पहला दृश्य
समय-नौ बजे रात्रि। यज़ीद, जुहाक, शम्स और कई दरबारी बैठे हुए हैं। शराब की सुराही और प्याला रखा हुआ है।
यज़ीद: नगर में मेरी ख़िलाफ़त का ढिंढोरा पीट दिया गया?
जुहाक: कोई गली, कूचा, नाका, सड़क, मसजिद, बाजार, खानक़ाह ऐसा नहीं है, जहां हमारे ढिंढोरे की आवाज न पहुंची हो। यह आवाज़ वायुमंडल को चीरती हुई हिजाज, यमन, इराक, मक्का-मदीना में गूंज रही है और, उसे सुनकर शत्रुओं के दिल दहल उठे हैं।
यज़ीद: नक्क़ार्ची को ख़िलअत दिया जाये।
जुहाक: बहुत खूब अमीर!
यज़ीद: मेरी बैयत लेने के लिए सबको हुक्म दे दिया गया?
जुहाक: अमीर के हुक्म देने की ज़रूरत न थी। कल सूर्योदय से पहले सारा शाम बैयत लेने को हाजिर हो जायेगा।
यज़ीद: (शराब का प्याला पीकर) नबी ने शराब को हराम कहा है। यह इस अमृत-रस के साथ कितना घोर अन्याय है! उस समय के लिये निषेध सर्वथा उचित था, क्योंकि उन दिनों किसी को यह आनंद भोगने का अवकाश न था। पर अब वह हालत नहीं है। तख्त पर बैठे हुए ख़लीफ़ा के लिए ऐसी नियामत हराम समझने से तो यह कहीं अच्छा है कि वह ख़लीफ़ा ही न रहे। क्यों जुहाक, कोई क़ासिद मदीने भेजा गया?
जुहाक: अमीर के हुक्म का इंतज़ार था।
यज़ीद: जुहाक, क़सम है अल्लाह की; मैं इस विलंब को कभी क्षमा नहीं कर सकता। फ़ौरन क़ासिद भेजो और वलीद को सख्त ताकीद लिखो कि वह हुसैन से मेरे नाम पर बैयत ले। अगर वह इनकार करें, तो उन्हें क़त्ल कर दे। इनमें ज़रा भी देर न होनी चाहिए।
जुहाक: या मौला! मेरी अर्ज़ है कि हुसैन क़बूल भी कर लें, तो भी उनका जिंदा रहना अबूसिफ़ियान के ख़ानदान के लिये उतना ही घातक है, जितना किसी सर्प को मारकर उसके बच्चे को पालना। हुसैन ज़रूर दावा करेंगे।
यज़ीद: जुहाक, क्या तुम समझते हो कि हुसैन कभी मेरी बैयत क़बूल कर सकते हैं? यह मुहाल है, असंभव है। हुसैन कभी मेरी बैयत न लेगा, चाहे उसकी बोटियां काट-काटकर कौवों को खिला दी जाये। अगर तक़दीर पलट सकती है, अगर दरिया का बहाव उलट सकता है, अगर समय की गति रुक जाये पर हुसैन दावा नहीं कर सकता। उसके बैयत लेने का मतलब ही यही है कि उसे इस जहान से रूखसत कर दिया जाये। हुसैन ही मेरा दुश्मन है। मुझे और किसी का ख़ौफ़ नहीं, मैं सारी दुनिया की फ़ौजों से नहीं डरता, मैं डरता हूं इसी निहत्थे हुसैन से। प्याला भरकर पी जाता है इसी हुसैन ने मेरी नींद, मेरा आराम हराम कर रखा है। अबूसिफ़ियान की संतान हाशिम के बेटों के सामने सिर न झुकाएगी। ख़िलाफ़त को मुल्लाओं के हाथों में फिर न जाने देंगे। इन्होंने छोटे-बड़े की तमीज उठा दी। हरएक दहकान समझता है कि मैं ख़िलाफ़त की मसनद पर बैठने लायक हूं, और अमीरों के दस्तर्खान पर खाने का मुझे हक़ है। मेरे मरहूम बाप ने इस भ्रांति को बहुत कुछ मिटाया, और आज ख़लीफ़ा शान व शौकत में दुनिया के किसी ताजदार से शर्मिंदा नहीं हो सकता। जूते सीनेवाले और रूखी रोटियां खाकर ख़ुदा का शुक्रिया अदा करने वाले खलीफों के दिन गए।
जुहाक: ख़ुदा न करे, वह दिन फिर आए।
अब्दुलशम्स: इन हाशिमियों से हमें उस्मान के ख़ून का बदला लेना है।
यज़ीद: ख़जाना खोल दो और रियाया का दिल अपनी मुट्ठी में कर लो। रुपया ख़ुदा के खौंफ को दिल से दूर कर देता है। सारे शहर की दावत करो। कोई मुज़ायका नहीं, अगर ख़जाना खाली हो जाये। हर एक सिपाही को निहाल कर दो और, अगर रियायतें करने पर भी कोई तुमसे खिंचा रहे, तो उसे क़त्ल कर दो। मुझे इस वक्त रुपए की ताक़त से धर्म और भक्ति को जीतना है।
हिंदा का प्रवेश
यज़ीद: हिंदा, तुमने इस वक्त कैसे तकलीफ़ की?
हिंदा: या अमीर! मैं आपकी ख़िदमत में सिर्फ इसलिए हाज़िर हुई हूं कि आपको इस इरादे से बाज़ रखूं। आपको अमीर मुआविया की क़सम, अपने दीन की, अपनी नजात को, अपने ईमान को यों न ख़राब कीजिए। जिस नवी से आपने इस्लाम की रोशनी पाई, जिसकी जात से आपको यह रुतबा मिला, जिसने आपकी आत्मा को अपने उपदेशों से जगाया, जिसने आपको अज्ञान के गढ्ढे से निकालकर आफ़ताब के पहलू में बिठा दिया, उसी ख़ुदा के भेजे हुए बुजुर्ग के नवासे का ख़ून बहाने के लिए आप आमादा है!
यज़ीद: हिंदा, ख़ामोश रहो।
हिंदा: कैसे ख़ामोश रहूं। आपको अपनी आंखों से जहन्नम के गार में गिरते देखकर ख़ामोश नहीं रह सकती। आपको मालूम नहीं रसूल की आत्मा स्वर्ग में बैठी हुई आपके इस अन्याय को देखकर आपको लानत दे रही होगी और, हिसाब के दिन आप अपना मुंह उन्हें न दिखा सकेंगे। क्या नहीं जानते, आप अपनी नजात का दरवाजा बंद कर रहे हैं।
यज़ीद: हिंदा, ये मज़हब की बातें मज़हब के लिये हैं, दुनिया के लिये नहीं। मेरे दादा इस्लाम इसलिये क़बूल किया था कि इससे उन्हें दौलत और इज्जत हाथ आती थी। नजात के लिये वह इस्लाम पर ईमान नहीं लाए थे, और न मैं ही इस्लाम को नजात का जामिन समझने को तैयार हूं।
हिंदा: अमीर, ख़ुदा के लिये यह कुवाक्य मुंह से न निकालो। आपको मालूम है, इस्लाम ने अरब से अधर्म के अंधेरे को कितनी आसानी से दूर कर दिया। अकेले एक आदमी ने काफ़िरों का निशान मिटा दिया। क्या ख़ुदा की मरजी बिना यह बात हो सकती थी? कभी नहीं। तुम्हें मालूम है कि रसूल हुसैन को कितना प्यार करते थे? हुसैन को वह कंधों पर बिठाते और अपनी नूरानी डाढ़ी को उनके हाथों से नुचवाते थे। जिस माथे को तुम अपने पैरों पर झुकाना चाहती हो, उसके रसूल बोसे लेते थे। हुसैन से दुश्मनी करके तुम अपने हक़ में कांटे बो रहो हो। ख़िलाफ़त उसकी है, जिसे पंच दे; यह किसी की मीरास नहीं है। तुम खुद मदीने जाओ, और देखो, कौन किस पर ख़िलाफ़त का बार रखती है। उसके हाथों पर बैयत लो। अगर क़ौम तुमको इन रुतबे पर बैठा दे, तो मदीने में रहकर शौक से इस्लाम का ख़िदमत करो। मगर ख़ुदा के वास्ते यह हंगामा न उठाओ। जाती है।
यज़ीद: सरजून रूमी की बुला लो।
सरजून आकर आदाब बजा लाता है।
यज़ीद: आपके वालिद मरहूम की ख़िदमत जितनी वफ़ादारी के साथ की, उसके लिये मैं आपका शुक्रगुजार हूं। मगर इस वक्त मुझे आपकी पहले से कहीं ज्यादा ज़रूरत है। बसरे की सूबेदारी के लिए आप किसे तजबीज करते हैं?
