सगे-लैला का मूल पाठ
मिस लैला ने अपने आशिक-जार मिस्टर बारटन ने कहा, “आज की चाँदनी रात कैसी समुहानी है।
वारटन ने किसी कदर शायराना नसरफ के साथ जवाब दिया, “हाँ, ऐसा मालूम होता है कि आफृताब मुँह पर एक सुनहरी नकाब डाले है !”
इतने में एक तीसरा शख्स कमरे में दाखिल हुआ। वह एक निहायत खुशवजा (परम्परावादी) और सजीला जवान था, जिसके बशरा (चेहरे) से अमारात और रियासत की आसार नुमायाँ थे। आते ही उसने मिस लैला को मुख़ातिब होकर कहा, “इस वक्त अफरीका के रेगिस्तान में अजब बहार होगी |”
बारटन तो ऐसा ख़ुशलबास आदमी न था, जैसा यह ताजावारिद (नवागत) नौजवान लार्ड हरबर्ट, मगर उसके चेहरे से मतानत (धीरता) और शाराफुत टपक रही थी। उसके ख़्यालात शायराना जरूर थे, मगर जबान में लसानी न थी, यही वजह थी कि साल भर से मिस लैला के इश्क में घुल रहा था, लेकिन यह हौसला न हुआ कि उससे अपने दरदे-दिल की दास्तान कहता, और जर्मे-जिगर पर मरहम रखवाता। या तो इसे कभी मुनासिब मौका ही न मिलता या ख़्यालात दिल से निकल कर होंठों तक आते और वहीं से लौट जाते।
अलावा बरी (इसके) इसकी जबान में वह शोख़ी व तरारी भी न थी जो बेसाख्ता दिलों को अपनी तरफ खींच लेती है। इसकी बरअक्स लार्ड हरबर्ट निहायत रंगीन-मिजाज और रसीला आदमी था। जबान में वो रवानी थी कि घंटो गुफ़्तगानी (समृद्ध बातचीत) किया करता | मिजाज में शोख़ी और जुर्रत का मादा भरा हुआ था। वो सैयाह (यात्री) भी था और रूहे-जमीन के बेश्तर मुकामात के हालात से वाकिफ था। यह सैयाहत (यात्रा-वृत्ति) उसके सिलसिलाए-तक्रीर की ताज़गी और रूवानी में बहुत मदद करती थी। उसने मिल लैला को पेरिस में देखा था। जब से साया की तरह उसके पीछे लगा हुआ था। बारटन को रोज-बरोज़ अपना पहलू कमजोर होता नजर आता था। जिस वक्त हरबर्ट कमरे में आता, लैला उसकी तरफ हमातनगो (आकर्षित) हो जाती और उसकी सैयाहत के वाक्ये बड़े गौर से सुनती व उसकी एक-एक बात पर मुस्कराती | इसके आते ही लैला का चेहरा शगुफ़्ता हो जाता और वह बुलबुल की तरह चहकने लगती | बारटन इन्हीं वजू से हरबर्ट की हरकृत से बेजार था। उसने कई बार हरबर्ट से ड्यूलबाजी का इरादा किया, लेकिन महज लैला के खौफ से बाज रहा। जिस वक्त लार्ड इरबर्ट मौजूद होता, बारटन के होंठों पर सुकूत (चुप्पी) की एक मजबूत मुहर लग जाती थी। वह गहरे ख्याल में डूब जाता और दिल-ही-दिल में कहने लगता, “क्या यह हुस्नपरस्त लौंडा मेरी सारी जिन्दगी की आरजूँओं को ख़ाक में मिला देगा। मैं यह खूब जानता हूँ कि इसके दिल में लैला की मुहब्बत नहीं है। उसमें अब इश्क की काबलियत ही नहीं। वो सिर्फ लैला की दौलत का आशिक है, मगर अफसोस है कि लैला उसके दम में रोज-बरोज़ आती रहती है। क्या वह इतना भी नहीं देख सकती * इसे इतनी भी तमीज नहीं ? अगर इसमें इतना अहसास नहीं है तो वह इस काबिल नहीं कि मैं इस पर जान दूँ। मगर अब मैं जल्द तस्फिया (फैसला) कर लूँगा। अब यह आये-दिन की कोफ़्त मुझ से नहीं सही जाती। हरबर्ट की चालों का एक बार मैं उससे जरूर जिक्र करूँगा। लैला को शायद मालूम नहीं कि यह हजरत फाकामस्त हैं। जो कुछ रियासत और दौलत है वह लस्सानी (लफ़्फाजी) है। वह उसकी चिकनी-चुपड़ी बातों, तुमतुराक (शानो-शीकृत) और नुमायशी हरकतों पर फ्रेफ्ता (आसक्त) हो गई है। मैं अब इस तिलिस्म को खोले बगैर नहीं रह सकता।
2
एक रोज बारटन अपने कमरे में बैठा हुआ था कि मिस लैला का ख़ानसामा दौड़ा हुआ आया और कहने लगा, “मिस्टर बारटन ज़रा बाहर आइये, आपको एक तमाशा दिखाऊ। लार्ड हरबर्ट की सूरत इस वक्त देखने के काबिल है।”
बारटन, “क्यों ? बात क्या है ? हरबर्ट को क्या हो गया ?”
