Cover Image for Haldi Ki Gaanth Wala Pansari (हल्दी की गांठ वाला पन्सारी) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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लेख•1935•11 मिनट

हल्दी की गांठ वाला पन्सारी

Haldi Ki Gaanth Wala Pansari

समकालीन साहित्यिक विवादों और संकीर्ण संपादकीय प्रवृत्तियों पर प्रेमचंद का तीखा और चुटीला व्यंग्यपूर्ण लेख।

Work Details

प्रकार: लेख
वर्ष: 1935
पठन समय: 11 मिनट (1,556 शब्द)

एक आदमी को हल्दी की कहीं एक गोठ मिल गयी तो उसने समझा अब में पद्धप हो गया। 'सरस्वती ' के संपादक ठाकुर श्रीनाथसिंह भी कुछ उसी दिमाग के भाई हैं। आपने जिंदगी में ले-देकर एक उपन्यास लिखा उलझन' और अब उन यह वहम हो गया कि लोग उनके इस उपन्यास के आधार पर कहानियां, नाटऋ ड्राम लिखने लगे हैं, चुनांचे मैंने भी इसी उपन्यास के आधार पर, थोड़ा -सा परिवर्तन करव जीवन का शाप ' नाम की कहानी लिख डाली। मुझे कुछ दिनों से श्रीनाथसिर के ऊल-जलूल बातें सुन-सुनकर यह भय होने लगा है कि उन्हें खफकान या मालीसूलिय हो गई है। और अगस्त को 'सरस्वती' में आपका ' प्रेमचंद जी की रचना-चापुरी क एक नमूना' नामक लेख पढ़कर मेरा वह भय विश्वास बन गया। में उनसे तमत से अर्ज करूंगा कि वह जल्दी किसी होशियार चिकित्सक से परामर्श करें वर्ना शायद रोग और भी भयंकर रूप धारण कर ले। मालीखूलिया के लक्षण यही हैं क्रि उस रोगी समझता है, लोग उसका माल-असबाब ढोये लिए जाते हैं और वह अंधे क की भांति बतासे भूंकने लगता है। श्रीनाथसिंह में एक विशेष लक्षण ओर है ओर व यह है कि, आप उन सिद्धांतों और आदर्शों को भी, जो चिरकाल से साहित्य के आधार बन चुके हैं, अपनी चीज या मिल्कियत समझ बैठते हैं और बावेला मचा लगते हैं। प्रेम की विजयिनी शक्ति कोई नयी आविष्कार नहीं है। वह उतनी हो चिरतः है जितना साहित्य। लेकिन हमारे ठाकुर साहब समझ रहे हैं कि यह उनके दिंमी की उपज है और अबकी साहित्य सम्मेलन में आप भो पंडित रामचद्र शुक्ल * उसका उल्लेख करते समय ललकार उठे, 'यह मेरे लेख की चोरी है। इस भर

आदमी को इतना भी नहीं सूझता कि माननीय शुक्ल जी इस सिद्धांत से उतने ही परिचित हैं जितना किसी भी साहित्यकार को होना चाहिए और वह उनका अपमान कर रहा है। मगर यहां तो यह नीति 5 है -_बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम न होगा । ु सरस्वती ' में यह लेख लिखने का मंशा यह मालूम होता है कि 'सरस्वती' के भोले-भाले पाठकों के सामने 'डलझन' की भरपेट प्रशंसा की जाय और यह दिखाया जाय यह रचना इतने ऊंचे दर्ज की है कि प्रेमचंद जी ने भी इसे पढ़ा और पढ़ा दे नहीं इससे इतना प्रभावित हुए कि उसके आधार पर कहानी लिख डाली। में उन्हीं लेखकों को रचनाएं पढ़ता हूं जिनकी प्रतिभा का मैं कायल हूं, जो अपनी रचनाएं मुझे भेंट करते हैं और उन पर मरी सम्मत्ति मांगते हैं। ठाकर साहब ने अपनी रचना मुझे भेंट नहीं को और उनकी प्रतिभा का में भी कायल नहीं रहा। मैं उन्हें कलाकार समझता ही नहीं। वह इस मानी में कुशल संपादक हैं कि लेखकों से ' सरस्वती ' के अच्छे गेट-अप के आधार पर अंग्रेजी में लेख लेकर उनका अनुवाद कर डालते हैं। बस, इसके सिवा मैंने उन्हें और कुछ नहीं समझा। उनकी गदनाओं में मैंने केवल बह बाल- कविता सुनी है दो भाइयों वाली, जो अब पेटेंट, हो चुकी है, और जिसे आप बडी "गन से हरेक सम्मेलन में सुनाया करते हैं और जो किसी अंग्रेजी कविता का अनुवाद या छाया है। हरेक ऐरे गैरे नत्थूखैरे की रचा पढ़ने के लिए मेरे पास समय नहीं हे।