रूमी: ख़ुदा अमीर, को सलामत रखे। मेरे ख़याल में अब्दुल्लाह बिन ज़ियाद से ज्यादा लायक आदमी आपको मुश्किल से मिलेगा। ज़ियाद ने अमीर मुआविया की जो ख़िदमत की, वह मिटाई नहीं जा सकती। अब्दुल्लाह उसी बाप का बेटा और ख़ानदान का उतना ही सच्चा ग़ुलाम है। उसके पास फ़ौरन क़ासिद भेज दीजिए।
यज़ीद: मुझे ज़ियाद के बेटे से शिकायत है कि उसने बसरेवालों के इरादों की मुझे इत्तिला नहीं दी और मुझे यकीन है कि बसरेवाले मुझसे बग़ावत कर जायेंगे।
रूमी: या अमीर, आपका ज़ियाद पर शक करना बेज़ा है। आपके मददग़ार आपके पास खुद-ब-खुद न आएंगे। वह तलाश करने से, मिन्नत करने से रियासत करने से आएंगे। आप ही आप वे लोग आएंगे, जो आपकी जात से खुद फ़ायदा उठाना चाहते हैं। इस मंसब के लिये ज़ियाद से बेहतर आदमी आपको न मिलेगा।
यज़ीद: सोचूंगा। शराब का प्याला उठाता है। जुहाक! कोई गीत तो सुनाओ। जिसकी मिठास उस फ़िक्र को मिटा दे, जो इस वक्त मेरे दिल और जिगर पर पत्थर की चट्टान की तरह रखी हुई है।
जुहाक: जैसा हुक्म।
डफ बजाकर गाता है।
गाना
सफ़ी थक के बैठे दवा करनेवाले, उठे हाथ उठाकर दुआ, करनेवाले। वफ़ा पर हैं। मरते वफ़ा करनेवाले। ज़फ़ा कर रहे हैं ज़फ़ा करनेवाले। बचाकर चले ख़ाक से अपना दामन, लहद पर जो गुजरी हवा करनेवाले। किसी बात भी तक क़ायम नहीं है, ये ज़ालिम, सितमगर, दग़ा करनेवाले। तअज्जुब नहीं है, जो अब जहन दे दें, ये जिच हो गए हैं दवा करनेवाले। समझ ले कि दुश्वार है राजदारी, किसी का किसी से गिला करनेवाले अभी है बुतों को खुदाई का दावा, ख़ुदा जाने और क्या करनेवाले।
दूसरा दृश्य
रात का समय– मदीने का गवर्नर वलीद अपने दरबार में बैठा हुआ है।
वलीद: स्वागत मरवान कितना ख़ुदगर्ज़ आदमी है। मेरा मातहत होकर भी मुझ पर रोब ज़माना चाहता है। उसकी मर्जी पर चलता, तो आज सारा मदीना मेरा दुश्मन होता। उसने रसूल के ख़ानदान से हमेशा दुश्मनी की है।
क़ासिद का प्रवेश
क़ासिद: या अमीर, यह ख़लीफ़ा यज़ीद का ख़त है।
वलीद: घबराकर ख़लीफ़ा यज़ीद! अमीर मुआविया को क्या हुआ?
क़ासिद: आपको पूरी कैफ़ियत इस ख़त से मालूम होगी। ख़त वलीद के हाथ में देता है।
वलीद: ख़त पढ़कर अमीर मुआविया की रूह को ख़ुदा जन्नत में दाखिल करे। मगर समझ में नहीं आता कि यज़ीद क्योंकर ख़लीफ़ा हुए। क़ौम के नेताओं की कोई मज़लिस नहीं हुई, और किसी ने उनके हाथ पर बैयत नहीं ली। महीने-भर में यह ख़बर फैलेगी तो गजब हो जायेगा। हुसैन यज़ीद को कभी ख़लीफ़ा न मागेंगे।
क़ासिद: दूसरा ख़त देकर हुजूर इसे भी देख ले।
वलीद: ख़त लेकर पढ़ता है ‘‘वलीद, हाकिम मदीना को ताक़ीद की जाती है कि इस ख़त को देखते ही हुसैन मेरे नाम पर बैयत न ले, तो उन्हें क़त्ल कर दें, और उनका सिर मेरे पास भेज दें।’’ सर्द सांस लेकर फ़र्श पर लेट जाता है।
क़ासिद: मुझे क्या हुक्म होता है?
वलीद: तुम जाकर बाहर ठहरो दिल में ख़ुदा वह दिन न लाए कि मुझे रसूल के नवासे के साथ यह घृणित व्यवहार करना पड़े। वलीद इतना बेदीन नहीं है। ख़ुदा रसूल को इतना नहीं भूला है मेरे हाथ गिर पड़े इसके पहले कि मेरी तलवार हुसैन की गर्दन पर पड़े। काश, मुझे मालूम होता है अमीर मुआविया की मौत इतनी नज़दीक है, उसकी आंखें बंद होते ही मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा, तो पहले ही इस्तीफा देकर चला जाता। मरवान की सूरत देखने को जी नहीं चाहता, मगर इस वक्त उसकी मर्जी के ख़िलाफ़। काम करना अपनी मौत को बुलाना है। वह रत्ती-रत्ती ख़बर यज़ीद के पास भेजेगा। उसके सामने मेरी कुछ भी न सुनी जायेगी। ऐसा अफ़सर, जो मातहतों से डरे, मातहत से भी बदतर है। जिस वजीर का ग़ुलाम बादशाह का विश्वासपात्र हो, उसके लिये जंगल से ऊँट चराना उससे हजार दर्जे बेहतर है कि वह वजीर की मसनद पर बैठे। ग़ुलाम को बुलाता है
ग़ुलाम: अमीर क्या हुक्म फ़र्माते हैं?
वलीद: जाकर मरवान को बुला ला।
ग़ुलाम: जो हुक्म। जाता है।
वलीद: दिल में हुसैन कितना नेक आदमी है। उसकी ज़बान से कभी किसी की बुराई नहीं सुनी। उसने कभी किसी को नुक़सान नहीं पहुंचाया। उससे मैं क्योंकर बैयत लूंगा। मरवान का प्रवेश
मरवान: इतनी रात गए मुझे आप न बुलाया करें। मेरी जान इतनी सस्ती नहीं है कि बागियों को इस पर छिपकर हमला करने का मौका दिया जाये।
वलीद: तुम्हारा बर्ताव ही क्यों ऐसा हो कि तुम्हारे ऊपर किसी कातिल की तलवार उठे। अभी-अभी क़ासिद मुआबिया की मौत की ख़बर लाया है, और यज़ीद का यह ख़त भी आया है। मुझे तुमसे इसकी बाबत सलाह लेनी है। ख़त देता है
मरवान: ख़त पढ़कर आह! मुआबिया, तुमने बेवक्त वफ़ात पाई। तुम्हारा नाम तारीख में हमेशा रोशन रहेगा। तुम्हारी नेकियों को याद करके लोग बहुत दिनों तक रोएंगे। यज़ीद ने ख़िलाफ़त अपने हाथ में ले ली, यह बहुत ही मुनासिब हुआ। मेरे ख़याल में हुसैन को इसी वक्त बुलाना चाहिए।
वलीद: तुम्हारे ख़याल में बैयत ले लेंगे?
मरवान: गैरमुमकिन। उनसे बैयत लेना उन्हें क़त्ल करने को कहना है। मगर अभी मुआबिया के मरने की ख़बर मशहूर न होनी चाहिए।
वलीद: इस मामले पर गौर करो।
मरवान: गौर की ज़रूरत नहीं, मैं आपकी जगह होता, तो बैयत का जिक्र ही न करता। फ़ौरन क़त्ल कर डालता। हुसैन के जिंदा रहते हुए यज़ीद को कभी इतमीनान नहीं हो सकता। यह भी याद रखिए कि मुआबिया के मरने की ख़बर फैल गई, तो न हमारी जान सलामत रहेगी, न आपकी। हुसैन से आपका कितना ही दोस्ताना हो, लेकिन वही हुसैन आपका जानी दुश्मन हो जायेगा।
वलीद: तुम्हें उम्मीद है कि वह इस वक्त यहाँ आएंगे। उन्हें शुबहा हो जायेगा।
मरवान: आपके ऊपर हुसैन का इतना भरोसा है, तो इस वक्त भी आएंगे। मगर आपकी तलवार तेज और ख़ून गर्म रहना चाहिए। यही कारगुजारी का मौका है। अगर हम लोगों ने इस मौके पर यज़ीद की मदद की, तो कोई शक नहीं कि हमारे इक़बाल का सितारा रोशन हो जायेगा।
वलीद: मरवान, मैं यज़ीद का ग़ुलाम नहीं, ख़लीफ़ा का नौकर हूं, और ख़लीफ़ा वही है, जिसे क़ौम चुनकर मसनद पर बिठा दे। मैं अपने दीन और ईमान का ख़ून करने से यह कही बेहतर समझता हूं कि कुरान पाक की नकल करके ज़िंदगी बसर करूं।
मरवान: या अमीर, मैं आपको यज़ीद के ग़ुस्से से होशियार किए देता हूं। मेरी और आपकी भलाई इसी मैं है कि यज़ीद का हुक्म बजा लाएं। हमारा काम उनको बंदगी करना है, आप दुविधा में न पड़ें। इसी वक्त हुसैन को बुला भेजें। ग़ुलाम को पुकारता है
ग़ुलाम: या अमीर, क्या हुक्म है?