ख़ानसामा (हँसकर), “आपके कुत्ते ने उनका काफिया तंग कर रखा है। ये हजरत कुत्तों से. डरते बहुत हैं। मैं इन्हें बचपन से जानता हूँ। क॒त्तों की सूरत देखी और लर्जा (कँपकंपी) आ गई। इस वक़्त आपका राबिन चुपचाप चला आता था।”
लार्ड साहब इसे देखते ही भागे। भागना था कि राबिन ने देख लिया और पीछे पड़ गया। एक घुड़दौड़नसी हो गयी। आगे-आगे जाते-शरीफ (महापुरुष), परेशान चेहरा फक, बदहवास। भागते जाते हैं, पीछे-पीछे क॒त्ता गुर्रीता हुआ तेजी से दौड़ता चला जाता है। डर के मारे अब गिरे जव गिरे। खैरियत हुई कि सामने एक दरख़्त मिल गया। फिर क्या था। आप बड़ी फूर्ती से उस दरख़्त पर चढ़ गये। चलकर ज़रा आप उनकी क॒ता (हालत) तो देखिए ।”
बारटन को इस वक्त बड़ी खुशी हुई, जो अपने रकीब की जिल्लत पर हर इन्सान के दिन में हुआ करती है। बाहर आये और लपके हुए बाग में जा पहुँचे । देखते क्या हैं कि नार्ड हरबर्ट दोनों हाथों से एक ढूँठ पकड़े दरख्त से चिपके बैठे हैं और राबिन ऊपर सर उठाये उन्हें नीचे से ललकार-ललकार कर इशारा कर रहा है। “यह कया आसमान पर जा बैठे । दम-खम हो तो आ जाओ नीचे ।'” अपनी पुरखुरोश (कोलाहलपूर्ण) आवाज में राबिन इन्हीं ख़्यालात की तस्वीर खाँच रहा था। बारटन को देखना था कि लार्ड साहब भराई हुई आवाज में चीखकर बोले, “बारटन। इस मूजी (जालिम) को किसी तरह यहाँ से दूर करो। तुमने अच्छा जानवर पाल रखा है। अगर मैं इस दरख़्त पर न चढ़ जाता तो इसने मेरी टॉग पकड़ ली होती। इसे जल्द यहाँ से दफा करो। खुदा के लिए मुहर पर यह करम करो।”
बारटन (हँसकर), “आप नाहक इससे डरते हैं। यह गरीब कभी किसी को नहीं काटता। बच्चे तो इससे खेला करते हैं।'
हरबर्ट (लजाजत से), “भाई जान, बातें न बनाओ। मेरी रूह फुना हुई जाती है। (दवी जबान से) और तुम्हें दिल्लगी सूझी हुई है ।''
राबिन ने अपने आका को देखा तो दुम हिलाता हुआ उसके पास आ गया . गारटन ने उसके गले का तस्मा पकड़कर इसे वहाँ से हटाया और हरबर्ट की इस दुरगत का किस्सा सुनाने के लिए वह मिस लैला के पास जाना चाहता था कि तार वाले ने आकर उसके हाथों म॑ं एक लिफाफा रख दिया। बारटन ने खोलकर पढ़ा तो चेहरा जर्द हो गया। लिखा था, “जल्द आओ, तुम्हारे वालिद रुख़्त बीमार हैं।'
बारटन अपने कमरे में आया और अपना सामान तैयार करके मिस लैला से रखसत लेने गया। मोटरकार दरवाजा पर खड़ा था। लैला ने यह खबर सुनी तो मायूस होकर बोली, “अब कब तक आओगे ?” |
बारटन, “जल्द ही आऊँगा ।'
लैला, “मगर राबिन को न ले जाओ। इसे यहीं मेरे पास छोड़ जाओ। इस प्यारे रफोक् (दोस्त) के बगैर मुझे लम्हा भर चैन न आयगा। मुत्मइन (बेफिक्र) रहो, इसे मैं बहुत आराझ से रखूँगी। ऐसा प्यारा कुत्ता मैंने नहीं देखा ।' .बारटन खुशी से फूल गया और दिल-ही-दिल कहने लगा, “अगर तुम्हारी मर्जी पाऊँ तो तुम्हारे कदमों पर मैं खुद कुरबान हो जाऊँ। यह कुत्ता क्या चीज है। काश, मुझे भी राबिन की-सी किस्मत मिली होती ? प्यारे राबिन | मुझे तुझ पर रश्क आता है।” (लैला से मुख़ातिब होकर) “मुझे इसको छोड़े जाने में कोई हर्ज नहीं है। यह मेरे लिए ऐन खुशी का बाइस है।”
लैला, “मिस्टर बारटन। मैं तुम्हारी इस इनायत का काफी शुक्रिया नहीं अदा कर सकती |”!
