Cover Image for Roshani (रोशनी) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1935•26 मिनट

रोशनी

Roshani

प्रेमचंद की कहानी 'रोशनी' एक अहंकारी आई.सी.एस. अधिकारी के जीवन में एक स्वाभिमानी ग्रामीण विधवा के प्रभाव से आए आत्मज्ञान और बदलाव की कहानी है।

पात्र:आई.सी.एस. अफ़सर (कथावाचक), ग्रामीण विधवा, अंधा व्यक्ति
स्थान:संयुक्त प्रांत का एक पहाड़ी क्षेत्र

रोशनी का मूल पाठ

आई. सी. एस. का इम्ताहन पास करके हिंदोस्तान आया तो मुझे मुमालिके-मुत्तहिदा (संयुक्त प्रान्त) के एक कोहिस्तान(पहाड़ी) इलाके में एक सब-डिवीजन का चार्ज मिला। मुझे शिकार का बहुत शौक़ था और कोहिस्तानी इलाके में शिकार की क्‍या कमी ! मेरी दिली मुरगादवर (पूर्ण होना) आई। एक पहाड़ के दामन में मेरा बंगला था। बंगले ही पर कचहरी कर लिया करता था। अगर कोई शिकायत थी तो यह कि सोसायटी न थी; इसलिए सैर व शिकार और अख़बारात व रसायल (पत्रिका) से इस कमी को पूरा किया करता था। अमरीका और यूरोप के कई अखबार-रिसाले आते थे। उनके मजामीन की शिगुफ्तगी (प्रफुल्लता, विकास) और जिदत (नवीनता) और ख़याल-आराई (भाव-सज्जा, काल्पनिकता) के मुक़ाबिले में हिंदोस्तानी अख़बार और रिसाले भला क्या जंचते ! सोचता था वह दिन कब आएगा कि हमारे यहां भी ऐसे ही शानदार रिसाले निकलेंगे।

बहार का मौसम था। फागुन का महीना। मैं दौरे पर निकला और लंघौर के थाने का मुआयना करके गजनपूर के थाने को चला। कोई अठारह मील की मसाफ़त (दूरी) थी मगर मंजर (दृश्य) निहायत सुहाना। धूप में किसी क़दर तेजी थी, मगर नाखुशगबार (असह्य) नहीं | हवा में भीनी-भीनी खुशबू थी। आम के दरख्तों में बौर आ गये थे और कोयल कूकने लगी थी। कंधे पर बंदूक रख ली थी कि कोई शिकार मिल जाए तो लेता चलूं! कुछ अपनी हिफ़ाजत का भी ख़याल था। क्योंकि उन दिनों जा-व-जा (जगह-जगह) डाके पड़ रहे थे। मेंने घोड़े की गर्दन सहलाई और कहा, “चलो, बेटा, चलो ! ढाई घंटे की दौड़ है। शाम होते- होते गजनपुर पहुंच जाएंगे।” और साथ के मुलाजिम पहले ही रवाना कर दिये गये थे।

