Cover Image for Paipuji (पैपूजी) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी••15 मिनट

पैपूजी

Paipuji

प्रेमचंद की कहानी 'पैपूजी' विवाह की कुरीतियों और वर-पक्ष के वर्चस्व पर करारा व्यंग्य करती है, जहाँ लेखक कन्या पक्ष के स्वाभिमान का समर्थन करता है।

पात्र:लेखक, सुरेश बाबू
स्थान:विवाह मंडप और गाँव

पैपूजी का मूल पाठ

सिद्धान्त का सबसे बड़ा दुश्मन है मुरौवत। कठिनाइयों, बाधाओं, प्रलोभनों का सामना आप कर सकते हें दृढ़ संकल्प और आत्मबल से। लेकिन एक दिली दोस्त से बेमुरोबती तो नहीं की जाती, सिद्धान्त रहे या जाय। कई साल पहले मैंने जनेऊ हाथ में लेकर प्रतिज्ञा की थी कि अब कभी किसी की बरात में न जाऊँगा, चाहे इधर की दुनिया उधर हो जाय। ऐसी विकट प्रतिज्ञा करने की जरूरत क्‍यों पड़ी, इसकी कथा लंबी है ओर आज भी उसे याद करके मेरी प्रतिज्ञा को जीवन मिल जाता है। बरात थी कायस्थों की। समधी थे मेरे पुराने मित्र। बारातियों में अधिकांश जान-पहचान के लोग थे। देहात में जाना था। मेंने सोचा, चलो दो-तीन दिन देहात की सैर रहेगी, चल पड़ा। लेकिन मुझे यह देखकर हेरत हुई कि बारातियों की वहाँ जाकर बुद्धि ही कुछ भ्रष्ट हो गई है। बात-बात पर झगड़ा-तकरार। सभी कन्यापक्षवालों से मानो लड़ने को तेयार। यह चीज नहीं आई, वह चीज नहीं भेजी, यह आदमी है या जानवर, पानी बिना बरफ के कोन पियेगा। गधे ने बरफ भेजी भी तो दस सेर। पूछो दस सेर

बरफ लेकिर आँखों में लगायें या किसी देवता को चढ़ाएँ! अजबचिलल-पों मची हुई थी। कोई किसी की न सुनता था। समधी साहब सिर पीट रहे थे कि यहाँ उनके मित्रों की जितनी दुर्गति हुई, उसका उन्हें उम्र-भर खेद रहेगा। वह क्‍या जानते थे कि लड़कीवाले इतने गँवार हैं। गँवार क्‍यों, मतलबी कहिए। कहने को शिक्षित हें, सभ्य हें, भद्र हैं, धन भी भगवान्‌ की दया से कम नहीं, मगर दिल के इतने छोटे। दस सेर बरफ भेजते हें! सिगरेट की एक डिबिया भी नहीं। फंस गया ओर क्‍या।

मैंने उनसे बिना सहानुभूति दिखाये कहा -- सिगरेट नहीं भेजे तो कोन-सा बड़ा अनर्थ हो गया, खमीरा तम्बाकू तो दस सेर भेज दिया हे, पीती क्‍यों नहीं घोल-घोल कर।

मेरे समधी मित्र ने विस्मय -- भरी आँखों से मुझे मानो उन्हें कानों पर विश्वास न हो। ऐसी अनीति!

बोले -- आप भी अजीब आदमी हैं, खमीरा यहाँ कोन पीता हे। मुद्दत हुई लोगों ने गुड़गुड़ियाँ ओर फर्शियाँ गुदड़ी बाजार में बेच डालीं। थोड़े-से दकियानूसी अब भी हुक्का गुड़गुड़ाते हें लेकिन बहुत कम। यहाँ तो ईश्वर की कृपा से सभी नई रोशनी, नये विचार, नये जमाने के लोग हें ओर कन्यावाले यह बात जानते हें, फिर भी सिगरेट नहीं भेजी, यहाँ कई सज्जन आठ-दस डिबियाँ