मोटरकार तैयार था। बारटन उमसें बैठ गया। इसकी झिझक ने उसे इस वक्त फिर धोखा दिया और इजहारे-मुहब्बत का एक नादिर (उत्तम) मौका फिर हाथ से निकल गया। मगर इस वक्त अपनी परेशानियों में इसे अब इन बातों को सोचने को कहाँ फुरसत थी।
3
लार्ड हरबर्ट को जब जॉन बारटन की रुखसत हो जाने की ख़बर मिली तो उसके दिल से एक बोझ-सा उतर गया। उसने ख्याल किया कि राबिन को वह अपने साथ ले गया होगा। ये दो हफ़्ते आफियत (सुख-चैन) से गुज़रेंगे। किस्मत ने यावरी (मदद) की तो इस अरसे में में अपने दिल के अरमान निकाल लूँगा और कमबख्त राबिन की सूरत देखने की मुझे कोई जरूरत न होगी। यह सोचते हुए आप मिस लैला के कमरे में आये और चेहरे को रंजीदा बनाकर बोले, “मिस लैला। मुझे सुनकर कमाल (बहुत) अफसोस हुआ कि जान बारटन के वालिद सख्त बीमार हैं। मैंने अभी उन्हें मोटरकार.... ।”
यह कहते-कहते लार्ड हरबर्ट चौंक पड़ा, क्योंकि उसने राबिन को बाहर से आते देखा | उसका रंग फक्क हो गया और इधर-उधर बगलें झाँकने लगा। मगर मिस लैला ने कुत्ते को गोद में ले लिया और बोली, “तू अब तक कहाँ था ? यह नाक में मिट्टी कहाँ लगाई। आ, तेरी नाक साफ कर दूँ।” यह कहकर उसने अपना रेशमी रूमाल निकाल लिया और उससे राबिन के नथुने साफ करने लगी। फिर लार्ड हरबर्ट से बोली, “क्यों, आप इस कुत्ते को पसन्द करते हैं या नहीं ? बारटन इसे लिए जाते थे, मगर मैंने रोक लिया। देखिए, कैसी प्यारी सूरत है। आप इससे खुश हैं ?”
हरबर्ट (खौफुजदगी को जब्त करते हुए), “जी हाँ, बेशक-बेशक, जी हाँ, आप सही कहती हैं।”
लैला, “आप इस ख़्याल को कहाँ तक सही समझते हैं कि हरएक इन्सान की शराफृत का अन्दाज़ा उससे किया जा सकता है कि कुत्ते उससे किस कदर मानूस (निर्भय) हो जाते हैं ?”
हरबर्ट (साबिक की तरह जब्त करते हुए), “आपका ख्याल सही है। बेशक यह कुत्ता अब मिस्टर बारटन के आने तक यहीं रहेगा, गालेबन अस्तबल इसके लिए बहुत अच्छी जगह होगी।
लैला (चीं ब जबीं होकर), “यह आप क्या कहते हैं ? मेरा प्यारा राबिन अस्तबल के कुत्तों में नहीं रहेगा, मैं उसे हमेशा अपने साथ रखूँगी। क्यों, आपका चेहरा उदास क्यों हो गया ?” हरबर्ट, “कुछ नहीं। मुझे मकान पर एक जरूरी काम करना है। अभी-अभी ख़्याल आ गया। माफ कीजिएगा, मैं फिर जल्द हाजिरे खिदमत होऊँगा।”
यह कहकर लार्ड साहब उठे। राबिन उनकी तरफ घूरकर खों-खों करने लगा। इस गुरगुराहट को सुनते ही हरबर्ट के होश उड़ गये। अपनी किस्मत को और इस मनहूस कुत्ते को कोसते हुए आप फौरन बाहर निकल आये। अहाते में लैला के खानसामे से मुलाकात हो गई | उनका बशरा (चेहरा) देखते ही वह ताड़ गया कि इस वक्त हजरत के होश उड़े हुए हैं। कुत्ते से यकीनी पाला पड़ा है। हमदर्द बनकर लगा कहने, “लार्ड हरबर्ट साहब। आप इस वक्त कहाँ तशरीफ लिए जाते हैं। आज कम्बखध्त राबिन ने आपको बहुत दिक् किया। अगर ढूँठ पर न जा बैठते तो वह जरूर आपको काट लेता।”
हरबर्ट, “मिस्टर काक सच कहते हो। तुम तो तेरे पुराने रफीक (दोस्त) हो ।”
काक, “जी, मैं आपका नमकख़्वार हूँ। आप मुझे अपना गुलाम समझें। मेरे लायक जो काम हो वह बेतकल्लुफ फरमायें |”
हरबर्ट, “तुम तो जानते हो मुझे क॒त्तों की सूरत से नफरत है।”
काक, “जी हाँ, मैं खूब जानता हूँ। इन्हें देखते ही आपकी रूह कापने तगती है।”
हरबर्ट, “खैर, यूँ ही सही। इस शैतान राबिन ने मेरा नाक में दम कर रखा है। इसे किसी तरह यहाँ से दप्णा कर दो |”
काक, “यह क्योंकर हो सकता है ?”
हरबर्ट, “बस, जहर दे दो”
काक, “अरे हुजूर, यह क्या फरमाते है ?”
हरबर्ट, “मैं दस पाउण्ड दूँगा, समझे |”
काक, “हुजूर....'
