साहित्य का आधार जीवन है। इसी नींव पर साहित्य की दीवार खडी होती है, उसकी अरटारियां, मीनार और गुंबद बनते हैं. लेकिन बुनियाद मिट्टी के नीचे दबी पडी है। उसे देखने को भी जी नहीं चाहेगा। जीवन परमात्मा की सृष्टि है, इसलिए अनंत है, अबोध है, अगम्य है। साहित्य मनुष्य की सृष्टि है, इसलि< सुबोध है, सुगम है और मर्यादाओं से परिमित है। जीवन परमात्मा को अपने कामों का जवाबदेह है या नहीं, हमें श्लूम्त नहीं, लेकिन साहित्य तो मनुष्य के सामने जवाबदेह है। इसके लिए कानून हैं जिनसे वह इधर-उधर नहीं हो सकता। जीवन का उद्देश्य ही आनंद है। मनुष्य जीवनपर्यन्त आनंद ही की खोज में पड़ा रहता है। किसी को वह रत-द्रव्य में मिलता है, किसी को भरे-पूरे परिवार में, किसी को लंबे-चौड़े भवन में, किसी को ऐडवर्य में। लेकिन साहित्य का आनंद, इस आनंद से ऊंचा है, इससे पवित्र है, उसका आधार सुंदर और सत्य है। वास्तव में सच्चा आनंद सुंदर और सत्य से मिलता है। उसी आनंद को दर्शाना, वही आनंद, उत्पन्न करना, साहित्य का उद्देश्य है। ऐड्वर्य या भोग के आनंद में ग्लानि छिपी होती है। उससे अरुचि भी हो सकती है, पश्चात्ताप भी हो सकता है, पर सुंदर से जो आनंद प्राप्त होता है, वह अखंड है, अमर है।
साहित्य के नौ रस कहे गए हैं। प्रश्न होगा, वीभत्स में ५” कोई आनंद है? अगर ऐसा न होगा, तो वह रसों में गिना क्यों जाता है। हां, है। वीभत्स में सुंदर और सत्य मौजूद है। भारतेन्दु ने श्मशान का जो वर्णन किया हं, वह कितना वीभत्स है। प्रेतों और पिशाचों का अधजले मांस का लोथड़े नोचना, हड्डियों को चटर-चटर चबाना, वीभत्स की पराकाष्ठा है, लेकिन वह वीभत्स होते हुए भी सुंदर है, क्योंकि उसकी वृष्टि पीछे आने वाले स्वर्गीय दृश्य के आनंद को तीब्र करने के लिए ही हुईं है। साहित्य तो हम एक रस में सुंदर खोजता है-राजा के महल में, रंक को झोंपड़ी में, पहाड़ के शिखर पर, गंदे नालों के अंदर, उषा की लाली में, सावन- भादों की अंधेरी रात में। और यह आरचर्य कौ बात है कि रंक को झोंपड़ी में जितनी आसानी से सुंदर मूर्तिमान दिखाई देता है उतन, महलों में नहीं। महलों में तो वह खोजने से मुश्किलों से मिलता है। जहां मनुष्य अपने मौलिक, यथार्थ अकृत्रिम रूप में है, वही आनंद है। आनंद कृत्रिमता और आडंबर से कोसों भागता है। सत्य का कृत्रिम से क्या संबंध है। अतएवं हमारा विचार है कि साहित्य में केवल एक रस है और वह ध्ृंगार है। कोई रस साहित्यिक-दृष्टि से रस नहीं रहता और न उस रचना
की गणना साहित्य में की जा सकती है जो श्रृंगार-विहीन और असुंदर हो। जो रचना केवल वासना-प्रधान हो, जिसका उद्देश्य कुत्सित भावों को जगाना हो, जो केवल बाह्य जगत् से संबंध रखे, वह साहित्य नहीं हे। जासूसी उपन्यास अद्भुत होता है; लेकिन हम उसे साहित्य उसी वक्त कहेंगे, जब उसमें सुंदर का समावेश हो, खूनी का पता लगाने के लिए सतत उद्योग, नाना प्रकार के कष्टों को झेलना, न््याय-मर्यादा की रक्षा करना, यह भाव रहें, जो इस अद्भुत रस की रचना को सुंदर बना देते हैं।
