को उठा लिया। उस समय उन्हें ऐसा मालूम हुआ मानो किसी ने उनके सिर पर पहाड़ उठकर रख दिया। आलसी आदमियों को अपने नियमित मार्ग से तिल भर भी हटना बड़ा कठिन मालूम होता है।

यद्यपि पंडितजी जानते थे कि मैं अपने दफ्तर के कारण इस कार्य को संभालने में असमर्थ हूं तथापि उनसे इतनी ठिठाई न हो सकी कि वह कुंजी गोमती को दें। पर यह केवल दिखावा ही भर था। कुंजी उन्हीं के पास रहती थी, काम सब गोमती को करना पड़ता था। इस प्रकार गृहस्थी के शासन का अंतिम साधन भी गोदावरी के हाथ से निकल गया। गृहिणी के नाम के साथ जो मर्यादा और सम्मान था वह भी गोदावरी के पास से उसी कुंजी के साथ चला गया। देखते-देखते घर की महरी और पड़ोस की स्त्रियों के बर्ताव में भी बहुत अंतर पड़ गया। गोदावरी अब पदच्युता रानी की तरह थी। उसका अधिकार अब केवल दूसरों की सहानुभूति पर ही रह गया था।

गृहस्थी के काम-काज में परिवर्तन होते ही गोदावरी के स्वभाव में भी शोकजनक परिवर्तन हो गया। ईर्ष्या मन में रहने वाली वस्तु नहीं। आठों पहर पास-पड़ोस के घरों में यही चर्चा होने लगी, देखो, दुनिया कैसे मतलब की है। बेचारी ने लड़-झगड़ कर ब्याह कराया, जान -बूझकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी। यहां तक कि अपने गहने-कपड़े तक उतार दिए। पर अब रोते-रोते आंचल भीगता है। सौत तो सौत ही है, पति ने भी उसे आंखों से गिरा दिया। बस, अब दासी की तरह घर में पड़ी-पड़ी पेट जिलाया करे। यह जीना भी कोई जीना है?

ये सहानुभूति पूर्ण बात सुनकर गोदावरी की ईर्ष्याग्नि और भी प्रबल होती जाती थी। इसे इतना न सूझता था कि वह मौखिक संवेदनाएं अधिकांश में उस मनोविकार से पैदा हुई हैं जिससे मनुष्यों को हानि और दुःख पर हंसने में विशेष आनंद आता है।

गोदावरी की जिस बात का पूर्ण विश्वास और पंडितजी को जिसका बड़ा भय था, वह न हुई। घर के काम-काज में कोई विघ्न-बाधा, कोई रुकावट न पड़ी। हां, अनुभव न होने के कारण पंडितजी का प्रबंध गोदावरी के प्रबंध जैसा अच्छा न था। कुछ खर्च ज्यादा पड़ जाता था। पर काम भली-भांति चला जाता था। हां, गोदावरी को गोमती के सभी काम दोषपूर्ण दिखाई देते थे। ईर्ष्या में अग्नि है। परंतु अग्नि का गुण उसमें नहीं। वह हृदय को फैलाने के बदले और भी संकीर्ण कर देती है। अब घर में कुछ हानि हो जाने से गोदावरी को दुःख के बदले आनंद होता। बरसात के दिन थे। कई दिन तक सूर्यनारायण के दर्शन न हुए। संदूक में रखे हुए कपड़ों में फफूंदी लग गयी। तेल के अचार बिगड़ गए। गोदावरी को यह सब देखकर रत्ती भर भी दुःख न हुआ। हां, दो चार जली-कटी सुनाने का अवसर अवश्य मिल गया। मालकिन ही बनना आता है कि मालकिन का काम करना भी।

