प्रतिज्ञा का मूल पाठ
देश में घोर अकाल पड़ा हुआ था। साल भर से पानी की बूँद भी नहीं पड़ी थी। खेतों में धूल उड़ती थी। घास तक जल गयी थी, न कहीं अन्न था और न जल। लोग वृक्षों की छालें कूट-कूट कर खाते थे। अर्धरात्रि दोपहर के समान तप्त रहती और दोपहर को भूमि से अग्नि की ज्वाला निकलती थी। समस्त देश में हा-हाकार मचा हुआ था। लोगों के हृदय भुप्क हो गए थे। कोई किसी की सुधि लेनेवाला न था। सबके सब अपनी-अपनी विपत्ति में वावले हो रहे थे। इंद्र की आराधना नित्य होती थी। लोग देवस्थानों में जमा हो-होकर रोते और विलाप करते थे, पर कदाचित देवताओं में दया, वात्सलय क। लोप हो गया था; न पूजा-पाठ ही से कोई उपकार होता था, न यज्ञ तथा बलि से। ज्योतिणियों के द्वारों पर सदा भीड़ लगी रहती थी। एक वैज्ञानिक महाशय ने वैज्ञानिक साधनों से मेघों को आकर्षित करने का उद्योग किया; पर सारे प्रयत्न निष्फल हुए। इंद्रदेव न पसीजे, पानी न बरसा और प्रजा की अवस्था प्रतिक्षण बिगड़ती गई।
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अन्त में एक दिन लाखों हिन्दू प्रजा एकत्र होकर देश के बड़े महात्मा बाबा दुर्लभदास की सेवा में पहुँचा और उनके द्वार पर, गले पड़ जाने वालों की तरह, जा बैठी। पुसलमान प्रजा ने मौलाना शेख आबिद अली का दामन पकड़ा। ८ ॥ों महात्माओं के हृदयों में दया उत्पन्न हुई। बाबा दुर्लभदास ने समस्त देश के साधु-सन्तों को निमन्त्रित किया। औलिया आबिद अली ने मुल्लाओं तथा पीरों के पास कासिद रवाना किए। एक सप्ताह में चारों दिशाओं से साधुगण तथा मुल्ला लोग आकर जमा हो गए। भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों के सहस्रों प्रतिभाशाली सन्त पुरुषों ने पदार्पण किया। मुल्लाओं के झुण्ड-के-झुण्ड विराजमान हुए। धर्मज्ञ, ईश्वर-भक्त और सिद्ध पुरुषों का ऐसा विलक्षण समागम कभी देखने में नहीं आया था।
इनमें का प्रत्येक महात्मा अपने-अपने चमत्कारों तथा अलीकिक क्रृत्यों के लिए प्रसिद्ध था। लोगों को विश्वास था कि इनमें से यदि एक भी सिद्ध पुरुष मन से इच्छा करेगा, तो इन्द्र की शक्ति नहीं कि उस सिद्ध की आज्ञा भंग हो सके।
अस्तु, एक शुभ मुहूर्त देखकर बाबा दुर्लभदास और आबिद अली दल-बल के साथ, बड़ी धूमधाम से, निकले। आगे-आगे ऊँटों पर नगाड़े थे, उनके पीछे नाना प्रकार की साम्प्रदायिक पताकाएँ थीं। इनके पीछे शंख और घण्टे बज रहे थे। फिर साधुओं के दल, कोई हाथी पर सवार था और कोई सजे हुए घोड़े पर। शिष्य लोग छत्र लगाए, चँवर हिलाते चले आते थे। इस प्रकार यह जलूस नगर के चक्कर लगाता और दर्शकों को विस्मित करता हुआ एक ऊँचे पहाड़ी टीले पर जा पहुँचा। यहाँ साधुगण अपने-अपने आसन लगाकर बैठ गए और इन्द्र की आराधना करने लगे। किसी ने समाधि ली, कोई प्राणायाम में मगन हुआ, कोई अपने योगासनों के कौशल दिखाने लगा। सीताराम प्रेमियों ने उच्च स्वर से 'रामचरित मानस” की चौपाइयों का गान करना आरम्भ किया। कृष्ण केभक्त कीर्तन करने लगे।