मरवान: जाकर हुसैन बिन अली को बुला ला। दौड़ते जाना और कहना कि अमीर आपके इंतज़ार में बैठे हैं। ग़ुलाम चला जाता है
तीसरा दृश्य
रात का वक्त– हुसैन अब्बास मसजिद में बैठे बातें कर रहे हैं। एक दीपक जल रहा है।
हुसैन: मैं जब ख़याल करता हूं कि नाना मरहूम ने तनहा बड़े-बड़े सरकश बादशाहों को पस्त कर दिया, और इतनी शानदार ख़िलाफ़त क़ायम कर दी, तो मुझे यकीन हो जाता है कि उन पर ख़ुदा का साया था। ख़ुदा की मदद के बग़ैर कोई इंसान यह काम न कर सकता था। सिकंदर की बादशाहत उसके मरते ही मिट गई, क़ैसर को बादशाहत उसकी ज़िंदगी के बाद बहुत थोड़े दिनों तक क़ायम रही, उन पर ख़ुदा का साया न था, वह अपनी हवस की धुन में क़ौमों को फ़तह करते हैं। नाना ने इस्लाम के लिए झंड़ा बुलंद किया, इसी से वह कामयाब हुआ।
अब्बास: इसमें किसको शक हो सकता है कि वह ख़ुदा के भेजे हुए थे। ख़ुदा की पनाह, जिस वक्त हज़रत ने इस्लाम की आवाज उठाई थी, इस मुल्क में अज्ञान का कितना गहरा अंधकार छाया हुआ। वह ख़ुदा की ही आवाज़ थी, जो उनके दिल में बैठी हुई बोल रही थी, जो कानों में पड़ते ही दिलों में गुजर जाती थी। दूसरे मज़हब वाले कहते है, इस्लाम ने तलवार की ताक़त से अपना प्रचार किया। काश, उन्होंने हज़रत की आवाज सुनी होती! मेरा तो दावा है कि कुरान में एक आयत भी ऐसी नहीं है, जिसकी मंशा तलवार से इस्लाम का फैलाना हो।
हुसैन: मगर कितने अफ़सोस की बात है कि अभी से क़ौम ने उनकी नसीहतों को भूलना शुरू किया, और वह नापाक, जो उनकी मसनद पर बैठा हुआ है, आज खुले बंदो शराब पीता है। ग़ुलाम का प्रवेश
ग़ुलाम: नबी के बेटे पर ख़ुदा की रहमत हो। अमीर ने आपको किसी बहुत जरूरी काम के लिये तलब किया है।
अब्बास: यह वक्त वलीद के दरबार का नहीं है।
ग़ुलाम: हुजूर, कोई खास काम है।
हुसैन: अच्छा तू जा। हम घर जाने लगेंगे तो उधर से होते हुए जायेगें। ग़ुलाम चला जाता है
अब्बास: भाई! मुझे तो इस बेवक्त की तलबी से घबराहट हो गई है। यह वक्त वलीद के इजलास का नहीं है। मुझे दाल में कुछ काला नज़र आता है। आप कुछ कयास कर सकते हैं कि किसलिये बुलाया होगा।
हुसैन: मेरा दिल तो गवाही देता है कि मुआबिए ने वफ़ात पाई।
अब्बास: तो वलीद ने आपको इसलिए बुलाया होगा कि आपसे यज़ीद की बैयत ले।
हुसैन: मैं यज़ीद की बैयत क्यों करने लगा। मुआबिया ने भैया इमाम हसन के साथ क़सम खाकर शर्त की थी कि वह अपने मरने के बाद अपनी औलाद में किसी को ख़लीफ़ा न बनायेगा। हुसैन के बाद ख़िलाफ़त पर मेरा हक़ है। अगर मुआबिया मर गया है, और यज़ीद को ख़लीफ़ा बनाया गया है, तो उसने मेरे साथ और इस्लाम के साथ दग़ा की है। यज़ीद शराबी है, बदकार है, झूठा है, बेदीन है, कुत्तों को गोद में लेकर बैठता है। मेरी जान भी जाये, तो क्या, पर मैं उसकी बैयत न अख्तियार करूंगा।
अब्बास: मामला नाजुक है। यज़ीद की जात से कोई बात बईद नही। काश, हमें मुआबिया की बीमारी और मौत की ख़बर पहले ही मिल गई होती! ग़ुलाम का फिर प्रवेश
ग़ुलाम: हुजूर तशरीफ़ नहीं लाए, अमीर आपके इंतज़ार में बैठे हुए हैं।
हुसैन: तुफ़ है मुझ पर! तू वहां पर गया भी कि रास्ते से ही लौट आया? चल, मैं अभी आता हूं। तू फिर न आना।
ग़ुलाम: हुजूर, अमीर से जाकर जब मैंने कहा कि वह अभी आते हैं, तो वह चुप हो गए, लेकिन मरवान ने कहा कि वह कभी न आएंगे, आपसे दावा कर रहे हैं।
इस पर अमीर उनसे बहुत नाराज हुए और कहाहुसैन कौल के पक्के हैं, जो कहते हैं, उसे पूरा करते हैं।
हुसैन: वलीद शरीफ़ आदमी है। तुम जाओ, हम अभी आते हैं। ग़ुलाम चला जाता है।
अब्बास: आप जायेंगे?
हुसैन: जब तक कोई सबब न हो, किसी की नीयत पर शुबहा करना मुनासिब नहीं।
अब्बास: भैया, मेरी जान आप पर फ़िदा हो। मुझे डर है कि कहीं वह आपको क़ैद न कर ले।
हुसैन: वलीद पर मुझे एतबार है। आबूसिफ़ियान की औलाद होने पर भी वह शरीफ़ और दीनदार है।
अब्बास: आप एतबार करें, लेकिन मैं आपको वहां जाने की हरगिज सलाह न दूंगा। इस सन्नाटे में अगर उसने कोई दग़ा की, तो कोई फर्याद भी न सुनेगा। आपको मालूम है कि मरवान कितना दग़ाबाज और हरामकार है। मैं उसके साए से भी भागता हूं। जब तक आप मुझे, यह इतमीनान न दिला दीजिएगा कि दुश्मन यहां आपका बाल बांका न कर सकेगा, मैं आपका दामन न छोड़ूगा।
हुसैन: अब्बास, तुम मेरी तरफ़ से बेफ़िक्र रहो, मुझे हक़ पर इतना यकीन है, और मुझमें हक़ की इतनी ताक़त है कि मेरी बात और वलीद तो क्या, यज़ीद की सारी फ़ौज भी मुझे नुक़सान नहीं पहुंचा सकती। यकीन है कि मेरी एक आवाज पर हजारों ख़ुदा के बंदे और रसूल के नाम पर मिटने वाले दौड़ पड़ेंगे और, अगर कोई मेरी आवाज न सुने, तो भी मेरी बाजुओं में इतना बल है कि मैं अकेले उनमें से एक सौ को ज़मीन पर सुला सकता हूं। हैदर का बेटा ऐसे गीदड़ों से नहीं डर सकता। आओ, ज़रा नाना की क़ब्र की जियारत कर लें। दोनों हज़रत मुहम्मद की क़ब्र के सामने खड़े हो जाते हैं, हाथ बांधकर दुआ पढ़ते हैं, और मसजिद से निकलकर घर की तरफ़ चलते हैं।
चौथा दृश्य
समय– रात। वलीद का दरबार। वलीद और मरवान बैठे हुए हैं।
मरवान: अब तक नहीं आए! मैंने आपसे कहा न कि वह हरगिज नहीं आएंगे।
वलीद: आएंगे, और ज़रूर आएंगे। मुझे उनके कौल पर पूरा भरोसा है।
मरवान: कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि उन्हें अमीर की वफ़ात की ख़बर लग गई हो, और वह अपने साथियों को जमा करके हमसे जंग करने आ रहे हों। हुसैन का प्रथम वलीद सम्मान के भाव से खड़ा हो जाता है, और दरवाजे पर आकर हाथ मिलाता है। मरवान अपनी जगह पर बैठा रहता है।
हुसैन: ख़ुदा की तुम पर रहमत हो। मरवान को बैठे देखकर मेल फूट और प्रेम द्वेष से बहुत अच्छा है। मुझे क्यों याद किया हैं?
