Cover Image for Qatil Ki Maa (क़ातिल की माँ) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1935•23 मिनट

क़ातिल की माँ

Qatil Ki Maa

प्रेमचंद की कहानी 'क़ातिल की माँ' एक माँ रामेश्वरी के नैतिक कर्तव्य और पुत्र-मोह के बीच के हृदयविदारक संघर्ष को दर्शाती है।

पात्र:रामेश्वरी, विनोद
स्थान:औपनिवेशिक भारत का एक शहर और कचहरी परिसर

क़ातिल की माँ का मूल पाठ

रात को रामेश्वरी सोई तो क्या ख्वाब देखती है कि विनोद ने किसी ऑफ़िसर को मार डाला है और कहीं रूपोश (ग़ायब) हो गया है। पुलिस उसकी तलाश में बेगुनाहों को जदोकोब (मारपीट) कर रही है और तमाम शहर में शोरोशर (शोर और फ़साद) बरपा है। इसी घबराहट में उसकी आँख युल गई। देखा तो विनोद सो रहा था। उठकर विनोद के पास गई। प्यार से सर पर हाथ फेरने लगी और सोचने लगी, मैंने क्या बेसर-पैर का ख़्वाब देखा। उसके साथ कुछ मुतफ़क्किर (चिंतित) भी हो गई। फिर लेटी, मगर नींद न आई। दिल में एक खौफ़ समा गया था।

सुबह को विनोद ने माँ को मुतफ़क्किर देखकर पूछा, “अम्माँ, आज उदास क्यों हो?”

माँ विनोद को मुहब्बत से लवरेज़ आँखों से देखकर बोली, “बेटा! तुमसे क्या कहूँ? रात को मैंने एक बहुत बुरा ख़्वाब देखा हे, जैसे तुम किसी अफ़सर को मारकर भाग गए हो और वेगुनाहों पर मार पड़ रही हे।”

विनोद ने हसकर कहा, “क्या तुम चाहती थीं कि में पकड़ लिया जाता?”

माँ ने कहा, “में तो चाहती हूँ कि तुम ऐसे कामों के नज़दीक ही न जाओ! पकड़े जाने का सवाल ही क्यों उठे! हमारा धरम हे कि खुद जिएँ और दूसरों को भी जीने दें। दूसरों को मारकर खुद जीना मेरे धरम के ख़िलाफ़ हे ।”

विनोद, “धरम और नीति का ज़माना नहीं हे।”

माँ, “धरम और नीति को हमेशा फ़तह हासिल हुई है और आइंदा भी होगी । स्वराज्य क़त्ल, खून से नहीं मिलता; त्याग, तप और आत्मशुद्धि से मिलता है । लालच छोड़ते नहीं, बुरी ख्र्वाहिशात (इच्छाएँ) छोड़ते नहीं, अपनी बुराइयाँ देखते नहीं, इस पर दावा है स्वराज्य लेने का। यह समझ लो, जो स्वराज्य क़त्ल व खून से मिलेगा, वह क़्त्ल व खून पर ही क़ायम रहेगा। अवाम की कोशिश से जो स्वराज्य मिलेगा, वह मुल्क की चीज़ होगी, अफ़राद (जनता) की चीज़ होगी और थोड़े से आदमियों का एक गिरोह तलवार के ज़ोर से इंतज़ाम न करेगा । हम अवाम का स्वराज्य चाहते हैं, व ख़ून की ताक़त रखनेवाले गिरोह का नहीं ।”

विनोद ने कहा, “तुम तो स्टेज पर खड़ी होकर बोलतीं। यहाँ कौन सुनने है?

माँ ने कहा, “बेटा! तुम हँसते हो और मेरा जी दुःखी है । कई दिन से दाई आँख बराबर फड़क रही है। यक़ीनन कोई मुसीबत आने वाली है।”

विनोद ने कहा, “मैं मुसीबत से नहीं डरता। अभी कौन-सा सुख भोग रहे है जो मुसीबतों से डरें?”