पंडित देवीदत्त की प्रकृति में भी अब नया रंग नजर आने लगा। जब तक गोदावरी अपनी कार्य-परायणता से घर का सारा बोझ संभाले थी तब तक उनको कभी किसी चीज की कमी नहीं खली। यहां तक कि शाक-भाजी के लिए भी उन्हें बाजार नहीं जाना पड़ा। पर अब गोदावरी उन्हें दिन में कई बार बाजार दौड़ते देखती। गृहस्थी का प्रबंध ठीक न रहने से बहुधा जरूरी चीजों के लिए उन्हें बाजार ऐन वक्त पर जाना पड़ता। गोदावरी यह कौतुक देखती और सुना-सुनाकर कहती, यही महाराज हैं कि एक तिनका उठाने के लिए भी न उठते थे। अब देखती हूं दिन में दस दफा बाजार में खड़े रहते हैं। अब मैं इन्हें कभी यह कहते नहीं सुनती कि मेरे लिखने-पढ़ने में हर्ज होगा।

गोदावरी को इस बात का एक बार परिचय मिल चुका था कि पंडितजी बाजार-हाट के काम में कुशल नहीं है। इसलिए जब उसे कपड़े की जरूरत होती तब वह अपने पड़ोस के एक बूढ़े लाला साहब से मंगवाया करती थी। पंडितजी को यह बात भूल-सी गयी थी कि गोदावरी को साड़ियों की भी जरूरत पड़ती है। उनके सिर से तो जितना बोझ कोई हटा दे उतना ही अच्छा था। खुद वे भी वही कपड़े पहनते थे जो गोदावरी मंगाकर उन्हें दे देती थी। पंडितजी को नए फैशन और नये नमूने से कोई प्रयोजन न था। पर अब कपड़ों के लिए भी उन्हीं को बाजार जाना पड़ता है। एक बार गोमती के पास साड़ियां न थी। पंडितजी बाजार गए तो एक बहुत अच्छा-सा जोड़ा उसके लिए ले आये। बजाज ने मनमाने दाम लिये। उधार सौदा लाने में पंडितजी जरा भी आगा-पीछा न करते थे। गोमती ने वह जोड़ा गोदावरी को दिखाया। गोदावरी ने देखा और मुंह फेर कर रुखाई से बोली, भला तुमने उन्हें कपड़े लाना तो सिखा दिया। मुझे तो सोलह वर्ष बीत गए, उनके हाथ का लाया हुआ एक कपड़ा स्वप्न में भी पहनना नसीब न हुआ।

ऐसी घटनाएं गोदावरी की ईर्ष्याद्वेष को और भी प्रज्ज्वलित कर देती थीं। जब तक उसे यह विश्वास था कि पंडित जी स्वभाव से ही रूखे है तब तक उसे संतोष था। परन्तु अब उनकी ये नयी-नयी तरंगें देखकर उसे मालूम हुआ कि जिस प्रीति को मैं सैकड़ों यत्न करके भी न पा सकी, उसे इस रमणी ने केवल अपने यौवन से जीत लिया। उसे अब निश्चय हुआ कि मैं जिसे सच्चा प्रेम समझ रही थी वह वास्तव में कपटपूर्ण था। वह निरा स्वार्थ था।

दैवयोग से इन्हीं दिनों गोमती बीमार पड़ी। उसे उठने-बैठने की भी शक्ति न रही। गोदावरी रसोई बनाने लगी, पर उसे इसका निश्चय नहीं था कि गोमती वास्तव में बीमार है। उसे यही ख्याल था कि मुझसे खाना पकवाने के लिए ही दोनों प्राणियों ने यह स्वांग रचा है। पड़ोस की स्त्रियों से कहती कि लौंडी बनने में इतनी ही कसर थी वह पूरी हो गयी।

पंडितजी को आजकल खाना खाते वक्त भाग-भाग सी पड़ जाती है। वे न जाने क्यों गोदावरी से एकांत में बातचीत करते डरते हैं। न मालूम कैसी कठोर और हृदय-विदारक बातें वह सुनाने लगे। इसीलिए खाना खाते वक्त वे डरते थे कि कहीं उस भयंकर समय का आगमन न हो जाये। गोदावरी अपने तीव्र नेत्रों से उनके मन का भाव ताड़ जाती थी, पर मन-ही-मन में ऐंठ कर रह जाती थी।

एक दिन उससे न रहा गया। वह बोली, क्या मुझसे बोलने की भी मनाही कर दी गयी है? देखती हूं कहीं तो रात-रात भर बातों का तार नहीं टूटता, पर मेरे सामने मुंह खोलने की भी कसम-सी खायी है। घर का रंग ढंग देखते हो न अब तो काम तुम्हारे इच्छानुसार चल रहा है न?