वलीद: इस तकलीफ़ के लिये माफ़ कीजिए, आपको यह सुनकर अफ़सोस होगा कि अमीर मुआबिया ने वफ़ात पाई।
मरवान: और ख़लीफ़ा यज़ीद ने हुक्म दिया है कि आपसे उनके नाम की बैयत ली जाये।
हुसैन: मेरे नजदीक यह मुनासिब नहीं है कि मुझ-जैसा आदमी छुपे-छुपे बैयत ले। यह न मेरे लिए मुनासिब है, और न यज़ीद के लिए काफी। बेहतर है, आप एक आम जलसा करें, और शहर के सब रईसों और आलिमों को बुलाकर यज़ीद की बैयत का सवाल पेश करें। मैं भी उन लोगों के साथ रहूंगा, और उस वक्त सबके पहले जवाब देने वाला मैं हूंगा।
वलीद: मुझे आपकी सलाह माकूल होता है। बेशक, आपके बैयत लेने से वह नतीजा न निकलेगा, जो यज़ीद की मंशा है। कोई कहेगा कि आपने बैयत ली, और कोई कहेगा कि नहीं। और, इसकी तसदीक करने में बहुत वक्त लगेगा। तो जलसा करूं?
मरवान: अमीर, मैं आपको खबरदार किए देता हूं कि इनकी बातों में न आइए। बग़ैर बैयत लिए इन्हें यहां से न जाने दीजिए, वरना इनसे उस वक्त तक बैयत न ले सकेंगे, जब तक ख़ून की नदी न बहेगी। यह चिनगारी की तरह उड़कर सारी ख़िलाफ़त में आग लगा देंगे।
वलीद: मरवान, मैं तुमसे मिन्नत करता हूं, चुप रहो।
मरवान: हुसैन, मैं ख़ुदा को गवाह करके कहता हूं कि मैं आपका दुश्मन नहीं हूं। मेरी दोस्ताना सलाह यह है कि आप यज़ीद की बैयत मंजूर कर लीजिए ताकि आपको कोई नुक़सान न पहुंचे। आपस का फ़साद मिट जाये और हजारों ख़ुदा के बंदो की जानें बच जाएं। ख़लीफ़ा आपके बैयत की ख़बर सुनकर बेहद ख़ुश होंगे, और आपके साथ ऐसे सलूक करेंगे कि ख़िलाफ़त में कोई आदमी आपकी बराबरी न कर सकेगा। मैं आपको यक़ीन दिलाता हूं कि आपकी जागीरें और वजीफ़े दोचंद करा दूंगा और आप मदीने में इज्जत के साथ रसूल के कदमों से लगे हुए दीन और दुनिया में सुर्खरू होकर ज़िंदगी बसर करेंगे।
हुसैन: बस करो मरवान, मैं तुम्हारी दोस्ताना सलाह सुनने के लिए नहीं आया हूं। तुमने कभी अपनी दोस्ती का सबूत नहीं दिया, और इस मौके पर तुम्हारी सलाह को दोस्ताना न समझकर दग़ा समझू, तो मेरा दिल और मेरा ख़ुदा मुझसे नाख़ुश न होगा। आज इस्लाम इतना कमज़ोर हो गया है कि रसूल का बेटा यज़ीद को बैयत लेने के लिए मज़बूर हो!
मरवान: उनकी बैयत से आपको क्या एतराज है!
हुसैन: इसलिए कि वह शराबी झूठा, दग़ाबाज, हरामकार और ज़ालिम है। वह दीन के आलिमों की तौहीन करता है। जहां जाता है, एक गधे पर एक बंदर को आलिमों के कपड़े पहनकर साथ ले जाता है। मैं ऐसे आदमी की बैयत अख्तियार नहीं कर सकता।
मरवान: या अमीर, आप इनसे बैयत लेंगे या नहीं?
हुसैन: मेरी बैयत किसी के अख्तियार में नहीं है।
मरवान: क़सम ख़ुदा की, आप बैयत क़बूल किए बिना नहीं जा सकते। मैं तुम्हें यहीं क़त्ल कर डालूंगा। तलवार खींचकर बढ़ता है
हुसैन: डपटकर तू मुझे क़त्ल करेगा, तुझमें इतनी हिम्मत नहीं है! दूर रह। एक क़दम भी आगे रखा, तो तेरा नापाक सिर ज़मीन पर होगा। अब्बास ३० सशस्त्र आदमियों के साथ तलवार खींचे हुए घुस आते हैं।
अब्बास: मरवान की तरफ़ झपटकर मलऊन, यह ले; तेरे लिए दोज़ख का दरवाजा खुला हुआ है।
हुसैन: मरवान के सामने खड़े होकर अब्बास, तलवार म्यान में करो। मेरी लड़ाई मरवान से नहीं, यज़ीद से है। मैं ख़ुश हूं कि यह अपने आका का ऐसा वफ़ादार ख़ादिम है।
अब्बास: इस मरदूद की इतनी हिम्मत कि आपके मुबारक जिस्म पर हाथ उठाए! क़सम ख़ुदा की, इसका ख़ून पी जाऊंगा।
हुसैनमेरे देखते ही नहीं, मुसलमान पर मुसलमान का ख़ून हराम है।
वलीद: हुसैन से मैं सख्त नादिम हूं कि मेरे सामने आपकी तौहीन हुई। ख़ुदा इसका अंजाम मुझे दे।
हुसैन: वलीद, मेरी तक़दीर में अभी बड़ी-बड़ी सख्तियां झेलनी बदी हैं। यह उस मारके की तमहीद है, जो पेश आने वाला है। हम और तुम शायद फिर न मिलें इसलिए रुखसत। मैं तुम्हारी मुरौवत और भलमनसी को कभी न भूलूंगा। मेरी तुमसे सिर्फ इतनी अर्ज है कि मेरे यहां से जाने में ज़रा भी रोकटोक न करना। दोनों गले मिलकर विदा होते हैं। अब्बास और तीसों आदमी बाहर चले जाते हैं।
मरवान: वलीद, तुम्हारी बदौलत मुझे यह ज़िल्लत हुई।
वलीद: तुम नाशुक्र हो। मेरी बदौलत तुम्हारी जान बच गई, वरना तुम्हारी लाश फर्श पर तड़पती नज़र आती।
मरवान: तुमने यज़ीद की ख़िलाफ़त यज़ीद से छीनकर हुसैन को दे दी। तुमने आबूसिफ़ियान की औलाद होकर उसके ख़ानदान से दुश्मनी की। तुम ख़ुदा की दरगाह में उस क़त्ल और ख़ून के ज़िम्मेदार होगे, जो आज को ग़फलत या नरमी का नतीजा होगा। मरवान चला जाता है
पाँचवाँ दृश्य
समय– आधी रात। हुसैन और अब्बास मसजिद के सहन में बैठे हुए हैं।
अब्बास: बड़ी ख़ैरियत हुई, वरना मलऊन ने दुश्मनों का काम ही तमाम कर दिया था।
हुसैन: तुम लोगों की जतन बड़े मौक़े पर आई। मुझे ग़ुमान न था कि ये सब मेरे साथ इतनी दग़ा करेंगे। मगर यह जो कुछ हुआ, आगे चलकर इससे भी ज्यादा होगा। मुझे ऐसा मालूम हो रहा है कि हमें अब चैन से बैठना नसीब न होगा। मेरा भी वही हाल होनेवाला है, जो भैया इमाम हसन का हुआ।
अब्बास: ख़ुदा न करे, ख़ुदा न करे।
हुसैन: अब मदीने में हम लोगों का रहना कांटे पर पांव रखना है। भैया; शायद नबियों की औलाद शहीद होने ही के लिये पैदा होती है। शायद नबियों को भी होनहार की ख़बर नहीं होती, नहीं तो क्या नाना की मसनद पर वे लोग बैठते, जो इस्लाम के दुश्मन हैं, और जिन्होंने सिर्फ अपनी ग़रज पूरी करने के लिये इस्लाम का स्वांग भरा है। मैं रसूल ही से पूछता हूं कि वह मुझे क्या हुक्म देते हैं? मदीने ही में रहूं या कहीं और चला जाऊँ? हज़रत मुहम्मद की क़ब्र पर आकर ऐ ख़ुदा, यह तेरे रसूल मुहम्मद की ख़ाक है, और मैं उनकी बेटी का बेटा हूं। तू मेरे दिल का हाल जानता है। मैंने तेरी और तेरे रसूल की मर्जी पर हमेशा चलने की कोशिश की है। मुझ पर रहम कर और उस पाक नबी के नाते, जो इस क़ब्र में सोया हुआ है, मुझे हिदायत कर कि इस वक्त मैं क्या करूं? रोते हैं, और क़ब्र पर सिर रखकर बैठ जाते हैं। एक क्षण में चौंककर उठ बैठते हैं।
अब्बास: भैया, अब यहां से चलो। घर के लोग घबरा रहे होंगे।
हुसैन: नहीं अब्बास, अब मैं लौटकर घर न जाऊंगा। अभी मैंने ख्वाब देखा कि नाना आए हैं, और मुझे छाती से लगाकर कहते है‘‘बहुत थोड़े दिनों में तू ऐसे आदमियों के हाथों शहीद होगा, जो अपने को मुसलमान कहते होंगे, और मुसलमान न होंगे। मैंने तेरी शहादत के लिये कर्बला का मैदान चुना है, उस वक्त तू प्यासा होगा, पर तेरे दुश्मन तुझे एक बूंद पानी न देंगे। तेरे लिये यहां बहुत ऊंचा रुतबा रखा गया है, पर वह रुतबा शहादत के बग़ैर हासिल नहीं हो सकता।’’ यह कहकर नाना ग़ायब हो गए।
अब्बास: रोकर भैया, हाय भैया, यह ख्वाब या पेशीनगोई?