यह कहता हुआ विनोद बाहर चला गया।


2

आज सुबह ही से विनोद का पता न था। मालूम नहीं कहाँ गया! रामेश्वरी ने पहर तो समझा कि काँग्रेस के दफ़्तर में होगा, लेकिन जब एक बज गया और वह लौटक न आया तो उसे फ़िकर हुई। दस बजे के बाद वह कहीं न रुकता था। फि सोचा-शायद किसी काम से चला गया हो । रात का ख्वाब उसे बेचैन व परेशान करन लगा और वक़्त के साथ-साथ बेचैनी भी बढ़ने लगी। जब शाम हो गई तो उससे = रहा गया। काँग्रेस के दफ़्तर गई।

वहाँ दरयाफ़्त करने पर मालूम हुआ कि आज विनोद सुबह से एक बार भी नह आया। रामेश्वरी का दिल किसी नामालूम ख़ौफ़ से परेशान हो गया और वह ख़्वाब् मुजस्सम (साकार) बनकर उसे डसने लगा । कुछ देर तक वह हवास-बाख्ना (चेतनाशून्य चुपचाप खड़ी रही । फिर ख्याल आया, शायद घर गया हो। फ़ौरन घर लोटी, लेकिन यहाँ विनोद का अब तक पता न था ।

ज्यों-ज्यों अंधेरा होता जाता था उसकी जान खुश्क होती जाती थी । इस पर दाः आँख भी फड़कने लगी । ख्यालात और भी खौफ़नाक सूरत अख्तियार करने लगे । कोः देवी या देवता न बचा, जिसकी उसने मन्नत न मानी हो । कभी सहन में आकर बै जाती, कभी दरवाज़े पर जाकर खड़ी होती । उसका दिल किसी खौफ़ज़दा तायर (भयभीत पक्षी) की मानिन्द कभी नशेमन (घोंसले) में आ बैठता और कभी शाख पर । खाना पकाने का ख्याल किसे था! बार-बार यही सोचती-भगवान मैंने ऐसा क्या क़सूर किया है जिसकी सज़ा दे रहे हो। अगर कोई ग़लती हो गई हो तो मुआफ़ करो। मैं तो खुर ही मुसीबतज़दा (पीड़ित) हूँ। अब और बर्दाश्त करने की ताक़त मुझमें नहीं है।

रामेश्‍वरी सर पर हाथ रखकर रोने लगी। आसमान पर स्याह बादल घिरे हुए थे। नन्हीं-नन्हीं बूँदें पड़ रही थीं। ऐसा मालूम होता था, जैसे वे बेकस के साथ कोई रोने वाला न देखकर उसका साथ देती हों।


3

नेस्फ़ शब (अर्द्धरात्रि) गुज़र चुकी थी । रामेश्‍वरी अभी तक दरवाज़े पर खड़ी विनोद ग़ रास्ता देख रही थी। इतने में कोई शख्स निहायत तेज़ी से दौड़ा हुआ आया और दरवाज़े पर खड़ा हो गया । उसके ज़िस्म पर एक स्याह कंबल था, जिसे उसने इस तरह ओढ़ लिया था कि मुँह का बड़ा हिस्सा छुप गया था।

रामेश्वरी ने डरकर पूछा, “कोन है?”

वह विनोद था। जल्दी से अंदर दाखिल होकर माँ से दरवाज़ा बंद करने को कहा, फिर आँगन में आकर कंबल को रख दिया और खाने को माँगा ।

रामेश्वरी ने खायफ़ (भयभीत) होकर पूछा, “तुम आज दिन-भर कहाँ थे? मैं तमाम दिन तुम्हें दूँढ़ती रही ।”

विनोद ने क़रीब आकर कहा, “में एक निहायत ज़रूरी काम से गया था और अभी फिर लौट जाना है । सिर्फ़ तुमसे यह कहने आया हूँ कि अब दो-चार महीने मैं यहाँ न रह सकूँगा। डरने की कोई बात नहीं है। मैंने वही किया है, जो मैं अपना धरम समझता था। हिफ़ाज़ते-जान (जीवन-रक्षा) की खातिर मुझे यहाँ से भाग जाना ज़रूरी है।”

रामेश्‍वरी की आँखों के सामने अँधेरा छा गया। बोली, “क्यों बेटा! तुमने वही किया, जिसका मुझे ख़ोफ़ था। ईश्वर ने तुम्हारी बुद्धि क्यों हर ली?”