काश्तकार खेतों में काम करते नजर आते थे। रबी की फसल तैयार हो चली थी। ऊख और ख़रबूजे के लिए ज़मीन तैयार की जा रही थी। जरा-जरा से मजरा (खेत) थे। वही बाबा आदम के ज़माने के बोसीदा (बेदम) हल, वही अफ़सोसनाक जहालत (अज्ञान), वही शर्मनाक बरहनगी (वस्त्रहीन), इस क्रीम का खुदा ही हाफिज है। गवर्नमेंट लाखों रुपये जराअती इस्लाहों (कृषि-सुधारों) पर सर्फ करती हैं नयी-नयी तहक़ीक़ातें और ईजादें होती हैं। डाइरेक्टर, इन्स्पेक्टर, सब मौजूद और हालत में कोई इस्लाह, कोई तगय्युर (बड़ा परिवर्तन) नहीं। तालीम का तूफाने बेतमीजी बरपा है। यहां मदरसों में कुत्ते लोटते हैं। जब मदरसे में पहुंच जाता हूं तो मुर्दर्रिस को खाट पर नीम गुनूदगी (ऊंघते) को हालत में लेट पाता हूं। बड़ी दवा दविश (भाग-दौड़) से दस-बीस लड़के जोड़े जाते हैं। जिस क़ौम पर जमूद (जड़ता) ने इस हद तक ग़लबा (छा जाना) कर लिया हो उसका मुस्तक़बिल (भविष्य) इन्तिहा दर्जा मायूस्तकुन (निराशाजनक) है। अच्छे-अच्छे तालीमयाफ्ता आदमियों को सलफ (अतीत) की याद में आंसू बहाते देखता हूं। माना कि एशिया के जज़ायर (द्वीप-समूह) में आर्यन मुबल्लिगों (धर्म-प्रचारकों) ने मजहब की रूह फूंकी थी! यह भी मान लिया कि किसो जमाने में ऑस्ट्रेलिया भी आर्यन तहजीव का ममनून (उपकृत) था। लेकिन इस सलफपरवरी (अतीत पूजा) से क्या हासिल ? आज तो मगारिब दुनिया का मशअले हिदायत (शिक्षा का पथ-प्रदर्शक) है। नन्‍्हा-सा इंग्लैड निस्फ कुर्र-ए-जमीन (आधी पृथ्वी) ५९ हावी है। अपनी सनअते हिर्फत (कला-शिप्प, व्यवसाय) की बदौलत वेशक मगरिव ने दुनिया को एक नया पैगाम-अमल अता किया है। और जिस क्रीम में इस पैगाम पर अमल करने की कुव्वत (सामर्थ्य) नहीं है, उसका मुस्तकविल तारीक (अन्धकारपूर्ण) है, जहां आज भी नीमबरहना (अर्दनग्न) गोशानशीन (एकांत निवासी) फकीरों की अजमत (महत्ता, बड़प्पन) के रोग अलापे जाते हैं, जहां आज भी शजर व हजर (वृक्ष और पत्थर) की इबादत होती है, जहां आज भी जिंदगी के हर एक शोबे (अंग, शाखा) में मजहब घुसा हुआ है, उसकी अगर यह हालत है तो ताज्जुब का कोई मुकाम नहीं ।

में इन्हीं तसव्वुरात (विचारों) में डूबा हुआ चला जा रहा था। दफअतन (एकाएक) ठंडी हवा का एक झोंका जिस्म में लगा तो मैंने सिर ऊपर उठाया। मशरिक की जानिब मंजर गर्दआलूद (धूल-धूसरित) हो रहा था। उफक (क्षितिज) गदा-गुबार के पर्दे में छिप गया था। आंधी की अलामत (चिह्ग) थी। मैंने घोड़े को तेज़ निया, लेकिन लमहा-व-लमहा (विशाल और विस्तृत) गुबार का परदा वसीअ और बसीत (विशाल और विस्तृत) होता था और मेरा रास्ता भी मशरिक ही की जानिव था। गोहा मैं यकक्‍्का व नन्‍्हा तूफ़ान का मुक़ाबला करने दौड़ा जा रहा था। हवा तेज हो गई, वह पर्द-ए-गुबार सिर पर आ पहुंचा और दफअतन मैं गर्द के समंदर में डूब गया। हवा इतनी तुंद (भोपण, तेज) थी कि कई बार मैं घोड़े से गिरते-गिरते बचा। वह सरसराहट और गड़गड़ाहट थी कि अल्अमान (ईश्वर रक्षा करे) गोया फितरत ने आंधी में तूफ़ान की रूह डाल दी है। दस-बीस हजार तोपें एक साथ छूटें, तव भी इतनी हौलनाक सदा (भयंक- आवाज) न पैदा होती मारे गर्द के कुछ न सूझता था। यहां तक कि रास्ता भी नज़र न आता था। उफ ! एक कयामत थी जिसकी याद से आज भी कलेजा कांप जाता है। मैं घोड़े की गर्दन से चिपट गया और उसके अयालों (घोड़े की गर्दन के लम्बे बालों) में मुंह छुपा लिया। संगरेजे (कंकड़) गर्द के साथ उड़कर मुंह पर इस तरह लगते थे, जैसे कोई कंकरियों को पिचकारी में भरकर मार रहा हो। एक अजीब दहशत मुझ पर मुसल्लत (व्याप्त) हो गई। किसी दरख्त के उखड़ने की आवाज कानों में आ जाती तो पेट में मेरी आंतें तक सिमट जातीं, कहीं कोई दरख्त पहाड़ से मेरे ऊपर गिरे तो यहीं रह जाऊं। तूफ़ान में ही बड़े-बड़े तोदे (टीला, दूह) भी तो टूट जाते हैं। कोई ऐसा तोदा लुढ़कता हुआ आ जाए तो खात्मा है, हिलने की भी तो गुंजाएश नहीं। पहाड़ी रास्ता कुछ सुझाई देता' नहीं। एक कदम दाहिने-बाएं हो जाऊं तो एक हजार फीट गहरे खड़ड में पहुंच जाऊं ! अजीब हयाजान (संकट) में मुब्तला था। कहीं शाम तक तुफ़ान जारी रहा तो मौत ही है। रात को कोई दरिन्दा आकर सफाया कर देगा। दिल पर बेअख्तियार रिक्कत (भावावेश) का गलबा (आधिक्य) हुआ। मौत भी आई तो इस हालत में कि लाश का भी पता न चले। उफ्फो ! कितनी जोर से बिजली चमकी है कि मालूम हुआ एक नेजा (बरछा) सीने के अंदर घुस गया।