पूरे तीन घण्टों तक ये महानुभाव अपने-अपने जप-तप में दत्तचित्त रहे। लाखों मनुष्य नीचे खड़े-खड़े इस दृश्य को कौतूहल से देख रहे थे, और बारम्बार आकाश की ओर ताक रहे थे कि मेघ उठ रहे हैं कि नहीं।
जब मध्याह्न हो गया, सूर्यदेव सिर पर पहुँचे, उनकी प्रखर किरणें लम्बवत् हुई, तब साधुगण व्याकुल होकर वहाँ से उठ खड़े हुए। प्रजा हताश हो गई ।-बाबा दुर्लभदास ने अन्त में उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा, “सज्जनो, तुम्हारे देश में इस दुर्दिन का आना तुम्हारे राजा के अन्याय और दुराचार का फल है। जब तक वे स्वयं अनुष्ठान न करेंगे, तब तक ईश्वर के कोप का निवारण न होगा। तुम लोग उन्हीं के चरणों पर गिरो। उन्हीं क॑ द्वारा तुम्हारा उद्धार होगा ।”
3
राजा पृथ्वीपाल सिंह एक दुश्चरित्र मनुष्य थे। अपने भोग-विलास के सिवा और कोई काम न था। महीनों ग्निवास से वाहर न निकलते थे। नृत्य, गान और आमोद-प्रमोद की सदा अधिकता रहा करती थी। सारे देश के भाँड़, भड़वे, लुच्चे और लफगे उनके
सहवासी थे। नित्य कई तरह की शराबें मेंगाई जाती थीं। नित्य-नूवन पुष्टिकारकत भोजन बनाए जाते थे। उन्हें कविता से प्रेम था; परन्तु केवल उसी कविता से जिससे विषय-वासनाओं को उत्तेजना मिलती है। वे स्वयं दादरे और ठुमरियाँ रचते थे और बहुधा नशे में मस्त होकर वेश्याओं के साथ नाचने लगते थे। उन्हें अभी तक इस घोर दुर्भिक्ष की खबर न थी। उनके मन्त्रीगण भी स्वार्थ-सेवी थे-देश की वास्तविक दशा को उनसे छिपाए रखने में वे अपना उपकार समझते थे। देश में चाहे कोई विपत्ति पड़े; परन्तु राज्य-दरवार के लिए रुपए कहीं-न-कहीं से निकल ही आते थे। प्रजा की यह मजाल कहाँ थी कि राज्य-व्यवहार में वह कुछ हस्तक्षेप कर सके ? वह राज" से उदासीन हो रही थी। जो विपत्ति आ पड़ती थी उसे तट येलती शी. पर ग़ाजा की विलास-शान्ति को भंग करने का इस्साहस न कर सकती थी।
किन्तु जब महात्मा दुर्लभदास ने स्पष्ट कर कह दिया कि उनके संकट का निवारण राजा के सिवा और किसी से न होगा, तब लोग विवश होकर राजभवन के सामने, मैदान में, जमा हो गए और जान पर खेलकर उच्च स्वर से दुहाई मचाने लगे। द्वारपालों तथा सैनिकों ने उन्हें वहाँ से बलात् हटाना चाहा, डॉटा, मारने की धमकी दी; पर इस समय लोग प्राण-समर्पण करने पर उद्यत थे। वे किसी भाँति वहाँ से न टले। उनका आर्तनाद प्रतिक्षण बढ़ता जाता था, यहाँ तक कि राजा के प्रमोदोल्लास में विध्न हो गया। उन्होंने क्रुद्ध होकर द्वारपालों से पूछा, “ये कौन हैं जो शोर मधा रहे हैं ?”