विनोद ने कहा, “न ईश्वर ने मेरी बुद्धि हरी है, न मुझ पर कोई आफ़त आई है। मैने छावनी में एक ऑफ़िसर को मार डाला है। ऐसा निशाना मारा, एक ही गोली में ठंडा हो गया। हिला तक नहीं ।”

“क्या वहाँ कोई और न था?”

“कोई नहीं, बिलकुल सन्नाटा था |”

“पुलिस को खबर तो हो गई होगी?”

“हाँ, कई शख्स पकड़े गए हैं। में तो साफ़ बच निकला ।”

रामेश्वरी को हालत बदल गई । बेटे की मुहब्बत में अश्कबार (अश्रुपूर्ण) आँखें गुस्से से सुर्ख हो गई । बोली, “में इसे बचना नहीं कहती कि मुज़रिम तो मुँह छुपाकर भाग जाए और वेगुनाहों को सज़ा मिले। तुम खूनी हो। मुझे मालूम नहीं था कि मेरी कोख से ऐसा सपूत पैदा होगा, वरना पेदा होते ही गला घोंट देती। अगर मर्द है तो जाकर अदालत में अपना क़सूर तस्लीम कर ले, वरना उन बेगुनाहों का खून भी तेरे सर पर होगा ।”

यह फटकार सुनकर विनोद को गुस्सा आ गया। बोला, “तुम्हारे कहने से मैं खूनी नहीं हुआ जाता; और लोग यही काम करते हैं तो लीडर हो जाते है। उनकी जय-जयकार होती है। लोग उनकी पूजा करते हैं। मैंने किया तो हत्यारा हो गया?”

रामेश्वरी, “हत्यारा तो तू है ही और जो दूसरों की हत्या करते हैं वे जी हत्यारे हें । तेरी माँ होकर मैं भी पाप की हिस्सेदार हो गई । मेरे मुँह पर भी स्याही गई । लीडर वह होते हैं जो दूसरों के लिए मरते हैं। जो दूसरों की हिफ़ाज़त करे, बहादुर और सूरमा है। उन्हीं का जनम मुबारक है । उन्हीं की माएँ ख़ुशनसीब हैं। ह शर्म नहीं आती कि तू खून करके अपनी बड़ाई कर रहा है!”

विनोद ने फिर कंबल उठा लिया और बोला, “तुम मेरी माँ न होतीं, तो इस वक़्त लगे-हाथ मैं तुम्हारा भी काम तमाम कर देता। जीते-जी फिर तुम्हारा मुँह । देखूँगा।”

यह कहता हुआ वह जोश में घर से निकल पड़ा।


4

दम-भर बाद रामेश्वरी भी उसी जोश में घर से निकली। बेटा है तो क्या? वह या नाइंसाफ़ी नहीं गवारा कर सकती, वह उसी वक़्त कोतवाली में जाकर उस खून व ख़बर दे देगी विनोद का फाँसी पर चढ़ना इससे कहीं बेहतर है कि बेगुनाहों को फॉर्स हो।

लेकिन कुछ दूर चलने के बाद माँ का दिल बेचैन हो गया। वह लौट पड़ी औ घर आकर खूब रोई। जिस बेटे को उसने ऐसी-ऐसी मुसीबतें झेलकर पाला, क्या उर फाँसी दिला देगी?

लेकिन फिर ख्याल आया, उन वेचारों की माएँ भी तो होंगी जो बेगुनाह फॉर्स पाएँगे । उन्हें भी तो अपने बेटे इतने ही प्यारे होंगे । नहीं, नहीं, वह यह जुल्म नहीं क सकती । उसे बगैर बेटे के होना मंजूर है, मगर उसके देखते बेगुनाहों का खून न होगा