पंडितजी ने सिर नीचा किए हुए उत्तर दिया, उंह जैसे चलता है वैसे चलता है। उस फिक्र से क्या अपनी जान दे दूं? जब तुम यह चाहती हो कि घर मिट्टी में मिल जाये तब फिर मेरा क्या वश है?

इस पर गोदावरी ने बड़े कठोर वचन कहे। बात बढ़ गयी। पंडितजी चौके पर से उठ आये। गोदावरी ने कसम दिलाकर उन्हें बिठाना चाहा, पर वे क्षण भर भी न रुके, तब उसने भी रसोई उठा दी। सारे घर को उपवास करना पड़ा।

गोमती में एक विचित्रता यह थी कि वह कड़ी-से-कड़ी बात सहन कर सकती थी पर भूख सहन करना उसके लिए बड़ा कठिन था। इसलिए कोई व्रत भी न रखती थी। हां, कहने-सुनने को जन्माष्टमी रख लेती थी। पर आजकल बीमारी के कारण उसे और भी भूख लगती थी। जब उसने देखा कि दोपहर होने को आयी और भोजन मिलने के कोई लक्षण नहीं, तब विवश होकर बाजार से मिठाई मंगायी। सम्भव है उसने गोदावरी को जलाने के लिए ही खेल खेला हो, क्योंकि कोई भी एक वक्त खाना न खाने से मर नहीं जाता। गोदावरी के सिर से पैर तक आग लग गयी। उसने भी तुरंत मिठाइयां मंगवाईं। कई वर्ष के बाद आज उसने पेट भर मिठाइयां खायी। ये सब ईर्ष्या के कौतुक है।

जो गोदावरी दोपहर के पहले मुंह में पानी न डालती थी, वही अब प्रातःकाल ही कुछ जलपान किए बिना नहीं रह सकती। सिर में वह हमेशा मीठा तेल डालती थी, पर अब मीठे तेल से उसके सिर में पीड़ा होने लगती थी। पान खाने का उसे नया व्यसन लग गया। ईर्ष्या ने उसे नयी नवेली बहू बना दिया।

जन्माष्टमी का शुभ दिन आया। पंडितजी का स्वाभाविक आलस्य इन दो-तीन दिनों के लिए गायब हो जाता था। बड़े उत्साह से झांकी बनाने में लग जाते थे। गोदावरी यह व्रत बिना जल के रखती थी और पंडितजी तो कृष्ण के उपासक ही थे। अब उनके अनुरोध से गोमती ने भी निर्जल व्रत रखने का साहस किया, पर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ जब महरी ने आकर उससे कहा, बड़ी बहू निर्जल न रहेगी उनके लिए फलाहार मंगा दो।

संध्या समय गोदावरी ने मान-मंदिर जाने के लिए इक्के की फरमाइश की। गोमती को यह फरमाइश बुरी मालूम हुई। आज के दिन इक्के का किराया बहुत बढ़ जाता था। मान-मंदिर कुछ दूर भी नहीं था। इससे वह चिढ़ कर बोली - व्यर्थ रुपया क्यों फेंका जाए? मंदिर कौन बड़ी दूर है। पांव-पांव क्यों नहीं चली जाती। हुक्म चला देना तो सहज है। अखरता उसे है जो बैल की तरह कमाता है।

तीन साल पहले गोमती ने इसी तरह की बातें गोदावरी के मुंह से सुनी थी। आज गोदावरी को भी गोमती के मुंह से सुननी पड़ीं। समय की गति!