एक द्वारपाल ने डरते-डरते कहा, “दीनबन्धु, नगर-निवासियों का असंख्य समूह राजभवन के सामने खड़ा है ओर किसी प्रकार नहीं हटता |”
राजा, “वे लोग क्या चाहते हैं »”
एक मन्त्री ने उत्तर दिया, 'धर्मावतार, कुछ मालूम नहीं कि उनकी क्या इच्छा है। वे कहते हैं कि वे महाराज कं दर्शन करेंगे।'
गजा, “आज उन्हें मेरे दर्शन का शौक क्यों हुआ है ?”
ए>६., “दीनानाथ, मैंने बहुत समझाया, किन्तु वे कहते हैं कि दर्शन किए विना वे कदापि वापिस न जायेंगे ।
राजा, “तो उन्हें गोली मारकर भगा दो। उन्हें यह ज्ञात होना चाहिए कि में उनका राजा हू, मेरे राजा वे नहीं हैं। वे मेरे आज्ञाकारी हैं, मैं उनका आज्ञाकारी नहीं हूँ।''
मन्त्री, “'पृथ्वीनाथ, मैं सब-कुछ करके हार -या। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि यदि गोनी भी चलाई जाएगी, तो वे द्वार से न हटेंगे, चाहे भले ही मर जाएं ।''
राजा ने कुछ सोचकर कहा, “तो अवश्य उन पर संकट है। लाओ, तामजान हाजिर करो ।!
एक क्षण में तामजान लाया गया। राजा साहब एक पग भी पेरों से न चल सकते थे। उनके पैर केवल अंगों की पूर्ति के निमित्त थे। तामजान पर बैठकर वे जनता के सम्मुख आकर उपस्थित हुए। उनके देखते ही असंख्य कंठों से 'जय, जय' की ध्वनि निकल पड़ी। यधपि समस्त प्रजा राजा से असन्तुष्ट थी, पर उसके इस प्रजा-वात्सल्य को देखकर मुग्ध हो गई और फिर वह इस समय राजा से वर माँगने आई थी। अतएव यह अवसर उदासीन होने का न था, परन्तु उसके विहल होने का मुख्य कारण यह था कि राजा के दर्शन पाते ही जनता में राज-भक्ति की लहर-सी दीौद गई, जिसने असन्तोष और अश्रद्धा को तृण के समान बहा दिया।
'जय, जय' की ध्वनि शान्त हुई। तदनन्तर लोगों ने विनय की, “महाराज, हम घोर संकट में पड़े हुए हैं। आप हमारे धर्मपिता हैं। यदि हमें आप न बचायेंगे, तो हम सब अन्न-जल के बिना तड़प-तड़प कर मर जायेंगे।
राजा ने आश्चर्य से पूछा, “तुम्हारे ऊपर कौन-सा संकट है ?'
प्रजा, “'दीनानाथ, साल भर से एक बूँद जल नहीं बरसा। सारे देश में हाहाकार मचा हुआ है। तालाबों में पानी नहीं है, कुएँ सूख गए हैं। यहाँ तक कि नदियों की धाराएँ बन्द हो गई हैं। आप हमारे स्वामी हैं, आप ही की कृपादृष्टि होने पर हमारा कल्याण हो सकता है।”
राजा, “मुझे तो यह समाचार आज ज्ञात हुआ। क्या वास्तव में वर्षा नहीं हुई ?”
प्रजागण, “दीनानाथ, आप स्वयं चलकर हमारी दशा देख लें। अन्न-जल के बिना हमारी दशा बहुत बुरी हो रही है।”
राजा, “क्या तुम लोगों ने देवताओं की पूजा नहीं की और यज्ञ नहीं किए ?”
