Cover Image for Kahani Kala - 3 (कहानी-कला-3) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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निबंध•1934•12 मिनट

कहानी-कला-3

Kahani Kala - 3

कहानी विधा के स्वरूप, कथानक और मनोवैज्ञानिक यथार्थ पर प्रेमचंद का प्रसिद्ध सैद्धांतिक विवेचन, जो कथाकारों के लिए मार्गदर्शक है।

Work Details

प्रकार: निबंध
वर्ष: 1934
पठन समय: 12 मिनट (1,792 शब्द)

कहानी सदेव से जीवन का एक विशेष अंग रही है। हर एक बालक को अपने बचपन की वे कहानियां याद होंगी, जो उसने अपनी माता -पिता या बहन से सुनी थीं। कहानियां सुनने को वह कितना लालायित रहता था, कहाना शुरू होते ही 4” किसी तरह सब- कुछ भूलकर सुनने में तमन्य हो जाता था, कुत्ते और बिल्लियों कौ कहानियां सुनकर वह कितना प्रसन्‍न होता था-इसे शायद वह कभी नहीं भूल थ्कता। बाल-जीवन को मधुर स्मृतियों में कहानी शायद सबसे मधुर है। वह खिलौने, मिठाइयां और तमाशे सब भूल गए, पर वे कहानियां अभी तक याद हैं और उन्हीं कहानियों का आज उसके मुंह से उसके बालक उसी हर्ष और उत्सुकता से सुनते होंगे। मनुष्य-जीवन की सबसे बड़ी लालसा यही है कि वह कहानी अपनी बन जाय और उसकी कीर्ति हर एक जबान पर हो।

कहानियों का जन्म तो उसी समय में हुआ, जब आदमी ने बोलना सीखा, लेकिन प्राचीन कथा-साहित्य का हमें जो कुछ ज्ञान है, वह #धा-सरित्सागर','ईसप की कहानियां' और ' अलीफ-लैला ' आदि पुस्तकों से हुआ है। ये सब उस समय के साहित्य के उज्ज्वल रल हैं। उनका मुख्य लक्षण उनका कथा-वैचित्र्य था। मानव-हृदय को वैचित्र्य से सदैव प्रेम रहा है। अनोखी घटनाओं और प्रसंगों को सुनकर हम, अपने बाप-दादा की भांति

ही, आज भी प्रसन्न होते हैं। हमारा ख्याल हे कि जनरुचि जिनती आसानी से अलिफ- लैला की कथाओं का आनंद उठाती है। उतनी आसानी से नवीन उपन्यासों का आंनद नहीं उठा सकती। और अगर काउंट टॉल्स्टॉय के कथनानुसार जनप्रियता ही कला का आदर्श मान लिया जाय, तो अलिफ-लैला के सामने स्वयं टॉल्स्टॉय के 'वार एंड पीस' और ह्यूगो के 'ले मिजरेबुल' की कोई गिनती नहीं। इस सिद्धांत के अनुसार हमारी राग रागिनियां, हमारी सुंदर चित्रकारियां और कला के अनेक रूप, जिन पर मानव-जाति को गर्व है, कला के क्षेत्र के बाहर हो जायंगे। जनरुचि परज और बिहाग की अपेक्षा बिरहे ओर दादरे को ज्यादा पसंद करती है। बिरहों और ग्रामगीतों में बहुधा बड़े उच दरजे की कविता होती है, फिर भी यह कहना असत्य नहीं है कि विद्वानों और आचार्या ने कला के विकास के लिए जो मर्यादांए बना दी हैं, उनसे कला का रूप अधिक सुदः और अधिक संयत हो गया है। प्रकृति में जो कला है, वह प्रकृति की है, मनुष्य का नहीं। मनुष्य को तो वही कला मोहित करती है, जिस पर मनुष्य की आत्मा की छाप हो, जो गीली मिट्टी की भांति मानव-हृदय के सांचे में पड़कर संस्कृत हो गई हो। प्रकृति का सौंदर्य हमें अपने विस्तार और वैभव से पराभूत कर देता है। उसमें हमें आध्यात्मिः उल्लास मिलता है, पर वही दृश्य जब मनुष्य की तूलिका एवं रंगों और मनोभात थ रजित होकर हमारे सामने आता है, तो वह जैसे हमारा अपना हो जाता है। उसम ₹म आत्मीयता का संदेश मिलता है।