मुहम्मद हंफ़िया का प्रवेश
मुहम्मद: हुसैन, तुमने क्या फ़ैसला किया?
हुसैन: ख़ुदा की मर्जी है कि मैं क़त्ल किया जाऊं।
मुहम्मद: ख़ुदा की मरजी ख़ुदा ही जानता है। मेरी सलाह तो यह है कि तुम किसी दूसरे शहर चले जाओ, और वहां से अपने कासिदों को उस जवार में भेजो। अगर लोग तुम्हारी बैयत मंजूर कर लें, तो ख़ुदा का शुक्र करना, वरना यों भी तुम्हारी आबरू क़ायम रहेगी। मुझे ख़ौफ़ यही है कि कहीं तुम ऐसी जगह न जा फंसो, जहां कुछ लोग तुम्हारे दोस्त हों, और कुछ तुम्हारे दुश्मन। कोई चोट बगली घूंसों की तरह नहीं होती, कोई सांप इतना कातिल नहीं होता, जितना आस्तीन का, कोई कान इतना तेज नहीं होता, जितना दीवार का, और कोई दुश्मन इतना ख़ौफनाक नहीं होता, जितनी दग़ा। इससे हमेशा बचते रहना।
हुसैन: आप मुझे कहां जाने की सलाह देते हैं?
मुहम्मद: मेरे ख़याल में मक्का से बेहतर कोई जगह नहीं है। अगर क़ौम ने तुम्हारी बैयत मंजूर की, तो पूछना ही क्या? वर्ना पहाड़ियों की घाटियां तुम्हारे लिये क़िलों का काम देंगी, और थोडे-से मददग़ारों के साथ तुम आजादी से ज़िंदगी बसर करोगे। ख़ुदा चाहेगा, तो लोग बहुत जल्द यज़ीद के बेजार होकर तुम्हारी पनाह में आएंगे।
हुसैन: अजीजों को यहां छोड़ दूं?
मुहम्मद: हरगिज नहीं। सबको अपने साथ ले जाओ।
हुसैन: यहां की हालत से मुझे जल्द-जल्द इत्तिला देते रहिएगा।
मुहम्मद: इसका इतमीनान रखो। मुहम्म्द हुसैन से गले मिलकर जाते हैं।
अब्बास: भैया, अब तो घर चलिए, क्या सारी रात जागते रहिएगा?
हुसैन: अब्बास, मैं पहले ही कह चुका कि लौटकर घर न जाऊंगा।
अब्बास: अगर आपकी इजाज़त हो, तो मैं भी कुछ अर्ज करूं: आप मुझे अपना सच्चा दोस्त समझते हैं या नहीं?
हुसैन: ख़ुदा पाक की क़सम, तुमसे ज्यादा सच्चा दोस्त दुनिया में नहीं है।
अब्बास: क्यों न आप इस वक्त यज़ीद की बैयत मंजूर कर लीजिए? ख़ुदा कारसाज है, मुमकिन है, थोड़े दिनों में यज़ीद खुद ही मर जाये, तो आपको ख़िलाफ़त आप-ही-आप मिल जायेगी। जिस तरह आपने मुआबिया के जमाने में सब्र किया, उसी तरह यज़ीद को भी सब्र के साथ काट दीजिए। यह भी मुमकिन है कि थोड़े ही दिनों में यज़ीद से तंग लोग बग़ावत कर बैठे, और आपके लिये मौका निकल आए। सब्र सारी मुश्किलों को आसन कर देता है।
हुसैन: अब्बास, यह क्या कहते हो? अगर मैं ख़ौफ़ से यज़ीद को बैयत क़बूल कर लूं, तो इस्लाम का मुझसे बड़ा दुश्मन और कोई न होगा। मैं रसूल को, वालिद को, भैया हसन को क्या मुंह दिखाऊंगी! अब्बाजान ने शहीद होना क़बूल किया, पर मुआबिया की बैयत न मंजूर की। भैया ने भी मुआबिया की बैयत को हराम समझा, तो मैं क्यों ख़ानदान में दाग़ लगाऊं? इज्जत की मौत बेइज्जती की ज़िंदगी से कहीं अच्छी है।
अब्बास: विस्मित होकर ख़ुदा की क़सम, यह हुसैन की आवाज नहीं रसूल की आवाज़ है, और ये बातें हुसैन की नहीं, अली की हैं। भैया! आपको ख़ुदा ने अक्ल दी है, मैं तो आपका खादिम हूं, मेरी बातें आपको नागवार हुई हों, तो माफ़ करना।
हुसैन: अब्बास को छाती से लगाकर अब्बास, मेरा ख़ुदा मुझसे नाराज हो जाये, अगर मैं तुमसे ज़रा भी मलाल रखूं। तुमने मुझे जो सलाह दी, वह मेरी भलाई के लिये दी। इसमें मुझे ज़रा भी शक नहीं। मगर तुम इस मुग़ालते में हो कि यज़ीद के दिल की आग मेरे बैयत ही से ठंडी हो जायेगी, हालांकि यज़ीद ने मुझे क़त्ल करने का यह हीला निकाला है। अगर वह जानता कि मैं बैयत ले लूंगा, तो वह कोई और तदबीर सोचता।
अब्बास: अगर उसकी यह नीयत है, तो क़लाम पाक की क़सम, मैं आपके पसीने की जगह अपना ख़ून बहा दूंगा, और आपसे आगे बढ़कर इतनी तलवारें चलाऊंगा कि मेरे दोनों हाथ कटकर गिर जायें। जैनब, शहरबानू और घर के अन्य लोग आते हैं।
जैनब: अब्बास, बातें न करो। हुसैन से भैया, मैं आपके पैरों पड़ती हूं। आप यह इरादा तर्क कर दीजिए, और मदीने में रसूल की क़ब्र से लगे हुए ज़िंदगी बसर कीजिए, और अपनी गर्दन पर इस्लाम की तबाही का इल्जाम न लीजिए।
हुसैन: जैनब ऐसी बातों पर तुफ़ है। जब तक ज़मीन और आसमान क़ायम है, मैं यज़ीद की बैयत नहीं मंजूर कर सकता। क्या तुम समझती हो कि मैं ग़लती पर हूं?
जैनब: नहीं भैया, आप ग़लती पर नहीं है। अल्लाहताला अपने रसूल के बेटे को ग़लत रास्ते पर नहीं ले जा सकता, अगर आप जानते हैं कि ज़माने का रंग बदला हुआ है। ऐसा न हो, लोग आपके खिलाफ़ उठ खड़े हों।
हुसैन: बहन, इंसान सारी दुनिया के ताने बर्दाश्त कर सकता है, पर अपने ईमान का नहीं। अगर तुम्हारा यह ख़याल है कि मेरी बैयत न लेने से इस्लाम में तफ़र्खा पड़ जायेगा, तो यह समझ लो कि इत्तिफ़ाक कितनी ही अच्छी चीज़ हो, लेकिन रास्ती उससे कहीं अच्छी है। रास्ती को छोड़कर मेल को क़ायम रखना वैसा ही है, जैसा जान निकल जाने के बाद जिस्म क़ायम रखना। रास्ती क़ौम की जान है, उसे छोड़कर कोई क़ौम बहुत दिनों तक जिंदा नहीं रह सकती। इस बारे में मैं अपनी राय क़ायम कर चुका, अब तुम लोग मुझे रुखसत करो। जिस तरह मेरी बैयत से इस्लाम का वक़ार मिल जायेगा, उसी तरह मेरी शहादत से उसका वक़ार क़ायम रहेगा। मैं इस्लाम की हुरमत पर निसार हो जाऊंगा।
शहरबानू: रोकर क्या आप हमें अपने कदमों से जुदा करना चाहते हैं?