रामेश्वरी इसी उलझन में पड़ी हुई थी, जब कोई रास्ता न नज़र आता तो वा रोने लग जाती थीं; फिर सोचती-क्यों न खुदकशी कर लूँ कि तमाम दुःखों से नजाः मिल जाए, लेकिन उसकी मौत से उन बेगुनाहों की जान तो न बचेगी। उन माताओ का कलेजा तो न ठंडा होगा। वे उस पाप से तो न आज़ाद होंगे। वह अपने आप है बोल उठी, “ख़्वाह कुछ हो, मैं बेगुनाहों का ख़ून न होने दूँगी। इजलास में जाक साफ़-साफ़ कह दूँगी कि गुनहगार में हूँ, क्योंकि मेरे बेटे ने यह खून किया है, हम दोन ही क़सूरवार हैं। दोनों को फाँसी दीजिए में अपने धरम से मुतहरिफ़ (विमुख) न हूँगी ख़्वाह मेरी आँखों के सामने ही विनोद की बोटी-बोटी क्यों न कर डाली जाए। हाँ, म अपनी आँखों से उसको फाँसी पर चढ़ता देखूँगी, क्योंकि मैंने उसको जन्म दिया है भगवान, मुझे ताक़त दो कि अपने फर्ज़ पर डटी रहूँ । मैं कमज़ोर हूँ, पापिन हूँ, हत्यार हू।

रामेश्वरी बेहोश होकर गिर पड़ी।


5

जब रामेश्वरी को होश आया तो उसका इरादा मुस्तहकम (पक्का) हो चुका था, मगर दिली तकलीफ़ हो रही थी। क्‍या इसीलिए बेटे को जन्म दिया था? इसीलिए पाला-पोसा था कि एक दिन उसे फाँसी पर चढते देखूँगी? विनोद उसकी ज़िंदगी का सहारा था। आज उसी विनोद से उसका नाता टूट रहा है। विनोद की सूरत उसकी आँखों के सामने फिरने लगी । एक दिन वह था कि वह उसे छाती से लगाए फिरती थी। बड़े दुःख झेलकर भी खुश थी। एक दिन यह है कि उसे फाँसी दिलाने जा रही है। विनोद की किताबें और कपड़े कमरे में रखे थे। उसने एक-एक चीज़ को छाती से लगाया। आह! फ़र्ज़ का रास्ता किस क़दर दुश्वार गुज़ार है। विनोद को आखिरी बार गले लगाने और उसका आखिरी बोसा लेने के लिए उसका दिल बेचैन हो गया। क्या लड़के को सज़ा देते हुए माँ मुहब्बत छोड़ देती है? रामेश्वरी विनोद को सज़ा देने जा रही थी, जोशे-मुहब्बत से भरी हुई ।


6

एक हफ़्ता गुज़र गया। पुलिस ने साज़िश का पता लगाया। शहर के दस जवान गिरफ़्तार कर लिए गए। उन्हीं में से एक सरकारी गवाह भी बन गया और मजिस्ट्रेट के इजलास में मुक़द्दमा दायर हो गया।

विनोद का उसी दिन से पता न था। रामेश्वरी फ़र्ज़ और मुहब्बत के दरमियान उस किश्ती की मानिंद डावाँडोल हो रही थी, जिसके ऊपर तूफ़ानी आसमान हो और नीचे तूफ़ानी समंदर । कभी फर्ज़ कलेजे को मज़बूत कर देता, कभी मुहब्बत दिल को कमज़ोर कर देती, लेकिन ज्यॉं-ज्यों दिन गुजरते थे, फ़र्ज़ पसपा (पराजित) होता जाता था। नई-नई दलीलें उसके अहसासे-फर्ज़ को कमज़ोर करती जाती थीं। जब तमाम काम ईश्वर की मर्जी से होता है तो उसमें भी उसकी मर्जी होगी । यही सबसे ज़वर्दस्त दलील थी । इन सात दिनों में उसने सिर्फ़ पानी पीकर दिन काटे थे और वह पानी भी आँखों के रास्ते निकल जाता था। ऐसी हो गई थी, जैसे बरसों की मरीज़ हो।

दस बजे का वक़्त था। वह काँग्रेस के दफ़्तर की तरफ़ चली। इसी वक़्त रोज़ाना एक बार विनोद का पता लेने के लिए यहाँ आया करती थी।

नागाह (सहसा) उसने नौ-दस जवानों को हथकड़ियाँ पहने एक दर्जन मुसल्लह (सशस्त्र) पुलिस के सिपाहियों के पंजे में गिरफ़्तार देखा । पीछे थोड़ी दूर पर कुछ मर्द-औरत सर झुकाए रंजो-यास (शोक व निराशा) की तसवीर बने आहिस्ता-आहिस्ता चले जा रहे थे।

रामेश्वरी ने दौड़कर एक सिपाही से पूछा, “क्या ये काँग्रेस के आदमी हैं?”