हरबर्ट, “अच्छा बीस पाउण्ड सही |”
काक, “हुजूर, बहुत मुश्किल काम है।"
हरबर्ट, “इन्कार मत करो। पच्चीस पाउण्ड मिल जायेंगे।”
इतने में उधर से मिस लैला के चचा को आते देखकर हरबर्ट जल्दी से बाहर चल गया।
4
इसके दो दिन बाद लार्ड हरबर्ट के पास काक गया। लार्ड साहब बहुत अपसुर्दा ख़ातिर (उदास मन) नज़र आते थे। किसी फलसफी का कौल है कि बाजऔकात बहुत खफीफ (अधम) वाक्यात इन्सान की जिन्दगी में बड़ी-बडी तबदीलियाँ कर देते हैं। लार्ड हरबर्ट की जिन्दगी की आरजूएँ, हौसले और खुशियाँ सब एक मनहूस कुत्ते के हाथों तबाह हुई जाती थीं। इन्हें अपनी कामयाबी में कोई शक बाकी न रहा था। लैला उसकी बातों से कैसी महफूज (निरापद) होती थी। मगर इस राबिन ने सारा ख़्वव परेशान कर दिया। थह क्योंकर मुमकिन था कि इस खौफनाक कुत्ते की तेज़ चमकीली आँखों के सामने उनकी रुआनी तक्रीर जारी रहती। ऐसी हालत में गुफ्तगूँ का मजा किरकिरा हुआ जाता है। काक ने लार्ड साहब के बहुत ताज़ीम (आदर) से सर झुका लिया और कहने लगा, “हुजूर ने एक काम के लिए मुझे पच्चीस पाउण्ड देने का वायदा फ्रमाया था।”
लार्ड हरबर्ट का चेहरा खिला उठा। मकसद बरारी की सूरत निकलती हुई मालूम हुई है। बेसब्री के साथ बोले, “हाँ-हाँ, मुझे याद है।”
काक, “'मैंने इस मसले पर गौर किया, मगर इसे ख़तरे से भरा हुआ पाता हूँ। खुदा जाने, बाद को क्या हो-कहीं-मुआमला खुल जाय तो लेने के देने पड़ जायें, इसलिए मैंने एक दूसरी तरकीब सोची है कि सॉप भी मर जाय और लाठी भी न टूटे। मेरा एक दोस्त है-राबर्ट । वह ऐसा कारीगर है कि जिस जानवर की सूरत चाहता है, तबदील कर देता है। ऐसे रंग-रोगन लगाता है कि बड़े-बड़े भी नहीं भोप सकते। इसके पास राबिन के कद्दोकामात (कद और शरीर) का एक खूबसूरत क॒त्ता है बहुत अच्छा। लड़के इससे खेला करते हैं। इसका रंग इस वक्त सफेद है। मगर राबर्ट कहता है कि मैं इसे बिलकुल राविन से मिला दूँगा। कोई पहचान न कर सकेगा। बस, जब दूसरा राबिन तैयार हो जाएगा तो असल राबिन को जंजीर में बाँधकर राबर्ट के घर में कैद कर दूँगा और नकली राबिन मिस लैला को दे दिया जायगा ।”
हरबर्ट ने सोचकर जवाब दिया, “क्या ऐसा मुमकिन है ?” काक, “हुजूर, मैंने खुद अपनी आँखों से राबर्ट को घोड़ों की सूरत तबदील करते देखा है।”
हरबर्ट, “मगर लैला पहचान गयी तो ?”
काक, “यह सिर्फ मुमकिन है, राबर्ट निहायत होशियार आदमी है। बस सिर्फ मुआवजा तय हो जाना चाहिए |”
हरबर्ट, “अगर मेरी खातिरख़्वाह (मनोवांछित) काम हो गया तो तुम दोनों को चार-चार पाउण्ड दूँगा।!
काक (हँसकर), “हुजूर दिललगी करते हैं। पच्चीस पाउण्ड तो महज जहर खिलाने के लिए देते थे जो बिलकुल सीधा-सा आसान काम है। हुलिया पेंट निहायत मुश्किल काम है। सी पौण्ड से कम में नहीं चलेगा |”
हरबर्ट, “ओफ्फो, सौ पाउण्ड और इतने से काम के लिए ?””
काक, “हुजूर, पच्चीस पाउंड तो सिर्फ रोगन और मसाला में लग जायेंगे ।'”
हरबर्ट, “नहीं, भई इस कदर मैं नहीं दे सकता, यह सौदा न पटेगा |”
काक, “अच्छा तो रहने दीजिए। बंदा अब जाता है।”
हरबर्ट (घबड़ा कर), “नहीं-नहीं, जाओ मत। ठहरो। पचास पाउण्ड में तय कर लो।'
काक, “न, सौ से कौड़ी कम नहीं |
हरबर्ट, “अच्छा फिर पचहत्तर....अस्सी....इसे लो, तुम्हारा ही कहना सही। मगर मैं पहले इस कुत्ते को देख लूँगा।
काक (खुश होकर), “हुजूर-गौर से देख लीजिएगा। क्या मजाल कि जरा भी कोई पहचान सके |”
हरबर्ट, “और वह राबर्ट वाला क॒त्ता सीधा है न ?”