इन दिनों गोदावरी बड़े उदास भाव से खाना बनाती। पंडितजी के पथ्यापथ्य के विषय में भी अब उसे पहले की-सी चिंता न थी। एक दिन उसने महरी से कहा कि अंदाज से मसाले निकालकर पीस ले, मसाले दाल में पड़े तो मिर्च जरा अधिक तेज हो गयी। मारे भय से पंडितजी से वह न खायी गयी। अन्य आलसी मनुष्यों की तरह चटपटी वस्तुएं उन्हें भी बहुत प्रिय थी, परंतु वह रोग से हारे हुए थे। गोमती ने जब यह सुना तब भौहें चढ़ाकर बोली, क्या बुढ़ापे में जबान गज भर की हो गई है।

कुछ इसी तरह से कटु-वाक्य एक बार गोदावरी ने भी कहे थे। आज उसकी बारी सुनने की थी।

आज गोदावरी गंगा से गले मिलने आयी है। तीन साल हुए, वह वर और वधू को लेकर गंगाजी को पुष्प और दूध चढ़ाने गयी थी। आज वह अपने प्राण समर्पण करने आयी है। आज वह गंगाजी की आनंदमयी लहरों में विश्राम करना चाहती है।

गोदावरी को अब उस घर में एक क्षण रहना भी दुस्सह हो गया था। जिस घर में रानी बनकर रही, उसी में चेरी बनकर रहना उस जैसी सगर्वा स्त्री के लिए असम्भव था।

अब इस घर में गोदावरी का स्नेह उस पुरानी रस्सी की तरह था जो बराबर गांठ देने पर भी कहीं-न-कहीं से टूट ही जाती है। उसे गंगाजी की शरण लेने के सिवाय और कोई उपाय न सूझता था।

कई दिल हुए, उसके मुंह से बार-बार जान देने की धमकी सुन पंडितजी खिजलाकर बोल उठे, तुम किसी तरह मर भी तो जाती। गोदावरी उन विष भरे शब्दों को अब तक न भूली थी। चुभने वाली बातें उसको कभी न भूलती थी। आज गोमती ने भी वही बातें कहीं, यद्यपि उसने बहुत कुछ सहन करने के पीछे कठोर बातें कहीं थी तथापि गोदावरी को अपनी बातें तो भूल-सी गई थी। केवल गोमती और पंडितजी के वाक्य ही उसके कानों में गूंज रहे थे। पंडितजी ने उसे डांटा तक नहीं। मुझ पर ऐसा घोर अन्याय और वे मुंह तक न खोलें ।

आज सब लोगों के सो जाने पर गोदावरी घर से बाहर निकली, आकाश में काली घटाएं छायी हुई थी। वर्षा की झड़ी लग रही थी। उधर उसके नेत्रों से भी आंसुओं की धारा बह रही थी। प्रेम का बंधन कितना कोमल है और दृढ़ भी कितना! कितना कोमल है अपमान के सामने, दृढ़ है वियोग के सामने! गोदावरी चौखट पर खड़ी-खड़ी घंटों रोती रही, कितनी ही पिछली बातें उसे याद आती थी। हां! कभी यहां उसके लिए प्रेम भी था, मान भी था, जीवन का सुख भी था। शीघ्र ही पंडितजी के वे कठोर शब्द भी याद आ गये। आंखों से फिर पानी की धारा बहने लगी। गोदावरी घर से चल खड़ी हुई।

इस समय यदि पंडित देवीदत्त नंगे सिर, नंगे पांव पानी में भीगते दौड़ते आते और गोदावरी के कम्पित हाथों को पकड़कर अपने धड़कते हुए हृदय से उसे लगाकर कहते, ‘प्रिय!' इससे अधिक और उनके मुंह से कुछ भी न निकलता, तो भी क्या गोदावरी अपने विचारों पर स्थिर रह सकती?