सत्य से आत्मा का संबंध तीन प्रकार का है। एक जिज्ञासा का संबंध है दूसरा प्रयोजन का संबंध हे ओर तीसरा आनंद का। जिज्ञासा का संबंध दर्शन का विषय है, प्रयोजन का संबंध विज्ञान का विषय है और साहित्य का संबंध केवल आनंद का संबंध है। सत्य जहां आनंद का स्रोत बन जाता है, वहीं पर साहित्य हो जाता है। जिज्ञासा का संबंध विचार से है, प्रयोजन का संबंध स्वार्थ-बुद्धि से। आनंद का संबंध मनोभावों से है। साहित्य का विकास मनोभावों द्वारा ही होता है। एक दृश्य घटना या कांड को हम तीनों ही भिन्न-भिन्न नजरों से देख सकते हैं। हिम से ढंके हुए पर्वत पर उषा का दुश्य दार्शनिक के गहरे विचार की वस्तु है, वैज्ञानिक के लिए अनुसंधान की, ओर साहित्यिक के लिए विह्लता की। बिहलता एक प्रकार का आत्म समर्पण है। यहां हम पृथक्ता का अनुभव नहीं करते। यहां ऊंच नीच, भले-बुरे का भेद नहीं रह जाता। श्रीरामचन्द्र शवरी के झूठे बेर क्यों प्रेम से खाते हैं, कृष्ण भगवान विदुर के शाक को क्यों नाना व्यंजनों से रुचिकर समझते हैं? इसीलिए कि उन्होंने इस पार्थक्य को मिटा दिया है। उनकी आत्मा विशाल है। उसमें समस्त जगत् के लिए स्थान है। आत्मा आत्मा से मिल गई है। जिसकी आत्मा जितनी ही विशाल है, वह उतना ही महान् पुरुष है। यहां तक कि ऐसे महान् पुरुष भी हो गए हैं, जो जड़ जगत् से भी अपनी आत्मा का मेल कर सके हें।
आइये देखें, जीवन क्या है? जीवन केवल जीना, खाना, सोना और मर जाना नहीं है। यह तो पशुओं का ज्ञान है। मानव-जोवन में भी यह सभी प्रवृत्तियां होती हैं. क्योंकि वह भी तो पशु है। पर इनके उपरांत कुछ और भी होता है। उनमें कुछ ऐसी मनोवृत्तियां होती हैं, जो प्रकृति के साथ हमारे मेल में बाधक होती हैं, कुछ ऐसी होती हैं, जो इसी मेल में सहायक बन जाती हैं। जिन प्रवृत्तियां में प्रकृति के साथ हमारा सामंजस्य बढ़ता है, वह वांछनीय होती हैं, जिनसे सामंजस्य में बाधा उत्पन्न होती है, वे दूषित हैं। अहंकार, क्रोध, या द्वेष हमारे मन की बाधक प्रवृतिया हैं। यदि हम इनको वे बेरोक-टोक चलने दें, तो निःसंदेह वह हमें नाश और पतन की ओर ले जायंगी, इसलिए हमें उनकी लगाम रोकनी पड़ती है, उन पर संयम रखना पड़ता हैं, जिसमें वे अपनी सीमा से बाहर न जा सकें। हम उन पर जितना कठोर संयम रख सकते हैं, उतना ही मंगलमय हमारा जीवन हो जाता है।
किंतु नटख्नट लड़कों से डांटकर कहना-तुम बड़े बदमाश हो, हम तुम्हारे कान पकड़कर उखाड़ लेंगे-अक्सर व्यर्थ ही होता है, बल्कि उस प्रकृति को और हठ का ओर ले जाकर पुष्ट कर देता है। जरूरत यह होतो है, कि बालक में जो सदूवृत्तिया हैं उन्हें ऐसा उत्तेजित किया जाय, कि दूधित तृत्तियां स्वाभाविक रूप से शात हैं!