काक, “हुजूर, ऐसा सीधा और नेक जैसे गाय | इसके मुँह में उँगली डाल दीजिए तो भी न काटेगा और गुर्राना तो सीखा ही नहीं; लाकर दिखाऊँ हुजूर को ।”
हरबर्ट, “हॉ-हाँ, ज़रूर लाओ। पहले जरा मैं भी इससे मिल लूँ।'”
थोड़ी देर में चालाक काक एक सफेद रंग का मैला-कुचैला कुत्ता लेकर हाजिर हुआ। हरबर्ट ने कहा, “यह कृत्ता राबिन नहीं बन सकता ।”
काक, “इसे हुजूर, रोगन तो लग जाने दीजिए। हिम्मत क्यों हारते हैं। हाँ, आशिकी में तो हिम्मत ही दरकार है।
हरबर्ट, “अच्छा, इसके सर पर हाथ तो रखो ।”
काक, “हजूर खुद ही रख लें। जरा भी न बोलेगा ।”
यह कहकर उसने डरते-डरते उस कुत्ते का पहले एक कान पकड़ लिया। फिर जरा डीठ हौकर उठा लिया, मगर कुत्ते के मुँह से आवाज तक न निकली | तब लार्ड साहब को और जुर्रत हुई। आपने डरते-डरते (गोया शेर का बच्चा है) आहिस्ता से उसके सर पर हाथ रखा। कुत्ते ने ख़ाइफ (भयभीत) और दुज्दीदा निगाहों (कनखियों) से देखा और जरा दुम हिलाकर रह गया। हरबर्ट मारे ख़ुशी के उछल पड़े और कहा, “आज शाम तक. काम बन जाय, वरना फिर एक पौण्ड भी न दूँगा ।”
काक, “बस, आज ही शाम को लीजिए ।”
5
एक दिन की बजाए दो दिन गुजर गये और काक आता ही नहीं है। अड़तालीस घण्टे लार्ड हरबर्ट ने बड़ी उम्मीद-ओ-पैहम (निरन्तर आशा) में काटे। कभा तो बिलकुल यकीन न आता और वह सोचते कि काक ने मुझसे शरारत की है और कभी उम्मीद ज्यादा खुशगवार मृूग्त अख्तयार कर लेती । आखिर तीसरे दिन काक आ धमका तो आप कहने लगा, “सुना जी, हमारा-तुम्हाग वायदा एक दिन का था। आज तीसरा दिन है। अब मैं एक कौड़ी भी न दूँगा, समझे ।'!
काक, “हुजूर, काम मुकम्मिल हो गया ।''
हरबर्ट (उछलकर), “सच, जाहिर तो नहीं होता ।''
काक, “अब हुजूर खुद इसका फैसला कर लें।'
दोनों आदमी मिस लैला के अहाते में आये। राबिन की शक्ल-सूरत और रंग का एक कुत्ता पड़ा सो रहा था। हरवर्ट इसे देखकर बोले, ''बख़ुदा, यह तो राबिन है, तू मुझे धोखा दे रहा है।'
काक, “ुजूर, धोखा क्या दूँगा, यह कारीगर की उस्तादी है। इससे दो दिन लग गये। जरा इसके सर पर हाथ तो रखिये |
हरबर्ट, “तुम खुद रखो। मुझे यकीन नहीं आता |"
काक ने नकली राबिन के सर पर हाथ रखा। उसने पड़े-पड़े एक बार आँख खोली और फिर बन्द कर ली। अब लार्ड साहब ने फिर जुर्रत करके गरदन धपथपायी। कुत्ते ने भी आहिस्ता से दुम हिलाने के आलवा और कोई बेजा हरकत नहीं की। लार्ड साहब का चेहरा खुशी से फूल पड़ा। बोले, “बेशक, कमाल किया है। कमाल। किसको दुआ दूँ।
काक, “हुजूर, अब पाउण्ड....”
266 : प्रेमचंद रचनावली-]
हरबर्ट, “ऐसी क्या जल्दी है।'
काक, “हजर, राबर्ट सख्त तकाज़ा कर रहा है। मुझ तो ऐसी कोई जरूरत नहीं है।'"
लार्ड हरबर्ट ने बड़ी फ्राखदिली से सौ पौण्ड का एक चैक निकालकर काक के हवाले कर दिया और थोड़ी देर के बाद गैर-मामूली सज-धज के साथ अकड़ते-झूमते आप मिस लैला के कमरे में दाखिल हुए। लैला ने इन्हें देखते ही शिकायत की, “लार्ड हरबर्ट। मेरे कुत्ते को आज खुदा जाने क्या हो गया है। न मेरे बुलाने से आता है, न मेरे पास बैठता है। बस बरामदे में चुपचाप पड़ा हुआ है।”
लार्ड हरबर्ट (निहायत हमदर्दाना लहजा में दिलदिही के तौर पर), “बदहजमी हो गयी होगी। दो-एक दिन में अच्छा हो जायगा ।/” यह कहकर आपने जाकर राबिन के सर पर हाथ रखा और बहुत गमगुसारी (सहानुभूति) के साथ बोले, “बेचारा बहुत निडाल हो गया है। वरना क्या हरदम खेलता रहता था। मगर आप घबड़ाएँ नहीं। दो-एक दिन में इसकी तबियत साफ हो जायेगी |”
आज शाम तक मिस लैला के साथ रहे और एक लम्हे के लिए भी जबान बन्द नहीं की । कभी अपनी जवॉमरदी का, कभी अपनी सैरों-सफर का, कभी अजीबो-गरीब मुनाजर (शास्त्रार्थ) का तज्करा करते रहे और लैला भी कोई रफीक न रहने के सबब से या सनकी सज-धज की कशिश के बाइस आज उनसे गैरमामूली अखलाकु (शिष्टाचार) से पेश आयी।
दूसरे दिन आप अल्लसबा सुबह ही फर्ते मसर्रत (हर्शातिरेक) से हैट हिलाते हुए, मिस लैला के कमरे में दाखिल हुए तो देखा कि वह बागीचा की तरफ खरामे-खरामे जा रही है और राबिन उसके पीछे चला जाता हैं। आप फौरन बागीचा की तरफ चले और लपक कर लैला के सामने जा पहुँचे। “गुड मार्निग”; के बाद पहला सवाल आपने यही किया, “राबिन की तबियत अब कैसी है ?”