कुआर का महीना था। रात को गंगा की लहरों की गरज बड़ी भयानक मालूम होती थी। साथ ही जब बिजली तड़क जाती तब उसकी उछलती हुई लहरें प्रकाश से उज्ज्वल हो जाती थी। मानों प्रकाश उन्मत्त हाथी का रूप धारण कर किलोल कर रहा हो। जीवन-संग्राम का एक विशाल दृश्य आंखों के सामने आ रहा था।

गोदावरी के हृदय में भी इस समय विचार की अनेक लहरें बड़े वेग से उठती, आपस में टकराती और ऐंठती हुई लोप हो जाती थी। कहां? अंधकार में।

क्या वह गरजने, उमड़ने वाली गंगा गोदावरी को शांति प्रदान कर सकती है? उसकी लहरों में सुधासम मधुर ध्वनि नहीं है और न उसमें करुणा का विकास ही है। वह इस समय उद्दंडता और निर्दयता की भीषण मूर्ति धारण किये हुए है।

गोदावरी किनारे बैठी क्या सोच रही थी, कौन कह सकता है? क्या अब उसे यह खटका नहीं लगा कि पंडित देवीदत्त आते न होंगे? प्रेम का बंधन कितना मजबूत होता है।

उसी अंधकार में ईर्ष्या, निष्ठुरता और नैराश्य की सताई हुई वह अबला गंगा की गोद में गिर पड़ी। लहरें झपटी और उसे निगल गयीं।

सवेरा हुआ। गोदावरी घर में नहीं थी। उसकी चारपाई पर यह पत्र पड़ा हुआ था:

‘स्वामी, संसार में सिवाय आपके मेरा और कौन स्नेही था? मैंने अपना सर्वस्व आपके सुख की भेंट कर दिया। अब आपका सुख इसी में है कि मैं इस संसार से लोप हो जाऊं। इसी लिए यह प्राण आपकी भेंट है, मुझसे जो कुछ अपराध हुए हों, क्षमा कीजिएगा। ईश्वर सदा आपको सुखी रखे।'

पंडितजी इस पत्र को देखते की मूर्छित होकर गिर पड़े। गोमती रोने लगी। पर क्या वे उसके विलाप के आंसू थे?


सौत का सारांश

पंडित देवीदत्त और गोदावरी का दांपत्य जीवन पंद्रह वर्षों से सुख और शांति के साथ बीत रहा था, किंतु उनके कोई संतान नहीं थी। देवीदत्त स्वभाव से संतोषी, सीधे-सादे और आलसी प्रवृत्ति के व्यक्ति थे; वे संतान के अभाव में भी अपनी पत्नी से संतुष्ट थे और दूसरा विवाह नहीं करना चाहते थे। दूसरी ओर, गोदावरी संतान-हीनता के सामाजिक और व्यक्तिगत दुःख से उबर नहीं पा रही थी। देवी-देवताओं और गंडे-ताबीजों के निष्फल होने के बाद उसने एक बड़ा आत्मघाती निर्णय लिया—उसने पति को दूसरा विवाह करने के लिए विवश कर दिया। गोदावरी ने अपने ही गहने और पैसे खर्च करके गोमती नामक एक युवती से देवीदत्त का विवाह करवा दिया और उसे घर में ऐसे लेकर आई मानो अपने ही बेटे की बहू लाई हो।

किंतु विवाह के कुछ ही दिनों बाद घर का वातावरण बदलने लगा। गोदावरी ने सोचा था कि वह गोमती पर सास की तरह शासन करेगी, परंतु गोमती की सुंदरता, यौवन और पति के साथ उसके स्वाभाविक संबंधों को देखकर गोदावरी के भीतर ईर्ष्या और सौतिया डाह की आग सुलगने लगी। वह छोटी-छोटी बातों, जैसे शक्कर का खर्च होना या दाल में मिर्च पड़ जाना, पर गोमती को जली-कटी सुनाने लगी। पंडित देवीदत्त, जो अब तक गोदावरी के प्रत्येक निर्णय को चुपचाप मानते थे, अब गोमती के प्रति गोदावरी के अन्यायपूर्ण और कटु व्यवहार को देखकर क्षुब्ध रहने लगे और गोमती के पक्ष में बोलने लगे।