रोज पी जाते हैं। एक साहब तो बारह तक पहुँच जाते हैं। और चार-पाँच डिबियाँ तो आम बात है। इतने आदमियों के बीच में पाँच सो डिबियाँ भी न हों तो क्या हो। और बरफ देखी आपने, जेसे दवा के लिए भेजी है। यहाँ इतनी बरफ घर-घर आती हे। में तो अकेला ही दस सेर पी जाता हूँ। देहातियों को कभी अकल न आएगी, पढ़-लिख कितने ही जाए।

मेंने कहा -- तो आपको अपने साथ एक गाड़ी सिगरेट ओर टन- भर बरफ लेते आना चाहिए था।

वह स्तम्भित हो गए -- आप भंग तो नहीं खा गए?

--जी नहीं, कभी उम्र-भर नहीं खाई।

--तो फिर ऐसी ऊल-जलूल बातें क्‍यों करते हो?

--में तो सम्पूर्णतः अपने होश में हूँ।

--होश में रहने वाला आदमी ऐसी बात नहीं कर सकता। हम यहाँ लड़का ब्याहने आए हें, लड़कीवालों को हमारी सारी फरमाइशें पूरी करनी पड़ेंगी, सारी। हम जो कुछ माँगेंगे उन्हें देना पड़ेगा, रो-रोकर देना पड़ेगा, दिल्‍लगी नहीं हे। नाकों चने न

चबवा दें तो कहिएगा। यह हमारा खुला हुआ अपमान हे। द्वार पर बुलाकर जलील करना। मेरे साथ जो लोग आए हें वे नाई-

कहार नहीं हें, बड़े-बड़े आदमी हैं। में उनकी तोहीन नहीं देख सकता। अगर इन लोगों की यह जिद हे तो बरात लोट जाएगी।

मेंने देखा यह इस वक्त ताव में हैं, इनसे बहस करना उचित नहीं। आज जीवन में पहली बार, केवल दो दिन के लिए, इन्हें एक आदमी पर अधिकार मिल गया हे। उसकी गर्दन इनके पाँव के नीचे हे। फिर उन्हें क्यों न नशा हो जाय क्‍यों न सिर फिर जाय, क्‍यों न उस दिल खोलकर रोब जमाएँ। वरपक्षवाले

कन्यापक्षवालों पर मुद्दों से हुकूमत करते चले आए हैं, और उस अधिकार को त्याग देना आसान नहीं। इन लोगों के दिमाग में इस वक्त यह बात केसे आएगी कि तुम कन्यापक्षवालों के मेहमान हो और वे तुम्हें जिस तरह रखना चाहें तुम्हें रहना पड़ेगा। मेहमान को जो आदर-सत्कार, चूनी-चोकर, रूखा-सूखा मिले, उस पर उसे सन्तुष्ट होना चाहिए, शिष्टता यह कभी गवारा नहीं कर सकती कि वह जिनका मेहमान हे, उनसे अपनी खातिरदारी का टेक्स वसूल करे। मेंने वहाँ से टल जाना ही मुनासिब समझा।

लेकिन जब विवाह का मुहूर्त आया, इधर से एक दर्जन व्हिस्की की बोतलों की फरमाइश हुई ओर कहा गया कि जब तक बोतलें न आ जाएगी हम विवाह-संस्कार के लिए मंडप में न जाएँगे। तब मुझसे न देखा गया। मेंने समझ लिया कि ये सब

एशु हैं, इंसानियत से खाली। इनके साथ एक क्षण रहना भी अपनी आत्मा का खून करना है। मेंने उसी वक्त प्रतिज्ञा की कि अब कभी किसी बरात में न जाऊँगा ओर अपना बोरिया-बकचा लेकर उसी क्षण वहाँ से चल दिया।

इसलिए जब गत मंगलवार को मेरे परम मित्र सुरेश बाबू ने मुझ अपने लड़के के विवाह का निमन्त्रण दिया तो मैंने सुरेश बाबू को दोनों हाथों से पकड़कर कहा - जी नहीं, मुझे कीजिए, में न जाऊँगा।

उन्होंने खिन्न होकर कहा -- आखिर क्‍यों?