दफअतन झन-झन की आवाज सुनकर मैं चौंक पड़ा। इस अरहिट में भी झन-झन की आवाज सुनाई दे रही थी, जैसे कोर्र सांडनी दौड़ी आ रही हो। सांडनी पर कोई सवार तो होगा ही, मगर उसे रास्ता कयोंकर सूझ रहा है। कहीं सांडनी एक कदम भी इधर या उधर हो जाए तो बच्चा तहतस्सर (पाताल लोक) में पहुंच जाएं। कोई जमींदार होगा। मुझे देखकर शायद पहचाने भी नहीं, चेहरे पर मनों गर्द पड़ी हुई है। मगर है वला का हिम्मत वाला।

एक लमहे में झन-झन की आवाज क़रीब आ गई। फिर मैंने देखा कि एक जवान औरत सिर पर एक खांची रखे क़दम बढ़ाती चली आ रही है। एक गज के फासले से भी उसका सिर्फ धुंधला-सा अक्स नज़र आया। वह औरत होकर अकेली मर्दानावार चली जा रही है। न आंधी का खौफ है, न टूटने वाले दरख़्तों का अंदेशा, न चट्टानों के गिरने का गम; गोया यह भी कोई रोजमर्रा का मामूली वाक्या है। मुझे दिल में गैरत का अहसास कभी इतना शदीद (तीव्र) न हुआ था।

मैंने जेब से रूमाल निकालकर मुंह पोछा और उससे बोला-“ओ औरत ! गजनपूर यहां से कितनी दूर है ?” मैंने पूछा तो बुलंद लहजे में, मगर आवाज दस गज न पहुंची। औरत ने कोई जवाब न दिया। शायद उसने मुझे देखा ही नहीं ;

मैंने चीख़कर पुकारा, “ओ औरत ! जरा ठहर जा। गजनपुर यहां से कितनी दूर है?”

औरत रुक गई। उसने मेरे क़रीब आकर, मुझे देखकर, जरा सिर झुकाकर कहा, “कहां जाओगे ?”

“गजनपूर कितनी दूर है ?”

“चले आओ। आगे हमारा गांव है। उसके बाद गजनुपर है।”

“तुम्हारा गांव कितनी दूर है ?”

“वह क्या आगे दिखाई देता है।”

“तुम इस आंधी में कहीं रुक क्‍यों नहीं गईं ?”

“छोटे-छोटे बच्चे घर पर हैं। कैसे रुक जाती ? मर्द तो भगवान्‌ के घर चला गया।” आंधी का ऐसा रेला आया कि मैं शायद दो-तीन क़दम आगे खिसक गया। गर्दो-गुबार की एक धौंकनी-सी मुंह पर लगी। उस औरत का क्‍या हशर हुआ, मुझे ख़बर नहीं। मैं फिर वहीं खड़ा रह गया। फलसफ़े (दर्शनशास्त्र) पे कहा-इस औरत के लिए जिंदगी में क्‍या राहत है ? कोई टूटा-फूटा झोंपड़ा होगा, दो-तीन फाकाकश बच्चे। बेकसी में मौत का क्या गम ? मौत तो उसे बाइसे नजात (मोक्ष का कारण) होगी। मेरी हालत और है। जिंदगी अपनी तमाम दिल-फरेबियों और रंगीनियों के साथ मेरी नाजबरदारी (नाज उठाना, नखरा उठाना) कर रही है। हौसले हैं, इरादे हैं। मैं उसे क्योंकर ख़तरे में डाल सकता हूं ?