प्रजा, “पृथ्वीनाथ, हम सब-कुछ करके हार गए ।”
राजा, “तो महात्माओं और सिद्ध पुरुषों की शरण क्यों नहीं गए ? महात्मा दुर्लभदास को क्यों नहीं घेरा ? वे ईश्वर के भक्त हैं, वे चाहें तो क्षणमात्र में जल-थल एक कर दें।”
प्रजा, “धर्मराज, महात्मा दुर्लभदास ने बहुत जप-तप किया, सहमौ्रों सिद्ध पुरुषों को एकत्रित किया, पर किसी से कुछ न हो सका।”
राजा, “सच ?”
प्रजा, “धर्मावतार, बिलकुल सच है।”
राजा, “मैंने तो उनके अलौकिक चमत्कारों की बड़ी-बड़ी कथाएँ सुनी हैं।!
प्रजागण, “दीनबन्धु, उन्होंने तो यही कहा है कि तुम लोग अपने स्वामी की शरण जाओ। वे ही तुम्हारा उपकार कर सकते हैं।”
राजा ने हँसकर कहा, “जब ऐसे सिद्धगण कुछ नहीं कर सके तो मैं किस गिनती में हूं '
प्रजागण, “धर्मावतार, आप इस देश के पति हैं। आपमें ईश्वर का वास है। आप यदि हमारी प्रार्थना को ईश्वर तक पहुँचा दें, तो हमें विश्वास है कि हमारा सनन््ताप दूर हो जाएगा ।”
राजा ने अनुकम्पित होकर कहा, “सज्जनो, मुझे ऐसी आशा नहीं है। आपके ऊपर विपत्ति पड़ी हुई है, इसका मुझे अत्यन्त दुःख है। जो राजा अपने भोग-विलास में इतना लिप्त हो कि उसे अपनी प्रजा की दशा का तनिक भी ज्ञान न हो, जो सदैव मद्य में चूर पड़ा रहता हो, जो नित्य काम-लिप्सा में मग्न रहता हो, उसके द्वारा तुम्हारा क्या उपकार हो सकता है ? किन्तु मैं तुम लोगों को निराश नहीं करना चाहता | तुम्हारी विपत्ति को अपनी कठोर हृदयता से बढ़ाना नहीं चाहता। मैं ईश्वर से कुछ विनय करने के लिए सर्वथा अयोग्य हूँ। मुझे उनसे कुछ प्रार्थना करते हुए लज्जा आती है, पर मैं तुम लोगों के कल्याणार्थ निर्लज्ज बनकर उनके सम्मुख जाऊँगा। धीरज रखो !”
4
मध्याह्-काल था। सूर्य की प्रखर किरणें अग्नि के शरों के समान पृथ्वी पर गिर रही थीं और पृथ्वी पीड़ा तथा भय से काँप रही थी। झुलसती हुई रेती से भाप निकल रही थी, मानो यह अनाथ पृथ्वी की आह का धुआँ था। ऐसे समय में राजा पृथ्वीपाल सिंह
राजभवन से बाहर निकले। उनके शरीर पर एक पतली लैँगोटी के सिवा और कोई वस्त्र या आभूषण न था। सुन्दर केश मुड़े हुए थे और मुख पर कालिमा पुती हुई थी। उस कालिमा में उनके रक्त-वर्ण नेत्र इस प्रकार चमक रहे थे, मानो काली बनात पर लाल रेशम के फूल बने हों। उनका चेहरा उदास और मलिन था और आँखों में आँसू बह रहे थे। इस भाँति नंगे सिर, नंगे पैर, ग्लानि, नैराश्य तथा लज्जा की मूर्ति बने हुए वे आकर राजभवन के सामने, जलती हुई भूमि पर खड़े हो गए। मन्त्रियों तथा अन्य अधिकारियों ने राजा को रोकने की बहुत चेप्टा की, पर उन्होंने कुछ दृढ़ प्रतिज्ञा की थी। वे उससे विचलित न हुए।
नगर-निवासियों ने यह वृत्तान्त सुना। वे दौड़ते हुए उस स्थान पर आकर जमा हो गए। ऐसा कोई हृदय न था जो राजा की ऐसी नैराश्यपूर्ण दृढ़ता पर द्रवित न हो गया हो। लोगों ने वहुत दीनता से कहा, “स्वामी, आप इस कालिमा को धो डालिए, इससे हमारे हृदयों पर चोट लगती है।” राजा ने सुदृढ़ भाव से उत्तर दिया, “'भाइयो, यह कालिमा अब ईश्वर की कृपा और दया के जल से धुलेगी, अन्यथा नहीं ।”