'जीवन का शाप' और 'उलझन' में आपने जो सादृश्य दिखाया है उसे पढ़कर हंसी आती है। अगर दोनों में यही बात है कि दाजों के हीरो गरीब, विद्वान्‌, मेहनती और संतोषी हैं और उनकी पत्लियां कट भाषिणी हैं ओर दोनों उपनायक धनी व्यापारी हैं और उनकी महिलाएं पति से असंतुष्ट हैं, तो में कहूंगा कि ठाकुर साहब ने मेरे 'सेवासदन' से प्लाट भो उड़ाया है, चरित्र भी और समस्या भी। वहां भी नायिका अपने पति की दरिद्रता से असतुष्ट हैं और पंडित पद्ममिंह दर्मा फे घर बहुत आती- जाती हैं। लेकिन मैंने 'उलझन' पढा होता तब भा यह आशक्षेप न +. पकता, क्योंकि ऐसे पसंग आये दिन के जीवन की बातें हैं, रोज देखने में आता हैं और उन पर किसी लखक की मोहर नहीं है। मगर हमारे ठाकुर साहब बेयारे इस मालीखूलिया से मजबूर हैं। कया करें। पार्क का दृश्य 'सेवासदन' में भी है, 'उलझन' में भी. नायिका को 'सेवासदन' में भी ब्रेंच पर बैठाया गया है, 'उलझन' में भी। इसलिए मैं यदि कहूं कि 'उलझन' 'सेबासदन' की भद्दी नकल है तो कुछ न्यायसंगत हो सकता है, क्योंकि ठाकुर साहब ने सेवासदन पढ़ा भी है और उसको प्रशंसा भी कर चुके हैं, यद्याप अब वह उनको निंदा कर सकत हैं। ु

मगर 'जीवन का शाप' में जो समस्या पेश की गई है वह हमारे ठाकुर साहब की पकड़ में न आई। 'उलझन ' में विवाह की बेज. [ता की समस्या होगी, ज॑सी सेवासदन में है, जिसकी वह नकल हैं, लेकिन 'जीवन का शाप' म॑ बिल्कुल नयी समस्या है, जिसे ठाकुर साहब समझ तक नहीं सके, उसका आविष्कार क्‍या करतेः जीवन का शाप' में पत्लियों ने अपने पतियों को त्याग नहीं दिया है बल्कि साबिक दस्वूर अपने पतियों के साथ हैं। कटभाषिणी अपने दरिद्र और विद्वान्‌ पति के पास आ जाती

है और विलासिनी अपने धनवान पति के पास। समस्या जो है वह कटुभाषिणी के इन शब्दों में है-

“चुपके से जाकर शीरीं बानू (धनवान की पत्नी) से कहो कि जाकर आराम से अपने घर में बैठे। सुख कभी संपूर्ण नहीं मिलता। विधि इतना घोर पक्षपात नहीं कर सकती। गुलाब में कांटे होते ही हैं। अगर सुख भोगना है तो उसे उसके दोषों के साथ भोगना पड़ेगा। अभी विज्ञान ने ऐसा कोई उपाय नहीं निकाला कि वह हम सुख में कांटों को अलग कर सकें। मुफ्त का माल उड़ाने वालों को ऐयाशी के सिवा और क्या सूझेगी। धन अगर सारी दुनिया का विलास न मोल लेना चाहे तो वह धन ही केसा? शीरीं के लिए भी क्‍या वह द्वार नहीं खुले हैं जो शापूर जी (धनवान पति) के लिए खुले हैं। उससे कहो शापूर जी के घर में रहे, उनके धन को भोगे और भूल जाय कि वह शापूर की स्त्री है, उसी तरह जैसे शापूर भूल गया है कि वह शीरीं का पति है। जलना और कुढ़ना छोड़कर आनंद लूटे।....यही धन का प्रसाद है। ऐयाश मर्द की स्त्री अगर ऐयाश न हो तो यह उसकी कायरता है, लतखोरपन है।

“कावस जी ने चकित होकर कहा-लेकिन तुम भी तो धन की उपासक हो?''