सिपाही ने कहा, “काँग्रेसवालों के सिवा अँगरेज़ों को कौन मारेगा?”

“कौन मारा गया?” |

“एक पुलिस के सार्जेण्ट को इन सबने क़त्ल कर दिया। आज आठवाँ दिन है

“काँग्रेस के आदमी हत्या नहीं करते ।”

“कसूर साबित न होगा तो आप छूट जाएँगे ।”

रामेश्वरी दम-भर वहीं खड़ी रही। फिर उन्हीं लोगों के पीछे-पीछे कचहरी व तरफ़ चली । फ़र्ज यह नई ताक़त पाकर सँभल गया। नहीं, वह इतने बेक़सूर नं को मौत के मुँह में न जाने देगी। अपने खूनी बेटे की हिफ़ाज़त के लिए इतने बेगुनाहो का खून न होने देगी। |

कचहरी में बहुत बड़ा मज़मा था। रामेश्वरी ने एक अर्दली से पूछा, “क्या साहब आ गए?”

उसने जवाब दिया, “अभी नहीं आए। आते ही होंगे ।”

“बहुत देर से आते हैं, बारह तो बजे होंगे?”

अर्दली ने झुँझलाकर कहा, “तो क्या वह तुम्हारे नौकर हैं कि जब तुम्हारी मर्जी हो, आकर बैठ जाएँ। बादशाह हैं, जब मर्जी होगी आएँगे ।”

रामेश्वरी चुप हो गई।

उसके पास ही कई औरतें बैठी हुई थीं । एक ने पूछा, “क्यों वहन, तुम्हारे घर का भी कोई लड़का पकड़ा गया है?”

रामेश्वरी अपनी फ़िक्रों में डूबी हुई थी । कुछ न बोली ।

उस औरत ने फिर कहा, “क्या कहूँ? न जाने किस पापी ने खून किया । आप तो मुँह पर स्याही लगाकर छुप रहा और हम लोगों के मत्थे गई।”

कई औरतें रो रही थीं। रामेश्वरी भी रोने लगी।

एक ज़ईफ़ (बूढ़ी) औरत उसे समझाने लगी, “बहन, चुप हो जाओ। जो हमारी क्रिस्मत में लिखा है, वही होगा। मेरा बेटा बिलकुल बेक़सूर पकड़ा गया है । काँग्रेस में काम करता था। तुम्हारा कौन गिरफ़्तार है?”

रामेश्वरी ने उसे भी कुछ जवाब न दिया। बार-बार लोगों से पूछती थी, “साहब कब तक आएँगे?”

दो बजे साहब को मोटर आई । इजलास में हलचल मच गई। ज्यों ही साहब कुर्सी पर बैठे, सरकारी वकील ने यह खून का मुक़दमा पेश कर दिया। पुलिस के अफसर आ गए। मुलज़िम भी सामने खड़े कर दिए गए।

ऐन उसी वक़्त रामेश्वरी ने इजलास में रू-ब-रू आकर सलाम किया, और साफ़ लफ़्ज़ों में बोली, “हुजूर! इस मुक्रद्दमे के पेश होने से पहले में कुछ अर्ज़ करना चाहती ह|

सब-के-सब उसकी तरफ़ हैरत से देखने लगे। कमरे में सन्नाटा छा गया

साहब ने उसकी तरफ़ तेज़ निगाहों से देखकर कहा, “क्या बात है?” रामेश्वरी, “में इसलिए आपके सामने आई हूँ कि इस मुक़द्दमे का सच्चा हाल बयां करूँ। सार्जेट का खून करने वाला मेरा बेटा है। यह तमाम मुलज़िम बेगुनाह हैं”