लैला, “कुछ अचछी नहीं मालूम होती। रात भर बहुत सुस्त रहा ।'
हरबर्ट, “वाकई ?”
लैला, “जी हॉ, नहीं मालूम क्या खा गया है या खुदा जाने क्या बीमारी पैदा हो गई है। अगर यही हाल रहा तो मैं मिस्टर बारटन को क्या जवाब दूँगी ?”
हरबर्ट ने दर्दमन्द निगाहों से राबिन को देखा और नज़दीक आकर दिलेरी के साथ उसका कान पकड़कर खींचा, गोया नींद से जगाने की कोशिश कर रहे हैं। यह एक बहुत मामूली बात थी, मगर दूसरा एक निहायत गैरमामूली नतीजा निकला। एक बम का गोला फट गया और हवा अजीबो-गरीब आवाज से गूँज उठी। राबिन एक रबड़ की गेंद की तरह उछल पड़ा और हरबर्ट की टरफ लपका लाई हरवर्ट को अब बगैर चारों खाने चित्त गिरने के और कोई सूरत नजर न आई। आप गिरे नीचे, आप ऊपर कुर्सी और जब इस बम के गोले के सदमे के बाद होश आया तो क्या देखते हैं कि राबिन शोलाबाज़ आँखों से इनकी तरफ घूर-घूर कर गुर्रा रहा है और लैला जोर से इसके गरदन का तसमा पकड़कर रोके हुए है। आप जल्दी से उठ खड़े हुए।
मिस लैला ने बिगड़कर कहा, “आपकने क्यों इसका कान खींचा ? मैंने कहा नहीं था
कि वह बीमार है ?'
लार्ड हरबर्ट (बदहवासी से), “मुझे मुझे ख़्याल....””
लैला ने हॉफकर कहा, “भागो, दौड़ो-मैं छोड़े देती हूँ। मुझसे नहीं सँभल सकता। और तेज भागों, तेज, निकल जाओ ।” लार्ड हरबर्ट भागे। पसीना में सराबोर। हाथ-पाँव थर-थर काँप रहे थे। और दिल धड़क रहा था दिल ही दिल कहते जाते हैं, “आज सख्त ख़फीफ (लज्जित) हुए। अब मेरा रंग जमना मुहाल (नामुमकिन) है। अब बाजी हाथ से जाती रही । यह सब बदमाश हरामख़ोर काक की शरारठ है।”
यह ख्याल आते ही आप बाहर निकल आए। सिगरेट जलाया और काक के मकान की तरफ चले तो क्या देखा कि वह सफेद कुत्ता, जिसे काक ने कल दिखाया था, आहिस्ता- आहिस्ता सर झुकाये चला जा रहा है। पूरा यकीन हो गया कि जालिम काक ने पटेबाजी की, मगर कहरे दरवेश बर जाने दरवेश-(गरीब का गुस्सा गरीब की जान पर)। फिर भी वो काक के पास गये। झल्लाये, चिल्लाये। लानत-ओ-मलामत की, धमकाया, दगाबाज, हरामखोर, सब-कुछ कहा, मगर यह सब हारे हुए जुआरी का गुस्सा था।
काक ने परवाह तक्म न की। बोला, “हजूर, मैंने रंग तबदीली करने के लिए रुपये लिये थे। मिजाज को तबदील करना इंसान क॑ अख़्तियार से बाहर है। खुदा जाने मिस साहब कुत्तों को क्या सिखा देती हैं कि कैसा ही सीधा कुत्ता हो, उनके साथ रहते ही शेर हो जाता है।”
6
दो हफ्ते के बाद एक मोटरकार मिस लिली के दरवाज़े पर आकर रुकी और जान बारटन नीच उतरा। खानसामा ने आकर ताजीम (अदब) से सलाम किया। बारटन ने पूछा, “कहो, यहाँ का क्या हाल है ?”
काक, “हुजूर सब खैरियत है। मिस प्ाहिबा झील के किनारे टहलने गयी हैं। राबिन भी उनके साथ है। आप तो खेरियत से हैं २"
बारटन, “और लार्ड हरबर्ट कहाँ हैं २"
काक (मुस्कराकर), “उनका कुछ हाल न पूछिये। राबिन ने उनका मोरचा हटा दिया ।
बारटन, “क्या अब वो यहाँ नहीं हैं ?'