मैंने फिर घोड़े के अयालों में मुंह छिपा लिया-शुतुरमुर्ग की तरह, जो ख़तरे से बचने की कोई राह न पाकर बालू में सिर छुपा लेता है।


2

वह आंधी की आखिरी सांस थी। उसके बाद बतदरीज (क्रमशः, धीरे-धीरे) जोर कम होने लगा। यहां तक कि कोई पंद्रह मिनट में मतला (दशा, धूंध) साफ़ हो गया। न गर्दो-गुवार का निशान था, न हवा के झोंकों का--हवा में एक फरहतवख्श खुनकी (सुखद शीतलता) आ गई थी। अभो मुश्किल से पांच बजे होंगे। सामने एक पहाड़ी थी। उसके दामन में एक छोटा-सा मौजा था। मैं ज्यों ही उस गांव में पहुंचा, वही औरठ एक बच्चे को गोद में लिये मेरी तरफ आ रही थी। मुझे देखकर उसने पूछा, “तुम कहां रह गये थे ? मैं डरी कि तुम रास्ता ४ भल गये हो। तुम्हें दूंढ़ने जा रही थी।

मैंने उसकी इन्सानियत से मुतस्सिर होकर कहा, “मैं इसके लिए तुम्हारा बहुत ममनूंन (उपकृत) हूं। आंधी का ऐसा रेला आया कि मुझे रस्ता न सूझा। मैं वहीं खड़ा हो गया। यही तुम्हारा गांव है ? यहां से गजनपुर कितनी दूर होगा ?””

“बस कोई धाप भर समझ लो। रास्ता विल्कुल सीधा है। कहीं दाहिने-बाएं मुड़ियो नहीं। सूरज डूबते-डूबते पहुंच जाओगे ।””

“यही तुम्हारा बच्चा है ?” ह

“नहीं । एक और इससे बड़ा है। जव आंधी आई तो दोनों नंवरदार की चौपाल में जाकर बैठे थे कि झोंपड़ियां कहीं उड़ न जाएं। जब से आई हूं, यह मेरी गोद से नहीं उतरता। कहता है, 'तू फिर कहीं भाग जाएगी /' बड़ा शैतान हैं . बड़ा लड़कों में खेल रहा है। मेहनत-मजदूरी करती हूं वावूजी। इनको पालना तो है। अब मेरे कीन बैठा हुआ है जिस पर टेक करूं ? घास लेकर बेचने गई थी। कहीं जाती हू, मन इन वच्चों में लगा रहता है।”

मेरा दिल इतना असरपिंजोर (प्रभाव ग्रहण करने वाला) तो नहीं है, लेकिन इस दहकान औरत (देहाती स्त्री) के बेलौस अंदाजे-गुफ्तगू, उसकी सादगी और जज़्वा-ए-मादरी (मां की भावना) ने मुझ पर तसखीर (जादू-मन्तर) का-सा अमल किया। उसके हालात से मुझे गूना (अनेक प्रकार की) दिलचस्पी हो गई। पूछा, “तुम्हें बेवा हुए कितने दिन हो गए ?”

औरत की आंखें नम हो गईं। अपने आंसुओं को छुपाने के लिए बच्चे के रुखसार (गाल) को अपनी आंखों से लगाकर बोली-- “अभी तो कल छह महीने हुए हैं, वाबूजी। भगवान्‌ की मर्जी में आदमी का क्‍या बस ! भले-चंगे हल लेकर लौटे, एक लोटा पानी पीया, कै हुई, बस आंखें बंद हो गईं। न कुछ कहा, न सुना। में समझी थके हैं, सो रहे हैं। जब खाना खाने को उठाने लगी तो बदन ठंडा | तव से बाबूजी ! घास छीलकर पेट पालती हूं और बच्चों को खिलाती हूं। खेती मेरे मान की न थी। बैल-बछिए बेचकर उन्हीं के किरिया-करम में लगा दिए। भगवान्‌ तुम्हारे इन दोनों गुलामों को जिलावे। मेरे लिए यही बहुत हैं।”

