Cover Image for Navayug-1 (नवयुग-1) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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सम्पादकीय•1931•9 मिनट

नवयुग-1

Navayug-1

राजनीतिक नवयुग के आरंभ में काशी और कानपुर के भीषण दंगों, प्रशासनिक उपेक्षा और हिन्दू-मुस्लिम एकता की अनिवार्य आवश्यकता पर प्रेमचंद का गहन विश्लेषण।

Work Details

प्रकार: सम्पादकीय
वर्ष: 1931
पठन समय: 9 मिनट (1,207 शब्द)

हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य के प्रकोप से नवयुग आरम्भ हो रहा है, उसी भांति जैसे नववर्ष का प्रारम्भ होलिका के प्रचण्ड अग्निकाण्ड में होता है। एक तरफ कांग्रेस की वर्किंग कमेटी प्रयाग में बैठी हुई गोलमेज परिषद् की शर्तों पर विचार कर रही थी, दूसरी ओर काशी में विद्रोह की आग धधक रही थी। और ठीक उस समय जब कांग्रेस समझौते की स्वीकृति पर फैसला सुनाने जा रही थी, कानपुर में भीषण हत्याकाण्ड आरम्भ हो गया। काशी की अपेक्षा कानपुर का दंगा कहीं अधिक भीषण और प्रलयंकारी था। अभी निश्चय रूप से नहीं कहा जा सकता कि इस हत्याकाण्ड से राष्ट्र को कितनी क्षति पहुंची पर इसमें सन्देह नहीं कि हानि इतनी अधिक हुई है जो वर्षों में पूरी न होगी। एक सप्ताह तक कानपुर में अराजकता का पूरा आधिपत्य रहा। सरकार अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ उसका दमन न कर सकी। बुद्धि यह मानने को तैयार नहीं होती कि जो सरकार राजनैतिक आंदोलन का दमन करने में इतनी तत्परता से काम ले सकती है, इतनी आसानी से गोलियां चलवा सकती है, वह इस अवसर पर इतनी अशक्त हो गई कि उसकी उपस्थिति में रक्त की नदी बह गई और वह कुछ न कर सकी! क्या खुफिया पुलिस केवल राजनीतिक प्रगति की जांच करने के लिए ही है? उसे जनता में आन्दोलित होने वाली भावनाओं का पहले से क्यों ज्ञान नहीं होता? क्यों उसके कर्मचारी बारूद पर सोये रहते हैं और जब तक धड़ाका नहीं हो जाता, उन्हें खबर नहीं होती? सम्भव है सरकार की इस दलील में कुछ सत्य हो कि वह दंगे को दबाने के लिए काफी शक्ति न रखती थी, पर साधारण बुद्धि जिस नतीजे पर पहुंची है वह यह है कि सरकारी कर्मचारियों ने जान-बूझकर केवल यह दिखाने के लिए कि बगैर सरकारी सहायता के तुम लोग कुछ नहीं कर सकते, यहां तक कि शान्तिपूर्वक रह भी नहीं सकते और तुम्हें एक-दूसरे को फाड़ खाने से बचाने के लिए एक तीसरी बलवान शक्ति का रहना अनिवार्य है, इस हत्याकाण्ड को रोकने की कोशिश नहीं की। उनका यह अभिप्राय पूरा हुआ या नहीं, हम नहीं कह सकते लेकिन इतना हम कह सकते हैं कि सरकार का जो कुछ रहा-सहा विश्वास था वह भी जनता के दिलों से उठ गया। जनसाधारण को ऐसे काण्डों को रोकने का एक ही उपाय सूझता है और वह उत्तरदायित्वपूर्ण विधान है। यदि सरकार को भय होता कि ऐसी दुर्घटना उसे जड़ से उखाड़ देगी, उसके विरुद्ध ऐसा वातावरण पैदा हो जायगा कि जिसमें उसकी सत्ता ही बाधा में पड़ जायगी तो वह यों तटस्थ न रहती।

एक मास के अन्दर काशी, मिर्जापुर, आगरा आदि स्थानों में जातिगत वैमनस्य का इतना भयंकर रूप धारण कर लेना अगर हमें कोई शिक्षा देता है तो वह यह है कि मुस्लिम भाइयों को अपने साथ न ले चलने में हमने भूल की। यह सत्य है कि हमने उनकी सहायता के लिए सदैव हाथ फैलाये रखा, सदैव उनकी सहानुभूति की याचना करते रहे, लेकिन यह भी मानना पड़ेगा कि बगैर आपस में कोई समझौता किये हुए सत्याग्रह आन्दोलन का सूत्रपात कर देना हमारे मुस्लिम भाइयों को अप्रिय ही नहीं लगा, उनमें कुछ सन्देह भी उत्पन्न किया। शायद आन्दोलन की सफलता ने उन्हें और भी भयभीत कर दिया हो। जिस काम में हम शरीक नहीं होते, जिसकी सफलता की हमें कोई आशा नहीं होती, उसे सफल होते देखकर हमें स्वाभाविक रूप से कुछ चिढ़ होती है। मुस्लिम भाइयों में इसी मनोवृत्ति ने अवश्य असंतोष पैदा किया और यह अनुभव कि हिन्दुओं ने मुसलमानों के एक अंश की सहायता से इतना बड़ा पड़ाव मार लिया, मुसलमानों को अपनी दृष्टि में पराभूत कर दिया। इधर राष्ट्रीय आन्दोलन की आशातीत सफलता ने बहुत सम्भव है, हमें अनम्र बना दिया हो, हम यह समझने लगे हों कि मुसलमानों की सहायता के बगैर भी हम बहुत कुछ कर सकते हैं। जो कुछ भी हो यह मानना पड़ेगा कि अभी पंथगत द्वेष की हमारे समाज में प्रधानता है और जब तक हम इस द्वेष और विरोध को मिटा न लेंगे, हम राजनीति के क्षेत्र में कदम नहीं बढ़ा सकते।