साहब ने मुतहय्यिर (चकित) होकर पूछा, “तुम अपने होश में हो या नहीं?” रामेश्वरी ने कहा, “में अपने होश में हूँ और बिलकुल सच कहती हूँ। सार्जेट क्रो मेरे बेटे ने मारा है । उसका नाम विनोद बिहारी है। मेरे घर में उसका फोटो रखा हुआ है। वह उसी दिन से लापता हो गया है। में अपने होश में हूँ। अपने बेटे से मेरी कोई दुश्मनी नहीं है। में उसे उसी तरह प्यार करती हूँ, जैसे हर एक बेवा अपने इकलोते बेटे को । एक हफ़्ता पेश्तर (पहले) वही मेरा सब कुछ था, लेकिन जब मेरे हरचंद मना करने पर भी उसने यह खून किया तो मैंने समझ लिया मेरे कोई बेटा न था। उसकी जान बचाने के लिए मैं इतने घर बर्वाद न होने दूँगी । मेरी इन बहनों को भी तो अपनी औलाद उतनी ही प्यारी है। उन्हें बेऔलाद बनाकर में औलाद वाली नहीं रहना चाहती। मैंने असल वाक्रिया बयान कर दिया। इंसाफ़ आपके हाथ में है ।” कमरे में हलचल मच गई। मर्द-औरत सबने रामेश्वरी को चारों तरफ़ से घेर लिया। कई औरतें उसके क़दमों पर सर रखकर रोने लगीं। अपनी खुशी में किसी को इस वात का खयाल न रहा कि इस बदनसीब के दिल पर क्या गुज़र रही है। वह बेहिसो-हरकत (चेतनाशून्य) दरमियान में खड़ी थी। न कुछ सूझता था, न कुछ सुनाई देता था। वस विनोद की सूरत आँखों के सामने थी।

यकायक मज़मे में से एक आदमी निकलकर रामेश्वरी के सामने आया और उसके सीने में खंजर उतार दिया। रामेश्वरी चीख मारकर गिर पड़ी और हमलावर के चेहरे की तरफ़ देखकर चौंक पड़ी। उसके मुँह से वेअख्तियार निकल गया, “अरे, तू है विनोद!”

उसकी आँखों से आँसू के दो क़तरे निकले और आँखें हमेशा के लिए बंद हो गई ।


क़ातिल की माँ का सारांश

'क़ातिल की माँ' देशभक्ति, हिंसा बनाम अहिंसा, और मातृ-स्नेह तथा सर्वोच्च नैतिक कर्तव्य के भीषण द्वंद्व पर आधारित मुंशी प्रेमचंद की एक अत्यंत हृदयविदारक एवं त्रासद कहानी है। कहानी की केंद्रीय पात्र रामेश्वरी एक विधवा माँ है, जिसका इकलौता पुत्र विनोद क्रांतिकारी गतिविधियों में संलिप्त है। एक रात रामेश्वरी दुःस्वप्न देखती है कि उसके पुत्र ने किसी अंग्रेज अफ़सर की हत्या कर दी है और पुलिस निर्दोष नागरिकों पर अत्याचार कर रही है। प्रातःकाल वह विनोद को समझाती है कि स्वराज्य रक्तपात और हत्या से नहीं, बल्कि त्याग, तप, आत्म-शुद्धि और जनता के सामूहिक समर्थन से प्राप्त होता है; जो शासन हिंसा की नींव पर बनेगा, वह आगे चलकर भी हिंसा पर ही टिका रहेगा। परंतु विनोद इसे अव्यावहारिक समझकर हँसी में उड़ा देता है।

उसी दिन विनोद अचानक गायब हो जाता है और आधी रात के समय काले कंबल में मुँह लपेटे घर पहुँचता है। वह गर्व के साथ माँ को बताता है कि उसने छावनी में एक अंग्रेज पुलिस सार्जेंट को गोली मारकर ढेर कर दिया है और अब वह कुछ महीनों के लिए फ़रार होने आया है, जबकि पुलिस ने शक के आधार पर कई अन्य लोगों को बंदी बना लिया है। रामेश्वरी अपने बेटे की इस कायरतापूर्ण प्रवृत्ति पर स्तब्ध रह जाती है। वह विनोद को धिक्कारते हुए कहती है कि निर्दोषों को सजा भुगतने के लिए छोड़कर भाग जाना कोई बहादुरी नहीं, बल्कि घृणित हत्या है; यदि उसमें सच्चा साहस है तो वह अदालत में जाकर अपना अपराध स्वीकार करे। इस पर विनोद आगबबूला हो जाता है और अपनी माँ को भी जान से मारने की धमकी देकर घर से भाग जाता है।