के मैं मौक़ा और महल समझता हूं और नफ़सियात (मनोविज्ञान) में भी दखल रखता हूं, लेकिन उस वक्‍त मुझ पर ऐसी रिक्क़ततारी (आर्द्रता) हुई कि मैं आबदीटा (अश्रुपूर्ण) हो गया। और जेब से पांच रुपये निकालकर उस औरत की तरफ हाथ बढ़ाते हुए कहा, “मेरी तरफ से ये बच्चों के मिठाई खाने के लिए लो ! मुझे मौक़ा मिला तो फिर कभी आऊंगा |” यह कहकर मैंने बच्चे के रुख़सारों को अंगुली से छू दिया।

मां एक कदम पीछे हटकर वोली-“नहीं बाबूजी, यह रहने दीजिए। मैं गरीब हूं, लेकिन भिखारिन नहीं हूं।”

“यर भीख नहीं है। बच्चों की मिठाई खाने के लिए है।”

“नहीं, बावूजी |”

“मुझे अपना भाई समझकर ले लो।"

“नहीं वाबूजी, जिससे व्याह हुआ उसकी इज्जत तो मेरे ही हाथ है। भगवान्‌ तुम्हारा भला करे। अब चले जाओ, नहीं, देर हो जाएगी ।”

“मैं दिल में इतना खफीफ (लज्जित) कभी न हुआ था। जिन्हें मैं जाहिल, कार बातिन (अविवेकी, अन्धात्मा), बेखलर समझता था उसी तबके की एक मामूली औरत में यह खुद्दारी, 5ह फर्जनशनासी (कर्त्तव्य-यालन), यह तवक्कुल (सांसारिक साधनों का भरोसा त्यागकर सारे कार्य ईश्वरेच्छा पर छोड़ना) ! अपने जुअफ (मूर्खता) के एहसास से मेरा दिल जैसे पामाल (पददलित, दुर्दशाग्रस्त) हो गया। अगर तालीम फिलअस्ल (यर्थाथत:) तहजीवे-नफ्स (आत्मिक संस्कृति) है और महज आला डिग्रियां नहीं, तो यह औरत तालीम की मेअराज (ऊंची सीढ़ी या श्रेणी) पर पहुंची हुई है।

मैंने नादिम (लज्जित) होकर नोट जेब में रख लिया और घोड़े को एड़ लगाते हुए पूछा, “तुम्हें इस आंधी में ज़रा भी डर न मालूम होता था ””

औरत मुस्कराई, “डर किस बात का ? भगवान्‌ तो सभी जगह हैं। अगर वह मारना चाहें तो क्या यहां नहीं मार सकते ? मेरा आदमी तो घर आकर बैठे-बैठे चल दिया। आज वह होता तो तुम इस तरह गजनपुर अकंले न जा पाते। जाकर तुम्हें पहुंचा आता तुम्हारी खिदमत करता ।”

घोड़ा उड़ा। मेरा दिल उससे ज्यादा तेजी से उड़ रहा था। जैसे कोई मुफलिस सोने का डला पाकर दिल में एक तरह की परवाज (उड़ान) का एहसास करता है वही हालत मेरी थी। उस दहकान औरत ने मुझे वह तामील दी जो फलसफा (दर्शनशास्त्र) और माबादत्तवीआत (अलौकिक) के दफ्तरों से भी न हासिल हुई होती। मैं उस मुफलिस की तरह उस सोने के डले को गिरह में बांधता हुआ एक गैर-मुतकांव्बर (अहंहीन) नियामत (अलभ्य पदार्थ) के गरूर से मसरूर (प्रसन्‍न), इस अंदेशे से खायफ (भयभीत) कि कहीं यह असर दिल से मिट न जाए, उड़ा चला जाता था। बस यही फिक्र थी कि इस पार ए-जर (स्वर्ण खंड) को दिल के किप्ती गोशे में छुपा लूं जहां किसी हरीस (लोभी) की उस पर निगाह न पड़े।