ऐसे ही दंगे पहले सत्याग्रह आन्दोलन के बाद हुए थे। मगर दोनों में बड़ा अन्तर है। उस वक्त के सभी दंगों का कारण धार्मिक था, मसजिद के सामने बाजा बजाना या कुर्बानी। इस समय जो दंगे हो रहे हैं उनके कारण राजनीतिक हैं। काशी में एक विदेशी कपड़े के व्यापारी की हत्या ने बारूद में आग लगाई। कानपुर में मुसलमानों की दूकानें बन्द करवाने की चेष्टा ने पुआल में चिनगारी का काम किया। पुआल पहले से मौजूद था, केवल चिनगारी की कमी थी। हम खुद कांग्रेसमैन हैं। आज से नहीं, हमेशा से। असहयोग में हमारा विश्वास है, मगर हम कहने से बाज नहीं रह सकते कि कांग्रेस ने मुसलमानों को अपना सहायक बनाने की ओर उतनी कोशिश नहीं की जितनी करनी चाहिए थी। वह हिन्दू सहायता प्राप्त करके ही संतुष्ट रह गई। भारत में हिन्दू बाईस करोड़ हैं। बाईस करोड़ अगर कोई काम करने का निश्चय कर लें तो उन्हें कौन रोक सकता है। हिन्दुओं में इसी मनोवृत्ति ने प्रधानता प्राप्त कर ली। मुसलमानों का सहयोग प्राप्त करने की चेष्टा की गई अवश्य पर बेदिली के साथ। कांग्रेस ने ऐसी सम्भावनाओं की ओर ध्यान नहीं दिया। यह उसी अदूरदर्शिता का परिणाम है। यह ठीक है कि पहले से ही कांग्रेस के जिम्मेदार आदमियों को जेल में डाल देने से, जिनमें ऐसे मुसलमान नेताओं की संख्या काफी थी, जो मुसलमानों पर असर डाल सकते थे, बहुत कुछ जिम्मेदारी सरकार के सिर आ पड़ती है। लेकिन यह मानते हुए भी ठंडे दिल से विचार करने पर यह स्वीकार करना पड़ेगा कि कांग्रेस प्रोग्राम में वैमनस्य पैदा होने की सम्भावना होते हुए भी उसने मुस्लिम जनता का दिल हाथ में लेने में कोई उल्लेखनीय उद्योग नहीं किया और इस तरह से उसने विपक्षियों को अपना अनर्थकारी प्रोपेगेण्डा करने के लिए उपयुक्त क्षेत्र बना दिया।

अपनी भूलों को स्वीकार कर लेने में हमें किसी प्रकार का संकोच न होना चाहिए क्योंकि उससे भविष्य के लिए सचेत हो जाते हैं। हमें यह देखकर संतोष होता है कि इन हत्याकाण्डों के बाद अब आपस में मेल-जोल की ओर लोगों का ध्यान अधिक हो गया है। यदि हम पहले से ही सचेष्ट हो जाते तो क्यों यह अनर्थ होता। जिस तरह आज लोग गली-गली और मुहल्ले-मुहल्ले चक्कर लगा-लगाकर प्रेम का संदेश सुनाते फिरते हैं, उसी भांति यदि पहले भी यह प्रोपेगेण्डा किया जाता, तो यह नौबत क्यों आती। हम तो यहां तक कहेंगे कि किसी पर दूकान बन्द करने के लिए दबाव डालना और समाज के एक मुख्य अंग का सहयोग प्राप्त किये बिना, पिकेटिंग करना भी वांछनीय न था। घर-घर घूमकर वही काम यदि उतनी सफलता से नहीं तो उतने खतरे के बगैर किया जा सकता था। यह कहना कि हमने सदैव विनय और सौजन्य से काम लिया है, सत्य पर परदा डालना है और जिद से जिद पैदा होती है। यह वही सब मवाद है जो इतने दिनों भीतर ही भीतर पककर अब इस रूप में प्रकट हुआ है। इस सत्य को स्वीकार कर लेने में ही हमारा उद्धार है। हमें आशा है कि हम ज्यादा संयम, ज्यादा विचार, ज्यादा नम्रता से काम लेंगे और हिन्दू-मुस्लिम मैत्री को केवल राजनीतिक आवश्यकता न समझेंगे, बल्कि अपने कर्म का एक तत्व बना लेंगे। यदि ऐसा हुआ तो बुराई से भलाई पैदा हो जायगी और भविष्य में आने वाली कठिनाइयों पर हम सदैव के लिए विजयी हो जाएंगे।


प्रकाशन इतिहास

[सम्पादकीय। 'हंस', मार्च, 1931 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-2 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "नवयुग-1." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1931, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/navayug-1. Accessed 22 Sep. 2026.