'मैंने प्रतिज्ञा कर ली हे अब किसी बरात में न जाऊँगा। ' “अपने बेटे की बरात में भी नहीं?

बेटे की बरात में खुद अपना स्वामी रहूँगा।'

“तो समझ लीजिए यह आप ही का पुत्र है ओर आप यहाँ अपने स्वामी हैं।'

में निरुतर हो गया। फिर भी मेंने अपना पक्ष न छोड़ा।

“आप लोग वहाँ कन्यापक्षवालों से सिगरेट बर्फ, तेल, शराब आदि -- आदि चीजों के लिए आग्रह तो न करेंगे?

'भूलकर भी नहीं, इस विषय में मेरे विचार वहीं हैं जो आपके।'

ऐसा तो न होगा कि मेरे जेसे विचार रखते हुए भी आप वहीं दुराग्रहियों की बातों में आ जाएँ ओर वे अपने हथकन्डे शुरू कर दें?

में आप ही को अपना प्रतिनिधि बनाता हूँ। आपके फेसले की वहाँ कहीं अपील न होगीं।'

दिल में तो मेरे अब भी कुछ संशय था, लेकिन इतना आश्वासन मिलने पर और ज्यादा अड़ना असज्जनता थी। आखिर मेरे वहाँ जाने से यह बेचारे तर तो नहीं जाएँगे। केवल मुझसे स्नेह रखने के कारण ही तो सब कुछ मेरे हाथों में सोंप रहे हैं। मेंने चलने का वादा कर लिया। लेकिन जब सुरश बाबू विदा होने लगे तो मैंने घड़े को जरा और ढोका --

लेन-देन का तो कोई झगड़ा नहीं है?

“नाम को नहीं। वे लोग अपनी खुशी से जो कुछ देंगे, वह हम ले लेंगे। माँगने न माँगने का अधिकार तो आपको रहेगा। '

“अच्छी बात हे, में चलूँगा।'

शुक्रवार को बरात चली। केवल रेल का सफर था ओर वह भी

पचास मील का। तीसरे पहर के एक्सप्रेस से चले ओर शाम को कन्या के द्वार पर पहुँच गए। वहाँ हर तरह का सामान मोजूद

था। किसी चीज के माँगने की जरूरत न थी। बारातियों की इतनी खातिरदारी भी हो सकती है, इसकी मुझे कल्पना भी न थी। घराती इतने विनीत हो सकते हैं, कोई बात मुँह से निकली नहीं कि एक की जगह चार आदमी हाथ बांधे हाजिर!

लगन का मुहूर्त आया। हम सभी मंडप में पहुँचे। वहाँ तिल रखने की जगह भी न थी। किसी तरह धंस-धंसाकर अपने लिए जगह निकाली। सुरेश बाबू मेरे पीछे खड़े थे। बेठने को वहाँ जगह न थी।

कन्या-दान संस्कार शुरु हुआ। कन्या का पिता, एक पीताम्बर पहने आकर वर के सामने बेठ गया और उसके चरणों को धोकर उन पर अक्षत, फूल आदि चढ़ाने लगा। में अब तक सेकड़ों बरातों में जा चुका था, लेकिन विवाह-संस्कार देखने का मुझे कभी अवसर न मिला था। इस समय वर के सगे-संबंधी ही जाते हें।

अन्य बराती जनवासे में पड़े सोते हैं। या नाच देखते हें, या ग्रामाफोन के रिकार्ड सुनते हैं। ओर कुछ न हुआ तो कई टोलियों में ताश खेलते हैं। अपने विवाह की मुझे याद नहीं। इस वक्त कन्या के वृद्ध पिता को एक युवक के चरणों की पूजा करते देखकर मेरी आत्मा को चोट लगी। यह हिन्दू विवाह का आदर्श है या उसका परहास? जामाता एक प्रकार से अपना पुत्र हे, उसका धर्म है कि अपने धर्मपिता के चरण धोये,उस पर पान-फूल

