अमन-सभाओं का संगठन शुरू हो गया। अब की उनका नामकरण ज्यादा मार्जित हुआ है। कहीं वह हितकारिणी-सभा है, कहीं शान्ति-रक्षिणी। उसके प्रवर्तक साधारणतः दो-एक रायबहादुर या खानबहादुर होते हैं और प्रेरक जिले का अधिकारी वर्ग। उनका प्रोपेगेण्डा राष्ट्रीय आन्दोलन के विरुद्ध हो रहा है। चौकीदार, थानेदार, पटवारी, तहसीलदार, हाकिम-परगना सभी उसकी मदद पर कमर बांधे हुए हैं। उन्हें पूरा अख्तियार है कि कांग्रेस की जितनी चाहें मिट्टी पलीद करें। उसे बदमाशों का दल कहें, चाहे लुटेरों का संघ, कोई उनकी जबान नहीं पकड़ सकता। कांग्रेस के विरुद्ध इस वक्त जो कुछ भी कहा जाय, जो कुछ भी किया जाय, वह सब उत्तम है, श्रेष्ठ है और कांग्रेस की जबान बन्द कर दी गई है। प्रायः सभी बड़े प्रान्तों में 144 धारा लगा दी गई है। समाचार-पत्रों का निकलना भी असम्भव कर दिया गया है। ऐसी दशा में कांग्रेस अपने विरुद्ध फैलाए गए आक्षेपों और लांछनों और अपवादों का जवाब कैसे दे? यह तो वैसा ही है—किसी आदमी के हाथ-पांव बांधकर, आप उसके घर में आग लगा दें। हमें ऐसी अमन-सभाओं का पहले कुछ अनुभव हो चुका है। इन्हें टोडी सभा कहना ही उपयुक्त होगा। हम आशा है कि जनता अब ऐसी सभाओं का रहस्य खूब समझने लगी है। वह इन गोरखधन्धों में न फंसेगी। मजा तो यह है कि प्रजाहित का यह सागर उसी समय तरंगित होता है जब कांग्रेस का आतंक घटा की भांति छा जाता है। तभी बेगार कम करने के, नजराने बन्द करने के और इसी प्रकार के दूसरे अनुष्ठान किए जाने लगते हैं और कांग्रेस का दबाव कम होते ही फिर वही नोच-खसोट शुरू हो जाती है।
प्रकाशन इतिहास
[सम्पादकीय। 'हंस', जून, 1930 में प्रकाशित। 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य' खण्ड-3 में संकलित।]