लेकिन भोजन जहां थोड़े से मसाले से अधिक रुचिकर हो जाता है, बहा "” भी आवश्यक है कि मसाले मात्रा से बढ़ने न पायें। जिस तरह मसालों के बाहर 4 से भोजन का स्वाद और उपयोगिता कम हो जाती है, उसी भाँति साहित्य भी अल ऊ- के दुरुपयोग से विकृत हो जाता है। जो कुछ स्वाभाविक है, वही सत्य है और स्व प" ।+ से दृर होकर कला अपना आनंद खो देती है और उसे समझने वाले थोड़े से कल ही रह जाते हैं उख्में जनता के मर्म का स्पश करन को शक्ति नहों रह ज०

पुगनी कथा कहानियां अपने घटना -वैचित््य क कारग मनोरजक तो हैं, एर «7 उस रस की कमी है जो शिक्षित रुचि साहित्य में गगोजनों है। अब हमारी साहित्यिक रषि कुछ परिष्कृत हां गई है। हम हर एक लिषय को भाति साहित्य में भी बौद्धिकता को ते हद करते है। अब हम किसी राजा की अलौकिक वीरता या रानी के हवा में उठकर राजा 2 पास पहचने, या भूल प्रतों के काल्पनिक चरित्रा का देखकर प्रसन्न नहीं होते। हम उह यथार्थ क कांटे से तौलते हैं और जौ भर भी इधर उधर नहीं देखना चाहते। आजकर*। + उपन्यासों और आख्यायिकाओं में अस्वाभाविक बातों के लिए गुजाइश नहीं है। उसमे एम अपने जीवन का ही प्रतिबिब देखना चाहते हैं। उयके एक्र एक वाक्य को, एक एक पा को यथार्थ के रूप में देखना चाहते हैं। उनम॑ जो कुछ भा जो, वे इस तरह लिखा जब कि साधारण बुद्धि उसे यथार्थ समझ। घटना बर्तमान कहानी या उपन्यास का मुख्य नहीं है। उपन्यासों में पात्रों का केवल बाह्य रूप देखकर हम संतुष्ट नहीं होते। हम उरगीर्क मनोगत भावना ओं तक पहुंचना चाहते हैं और जो लेखक मानवी हृदय के रहस्यों का खाल में सफल होता है, उसी की रचना सफल समझी जाती है। हम केवल इतने ही में संतुष्ट नहीं होते कि अमुक व्यक्ति ने अमुक काम लिया। हम देखना चाहते हैं, कि कि

मनो भावनाओं से प्रेरित होकर उसने यह काम किया, अतएव मानसिक द्वंद्र वर्तमान उपन्यास का गल्प का खास अंग है।

प्राचीन कलाओं में लेखक बिल्कुल नेपथ्य में छिपा रहता था। हम उसके विषय में उतना ही जानते थे, जितना वह अपने को अपने पात्रों के मुख से व्यक्त करता था। जीवन पर उसके विचार हैं, भिन्‍न-भिन्‍न परिस्थितियों में उसके मनोभावों में क्‍या परिवर्तन होते हैं, इसका हमें कुछ पता न चलता था, लेकिन आजऊल उपन्यासों में हमें लेखक के दृष्टिकोण का भी स्थल-स्थल पर परिचय मिलता है। हम उसके मनोगत विचारों और भावों द्वारा उसका रूप देखते रहते हैं और ये भाव जितने व्यापक और गहरे तथा अनुभवपूर्ण होते हैं, उतनी ही लेखक के प्रति हमारे मन में श्रद्धा उत्पन्न होती है। यों कहना चाहिए कि वर्तमान आख्यायिका या उपन्यास का आधार ही मनोविज्ञान है। घटनाएं और पात्र उसी मनोवैज्ञानिक सत्य को स्थिर करने के निमित्त ही लाये जाते हैं। उनका स्थान बिल्कुल गौण है। उदाहरणत: मेरी 'सुजन भगत', मुक्ति मार्ग ', 'पंच-परमेश्वर ', शतरंज के खिलाड़ी ' और ' महातीर्थ ', नामक सभी कहानियों में एक- न-एक मनोवैज्ञानिक रहस्य को खोलने की चेष्टा की गई है।