जाय॑ं। इसी प्रकार मनुष्य को भी आत्मविकास के लिए संयम की आवश्यकता होती है। साहित्य ही मनोविकारों के रहस्य खोलकर सद्वृत्तियों को जगाता है। सत्य को रसों द्वारा हम जितनी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं, ज्ञान और विवेक द्वारा नहीं कर सकते, उसी भांति जैसे दुलार-चुमकारकर बच्चों को जितनी सफलता से वश में किया जा सकता है, डांट-फटकार से संभव नहीं। कौन नहीं जानता कि प्रेम से कठोर-से-कठोर प्रकृति को नरम किया जा सकता है। राहित्य मस्तिष्क की वस्तु नहीं, हृदय की वस्तु है। जहां ज्ञान और उपदेश असफल होता है, वहां साहित्य बाजी ले जाता है। यही कारण है, कि हम उपनिषदों और अन्य धर्म-ग्रंथों को साहित्य की सहायता लेते देखते हें | हमारे धर्माचार्यों ने देखा कि मनुष्य पर सबसे अधिक प्रभाव मानव-जीवन के दुःख - सुख क वर्णन से ही हो सकता है और उन्होंने मानव-जीवन की वे कथाएं रचीं, जो आज भी हमारे आनंद की वस्तु हैं। बौद्धों की जातक-कथाएं, तौरेह, कुरान, इंजील ये सभी मानवी कथाओं के संग्रहमात्र हैं। उन्हीं कथाओं पर हमारे बड़े-बड़े धर्म स्थिर हैं। वही कथाएं धर्मो की आत्मा हैं। उन कथाओं को निकाल दीजिए, तो उस धर्म का अस्तित्व मिट जायगा। क्या उन धर्म-प्रवर्तकों ने अकारण ही मानव- जीवन की कथाओं का आश्रय लिया? नहीं, उन्होंने देखा कि हृदय द्वारा ही जनता की आत्म तक संदेश पहुंचाया जा सकता है। वे स्वयं विशाल हृदय के मनुष्य थे। उन्होंने मानव जोवन से अपनी आत्मा का मेल कर लिया था। समस्त मानवजाति से उनके जीवन का सामंजस्य था, फिर वे मानव-चरित्र की उपेक्षा केसे करते?
आदिकाल से मनुष्य के लिए सबसे समीप मनुष्य है। हम जिनके सुख-दु:ख, हंसने-रोने का मर्म समझ सकते हैं, उसी से हमारी आत्मा का अधिक मेल होता है। विद्यार्थी को विद्यार्थी -जोवन से, कृषक को कृषक जीवन से जितनी रुचि है, उतनी अन्य जातियों से नहीं, लेकिन साहित्य-जगत् में प्रवेश पाते ही यह भेद, यह पार्थक्य मिट जाता है। हमारी मानवता जैसे विशाल और विराट् होकर समस्त मानव-जाति पर अधिकार पा जाती है। मावन- जाति ही नहीं, चर और अचर, जड़ और चेतन सभी उसके अधिकार में आ जाते हैं। उसे मानो विश्व की आत्मा 'र साम्राज्य प्राप्त हो जाता है। श्री रामचन्द्र राजा थे, पर आज रंक भी उनके दु:ख ज॑ उतना ही प्रभावित होता है, जितना कोई राजा हो सकता है। साहित्य वह जादू री लकड़ी है, जो पशुओं में, ईंट-पत्थरों में, पेड़-पौधों में विश्व की आत्मा का दर्शन करा देती है। मानव हृदय का जगत्, इस प्रत्यक्ष जगत् जैसा नहीं है। हम मनुष्य होने के कारण मानव-जगत् के प्राणियों में अपने को अधिक पाते हैं, उनके सुख-दुःख, हर्ष और विषाद से ज्यादा विचलित होते हैं। हम अपने निकटतम बंधु-बांधवों से अ ने को इतना निकट नहीं पाते, इसलिए कि हम उनके एक-एक विचार, एक-एक उद्गार को जानते हैं, उनका मन हमारी नजरों के सामने आईने की तरह खुला हुआ है। जीवन में ऐसे प्राणी हमें कहां मिलते हैं, जिनके अंत:ःकरण में हम (तनी स्वाधीनता से जिषर सकें सच्चे साहित्यकार का यही लक्षण है कि भावों में व्यापकता हो, उसने विश्व को आत्मा से ऐसी प्रणा# प्राप्त कर ली हो कि उसके भाव प्रत्येक प्राणी को अपने ही भाव मालूम हों।