एक घण्टा बीत गया। राजा का मुख-मण्डल काले तवे के सदृश्य तप रहा था। उनकी आँखों से अग्नि की चिनगारियाँ निकलने लगीं। चोटी का पसीना एड़ी तक जा रहा था। उनका पद-स्थल भीग गया। मस्तक गर्म पानी के सदश खौल रहा था । प्रतिक्षण लोगों को भय होता था कि कहीं वे मूर्च्छित होकर न गिर पर्दे । लोग अत्यन्त विनीत भाव से कह रहे थे, “दीनवन्धु, आप अपने सुकोमल शरीर को अब कष्ट न दें। हमें अन्न-जल के बिना मर जाना स्वीकार है, पर आपकी यह दशा देखी नहीं जाती ।” किन्तु राजा के मुख-मण्डल से अटल प्रतिज्ञा का दिव्य प्रकाश फैल रहा था। उनकी कर्म तथा ज्ञान की समस्त इन्द्रियाँ शुन्यावरःए में थीं। हाँ, शरीर का एक-एक रोम स्पष्ट शब्दों में कह रहा था कि-“परम पिता, मेरी प्रजा दुखी है, उसे उबारिए। मैं पापी हूँ, कुकर्मी हूँ, दुराचारी हूँ, दुर्व्यसनी हूँ, मुझे आपसे कुछ प्रार्थना करने में भी लज्जा होती है, पर मेरे कुकर्मो का दण्ड मुझे मिलना चाहिए; मेरी प्रजा निरपराथ है, उस पर टया कीजिए। में कठोर-से-कठोर यातना के लिए आपके सम्मुख सिर झुकाये खड़ा हूँ। यदि आप मेरी प्रार्थना को स्वीकार न करेंगे तो मैं यहीं खड़े-खड़े प्राण दे दूँगा, पर प्रजा को अपना मुँह न दिखाऊँगा। मैं आपका दासानुदास हूँ, आपसे अपना दुःख कहने में कोई अपमान नहीं है; किन्तु जो प्रजा मुझे अपना स्वामी समझती है उसके सामने में कौन मुँह लेकर जार्ऊ ?”
दो घण्टे बीत गये। सूर्य की किरणें और भी प्रचण्ड हुई। भगि और भी अधिक तप्त हो
गई। सारी प्रजा आकाश की ओर टकटकी लगाए दख रही थी, 4 नतु बादल का कहीं नाम नथा।
सारा नगर यह विलक्षण दृश्य देखने के लिए उमड़ा चला आता था। प्रत्येक हृदय राजा के प्रति श्रद्धा तथा भक्ति से परिपूर्ण हो रहा था। ऐसा राज्यानुराग कभी देखने में न आया था। सहसों नेत्रों से अश्रुधारा बह रही थी। स्त्रियाँ व्याकुल होकर विलाप कर रही थीं। राजभवन से क्रन्दन-ध्वनि निकलकर सबके हृदयों को विदीर्ण किए देती थी। " तीन बज गये थे, पर सूर्य का तेज लेश गात्र भी कम न हुआ था ! राजा पृथ्वीपालसिंह की आँखें फैल गई थीं, माथा सिकुड़ गया था, शरीर को सँभालने और चित्त को बलात्कार से स्थिर रखने के कारण ओठ पुष्पकली के समान बन्द हो गये थे। ऐसा ज्ञात होता था कि उनके शरीर में रक््त-संचार नहीं है, प्राण नहीं हैं, केवल नैराश्यमय दृढ़ता का बल उन्हें पैरों पर खड़ा रक्खे हुए है। लोगों को प्रतिक्षण भय होता था कि राजा अब भूमि पर गिरे, अब गिरे। बहुत से प्राणियों को तो विश्वास था कि यद्यपि राजा खड़े हैं, पर यह केवल शव मात्र है। जिस ताप और उष्णता को घर में बैठकर सहन करना दुस्तर था, जिस धूप में चील अंडे छोड़ती थी और कीट-पतंग धरती से निकल-निकलकर तड़पते और मर जाते थे, जिस अग्नि-कुण्ड में किसी जीवधारी का एक क्षण खड़ा रहना असम्भव था और दहकती हुई ज्वाला में राजा जैसा सुकोमल, सुखोन्वित भनुष्य इतनी देर तक क्योंकर खड़ा रह सकता है?