3

गजनपुर अभी पांच मील से कम न था। रास्ता निहायत पेचीदा, वीहड़ चेवर्गबार (पत्ता व फलरहित)। घोड़े को रोकना पड़ा। तेजी में जान का खतग था। आहिस्ता-आहिस्ता संभलता हुआ चला जाता था कि आसमान पर अब्र घिर आया। कुछ-क॒छ तो पहले ही से छाया हुआ है। फिर अब उसने एक अजीब सूरत इख़्तियार की। वर्क (विजली) की चमक और रअद (मेघ) की गरज शुरू हुई। फिर उफके मशरिक (पूर्व क्षितिज) की तरफ से जर्द (पीला) रंग के अंबर की एक नयी तह उस मटियाले रंग पर जर्द लेप करती हुई तेजी से ऊपर की जानिब दौड़ती नजर आई। मैं समझ गया, आले हैं। फागुन क॑ महीने में इस रंग के बादल और गरज की यह मुहीब (भयानक) गड़गड़ाहट जालावारी (ओले बरसना) की अलामत (निशानी) है। घटा सर पर बढ़ती चली जाती थी। यकायक सामने एक कफंदस्त मैदान (हथेली की तरफ साफ मैदान) आ गया, जिसके परले सिरे पर गजनपुर के ठाक॒रद्वारे का कलश साफ नजर आ रहा था। कहीं किसी दरख्त की भी आड़ न थी, लेकिन मेरे दिल में मुतलतक कमजोरी न थी। ऐसा महसूस होता था कि मुझ पर किसी का साया है; जो मुझे हर आफतो-जद (विपत्ति के आघात) से महफूज रखेगा।

अब्र की जर्दी हर लमहा बढ़ती जाती थी। शायद घोड़ा इस ख़तरे को समझ रहा था। वह बार-बार हिनहिनाता था, और उड़कर खेतों से वाहर निकल जाना चाहता था। मैंने भी देखा, रास्ता साफ है। लगाम ढीली कर दी। घोड़ा उड़ा। मैं उसकी तेजी का लुत्फ उठा रहा था। दिल में खोफ का मुतलक एहसास न था।

एक मील निकल गया हूंगा कि एक रपट (फिसलना) आ पड़ी। पहाड़ी नदी थी जिसके पेटे में कोई पचास गज लंबी रपट बनी हुई थी। पानी की हल्की धार रपट पर से अब भी बह रही थी। रपट के दोनों तरफ पानी जमा था। मैंने देखा, एक अंधा लाठी टेकता हुआ रपट से गुज़र रहा था। वह रपट के एक किनारे से इतना क़रीब था कि मैं डर रहा था, कहीं गिर न पड़े। अगर पानी में गिरा तो मुश्किल होगी, क्योंकि वहां पानी गहरा था। मैंने चिल्लाकर कहा, “बुड़ढे ! और दाहिने को हो जा ।”

बुड़्ढा चौंका और घोड़े की टापों की आवाज़ सुनकर १:.बद डर गया। दाहिने तो नहीं हुआ, और बायीं तरफ हो तिया और फिसलकर पानी में गिर पड़ा। उसी वक्‍त एक नन्‍्हा-सा ओला मेरे सामने गिरा। दोनों मुसीबतें एक साथ नाज़िल (आ पहुंची) हुई।

नदी के इस पार एक मंदिर था। उसमें बैठने की जगह काफी थी। मैं एक मिनट में वहां पहुंच सकता था। लेकिन यह नया उक्दा (जटिल समस्या, गुत्थी) सामने आ गया। क्या उस अंधे को मरने के लिए छोड़कर अपनी जान बचाने के लिए भागूं ? हमीयत (गैरत) ने इसे गवारा न किया। ज्यादा पशोपेश का मौका न था। मैं फीरन घोड़े से कूदा। और कई ओजले मेरे चारों तरफ गिरे। मैं पानी में कूद पड़ा । हाथी-इुबाऊ पानी था। रपट के लिए जो बुनियाद खोदी गई थी, वह जर “न से ज्यादा चौड़ी थी। 3फ्रेदार ने दस फीट चौड़ी रपट तो बना दी, मगर खुदी हुई मिट्टी बराबर न की । बुड्ढा इसी गड्ढे में गिया था। में भी एक गोता खा गया लेकिन तैरना जानता था, कोई अंदेशा न था। मैंने दूसरी डुबकी लगाई और अंधे को बाहर निकाला। इतनी देर में वह सेरों पानी पी चुका था। जिस्म बेजान हो रहा था। मैं उसे लिये बड़ी मुश्किल से बाहर निकला। देखा तो घोड़ा भागकर मंदिर में जा पहुंचा है। इस नीमजां (अधमरी) लाश को लिये हुए एक फर्लाग चलना आसान न था। ऊपर ओले तेजी से गिरने लगे थे। कभी सिर पर, कभी शाने (कन्धे) पर, कभी पीठ में गोली-सी लगा जाती थी। मैं तिलमिला उठता था, लेकिन इस लाश को सीने से लगाये मंदिर की तरफ लपका जाता था। मैं अगर इस वक्‍त अपने दिल के जज्बात बयान करूं तो शायद खयाल हो, मैं तहलील (शेखी, अत्युक्ति) कर रहा हूं। अच्छे काम करने में एक खास मसर्रत होती है। मगर मेरी खुशी एक दूसरी ही किस्म की थी। वह फातेहाना (विजयी) मसर्रत थी। मैंने अपने ऊपर फतह पायी थी। आज से पहले गालेबन मैं इस अंधे को पानी में डूबते देखकर या तो अपनी राह चला जाता या पुलिस को रिपोर्ट करता। खास ऐसी हालत में जबकि सिर पर ओले पड़ रहे हों, मैं कभी पानी में न घुसता । हर लहजा खतरा था कि कोई बड़ा-सा ओला सिर पर गिरकर अजीज जान का खात्मा कर दे। मगर मैं खुश था क्योंकि आज मेरी जिंदगी में एक नये दौर का आगाज (आरम्भ) था।