साहित्यकार बहुधा अपने देशकाल से प्रभावित होता है। जब कोई लहर देश में उठती है, तो साहित्यकार के लिए उससे अविचलित रहना असंभव हो जाता है और उसकी विशाल आत्मा अपने देश-बंधुओं के कष्टों से विकल हो उठती है और इस तीबत्र विकलता में वह रो उठता हैं, पर उसके रुदन में भी व्यापकता होती है। वह स्वदेश का होकर भी सार्वभौमिक रहता है। 'टाम काका भी कुटिया' गुलामी की प्रथा से व्यथित हृदय की रचना है, पर आज उस प्रथा के उठ जाने पर भी उसमें वह व्यापकता है कि हम लोग भी उसे पढ़कर मुग्ध हो जाते हैं। सच्चा साहित्य कभी पुरानी नहीं होता। वह सदा नया बना रहता है। दर्शन और विज्ञान समय की गति के अनुसार बदलते रहते हैं, पर साहित्य तो दृदय की वस्तु है और मानव हृदय में तब्दीलियां नहीं होतीं। हर्ष ओर विस्मय, क्रोध और द्वेष, आशा और भय, आज भी हमारे मन पर उसी तरह अधिकृत हैं, जेसे आदिकवि वाल्मीकि के समय में थे और कदाचित् अनंत तक रहेंगे। रामायण के समय का समय अब नहीं है, महाभारत का समय भी अतोत हो गया, पर ये ग्रंथ अभी तक नये हैं। साहित्य ही सच्चा इतिहास है क्योंकि उसमें अपने देश और काल का जैसा चित्र होता है, वैसा कोरे इतिहास में नहीं हो सकता। घटनाओं की तालिका इतिहास नहीं है ओर न राजाओं की लड़ाइयां ही इतिहास हैं। इतिहास जीवन में विभिन्न अंगों की प्रगति का नाम है, और जीवन पर साहित्य से अधिक प्रकाश और कौन वस्तु डाल सकती है क्योंकि साहित्य अपने देशकाल का प्रतिबिंब होता है।
जीवन में साहित्य की उपयोगिता के विषय में कभी-कभी संदेह किया जाता है। कहा जाता है, जो स्वभाव से अच्छे हैं, वह अच्छे ही रहेंगे, चाहे कुछ भी पढें जो स्वभाव के बुरे हैं, वह बुरे ही रहेंगे, चाहे कुछ भी पढें। इस कथन में सत्य की मात्रा बहुत कम है। इसे सत्य मान लेना मानव-चरित्र को बदल लेना होगा। जो सुंदर है, उसकी ओर -मनुष्य का स्वाभाविक आकर्षण होता है। हम कितने ही पतित हो जाय॑ं पर असुंदर की ओर हमारा आकर्षण नहीं हो सकता। हम कर्म चाहे कितने ही बुरे करें पर यह अंसभव है कि करुणा और दया और प्रेम और भक्ति का हमारे दिलों पर असर न हो। नादिरशाह से ज्यादा निर्दयी मनुष्य और कौन हो सकता है -हमार आशय दिल्ली में कत्लेआम कराने वाले नादिरशाह से है। अगर दिल्ली का कत्लेआम सत्य घटना है, तो नादिरशाह के निर्दय होने में कोई संदेह नहीं रहता। उस समय आपको मालूम है, किस बात से प्रभावित होकर उसने कत्लेआम को बंद करने का हुक्म दिया था? दिल्ली के बादशाह का वजीर एक रसिक मनुष्य था। जब उसने देखा कि नादिरशाह का क्रोध किसी तरह नहीं शांत होता और दिल्ली वालों के खून की नदी बहती चली जाती है, यहां तक कि खुद नादिरशाह के मुंहलगे अफसर भी उसके सामने ऊ,ने का साहस भी नहीं करते, तो वह हथेलियीं पर जान रखकर नादिरशाह के पास पहुंचा और यह शेर पढ़ा