यह तो सभी मानते हैं कि आख्यायिका का प्रधान धर्म मनोरंजन है, पर साहित्यिक मनोरंजन 76 * जिसे हमारी कोमल और पवित्र भावनाओं को प्रोत्साहन मिले-हममें सत्य, नि:स्वार्थ सेवा, न्याय आदि देवत्व के जो अंश हैं, वे जागृत हों। वास्तव में मानवीय आत्मा की यह वह चेब्टा है, जो उसके मन में अपने-आपको पूर्णरूप से देखने को होती है। अभिव्यक्ति मानव-हृदय का स्वाभाविक गुण है। मनुष्य जिस समाज में रहता है उसमें मिलकर रहता है, जिन मनोभावों से वह अपने मेल के क्षेत्र को बढ़ा सकता है, अर्थात्‌ जीवन के अनंत प्रवाह में सम्मिलित हो सकता है, वही सत्य है। जो वस्तुए भावनाओं के इस प्रवाह में बाधक होती हैं, वह सर्वथा अस्वाभाविक हैं, परंतु यदि स्वार्थ, अहंकार और ईर्ष्या की ये बाधाएं न होतीं, तो हमारी आत्मा के विकास को शक्ति कहां से मिलती ? शक्ति तो संघर्ष में है। हमारा मन इन बाधाओं व्गो परास्त करके अपने स्वाभाविक कर्म को प्राप्त करने की सदेव चेष्टा करता रहता है। इ%० संघर्ष से साहित्य की उत्पत्ति होती है। यही साहित्य की उपयोगिता भी है। साहित्य में कहानी का स्थान इसलिए ऊंचा है कि वह एक क्षण में ही, बिना किसी घुमाव-फिराव के, आत्मा के किसी-न-किसी भाव को प्रकट कर देती है। और चाहे थोड़ी ही मात्रा में क्‍यों न हो, वह हमारे परिचय का, दूसरों में अपने को देखने का, दूसरों के हर्ष या शोक को अपना बना लेने का क्षेत्र बढ़ा देती है।

हिन्दी में इस नवीन शैली की कहानियों का प्रचार अभी थोड़े ही दिनों से हुआ है, पर इन थोड़े ही दिनों में इसने साहित्य के अन्य सभी अंगों पर अपना सिक्‍का जमा लिया है। किसी पत्र को उठा लीजिए, उसमें कहानियों ही की प्रधानता होगी। हां, जो पत्र किसी विशेष नीति या उद्देश्य से ।नकाले जाते हैं उसमें कहानियों का स्थान नहीं रहता। जब डाकिया कोई पत्रिका लाता है, तो हम सबसे पहले उसकी कहानियां पढ़ना शुरू करते हैं। इनसे हमारी यह क्षुधा तो नहीं मिटती, जो इच्छापूर्ण भोजन चाहती है पर फलों और मिठाइयों की जो क्षुधा हमें सदैव बनी रहती है, वह