चढ़ाये। यह तो नीति-संगत मालूम होता है। कन्या का पिता वर के पाँव पूजे यह तो न शिष्टता हे,न धर्म,न मर्यादा। मेरी विद्रोही आत्मा किसी तरह शांत न रह सकी। मेंने झल्लाए हुए स्वर में कहा -- यह क्या अनर्थ हो रहा है, भाइयो! कन्या के पिता का यह अपमान! क्‍या आप लोगों में आदमियत रही ही नहीं?

मंडप में सन्नाटा छा गया। में सभी आँखों का केन्द्र बन गया। मेरा क्या आशय हे, यह किसी की समझ में न आया।

आखिर सुरेश बाबू ने पूछा -- केसा अपमान ओर किसका अपमान? यहाँ तो किसी का अपमान नहीं हो रहा हे।

“कन्या का पिता वर के पाँव पूजे, यह अपमान नहीं तो क्‍या हे? “यह अपमान नहीं, भाई साहब, प्राचीन प्रथा हे।'

कन्या के पिता महोदय बोले -- यह मेरा अपमान नहीं है मान्यवर, मेरा अहोभाग्य कि आज का यह शुभ अवसर आया। आप इतने ही से घबरा गये। अभी तो कम से कम एक सो आदमी पेपुजी के इन्तजार में बेठे हुए हें। कितने ही तरसते हें कि कन्या होती तो वर के पाँव पूजकर अपना जन्म सफल करते।

में लाजवाब हो गया। समधी साहब पाँव पूज चुके तो स्त्रियों ओर पुरुषों का एक समूह वर की तरफ उमड़ पड़ा। ओर प्रत्येक प्राणी लगा उसके पाँव पूजने जो आता था, अपनी हेसियत के अनुसार कुछ न कुछ चढ़ा जाता था। सब लोग प्रसन्नचित्त ओर गदगद नेत्रों से यह नाटक देख रहे थे ओर में मन में सोच रहा था -- जब समाज में ओचित्य ज्ञान का इतना लोप हो गया हे ओर लोग अपने अपमान को अपना सम्मान समझते हैं तो फिर क्यों न स्त्रियों की समाज में दुर्दशा हो, क्यों न वे अपने को पुरुष के पाँव की जूती समझें, क्यों न उनके आत्मसम्मान का सर्वनाश हो जाय!

जब विवाह-संस्कार समाप्त हो गया और वर-वधू मंडप से निकले तो मैंने जल्दी से आगे बढ़कर उसी थाल से थेड़े-से फूल चुन लिए ओर एक अर्द्ध-बतना की दशा में,न जाने किन भावों से प्रेरित होकर, उन फूलों को वधू के चरणों पर रख दिया, ओर उसी वक्त वहाँ से घर चल दिया।


पैपूजी का सारांश

'पैपूजी' कहानी का मूल विषय विवाह-प्रथाओं में वर-पक्ष के वर्चस्व, आडंबर और कन्या-पक्ष के प्रति सामाजिक असमानता तथा अपमानजनक परंपराओं पर करारा प्रहार है। कहानी का लेखक अतीत के एक कटु अनुभव के कारण बरात में न जाने की प्रतिज्ञा कर चुका होता है। उस अतीत की बरात में वर-पक्ष के लोगों ने सिगरेट, बर्फ और शराब जैसी चीजों की अनुचित माँग करके कन्या-पक्ष को अत्यधिक प्रताड़ित और अपमानित किया था।