कसे न मांद कि दीगर ब तेगे नाज़ कुशी। मगर कि ज़िंदा कुनी खल्क रा व बाज़ कुशी। इसका अर्थ यह है कि तेरे प्रेम की तलवार ने अब किसी को जिंदा न छाड़।
अब तो तेरे लिए इसके सिवा और कोई उपाय नहीं है कि तू मुर्दों को फिर जिला दे और फिर उन्हें मारना शुरू करे। यह फारसी के एक प्रसिद्ध कवि का श्ृंगार-विषयक शेर है, पर इसे सुनकर कातिल के दिल में मनुष्य उठा। इस शेर ने उसके हृदय के कोमल भाग को स्पर्श कर दिया और कत्लेआम तुरंत बंद करा दिया गया। नेपोलियन के जीवन की यह घटना भी प्रसिद्ध है, जब उसने एक अंग्रेज मल्लाह को झाऊ की नाव पर कैले का समुद्र पार करते देखा। जब फ्रांसीसी अपराधी मललाह को पकडकर
नेपोलियन के सामने लाये और उससे पूछा-तू इस भंगुर नौका पर क्यों समुद्र पार कर रहा था, तो अपराधी ने कहा-इसलिए कि मेरी वृद्धा माता घर पर अकेली है, मैं उसे एक बार देखना चाहता था। नेपोलिणन कौ आंखों में आंसू छलछला आये। मनुष्य का कोमल भाग स्पन्दित हो उठा। उसने उस सैनिक को फ्रांसीसी नौका पर इंलैंड भेज दिया। मनुष्य स्वभाव से देव तुल्य है। जमाने के छल-प्रपंच और परिस्थितियों के वशीभूत होकर वह अपना देवत्व खो बैठता है। साहित्य इसी देवत्व को अपने स्थान पर प्रतिष्ठित करने की चेष्टा करता है-उपदेशों से नहीं, नसीहतों से नहीं, भावों को स्पन्दित करके, मन के कोमल तारों पर चोट लगाकर, प्रकृति से सामंजस्य उत्पन्न करके। हमारी सभ्यता साहित्य पर ही आधारित है। हम जो कुछ हैं, साहित्य के ही बनाये हैं। व्डिव की आत्मा के अंतर्गत भी राष्ट्र या देश की एक आत्मा होती है। इसी आत्मा की प्रतिध्वनि है-साहित्य। योरप का साहित्य उठा लीजिए। आप वहां संघर्ष पायेंगे। कहीं खूनी कांडों का प्रदर्शन है, कहीं जासूसी कमाल का। जैसी सारी संस्कृति उनन््मत्त होकर मरु में जल खोज रही है। उस साहित्य का परिणाम यही है वे्यक्तक स्वार्थ-परायणता दिन-दिन बढ़ती जा रही है अर्थ-लोलुपता की कहीं सीमा नहीं, नित्य दंगे, नित्य लड़ाइयां। प्रत्येक वस्तु स्वार्थ के कांटे पर तौली जा रहो है। यहां तक कि अब किसी यूरोपियन महात्मा का उपदेश सुनकर भी संदेह होता है कि इसके परदे में स्वार्थ न हो। साहित्य सामाजिक आदर्शों का स्रष्टा है। जब आदर्श ही भ्रष्ट हो गया, समाज के पतन में बहुत दिन नहीं लगते। नयी सभ्यता का जीवन डेढ़ सौ साल से अधिक नहीं पर अभी से संसार उससे तंग आ गब है। पर इसके बदले में उसे कोई ऐसी वस्तु मिल रही है, जिसे वहां स्थापित कर सके। उसको दशा उस मनुष्य कौ-सो है, जो यह तो समझ रहा है, कि वह जिस रास्ते पर जा रहा है वह रास्ता ठीक नहों है, पर वह इतनी दूर आ चुका है, कि अब लौटने को उसमें सामर्थ्य नहीं है। वह आगे हो जायगा। चाहे उधर कोई समुद्र ही क्यों न लहरें मार रहा हो। उसमें नैराशय का हिंसक बल है, आशा की उदार शक्ति नहीं। भारतीय साहित्य का आदर्श उसका त्याग और उत्सर्ग है। योरप का कोई व्यक्ति लखपति होकर, जायदाद खरीदकर, कंपनियों में हिस्से लेकर, और ऊंची सोसायटी में मिलकर अपने को कृतकार्य समझता है। भारत अपने का उस समय कृतकार्य समझता है जब वह इस मायाबंधन से मुक्त हो जाता है, जब उसमें .ग और अधिकार का मोह नर: रहता! किसी राष्ट्र की सबसे मूल्यवान संपत्ति उसके साहित्यिक आदर्श होते हैं। न्स का वाल्मीकि ने जिन आद्शों की सृष्टि की, तह आज भी भारत का सिर ऊचा किये हुए हैं। राम अगर वाल्मीकि के सांचे में न ढलते, तो राम न रहते। सीता भौ