“'गुलशन ने लज्जित होकर कहा-यही तो जीवन का शाप है।''

इस उद्धरण से पाठक समझ जाएंगे कि यहां तक किस वस्तु को जीवन का शाप कहा गया है। जीवन का शाप जरूरत से ज्यादा धन है जो सदैव ऐयाशी की ओर ले जाता है।

गुलशन को अपने दरिद्र पति पर भी विश्वास नहीं है। वह कहती है आज तुम्हें कहीं से धन मिल जाय तो तुम भी शापूर बन जाओगे, निशचय।

कावस जो रांका करते हैं-तो शायद तुम भी अपने बचाएँ हुए मार्ग पर चलोगी *

गुलशन जवाब देती है-शायद नहीं, अवश्य।

मैंने अपनी एक बड़ी पुस्तक 'कायाकल्प' और दर्जनों गल्पों में धन को जीवन का शाप सिद्ध किया है, जो वास्तव में है। धन और बिलास जुड़वां हैं, अलग नहीं रहते। जीवन का सुख धन में नहीं, संतोष और निग्रह में है। यह कोई नया आविष्कार नहीं। हमारा साहित्य इस प्रसंग से भरा पड़ा है, मगर जीवन में ऐसे कितने ही सत्य हैँ जो हमेशा सत्य रहते हैं और बार-बार दोहराने से उनकी सत्यता में कर्मी नहीं पड़ती। मैंने उसका एक नये रूप में उपयोग किया है और यही मेरा ध्येय है।

अंत में में अपने मित्र ठाकुर साहब से कहंगा कि इस तरह की बेसिर-पैर का बातों से अपने पत्र के पन्‍ने भरकर वह अपने ही को हास्यास्पद नहीं बनाते, बल्कि हिन्दी के सभी लेखकों को लज्जित करते हैं, क्योंकि एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है। अन्य भाषाओं के लोग जब देखते होंगे कि हिन्दी में ऐसे- ऐसे संपादक भी हैं, जिन्हें साहित्य को मोटी-मोटी बातें भी नहीं मालूम, तो उनकी नजर में हिन्दी साहित्य का स्थान अवश्य गिर जायेगा। जिस व्यक्ति ने तीन सौ से ऊपर कहानिया और लगभग पच्चीस उपन्यास और सैकड़ों लेख लिख डाले, वह अपने अंदर कुछ रखता है और जब वह दिन आयेगा कि उसका मस्तिष्क निकम्मा हो जाये और उसे ठाकुर साहब जैसे टुटपुंजियों की रचनाओं का आधार लेना पड़े तो वह लिखना बद

कर देगा। 'उलझन' में विवाह की समस्या जिस तरह ठाकुर साहब ने इस लेख में हल कौ हुई दिखायी है। अर्थात्‌ पत्नियों का अदल बदल यह पश्चिम के निकृष्टतम आदर्शों की साफ नकल है। उन्होंने उसके गुण-दोष पर विचार नहीं किया। शायद इसकी उनमें योग्यता ही नहीं है वह मुझ पर पश्चिम की गुलामी का आश्षेप करते हैं, मगर मैंने आदर्श को कभी हाथ से नहीं जाने दिया यह समझना कि (०१०! जो कुछ कहता है वह वेद वाक्य है, अपनी अल्पज्ञता का परिचय देता है। जीवन पत्नियों के अदल-बदल से सुरब्री नहीं होगा। आज जो स्त्री आपको देवी जंचती है, बहुत संभव है कि कल वह आपकी नजरों से गिर जाय। आज जो पुरुष देवता- सा लगता है कल को राक्षस बन सकता है। यह वैवाहिक समस्या संतोष और व्रत क आधार पर ही हल हो सकती है। ठाकुर साहब को विदित होना चाहिए कि ख्याति साधना और सतत परिश्रम तथा ईश्वरदत्त प्रतिभा, इन तीनों के समनन्‍्जय से मिलती है इस तरह दूसरों की कोर्ति को मिटाने से नहीं। कीचड़ फेंकने से नहीं, झूठे इंटरव्यू छापने से नहीं, भरी सभा में चोख पुकार मचाने से नहीं। अएः उनमे यह तीनों बातें नहीं है तो व्यर्थ साहित्य के पीछे क्या लटठ लिये पड़े हैं। कंनवैसिंग में इससे कहीं ज्यादा पैसे मिल सकते हैं।


प्रकाशन इतिहास

[लेख। 'भारत', 11 अगस्त, 1935 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-3 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "हल्दी की गांठ वाला पन्सारी." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1935, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/haldi-ki-gaanth-wala-pansari. Accessed 22 Sep. 2026.