अली अकबर: अब्बाजान, अगर शहीद ही होना है, तो हम भी वह दर्जा क्यों न हासिल करें?
मुस्लिम: या अमीर, हम आपके क़दमों पर निसार होना ही अपनी ज़िंदगी का हासिल समझते हैं। आप न ले जायेंगे, तो हम जबरन आपके साथ चलेंगे।
अली असगर: अब्बा, मैं आपके पीछे खड़े होकर नमाज़ पढ़ता था। आप यहां छोड़ देंगे, तो मैं नमाज कैसे पढ़ूंगा?
जैनब: भैया, क्या कोई उम्मीद नहीं? क्या मदीने में रसूल के बेटे पर हाथ रखनेवाला, रसूल की बेटियों की हुरमत पर जान देनेवाला, हक़ पर सिर काटने वाला कोई नहीं है? इसी शहर से वह नूर फैला, जिससे सारा जहान रोशन हो गया। क्या वह हक़ की रोशनी इतनी जल्द ग़ायब हो गई? आप यहीं से हिजाज़ और यमन की तरफ़ कासिदों को क्यों नहीं रवाऩा फ़रमाते?
हुसैन: अफ़सोस है जैनब, ख़ुदा को कुछ और ही मंजूर है। मदीने में हमारे लिये अब अमन नहीं है। यहां अगर हम आजादी से खड़े हैं, तो यह वलीद की शराफत है; वरना यज़ीद की फ़ौजों में हमको घेर लिया होता। आज मुझे सुबह होते-होते यहां से निकल जाना चाहिए। यज़ीद को मेरे अजीजों से दुश्मनी नहीं, उसे ख़ौफ़ सिर्फ़ मेरा है। तुम लोग मुझे यहां से रुखसत करो। मुझे यकीन है कि यज़ीद तुम लोग को तंग न करेगा। उसके दिल में चाहे न हो, मगर मुसलमान के दिल में ग़ैरत बाकी है। वह रसूल की बहू-बेटियों की आबरू लुटते देखेंगे, तो उनका ख़ून ज़रूर गर्म हो जायेगा।
जैनब: भैया, यह हरगिज़ न होगा। हम भी आपके साथ चलेंगी। अगर इस्लाम का बेटा अपनी दिलेरी से इस्लाम का वकार क़ायम रखेगा, तो हम अपने सब्र से, जब्त से और बरदाश्त से उसकी शान निभाएंगे। हम पर जिहाद हराम है, लेकिन हम मौका पड़ने पर मरना जानती हैं। रसूल पाक की क़सम, आप हमारी आँखों में आँसू न देखेंगे, हमारे लबों से फ़रियाद न सुनेंगे, और हमारे दिलों से आह न निकलेगी। आप हक़ पर जान देकर इस्लाम की आबरू रखना चाहते हैं, तो हम भी एक बेदीन और बदकार की हिमायत में रहकर इस्लाम के नाम पर दाग़ लगाना नहीं चाहती। सिपाहियों का एक दस्ता सड़क पर आता दिखाई पड़ता है
हुसैन: अब्बास, यज़ीद के आदमी हैं। वलीद ने भी दग़ा दी। आह! हमारे हाथों में तलवार भी नहीं! ऐ ख़ुदा मदद!
अब्बास: क़लाम पाक की क़सम, ये मरदूद आपके क़रीब न पाएंगे।
जैनब: भैया, तुम सामने से हट जाओ।
हुसैन: जैनब घबराओ मत, आज मैं दिखा दूंगा कि अली का बेटा कितनी दिलेरी से जान देता है।
अब्बास: (बाहर निकल कर फ़ौज के सरदार से) ऐ सरदार, किसकी बदनसीबी है कि तू उसके नज़दीक जा रहा है?
सरदार: या हज़रत, हमें शहर में गश्त लगाने का हुक्म हुआ है कि कहीं बाग़ी तो जमा नहीं हो रहे हैं।
हुसैन: अब देर करने का मौका नहीं है। चलूं, अम्माजान से रुखसत हो लूं। फ़ातिमा की क़ब्र पर जाकर ऐ मादरेजान, तेरा बदनसीब बेटा जिसे तूने गोद में प्यार से खिलाया था, जिसे तूने सीने से दूध पिलाया थाआज तुझसे रुखसत हो रहा है, और फिर शायद उसे तेरी जियारत नसीब न हो रोते हैं।
मदीने के सब नगरवासियों का प्रवेश
सब: ऐ अमीर, आप हमें कदमों से क्यों जुदा करते है? हम आपका दामन न छोड़ेंगे। आपके कदमों से लगे हुए गुरबत की ख़ाक छानना इससे कहीं अच्छा है कि एक बदकार और ज़ालिम ख़लीफ़ा सख्तियां झेले। आप नबी के ख़ानदान के आफ़ताब हैं। उसकी रोशनी से दूर होकर हम अंधेरे में खौफ़नाक जानवरों से क्योंकर अपनी जान बचा सकेंगे? कौन हमें हक़ और दीन की राह सुझाएगा? कौन हमें अपनी जान बचा सकेंगे? कौन हमें एक और दीन की राह सुझाएगा? कौन हमें अपनी नसीहतों का अमृत पिलाएगा? हमें अपने कदमों से जुदा न कीजिए। रोते है।
हुसैन: मेरे प्यारे दोस्तों, मैं यहां से खुद नहीं जा रहा हूं। मुझे तक़दीर लिए जा रही है। मुझे वह दर्दनाक नजारा देखने की ताब नहीं है कि मदीने की गलियां इस्लाम और रसूल के दोस्तों के ख़ून से रंगी जायें। मैं प्यारे मदीने को उस तबाही और ख़ून से बचाना चाहता हूं। तुम्हें मेरी यही आखिरी सलाह है कि इस्लाम की हुरमत क़ायम रखना, माल और जर के लिये अपनी क़ौम और अपनी मिल्लत से बेवफाई न करना, ख़ुदा के नज़दीक इससे बड़ा गुनाह नहीं है। शायद हमें फिर मदीने के दर्शन न हों, शायद हम फिर सूरतों को देख न सकें। हां, शायद फिर हमें बुजुगों की सूरत देखनी नसीब न हो, जो हमारे नाना के शरीक और हमदर्द रहें, जिनमें से कितनों ही ने मुझे गोद में खेलाया है। भाइयों, मेरी ज़बान में इतनी ताक़त नहीं है कि उस रंज और ग़म को ज़ाहिर कर सकूं, जो मेरे सीने में दरिया की लहरों की तरह उठ रहा है। मदीने की तरह उठा रहा है। मदीने की ख़ाक से जुदा होते हुए जिगर के टुकड़े हुए जाते हैं। आपसे जुदा होते आँखों में अँधेरा छा जाता है, मगर मज़बूर हूं। ख़ुदा की और रसूल की यह मंशा है कि इस्लाम का पौधा मेरे ख़ून से सींचा जाये, रसूल की खेती रसूल की औलाद के ख़ून से हरी हो, और मुझे उनके सामने सिर झुकाने के सिवा और कोई चारा नहीं।
नागरिक: या अमीर, हमें अपने क़दमों से जुदा न कीजिए। हाय अमीर, हाय रसूल के बेटे, हम किसका मुंह देखकर जिएंगे। हम क्योंकर सब्र करें, अगर आज न रोएं तो फिर किस दिन के लिये आंसुओं को उठा रखे? आज से ज्यादा मातम का और कौन दिन होगा?
हुसैन: मुहम्मद की क़ब्र पर जाकर ऐ रसूल-ख़ुदा, रुखसत। आपका नवासा मुसीबत में गिरफ्तार है। उसका बेड़ा पार कीजिए।
सब लोग छोड़ के पहले ही सिधारे; मिलता नहीं आराम नवासे को तुम्हारे। खादिम को कोई अमन की अब जा नहीं मिलती; राहत कोई साहत मेरे मौला, नहीं मिलती। दुख कौन-सा और कौन-सी ईज़ा नहीं मिलती; है आप जहां, राय वह मुझको नहीं मिलती; दुनिया में मुझे कोई नहीं और ठिकाना; आज आखिरी रुखसत को ग़ुलाम आया है नाना! बच जाऊं जो, पास अपने बुला लीजिए नाना; तुरबत में नवासे को छिपा लीजिए नाना!