उसी सांचे में ढलकर सीता हुईं। यह सत्य है कि हम सब ऐसे चरित्रों का निर्माण नहीं कर सकते, पर एक धघंवंतरि के होने पर भी संसार में वैद्यों की आवश्यकता रही है ओर रहेगी।
ऐसा महान् दायित्व जिस वस्तु पर है, उसके निर्माताओं का पद कुछ कम जिम्मेदारी का नहीं। कलम हाथ में लेते ही हमारे सिर बड़ी भारी जिम्मेदारी आ जाती है। साधारणत: युवावस्था में हमारी निगाह पहले विध्वंस करने की ओर उठ जाती है। हम सुधार करने की धुन में अंधाधुंध शर चलाना शुरू करते हैं। खुदाई फौजदार बन जाते हैं। परंतु आंखें काले धब्बों की ओर पहुंच जाती है। यथार्थवाद के प्रवाह में बहने लगते हैं। बुराइयों के नग्न चित्र खींचने में कला की कृतकार्यता समझते है। यह सत्य है कि कोई मकान गिराकर ही उसकी जगह नया मकान बनाया जाता है| पुराने ढकोसलों और बंधनों को तोड़ने की जरूरत है, पर इसे साहित्य नहीं कह सकते साहित्य तो वही है, जो साहित्य की मर्यादाओं का पालन करे। हम अक्सर साहित्य का मर्म समझे बिना ही लिखना शुरू कर देते हैं। शायद हम समझते हैं, कि मजेदाः चटपटी और ओजपूर्ण भाषा लिखना ही साहित्य है। भाषा भी साहित्य का एक अग है, पर साहित्य विध्वंस नहीं करता, निर्माण करता है। वह मानव-चरित्र की कालिमाए नहीं दिखाता, उसकी उज्ज्बलताएं दिखाता है। मकान गिराने वाला इंजीनियर नहीं कहलाता। इंजीनियर तो निर्माण ही करता है। हममें जो युवक साहित्य को अपने जीवन का ध्येय बनाना चाहते हैं, उन्हें बहुत आत्मसंयम की आवश्यकता है, क्योंकि वह अपने को एक महान् पद के लिए तैयार कर रहा है, जो अदालतों में बहस करन या कुर्सी पर बैठकर मुकदमे का फैसला करने से कहीं ऊंचा है। उसके लिए केवल डिप्रियां और ऊंची शिक्षा काफी नहीं। चित्त की साधना, संयम, सौंदर्य, तत्त्व का ज्ञान इसकी कहीं ज्यादा जरूरत है। साहित्यकार को आदर्शावादी होना चाहिए। भावों का परिमार्जन भी उतना ही वांछनीय है जब तक हमारे साहित्य-सेवी इस आदर्श तक न पहुंचेंगे तब तक हमारे साहित्य से मंगल की आशा नहीं की जा सकती। अमर साहित्य के निर्माता विलासी प्रवृत्ति के मनुष्य नहीं थे। वाल्मीकि और व्यास दोन तपस्वी थे। सूर और तुलसी भी विलासिता के उपासक न थे। कबीर भी तपस्वो ही थे। हमारा साहित्य अगर आज उन्नति नहीं करता तो इसका कारण यह है कि हमने साहित्य-रचना के लिए कोई तैयारी नहीं को। दो चार नुस्खे याद करके हकाम बन बैठे। साहित्य का उत्थान राष्ट्र का उत्थान है और हमारी ईश्वर से यही याचना है कि हममें सच्चे साहित्य-सेवी उत्पन्न हों, सच्चे तपस्बी, सच्चे आत्मज्ञानी।
प्रकाशन इतिहास
[लेख। 'हंस', अप्रैल, 1932 में प्रकाशित। 'कुछ विचार' तथा 'साहित्य का उद्देश्य' में संकलित।]