पुत्र के चले जाने के बाद रामेश्वरी के अंतर्मन में वात्सल्य और सत्य-निष्ठा के बीच घोर अंतर्द्वंद्व छिड़ जाता है। एक ओर उसका इकलौता लाडला पुत्र है जिसे उसने असीम कष्ट सहकर पाला-पोसा, वहीं दूसरी ओर उन निर्दोष युवकों और उनकी असहाय माताओं का रुदन है जिनके बेगुनाह बच्चे फाँसी के फंदे पर लटकने वाले हैं। पूरे सात दिनों तक अन्न-जल त्यागकर घोर आत्मिक वेदना सहने के बाद उसका कर्तव्य-बोध विजयी होता है।

कचहरी में जब हथकड़ियों में जकड़े निर्दोष नवयुवकों को अंग्रेज मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाता है और उनकी माताएँ चीत्कार कर रही होती हैं, तब रामेश्वरी निर्भीकता से भरी अदालत में आगे बढ़ती है। वह साफ शब्दों में बयान देती है कि ये सभी युवक सर्वथा निर्दोष हैं और सार्जेंट का वास्तविक हत्यारा उसका अपना बेटा विनोद बिहारी है। वह कहती है कि अपने बेटे को बचाने के लिए वह इतने निरपराध घरों को तबाह नहीं होने दे सकती। अदालत सन्न रह जाती है और बंदियों के परिजन कृतज्ञता से रामेश्वरी के पाँवों पर गिर पड़ते हैं। उसी समय भीड़ में से अचानक विनोद निकलता है और अपनी ही माँ की छाती में खंजर घोंप देता है। रामेश्वरी अपने कातिल बेटे का चेहरा देखकर "अरे, तू है विनोद!" कहती हुई प्राण त्याग देती है और न्याय की वेदी पर अमर हो जाती है।


प्रकाशन इतिहास

प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • हिंसा बनाम अहिंसक सत्याग्रह का द्वंद्व: कहानी स्वाधीनता आंदोलन के दौरान क्रांतिकारी उग्रवाद और गांधीवादी नैतिक व अहिंसक दर्शन के बुनियादी टकराव को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है।
  • मातृ-स्नेह और सार्वभौमिक कर्तव्य का संघर्ष: एक माँ के लिए अपने इकलौते बेटे के अपराध को उजागर कर उसे मृत्युदंड की ओर धकेलना अकल्पनीय पीड़ा है, किंतु रामेश्वरी वैयक्तिक ममता से ऊपर उठकर समष्टिगत सत्य और न्याय की रक्षा करती है।
  • छद्म शौर्य बनाम वास्तविक शूरवीरता: विनोद राजनीतिक हत्या कर भागने को वीरता और नेतृत्व मानता है, जबकि रामेश्वरी यह स्पष्ट करती है कि दूसरों की रक्षा के लिए सत्य पर अडिग रहना और त्याग करना ही सच्ची शूरवीरता है।
  • त्रासद पराकाष्ठा और सर्वोच्च बलिदान: पुत्र के हाथों ही माँ का मारा जाना कहानी को अत्यंत गहरा और स्तब्धकारी त्रासद आयाम देता है, जहाँ रामेश्वरी का चरित्र व्यक्तिगत मोह से मुक्त एक युगांतकारी नैतिक आदर्श बन जाता है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: प्रेमचंद ने 'क़ातिल की माँ' में साधन और साध्य की पवित्रता के दार्शनिक प्रश्न को घरेलू और सामाजिक संदर्भों में अत्यंत कुशलता से बुना है। यह रचना राष्ट्रप्रेम के नाम पर हिंसा की निरर्थकता और मानवीय संवेदना व सत्य की सर्वोच्चता को स्थापित करती है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "क़ातिल की माँ." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1935, https://munshipremchand.com/works/short-stories/qatil-ki-maa. Accessed 22 Sep. 2026.