काक, “जी, उन्हें गये तो आज आठवाँ दिन है।'
बारटन की जान में जान आयी। उसने झील तक जाकर मिस लिली से मुलाकात करने का इरादा किया और झिझकता हुआ जा पहुँचा । मिस लिली झील के किनारे खडी राबिन को बत्तखों पर दौड़ने के लिए इशारा कर रही थी। ग़रटन को देखकर उसन सर्दमेहरी (बेदिली) के साथ, जो बारटन के हौसलों को खाक में मिला दिया करता था, इसके सलाम का जवाब दिया। मगर राबिन दौड़ा-दौड़ा दुम हिलाकर बड़ी सरगर्मी से इजहा-मुसर्रत करने लगा। लिली की यही मतानत (संजीदगी), यही रुखाई बारटन को सर्द कर दिया करती थी।
मिस लिली ने कहा, “कहिये मिस्टर बारटन। मिजाज कैसा है * मैंने आपके कुत्ते को बड़े आराम से रखा है।
लाज़िम था कि इसके जवाब में बारटन कोई पुरमानी (अनेकार्थी), पुरमजाक् (जिन्दादिल) जुमला कहता, मगर ऐसा न पहले कभी हुआ था, और न इस वक्त हो सका।
मिस लिली ने राबिन को प्यार करके कहा, “अब तुम मिस्टर बारटन के पास न जाने पाओगे। क्यों, मेरे पास रहेगा न ? तुझे बड़े आराम से रखूँगी।”
यह अल्फाज़ बहुत सादा और बेरंग थे और बिला किसी ख़ास निशाने के कहे गये थे, मगर उन्होंने जान बारटन पर गजब का असर पैदा किया। उन्होंने इस रूखी मतानत का ख्याल दूर कर दिया जो इसकी हिम्मतों को तोड़ दिया करती थी। उन अल्फाज में इसे एक खुशगुवार इशारग, एक महशर-अंगेज तहरीक (प्रलयंकारी प्रवृत्ति) का असर महसूस हुआ, जिसने इसकी झिझक और शर्मीलिपन को गायब कर दिया। खौफ की बजाय दिल में उम्मीद की ताकत महसूस हुई। इसने जल्दी से झुक कर मिस लिली को प्यार किया और नशाए-मुहब्बत से मखमूर (उन्मत्त) होकर बोला, “राबिन अकेला नहीं रह सकता, मैं भी इसके साथ हूँ।''
लिली ने शर्मीली अदा से सर झुकाकर जवाब दिया, “ज़ैर, क॒त्ता तुम्हारा रहनुमा तो साबित हुआ ।
[प्रथम प्रकाशन उर्दू में, 'अदीब' (उर्दू पत्रिका), अप्रैन, 1913 में प्रकाशित । हिन्दी रूप “सगे-लैन्ा' (लैला का कुत्ता) शीर्षक से “प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य” खण्ड-] में संकलित ।]
सगे-लैला का सारांश
'सगे-लैला' (लैला का कुत्ता) एक हास्य-विनोद और रोमांस से भरपूर कहानी है, जो मिस लैला नामक एक सुंदर व संपन्न युवती और उसके दो प्रेमियों के इर्द-गिर्द घूमती है। लैला के पहले प्रेमी मिस्टर जॉन बारटन हैं, जो स्वभाव से गंभीर, संकोची, शरीफ और सच्चे आशिक हैं; परंतु अपनी अत्यधिक झिझक के कारण वे साल भर से लैला के प्रति अपने प्रेम का इजहार नहीं कर पाते। दूसरी ओर, लॉर्ड हरबर्ट एक रंगीन-मिजाज, वाक्पटु, सजीला और दिखावटी रईस है, जो केवल लैला की संपत्ति पर आँख गड़ाए हुए है। अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों और यात्राओं के किस्सों से हरबर्ट लैला को रिझाने में काफी हद तक सफल दिखता है, जिससे बारटन अक्सर खुद को असहाय और निराश महसूस करते हैं।
कहानी में निर्णायक मोड़ तब आता है जब बारटन का वफादार शिकारी कुत्ता 'राबिन' इस प्रतिद्वंद्विता के बीच आ जाता है। लॉर्ड हरबर्ट स्वभाव से कुत्तों से बेहद डरता है। एक दिन लैला के बगीचे में राबिन हरबर्ट को देखकर भौंकते हुए उसका पीछा कर लेता है। हरबर्ट बदहवास होकर जान बचाने के लिए एक सूखे पेड़ के ठूँठ पर चढ़ जाता है और काँपते हुए चीखने लगता है। तभी बारटन वहाँ पहुँचकर राबिन को हटाता है और हरबर्ट को नीचे उतारता है। इसी बीच बारटन को अपने पिता के गंभीर रूप से बीमार होने का तार मिलता है और उसे तुरंत जाना पड़ता है। विदा होते समय मिस लैला उससे राबिन को अपने पास छोड़ जाने का अनुरोध करती है, जिसे बारटन सहर्ष स्वीकार कर लेता है।