एक दिन विवाद चरम पर पहुँच गया और गोदावरी ने गुस्से में आकर संदूक और गृहस्थी की चाबी आँगन में फेंक दी। तीन दिनों तक वह चाबी वहीं पड़ी रही, अंततः चौथे दिन विवश होकर पंडितजी ने चाबी उठा ली और घर का प्रबंध गोमती के हाथ में आ गया। चाबी हाथ से निकलते ही गोदावरी की स्थिति घर में एक पदच्युत रानी जैसी हो गई; महरी और पड़ोस की स्त्रियों के व्यवहार में भी अंतर आ गया। पंडितजी, जो पहले कभी एक तिनका नहीं उठाते थे, अब गोमती की जरूरतों के लिए दिन में कई बार बाजार दौड़ने लगे और उसके लिए सुंदर साड़ियाँ खरीद लाए। यह देखकर गोदावरी का दिल टूट गया कि जिस प्रेम को उसने पंद्रह वर्षों के समर्पण से सींचा था, उसे गोमती ने केवल अपने यौवन के आकर्षण से जीत लिया।

घर में अशांति और मनमुटाव इतना बढ़ गया कि दोनों स्त्रियों में असहयोग और तकरार रहने लगी। जन्माष्टमी के अवसर पर जब गोदावरी ने मान-मंदिर जाने के लिए इक्के की माँग की, तो गोमती ने उसे वही ताने मारे जो कभी गोदावरी ने उसे दिए थे। एक दिन की तीखी बहस में पंडितजी के मुँह से झल्लाहट में निकल गया—"तुम किसी तरह मर भी तो जाती।" यह वाक्य गोदावरी के सीने में तीर की तरह चुभ गया। एक बरसात की अँधेरी रात में, उपेक्षा, अपमान और निराशा से जर्जर गोदावरी घर छोड़कर गंगा तट पर पहुँची। उसने अपने स्वामी के नाम एक मार्मिक विदाई पत्र छोड़ा और उफनती हुई गंगा में छलांग लगा दी। सुबह जब पंडितजी ने पत्र पढ़ा, तो वे मूर्छित होकर गिर पड़े।


प्रकाशन इतिहास

प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • संतान-लालसा और आत्मत्याग की परिणति: गोदावरी संतान की चाह में अपने दांपत्य का सबसे बड़ा त्याग करती है, लेकिन कहानी यह सिद्ध करती है कि सामाजिक दबाव में किया गया अव्यावहारिक त्याग अक्सर आत्मघाती सिद्ध होता है।
  • सौतिया डाह और मानवीय मनोविज्ञान: प्रेमचंद ने स्त्री मन की जटिलताओं का अत्यंत गहरा विश्लेषण किया है। त्याग की महान भावना के बावजूद एक स्त्री के लिए अपने पति के प्रेम और घर के एकाधिकार को दूसरी स्त्री के साथ बाँटना असहनीय हो जाता है।
  • अधिकार और प्रतिष्ठा का छिनना: घर और संदूक की चाबी केवल घरेलू व्यवस्था की नहीं, बल्कि परिवार में सत्ता और मर्यादा की प्रतीक है। चाबी के हाथ से जाते ही गोदावरी का मालकिन से आश्रिता बन जाना घरेलू राजनीति की कड़वी सच्चाई को दर्शाता है।
  • पुरुष मानसिकता और निष्ठा का दोहरापन: पंडित देवीदत्त जो पहले गोदावरी के प्रति पूर्णतः निष्ठावान दिखते थे, गोमती के आते ही धीरे-धीरे गोदावरी के प्रति निष्ठुर और उपेक्षापूर्ण हो जाते हैं। उनका बदलता व्यवहार गोदावरी को अवसाद और आत्महत्या की ओर ले जाता है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'सौत' भारतीय समाज में बहुविवाह, निःसंतानता के सामाजिक अभिशाप और पारिवारिक विघटन की एक मर्मस्पर्शी त्रासदी है। यह कहानी यह संदेश देती है कि मानवीय स्वभाव और भावनात्मक सीमाओं की उपेक्षा करके किया गया समझौता अंततः विनाश और अपार पश्चाताप को ही जन्म देता है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "सौत." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1915, https://munshipremchand.com/works/short-stories/saut. Accessed 22 Sep. 2026.