भाई की क़ब्र पर जाकर
सुन लीजिए शब्बीर की रुखसत है बिरादर, हज़रत को तो पहलू हुआ अम्मा का मयस्सर। क़ब्र भी जुदा होंगी यहां अब तो हमारी; दखें हमें ले जाये कहां ख़ाक हमारी!
मैं नहीं चाहता कि मेरे साथ एक चिउंटी की भी जान खतरे में पड़े। अपने अजीजों से, अपनी मस्तूरात से, अपने दोस्तों से यही सवाल है कि मेरे लिये ज़रा भी ग़म न करो, मैं वहीं जाता हूं, जहां ख़ुदा की मर्जी लिए जाती है।
अब्बास: या हज़रत, ख़ुदा के लिये हमारे ऊपर यह सितम न कीजिए। हम जीते-जी आपसे जुदा न होंगे।
जैनब: भैया, मेरी जान तुम पर फ़िदा हो। अगर औरतों को तुमने छोड़ दिया, तो लौटकर उन्हें जीता न पाओगे। तुम्हारी तीनों फूल-सी बेटियां ग़म से मुरझाई जा रही है। शहरबानू का हाल देख ही रहे हो। तुम्हारे बग़ैर मदीना सूना हो जायेगा, और घर की दीवारें हमें फाड़ खायेंगी। हमारे ऊपर इस बदनामी का दाग़ न लगाओ कि मुसीबत में रसूल की बेटियों ने अपने सरदार से बेवफ़ाई की। तुम्हारे साथ के फ़ाके यहां के मीठे लुकमों से ज्यादा मीठे मालूम होंगे। जिस्म को तकलीफ़ होगी, पर दिल को तो इतमीनान रहेगा।
अली अकबर: अब्बा, मैं इस मुसीबत का सारा मजा आपको अकेले न उठाने दूंगा। इसमें मेरा भी हिस्सा है। कौन हमारे नेत्रों की चमक देखेगा? किसे हम अपनी दिलेरी के ज़ौहर दिखाएंगे? नहीं, हम यह ग़म की दावत अकेले न खाने देंगे।
अली असगर: अब्बा, मुझे अपने आगे घोड़ों पर बिठाकर रास मेरे हाथों में दे दीजियेगा। मैं उसे ऐसा दौड़ाऊँगा कि हवा भी हमारी गर्द को न पहुंचेगी।
हुसैन: हाय, अगर मेरी तक़दीर की मंशा है कि मेरे जिगर के टुकड़े मेरी आंखों के सामने तड़पें, तो मेरा क्या बस है। अगर ख़ुदा को यही मंजूर है कि मेरा बाग मेरी नज़रों के सामने उजाड़ा जाये, तो मेरा क्या चारा है। ख़ुदा गवाह रहना कि इस्लाम की इज्जत पर रसूल की औलाद कितनी बेदरदी से कुरबान की जा रही है!
छठा दृश्य
समय– संध्या। कूफ़ा शहर का एक मकान। अब्दुल्लाह, कमर, वहब बातें कर रहे हैं।
अब्दुल्लाह: बड़ा गजब हो रहा है। शामी फ़ौज के सिपाही शहरवालों को पकड़-पकड़ ज़ियाद के पास ले जा रहे हैं, और वहां जबरन उनसे बैयत ली जा रही है।
कमर: तो लोग क्यों उसकी बैयत क़बूल करते हैं?
अब्दुल्लाह: न करें, तो करें। अमीरों और रईसों को तो जागीर और मंसब की हवस ने फोड़ लिया। बेचारे ग़रीब क्या करें। नहीं बैयत लेते, तो मारे जाते हैं, शहरबदर किए जाते हैं। जिन गिने-गिनाए रईसों ने बैयत नहीं ली, उन पर भी संख्ती करने की तैयारियां हो रही हैं। मगर ज़ियाद चाहता है कि कूफ़ावाले आपस ही में लड़ जाएं। इसीलिए उसने अब तक कोई सख्ती नहीं की है।
कमर: यज़ीद को ख़िलाफ़त का कोई हक़ तो है नहीं, महज तलवार का ज़ोर है। शरा के मुताबिक हमारे ख़लीफ़ा हुसैन हैं।
अब्दुल्लाह: वह तो ज़ाहिर ही है, मगर यहां के लोगों को जो जानते हो न। पहले तो ऐसा शोर मचाएंगे, गोया जाने देने पर आमादा हैं, पर ज़रा किसी ने लालच दिखलाया, और सारा शोर ठंडा हो गया! गिने हुए आदमियों को छोड़कर सभी बैयत ले रहे हैं।
कमर: तो फिर हमारे ऊपर भी तो वहीं मुसीबत आनी है।
अब्दुल्लाह: इसी फ़िक्र में तो पड़ा हूं। कुछ सूझता ही नहीं।
कमर: सूझता ही क्या है। यज़ीद की बैयत हर्गिज मत क़बूल करो।
अब्दुल्लाह: अपनी ख़ुशी की बात नहीं है।
कमर: क्या होगा?
अब्दुल्लाह: वजीफ़ा बन्द हो जायेगा।
कमर: ईमान के सामने वजीफ़े की कोई हस्ती नहीं।
अब्दुल्लाह: जागीर ज्यादा नहीं, तो परवरिश तो हो ही जाती है। वह फ़ौरन छिन जाएंगी। कितनी मेहनत से हमने मेवों का बाग लगाया है। यह कब गंवारा होगा कि हमारी मेहनत का फल दूसरे खायें। क़लाम पाक की क़सम, मेरे बाग पर बड़ों-बड़ों को रश्क है।
कमर: बाग के लिए ईमान बेचना पड़े, तो बाग की तरफ़ आंख उठाकर देखना भी गुनाह है।
अब्दुल्लाह: क़मर, मामला इतना आसान नहीं है, जितना तुमने समझ रखा है। जायदाद के लिए इंसान अपनी जान देता है, भाई-भाई दुश्मन हो जाते हैं, बाप-बेटों में, मियां बीवी में तिफ़ाक पड़ जाता है। अगर उसे लोग इतनी आसानी से छोड़ सकते, तो दुनिया जन्नत बन जाती है।
कमर: यह सही है, मगर ईमान के मुकाबले जायदाद ही की नहीं, ज़िंदगी की भी कोई हस्ती नहीं। दुनिया की चीजें एक दिन छूट जाएंगी, मगर ईमान हो हमेशा साथ रहेगा।
अब्दुल्लाह: शहरबदर होना पड़ा। तो यह मकान हाथ से निकल जाएगा। अभी पिछले साल बनकर तैयार हुआ है। देहातों में, जंगल में बुद्दुओं की तरह मारे-मारे घूमना पड़ेगा। क्या जला-वतनी कोई मामूली चीज है?
कमर: दीन के लिए लोगों से सल्तनतें तर्क कर दी हैं, सिर कटाए हैं, और हंसते-हंसते सूलियों पर चढ़ गए हैं। दीन की दुनिया पर हमेशा जीत रही है, और रहेंगी।
अब्दुल्लाह: वहब अपनी अम्माजान की बातें सुन रहे हो?
वहब: जी हां, सुन रहा हूं, और दिल में फ़ख्र कर रहा हूँ कि मैं ऐसी दीन-परवर मां का बेटा हूं। मैं आपसे सच अर्ज करता हूं कि कीस, हज्जाज, हुर, अशअस जैसे रऊसा को बेयत क़बूल करते देखकर मैं भी नीम राजी हो गया था, पर आपकी बातों ने हिम्मत मजबूत कर दी। अब मैं सब कुछ झेलने को तैयार हूं।
अब्दुल्लाह: वहब, दीन हम बूढ़ों के लिए है, जिन्होंने दुनिया के मज़े उठा लिए। जवानों के लिए दुनिया है। तुम अभी शादी करके लौटे हो, बहू की चूड़िया भी मैली नहीं हुई। जानते हो, वह एक रईस की बेटी है। नाजों में पली है, क्या उसे भी खानावीरानी की मुसीबतों में डालना चाहते हो? हम और कमर को हज करने चले जायेंगे। तुम मेरी जायदाद के वारिस हो, मुझे यह तसकीन रहेगा कि मेरी मिहनत रायगां नहीं हुई। तुमने मां को नसीहत पर अमल किया, तो मुझे बेहद सदमा होगा। पहले जाकर नसीमा से पूछो तो?