मैं मंदिर में पहुंचा तो सारा जिस्म जख्मी हो रहा था। मुझे अपनी फिक्र न थी। एक जमाना हुआ मैंने फौरी इम्दाद (फर्स्टऐड) की मश्क की थी। वह इस वक्‍त काम आई। मैंने आधे घंटे में उस अंधे को उठाकर बिठा दिया । इतने में दो आदमी अंधे को दूंढ़ते हुए मंदिर में आ पहुंचे। मुझे उसकी तीमारदार से नजात मिली। ओले निकल गये थे। मैंने घोड़े की पीठ ठोंकी। रूमाल से साज हो साफ किया और गजनपुर चला। बेखौफ, बेखतर, दिल में एक गैबी (दैवी) ताकत महसूस करता हुआ | उसी अंधे ने पूछा, “तुम कौन हो, भाई ? मुझे तो कोई महात्मा मालूम होते हो |”

मैंने कहा, “तुम्हारा खादिम हूं।'

“तुम्हारे सिर पर किसी देवता का साया मालूम होता है।”

“हां, एक देवी का साया है।”

“वह कीन देवी है ?”

“वह देवी पीछे गांव में रहती है।”

“तो क्या वह औरत है ?”

“नहीं, मेरे लिए तो वह देवी है।”


रोशनी का सारांश

'रोशनी' एक अहंकारी और पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव में डूबे युवा आई.सी.एस. अधिकारी के आत्मिक जागरण और नैतिक कायाकल्प की अत्यंत प्रेरक कहानी है। कथावाचक संयुक्त प्रांत के एक पहाड़ी इलाके में सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट के पद पर नियुक्त है। वह स्वयं को आधुनिक विचारों का मसीहा और भारतीय समाज तथा देहाती जनता को पिछड़ा, अज्ञानी और अंधविश्वासी समझता है।

एक दिन फागुन के महीने में जब वह घोड़े पर सवार होकर लंघौर से गजनपुर थाने के निरीक्षण के लिए निकलता है, तो रास्ते में अचानक भीषण धूलभरी आंधी और प्रलयंकारी तूफान आ जाता है। उड़ते कंकड़-पत्थरों और उखड़ते पेड़ों के बीच कथावाचक भय से कांपने लगता है और अपनी जान बचाने के लिए शुतुरमुर्ग की तरह घोड़े की गर्दन में मुंह छुपा लेता है। उसी विकराल आंधी में वह एक साधारण ग्रामीण महिला को सिर पर खांची रखे बिना किसी भय के तेजी से आगे बढ़ते देखता है। पूछने पर वह बताती है कि घर पर उसके छोटे बच्चे अकेले हैं, इसलिए वह आंधी की परवाह किए बिना दौड़ी जा रही है।