सहसा जय-जयकार की ध्वनि से सारा आकाश-मण्डल गूँज उठा, मानो कोई भयंकर भूकम्प आ गया हो, अथवा दो पर्वत टकरा गए हों। लाखों मनुष्य आनन्द से विह्ल होकर उछलने-कूदने लगे। सारी जनता में एक हलचल-सी मच गई। अगणित उँगलियाँ पूर्व दिशा की ओर उठ गई। एक छोटा-सा बादल का टुकड़ा क्षितिज पर उसी तरह दिखाई दे रहा था, जैसे अन्धकार में कोई दीपक टिमटिमा रहा हो।
एक क्षण में किले से तोपें छूटने लगीं। स्त्रियाँ मंगलाचार गाने लगीं, और भवन-द्धार पर खड़ी होकर महारानी यशोदा ने दरिद्रों को अन्न-वस्त्र देना आरम्भ किया, किन्तु प्रजा शान्त हो गई थी। आनन्द की पहली लहर ने उसे अधीर कर दिया था। अपने उल्लास को हृदय में छिपाकर अब वह बादल के टुकड़े की ओर आशा और भय के साथ ताक रही थी।
देखते-देखते बादल के उस छोटे-से टुकड़े ने विराट् रूप धारण कर लिया। जैसे बारूद के ढेर में आग लगते ही क्षण मात्र में चारों ओर धुआँ फैल जाता है, उसी प्रकार वह बीज-रूपी मेघ समस्त आकाश में छा गया। बिजली चमकने लगी और पवन के झकोरे चलने लगे। अकस्मात् एक कर्णबेधी मेघ-ध्वनि सुनायी पड़ी। यह भीषण नाद इस समय लोगों को स्वर्गीय गान से भी अधिक प्रिय मालूम हुआ। इस नाद को सुनने के लिए वे कितने ही दिनों से लालायित हो रहे थे।
सूर्य भगवान् बड़े वेग से अस्ताचल की ओर दीड़े चले जाते थे, मानो वे इस मेघ-दल से भयभीत हो गए हों, पर उनका भागना भी निष्फल हुआ। क्षणभर में वे इस काले मेघ-सागर में विलीन हो गए। पृथ्वी पर अन्धकार छा गया। यह अन्धकार जनता की आशाओं का विमल प्रकाश था।
बादल फिर गरजने लगे और जल-विन्दु पृथ्वी पर गिरने लगी। असंख्य मनुष्य भक्ति, श्रद्धा, आनन्द तथा अनुराग से उन्मत्त होकर राजा की ओर दौड़े और उनके चरणों पर गिर पड़े। राजा अभी तक मूर्ति के समान स्थिर खड़े थे। उनके मुख की कालिमा धुल-धुल कर बही जाती थी। उनका दिव्य स्वरूप श्याम घटा से इस प्रकार उदित होता आता था, जैसे बादलों में से चाँद निकलता है। उनके मुख पर इस समय एक अलौकिक प्रतिभा थी और नेत्रों से आत्मोत्सर्ग की ज्योति निकल रही थी।
उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि मुख की यह कालिमा अब ईश्वर की दया-दृष्टि से ही धुलेगी और यह प्रतिज्ञा पूरी हुई, क्योंकि उनमें दृढ़ता थी, आत्मिक वल था और परमात्मा की दीन बन्धुता पर पूरा-पूरा विश्वास था।
देश कभी इतना उल्लसित, इतना सुखी और इतना गौरवोन्मत्त न हुआ था।
[हिन्दी कहानी। 'श्री शारदा” (हिन्दी पत्रिका), मार्च 1920 में प्रकाशित। "प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य” खण्ड-] में संकलित ।]