वहब: मुझे अपने ईमान के मामले में किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं। मुझे यकीन है कि ख़िलाफ़त के हकदार हज़रत हुसैन हैं। यज़ीद की बायत कभी न क़बूल करूंगा, जायदाद रहे या न रहे, जान रहे या न रहे।
कमर: बेटा, तेरी माँ तुझ पर फ़िदा ही, तेरी बातों ने दिल ख़ुश कर दिया। आज मेरी जैसी ख़ुशनसीब मां दुनिया में न होगी। मगर बेटा, तुम्हारे अब्बाजान ठीक कहते हैं, नसीमा से पूछ लो, देखो, वह क्या कहती है। मैं नहीं चाहती कि हम लोगों की दीन-परवरी के वाइस उसे तकलीफ़ ही, और जंगलों की ख़ाक छाननी पड़े। उसकी दिलजोई करना तुम्हारा फ़र्ज है।
वहब: आप फरमाती हैं, तो मैं उससे भी पूछ लूंगा। मगर में साफ़ कहें देता हूं कि उसकी रजा का ग़ुलाम न बनूंगा। अगर उसे दीन के मुकाबले में ऐश व आराम ज्यादा पसन्द है, तो शौक से रहे, लेकिन मैं बैयत की ज़िल्लत न उठाऊंगी। दरवाजा खोलकर बाहर चला जाता है।
सातवां दृश्य
(अरब का एक गांव - एक विशाल मंदिर बना हुआ है, तालाब है, जिसके पक्के घाट बने हुए हैं, मनोहर बगीचा, मोर, हिरण, गाय आदि पशु-पक्षी इधर-उधर विचर रहे हैं। साहसराय और उनके बंधु तालाब के किनारे संध्या-हवन, ईश्वर-प्रार्थना कर रहे हैं।) गाना स्तुति
हरि, धर्म प्राण से प्यार हो। अखिलेष, अनंत विधाता हो, मंगलमय, मोहप्रदाता हो; भय-भंजन शिव जन-त्राता हो, अविनाशी अद्भुत ज्ञाता हो। तेरा ही एक सहारा हो; हरि धर्म प्राण से प्यारा हो। बल, वीर्य, पराक्रम त्वेष रहे, सद्धर्म धरा पर शेष रहे; श्रुति-भानु, एकांत-वेश रहे, धन-ज्ञान-कला-युत देश रहे। सर्वत्र प्रेम की धारा हो; हरि, धर्म प्राण से प्यारा हो। भारत तन-मन-धन से सारा हो, उसकी सेवा सब द्वारा हो; निज मान-सम्मान दुलारा हो, सबकी आंखों का तारा हो। जीवन-सर्वस्व हमारा हो; हरि, धर्म प्राण से प्यारा हो।
(साहसराय प्रार्थना करते हैं।) भगवान्, हमें शक्ति प्रदान कीजिए कि सदैव अपने व्रत का पालन करें। अश्वत्थामा की संतान का, निरंतर सेवामार्ग का अवलंबन करें, उनका रक्त सदैव दोनों की रक्षा में बहता रहे, उनके सिर सदैव न्याय और सत्य पर बलिदान होते रहें। और, प्रभो! वह दिन आए कि हम प्रायश्चित-संस्कार से मुक्त होकर तपोभूमि भारत को पयाम करें, और ऋषियों के सेवा-सत्कार में मग्न होकर अपना जीवन सफल करें। हे नाथ, हमें सद्भुद्धि दीजिए कि निरंतर कर्म-पथ पर स्थिर रहें, और उस कलंक-कालिमा को, जो हमारे आदि पुरुष ने हमारे मुख पर लगा दी है, अपनी सुकीर्ति से धोकर अपना मुख उज्जवल करें। जब हम स्वदेश यात्रा करें, तो हमारे मुख पर आत्मगौरव का प्रकाश हो, हमारे स्वदेश-बंधु सहर्ष हमारा स्वागत करें, और हम वहां पतित बनकर नहीं, समाज के प्रतिष्ठित अंग बनकर जीवन व्यतीत करें। (सेवक का प्रवेश)
सेवक: दीनानाथ, समाचार आया है, अमीर मुआबिया के बेटे यज़ीद ने ख़िलाफ़त पर अधिकार कर लिया।
साहसराय: यज़ीद ने ख़िलाफ़त पर अधिकार कर लिया! यह कैसा! उसका ख़िलाफ़त पर क्या स्वत्व था? खिलाफ़ात तो हज़रत अली के बेटे इमाम हुसैन को मिलनी चाहिए थी।
हरजसराय: हां, हक़ तो हुसैन ही का है। मुआबिया से पहले से इसी शर्त पर संधि हुई थी।
सिंहदत्त: यज़ीद की शरारत है। मुझे मालूम है, वह अभिमानी, तामसी और विलासी-भोगी मनुष्य है। विषय वासना में मग्न रहता है। हम ऐसे दुर्जन की ख़िलाफ़त कदापि स्वीकार नहीं कर सकते।
पुण्यराय: सेवक से कुछ मालूम हुआ, हुसैन क्या कर रहे हैं?
सेवक: दीनबंधु, वह मदीना से भागकर मक्का चले गए हैं।
सिंहदत्त: यह उनकी भूल है, तुरंत मदीनावासियों को संगठित करके यज़ीद के नाज़िम का वध कर देना चाहिए था, इसके पश्चात अपनी ख़िलाफ़त की घोषणा कर देनी थी। मदीना को छोड़कर उन्होंने अपनी निर्बलता स्वीकार कर ली।
रामसिंह: हुसैन धर्मनिष्ठ पुरुष है। अपने बंधुओं का रक्त नहीं बहाना चाहते।
ध्रुवदत्त: जीव हिंसा महापाप है। धर्मात्मा पुरुष कितने ही संकट में पड़े, किन्तु अहिंसा-व्रत को नहीं त्याग सकता।
भीरुदत्त: न्याय-रक्षा के लिये हिंसा करना पाप नहीं। जीव-हिंसा न्याय हिंसा से अच्छी है।
साहसराय: अगर वास्तव में यज़ीद ने ख़िलाफ़त का अपहरण कर लिया है, तो हमें अपने व्रत के अनुसार न्याय-पक्ष ग्रहण करना पड़ेगा। यज़ीद शक्तिशाली है, इसमें संदेह नहीं, पर हम न्याय-व्रत का उल्लंघन नहीं कर सकते। हमें उसके पास दूत भेजकर इसका निश्चय कर लेना चाहिए कि हमें किस पथ पर अनुसरण करना उचित है।
सिंहदत्त: जब यह सिद्ध है कि उसने अन्याय किया, तो उसके पास दूत भेजकर विलंब क्यों किया जाये? हमें तुरंत उससे संग्राम करना चाहिए। अन्याय को भी अपने पक्ष का समर्थन करने के लिये युक्तियों का अभाव नहीं होता।
हरजसराय: मैं पूछता हूं, अभी समर की बात क्यों की जाये। राजनीति के तीनों सिद्धांतो की परीक्षा कर लेने के पश्चात् ही शस्त्र ग्रहण करना चाहिए। विशेषकर इन समय हमारी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि हम आत्मगौरव की दुहाई देते हुए रण-क्षेत्र में कूद पड़े। शस्त्र-ग्रहण सर्वदा अंतिम उपाय होना चाहिए।
सिंहदत्त: धन आत्मा की रक्षा के लिये ही है।
हरजसराय: आत्मा बहुत ही व्यापक शब्द है। धन केवल धर्म की रक्षा के लिये है।
रामसिंह: धर्म की रक्षा रक्त से नहीं होती शील, विनय, सदुपदेश, सहानुभूति, सेवा, ये सब उसके परीक्षित साधन हैं, और हमें स्वयं इन साधनों की सफलता का अनुभव हो चुका है।
सिंहदत्त: राजनीति के क्षेत्र में ये साधन उसी समय होते हैं, जब शस्त्र उनके सहायक हों। अन्यथा युद्ध-लाभ से अधिक उनका मूल्य नहीं होता। साहसराय-– हमारा कर्त्तव्य अपनी वीरता का प्रदर्शन अथवा राज्य प्रबन्ध की निपुणता दिखाना नहीं, न हमारा अभीष्ट अहिंसा-व्रत का पालन करना है। हमने केवल अन्याय को दमन करने का व्रत धारण किया है, चाहे उसके लिये किसी उपाय का आलंबन करना पड़े। इसलिए सबसे पहले हमें दूतों द्वारा यज़ीद के मनोभाव का परिचय प्राप्त करना चाहिए। उसके पश्चात् हमें निश्चय करना होगा कि हमारा कर्त्तव्य क्या है। मैं रामसिंह और भीरुदत्त से अनुरोध करता हूँ कि ये आज ही शाम को यात्रा पर अग्रसर हो जायें।