अवश्य कहानियों से तृप्त हो जाती है। हमारा ख्याल है कि कहानियों ने अपने सार्वभोम आकर्षण के कारण, संसार के प्राणियों को एक-दूसरे से जितना निकट कर दिया है उसमें जो एकात्मभाव उत्पन्न कर दिया है, उतना और किसी चीज ने नहीं किया। हम आस्ट्रेलिया का गेहूं खाकर, चीन की चाय पीकर, अमेरिका की मोटरों पर बैठकर भी उनको उत्पन्न करने वाले प्राणियों से बिल्कुल अपरिचित रहते हैं, लेकिन मोपासां, अनातोल फ्रांस, चेखोव और टॉल्स्टॉय की कहानियां पढ़कर हमने फ्रांस और रूम से आत्मिक संबंध स्थापित कर लिया है। हमारे परिचय का क्षेत्र सागरों, द्वीपों और पहाड़ों का लांघता हुआ फ्रोस और रूस तक विस्तृत हो गया है। हम वहां भी अपनी ही आत्मा का प्रकाश देखने लगते हैं। वहां के किसान और मजदूर एवं विद्यार्थी हमें ऐसे लगते हैं, मानो उनसे हमारा घनिष्ठ परिचय हो।

हिन्दी में बीस-पच्चीस साल पहले कहानियों की कोई चर्चा न थी। कभी -कभी बंगला और अंग्रेजी कहानियों के अनुवाद छप जाते थे। परंतु आज कोई ऐसा पत्र नहीं, जिसमें दो-चार कहानियां प्रतिमास न छपती हों। कहानियों के अच्छे-अच्छे संग्रह निकलते जा रहे हैं। अभी बहुत दिन नहीं हुए कि कहानियों को पढ़ना समय का दुरुपयोग समझा जाता था। बचपन में हम कभी कोई किस्सा पढ़ते पकड़ लिए जाते थे, तो कड़ी डाट पड़ती थी। यह ख्याल किया जाता था कि किस्सों से चरित्र भ्रष्ट हो जाता है। और उन 'फिसाना अजायब' ओर 'शुक-बहत्तरी ' ओर तोता-मैना' के दिनों में ऐसा ख्याल होना स्वाभाविक ही था। उस वक्‍त कहानियां कहीं स्कूल केरिकुलम में रख दी जातीं तो शायद पिताओं का एक डेपूटेशन इसके विरोध में शिक्षा विभाग के अध्यक्ष को सेवा में पहुंचता। आज छोटे-बड़े सभी क्लासों में कहानियां पढ़ाई जाती हैं और परीक्षाओं में उन पर प्रशन किये जाते हैं। यह मान लिया गया है कि साछ्कृतिक विकास के लिए सरस साहित्य में उत्तम कोई साधन नहीं है। अब लोग यह भी स्वीकार करने लगे हैं कि कहानी कोरी गप नहीं है, और उसे मिथ्या समझना भूल है। आज से दो हजार बरस पहले यूनान के विख्यात फिलॉसफर अफलातुंन ने कहा था कि हर एक काल्पनिक रचना में मौलिक सत्य मौजुद रहता है। रामायण, महाभारत आज भी उतने ही सत्य हैं, जितने आज से पांच हजार साल पहले थे, हालांकि इतिहास, विज्ञान और दर्शन में सदैव परिवर्तन होते रहते हैं। कितने हो सिद्धांत, जो एक जमाने में सत्य समझे जाते थे, आज असत्य सिद्ध हो गए हैं, पर कथाएं आज भी उतनी ही सत्य हैं, क्योंकि उनका संबंध मनोभावों से है और मनोभावों में कभी परिवर्तन नहीं होता। किसी ने बहुत ठीक कहा है, कि कहानी में नाम और सन्‌ के सिवा और सब कुछ सत्य है, और इतिहास में नाम और सन्‌ के सिवा कुछ भी सत्य नहीं। गल्पकार अपनी रचनाओं को जिस साच में चाहे ढाल सकता है, पर किसी दशा में भी वह उस महान्‌ सत्य को अवहलना नहीं कर सकता, जो जीवन-सत्य कहलाता है।


प्रकाशन इतिहास

[लेख। मूल स्रोत अज्ञात। 'साहित्य का उद्देश्य', प्रथम संस्करण (जुलाई 1954) में संकलित। प्रकाशक-शिवरानी प्रेमचंद, वितरक-हंस प्रकाशन, इलाहाबाद। 'कुछ विचार' में भी संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "कहानी-कला-3." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1934, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/kahani-kala-3. Accessed 22 Sep. 2026.