प्रतिज्ञा का सारांश
'प्रतिज्ञा' अकाल से त्रस्त निरीह प्रजा की रक्षा के लिए एक विलासी राजा के अप्रत्याशित आत्म-प्रायश्चित, अटल संकल्प और आत्मोत्सर्ग की अत्यंत भावपूर्ण एवं प्रेरक कहानी है। राज्य में लगातार एक वर्ष से भयानक सूखा और अकाल पड़ा हुआ था। वर्षा की एक बूँद न बरसने के कारण खेत-खलिहान सूख गए थे, नदी-तालाबों का पानी सूख चुका था और प्रजा भूख-प्यास से व्याकुल होकर वृक्षों की छालें खाने पर विवश थी। पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन और वैज्ञानिक प्रयास—सब विफल हो चुके थे। अंत में विवश होकर हिंदू प्रजा महात्मा बाबा दुर्लभदास की शरण में गई और मुस्लिम प्रजा मौलाना शेख आबिद अली के पास पहुँची। दोनों धर्मगुरुओं के आह्वान पर देश भर के सिद्ध साधु-संतों और मुल्लाओं का एक विशाल जुलूस धूमधाम और नगाड़ों के साथ पहाड़ी पर पहुँचा और उन्होंने कई घंटों तक साधना की। किंतु दोपहर की प्रचंड धूप होते ही वे सब व्याकुल होकर उठ खड़े हुए। बाबा दुर्लभदास ने प्रजा को बताया कि यह भीषण संकट उनके राजा के दुराचार और घोर विलास का परिणाम है; जब तक राजा स्वयं अनुष्ठान व प्रायश्चित नहीं करेगा, ईश्वर का कोप शांत नहीं होगा।
राजा पृथ्वीपाल सिंह अत्यंत भोगी और काम-लिप्त शासक थे, जो हर समय राग-रंग, मदिरा और आमोद-प्रमोद में डूबे रहते थे और उन्हें देश में फैले दुर्भिक्ष की कोई जानकारी न थी। जब हताश प्रजा ने राजभवन के सामने एकत्र होकर जान की बाजी लगाते हुए दुहाई मचाई, तब राजा तामझाम पर सवार होकर बाहर निकले। जनता का कारुणिक विलाप और अकाल की भयावहता सुनकर राजा की अंतरात्मा झकझोर उठी। उन्हें अपनी अकर्मण्यता और भोग-विलास पर गहरा पश्चाताप हुआ कि उनके पापों का दंड निरपराध प्रजा भुगत रही है। उन्होंने स्वीकार किया कि वे स्वयं को ईश्वर के सामने हाथ फैलाने योग्य भी नहीं समझते, किंतु प्रजा के कल्याण के लिए वे अपने प्राणों की बाजी लगा देंगे।
मध्याह्न की चिलचिलाती और झुलसाने वाली धूप में, जब धरती से आग की लपटें निकल रही थीं, राजा पृथ्वीपाल सिंह राजमहल से बाहर निकले। उनके शरीर पर केवल एक लंगोटी थी, सिर मुँड़ा हुआ था, नंगे पैर थे और पापों के प्रायश्चित स्वरूप पूरे मुख पर कालिमा (कालिख) पुती हुई थी। वे उस दहकती हुई रेत पर जाकर खड़े हो गए और उन्होंने अटल 'प्रतिज्ञा' की कि चेहरे की यह कालिमा अब केवल ईश्वर की दया के जल से ही धुलेगी, अन्यथा वे वहीं खड़े-खड़े अपने प्राण त्याग देंगे। मंत्रियों और जनता ने उनसे अनुनय-विनय की कि वे अपने शरीर को इतना कष्ट न दें, किंतु राजा अपने संकल्प पर अडिग रहे। घंटों तक प्रचंड धूप में खड़े रहने से उनका शरीर तवे की तरह तपने लगा, पसीने की धारा बहने लगी और वे अचेत होने की स्थिति में पहुँच गए, किंतु उनका आत्मिक संकल्प डिगा नहीं।