तूफान थमने के बाद जब कथावाचक उस महिला के गांव पहुंचता है, तो वह स्त्री अपने बच्चे को गोद में लिए कथावाचक की खोज-खबर लेने आती है। बातचीत में कथावाचक को पता चलता है कि छह महीने पूर्व ही उसके पति का देहांत हो चुका है और वह घास काटकर तथा मजदूरी करके अत्यंत स्वाभिमान के साथ अपने दोनों बच्चों का पालन-पोषण कर रही है। कथावाचक द्रवित होकर बच्चों की मिठाई के लिए उसे पांच रुपये देना चाहता है, परंतु वह गरीब विधवा स्वाभिमान के साथ रुपये लेने से इनकार कर देती है और कहती है कि वह गरीब जरूर है, लेकिन भिखारिन नहीं है तथा उसके पति की मर्यादा उसके ही हाथों में है।

एक अनपढ़ और साधनहीन देहाती स्त्री के इस अदम्य आत्मसम्मान, कर्तव्यनिष्ठा और निस्वार्थ मानवीय संवेदना को देखकर कथावाचक का सारा बौद्धिक दंभ चकनाचूर हो जाता है। उसे बोध होता है कि असली शिक्षा किताबी डिग्रियों में नहीं, बल्कि मन की शुद्धि और उदात्त मानवीय मूल्यों में है। उसके अंतःकरण में कर्तव्य और त्याग की एक नई 'रोशनी' जाग उठती है।

आगे रास्ते में अचानक घने बादल घिर आते हैं और जानलेवा ओले बरसने लगते हैं। इसी बीच एक पहाड़ी नदी की रपट पर से गुजरता हुआ एक अंधा वृद्ध फिसलकर गहरे पानी में गिर जाता है और डूबने लगता है। अपनी जान की परवाह न करते हुए कथावाचक तुरंत गहरे पानी में कूद पड़ता है और सिर तथा देह पर ओलों की मार सहते हुए उस अंधे वृद्ध को बचाकर सुरक्षित मंदिर तक ले आता है। प्राथमिक उपचार देकर वह वृद्ध को होश में लाता है। अपने स्वार्थ और कायरता पर विजय पाकर कथावाचक को परम संतोष और आत्मिक बल की अनुभूति होती है। जब अंधा व्यक्ति उसे महात्मा समझकर कहता है कि तुम्हारे सिर पर किसी देवता का साया है, तो कथावाचक श्रद्धापूर्वक कहता है कि यह उस ग्रामीण देवी का साया है जिसने उसे जीवन की सच्ची रोशनी दिखाई है।


प्रकाशन इतिहास

प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • मिथ्या बौद्धिक अहंकार और आत्म-बोध: कहानी पाश्चात्य शिक्षा और प्रशासनिक पद के खोखले दंभ को उजागर करती है, जो आम जनता को हेय समझता है, किंतु जीवन के वास्तविक संकटों में वह बौद्धिक दंभ नितांत असहाय सिद्ध होता है।
  • ग्रामीण स्त्री का अदम्य स्वाभिमान और श्रम-निष्ठा: वैधव्य और दारुण विपन्नता के बावजूद ग्रामीण विधवा का किसी से दान या खैरात न लेना भारतीय ग्रामीण समाज की सुदृढ़ आंतरिक नैतिक मर्यादा और स्वाभिमान का सजीव प्रमाण है।
  • सच्ची शिक्षा का मर्म: कथावाचक को यह अहसास होता है कि बड़ी-बड़ी डिग्रियों और दर्शनशास्त्र के पोथों से परे वास्तविक शिक्षा आत्मा की उदात्तता, संवेदनशीलता और निस्वार्थ कर्म में निहित है।
  • मानवता और आत्म-बलिदान की विजय: ओलों के जानलेवा प्रकोप के बीच डूबते हुए अंधे वृद्ध को बचाने के लिए कथावाचक का अपने प्राणों को जोखिम में डालना उसके भीतरी कायाकल्प और परोपकार की भावना की जीत को दर्शाता है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: प्रेमचंद ने 'रोशनी' में बाह्य ज्ञान बनाम अंतःकरण की रोशनी के द्वंद्व को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। कहानी यह शाश्वत संदेश देती है कि सच्चा बड़प्पन पद या सामाजिक रुतबे में नहीं, बल्कि परदुख-कातरता, त्याग और आत्मसम्मान में समाहित होता है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "रोशनी." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1935, https://munshipremchand.com/works/short-stories/roshani. Accessed 22 Sep. 2026.