जब लेखक के अभिन्न मित्र सुरेश बाबू अपने बेटे के विवाह के लिए लेखक को आमंत्रित करते हैं, तो लेखक मना करता है। लेकिन सुरेश बाबू के यह आश्वासन देने पर कि वे किसी प्रकार की बेजा माँग नहीं करेंगे और लेखक को ही बरात का सर्वाधिकारी बनाएंगे, लेखक बरात में जाने के लिए सहमत हो जाता है। कन्या-पक्ष के यहाँ पहुँचकर लेखक देखता है कि घराती अत्यंत विनम्र और आतिथ्य-सत्कार में लीन हैं।

विवाह मंडप में जब कन्या-दान संस्कार आरंभ होता है, तो कन्या के वृद्ध पिता पीताम्बर पहनकर आते हैं और वर के पैर धोकर उन पर अक्षत, फूल और उपहार चढ़ाते हैं। एक वृद्ध पिता को अपने से बहुत छोटे युवक (वर) के पैरों की पूजा करते देखकर लेखक की आत्मा तिलमिला उठती है। वह मंडप में ही इसका विरोध करता हुआ कहता है कि यह कन्या के पिता का अपमान है। परंतु सुरेश बाबू और स्वयं कन्या के पिता इसे 'प्राचीन प्रथा' और अपना 'अहोभाग्य' बताते हैं। इसके बाद दर्जनों पुरुष और स्त्रियाँ आकर वर के पाँव पूजने (पैपूजी) की होड़ लगा देते हैं।

लेखक समाज की इस सोच पर आहत होता है कि जहाँ लोग अपने अपमान को सम्मान समझ रहे हैं, वहीं स्त्रियों के स्वाभिमान का हनन हो रहा है। वह समझ जाता है कि जब तक समाज में ऐसी रूढ़िवादी और पुरुष-सत्तात्मक परंपराएँ बनी रहेंगी, तब तक समाज में स्त्रियों की दशा दयनीय रहेगी। विवाह-संस्कार संपन्न होने पर लेखक प्रतीकात्मक विरोध और सम्मान व्यक्त करते हुए पूजा की थाली से फूल उठाकर वधू (दुल्हन) के चरणों में अर्पित करता है और चुपचाप वहाँ से घर लौट आता है।


प्रकाशन इतिहास

प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • वर-पक्ष का दंभ और कन्या-पक्ष का उत्पीड़न: कहानी विवाह के दौरान वर-पक्ष द्वारा की जाने वाली अनैतिक माँगों और कन्या-पक्ष को हीन समझने की सामाजिक विकृति पर करारी चोट करती है।
  • 'पैपूजी' रस्म और पुरुष-सत्तात्मक रूढ़ियाँ: प्रेमचंद ने विवाह में वर के पैर पूजने ('पैपूजी') की परंपरा पर सवाल उठाया है। कहानी दर्शाती है कि उम्र और रिश्ते में बड़े कन्या-पिता द्वारा वर के पैर धोना और पूजना शिष्टता या धर्म नहीं, बल्कि पुरुष-सत्तात्मक व्यवस्था का अपमानजनक प्रतीक है।
  • स्त्री-समानता और स्वाभिमान का प्रश्न: लेखक का मानना है कि जब तक समाज कन्या-पक्ष को नीचा दिखाएगा और वर को देवता की तरह पूजेगा, तब तक समाज में स्त्रियों को 'पाँव की जूती' माना जाता रहेगा और उनके स्वाभिमान की रक्षा नहीं हो सकेगी।
  • प्रतीकात्मक प्रतिवाद (वधू-पूजन): कहानी के अंत में लेखक का वधू के चरणों में फूल चढ़ाना एक क्रांतिकारी प्रतीकात्मक कदम है, जो पुरुष-प्रधान परंपराओं के विपरीत नारी के सम्मान और समानता का संदेश देता है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'पैपूजी' भारतीय विवाह प्रणाली में समाई रूढ़ियों, असमानता और पाखंड का यथार्थवादी एवं व्यंग्यात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करती है, जो समाज को सामाजिक सुधार और नारी-सम्मान की दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करती है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "पैपूजी." *Munshi Premchand Digital Archive*, https://munshipremchand.com/works/short-stories/paipuji. Accessed 22 Sep. 2026.