अपराह्न के समय, जब राजा का शरीर निष्प्राण-सा प्रतीत हो रहा था, तभी आकाश के क्षितिज पर बादल का एक छोटा-सा टुकड़ा दिखाई दिया। देखते ही देखते वह विशाल घटा में बदल गया। बिजली कौंधी, बादलों की भीषण गर्जना हुई और मूसलाधार अमृत-वृष्टि शुरू हो गई। वर्षा की धार ने राजा के मुख की कालिमा को धोकर उनके त्याग और आत्मबल को चंद्रमा की भाँति चमका दिया। राजा की अटल प्रतिज्ञा और निःस्वार्थ बलिदान ने ईश्वर को द्रवित कर प्रजा को जीवनदान दिया। कृतज्ञ और विह्वल प्रजा अपने उद्धारक राजा के चरणों में गिर पड़ी।
प्रकाशन इतिहास
यह कहानी सर्वप्रथम हिंदी पत्रिका श्री शारदा के मार्च 1920 अंक में प्रकाशित हुई थी। बाद में यह प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य (खण्ड-1) में संकलित हुई।
महत्त्व और विषय-विमर्श
- राजधर्म और शासक का नैतिक उत्तरदायित्व: कहानी का केंद्रीय विचार यह है कि सच्चा शासक वही है जो प्रजा के सुख-दुख को अपना समझे। भोग-विलास को त्यागकर प्रजा की विपदा के निवारण हेतु स्वयं को कष्टों की भट्टी में झोंक देना ही सर्वोच्च राजधर्म है।
- आडंबरपूर्ण कर्मकांड बनाम सच्चा आत्म-प्रायश्चित: साधु-संतों और मुल्लाओं का ठाठ-बाट भरा जुलूस और कोरा जप-तप दोपहर की धूप भी न सह सका, जबकि राजा के हार्दिक पश्चाताप, निष्कपट पीड़ा और देह-दंड ने प्रकृति और ईश्वर को द्रवित कर दिया।
- दृढ़ संकल्प और अटल प्रतिज्ञा का सामर्थ्य: राजा का यह प्रण कि मुख की कालिमा केवल ईश्वर की कृपा-वृष्टि से धुलेगी, असाधारण आत्मबल और अटूट आस्था का प्रतीक है। यह दिखाता है कि सच्चा संकल्प असंभव को भी संभव बना सकता है।
- पापबोध से नैतिक उत्थान: भोग-विलास और दुराचार में आकंठ डूबे राजा का एकाएक चरम आत्मोत्सर्ग के शिखर पर पहुँचना मानवीय चेतना के नैतिक रूपांतरण की असीम संभावनाओं को रेखांकित करता है।
- कहानी का व्यापक महत्त्व: 'प्रतिज्ञा' भारतीय चिंतन परंपरा में राजा और प्रजा के एकात्म भाव, त्याग की महिमा और प्रायश्चित की शक्ति को उजागर करने वाली एक अत्यंत प्रभावशाली कथा है। यह साबित करती है कि निःस्वार्थ बलिदान ही संकटमोचक होता है।