बारटन के जाते ही हरबर्ट लैला का दिल जीतने की कोशिश में उसके घर पहुँचता है, परंतु राबिन हर समय लैला के पास रहता है और हरबर्ट को देखते ही गुर्राने लगता है। भयभीत होकर हरबर्ट लैला के खानसामे 'काक' को बीस-पच्चीस पाउंड देकर राबिन को जहर देने की बात कहता है। काक उसे एक सुरक्षित उपाय सुझाता है कि उसका एक साथी एक सीधे, सफेद कुत्ते को बिल्कुल राबिन की तरह रंग-रोगन करके हूबहू नकली राबिन बना देगा और असली राबिन को कहीं छिपा देगा। हरबर्ट इस योजना से संतुष्ट होकर काक को सौ पाउंड दे देता है।
कुछ दिनों बाद काक दावा करता है कि उसने कुत्ते को बदल दिया है। हरबर्ट जब लैला के घर पहुँचता है, तो लैला कहती है कि राबिन आज बहुत बीमार और सुस्त लग रहा है। अपनी दिलेरी दिखाने और कुत्ते को सहलाने के चक्कर में हरबर्ट बेधड़क होकर उसका कान खींच देता है। कान खिंचते ही कुत्ता आगबबूला होकर उछलता है और हरबर्ट पर झपट पड़ता है। हरबर्ट औंधे मुँह गिर पड़ता है और लैला के सामने रोता-चिल्लाता हुआ सिर पर पैर रखकर भागता है। इस घटना से हरबर्ट का सारा पाखंड और झूठी मर्दानगी लैला के सामने खुल जाती है और वह अपमानित होकर हमेशा के लिए मैदान छोड़ देता है।
दो सप्ताह बाद जब जॉन बारटन लौटता है, तो खानसामा उसे बताता है कि राबिन ने हरबर्ट का मोर्चा पूरी तरह साफ कर दिया है। बारटन झील के किनारे पहुँचता है जहाँ लैला राबिन को टहला रही होती है। राबिन अपने पुराने मालिक को देखकर खुशी से उछल पड़ता है। लैला जब मुस्कुराते हुए कहती है कि वह राबिन को अब कभी वापस नहीं जाने देगी और अपने ही पास रखेगी, तो बारटन अपनी स्वाभाविक झिझक को त्यागकर कह उठता है कि राबिन अकेला नहीं रह सकता, वह भी उसके साथ ही रहेगा। लैला लजाकर सहमति दे देती है और कहती है कि अंततः यह कुत्ता ही बारटन का सच्चा रहनुमा (मार्गदर्शक) साबित हुआ।
प्रकाशन इतिहास
यह कहानी सर्वप्रथम उर्दू में उर्दू पत्रिका अदीब के अप्रैल, 1913 के अंक में प्रकाशित हुई थी। बाद में इसका हिन्दी रूपांतर 'सगे-लैला' (लैला का कुत्ता) शीर्षक से प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य (खण्ड-1) में संकलित किया गया।
महत्त्व और विषय-विमर्श
- सच्ची निष्ठा बनाम दिखावटी वाक्चातुर्य: कहानी यह स्पष्ट करती है कि लॉर्ड हरबर्ट का छिछला आकर्षण और लच्छेदार बातें जॉन बारटन के गंभीर, मूक और निष्कपट प्रेम के सामने टिक नहीं सकीं। प्रेम में वाक्पटुता की अपेक्षा निष्ठा और शराफत अधिक मूल्यवान होती है।
- झूठे पौरुष और कायरता का उद्घाटन: लॉर्ड हरबर्ट खुद को बड़ा जाँबाज और रईस दिखाता था, परंतु एक साधारण कुत्ते के सामने उसकी घबराहट, पेड़ पर चढ़ जाना और अंत में गिरते-पड़ते भागना उसके खोखले व्यक्तित्व और भीरुता को उजागर करता है।
- पशु की वफादारी और सहज विवेक: राबिन की भूमिका केवल एक पालतू जानवर की नहीं, बल्कि न्यायकर्ता की है। वह अपनी सहज प्रवृत्ति से सच्चे और स्वार्थी मनुष्य की पहचान करता है। उसका व्यवहार बारटन के प्रेम को परिणति तक पहुँचाने में उत्प्रेरक बनता है।
- चालाकी और लालच पर व्यंग्य: खानसामा 'काक' द्वारा हरबर्ट के भय का फायदा उठाकर सौ पाउंड ठग लेना और अंत में यह कहकर पल्ला झाड़ लेना कि उसने रंग बदलने के पैसे लिए थे स्वभाव बदलने के नहीं, धूर्त व्यक्तियों के आपसी छल-कपट पर रोचक व्यंग्य है।
- कहानी का व्यापक महत्त्व: 'सगे-लैला' प्रेमचंद की कथा-यात्रा में हास्य, व्यंग्य और रूमानी तत्वों का एक अनूठा संगम है। यह कहानी दिखाती है कि जीवन के कई जटिल निर्णय अनायास ही साधारण और अप्रत्याशित घटनाओं के माध्यम से सुलझ जाते हैं, जहाँ छल की पराजय और सच्चाई की विजय निश्चित होती है।
