देश में इस समय आर्थिक संकट के कारण, जो दशा उपस्थित हो गई है, उसे जल्द न संभाला गया, तो देश में भारी उपद्रव मच जाने की सम्भावना है। जिन्सों के भाव आधे से भी कम हो गए हैं। इस दशा में जमींदार पूरा लगान वसूल करने पर तुले हुए हैं और किसान देने में असमर्थ हैं। सरकार ने लगान में जो छूट दी है, वह नाम मात्र है। कांग्रेस की सहायता के बिना किसानों की दशा और भी शोचनीय हो जाती, लेकिन कांग्रेस के प्रयत्न से भी स्थिति सुधरती नज़र नहीं आती। महात्मा गांधी ने किसानों को उचित परामर्श दिया है कि वे अपनी सामर्थ्य के अनुसार जितना लगान दे सकें उतना खुशी से दें। किन्तु एक ओर तो हमारे जमींदार इससे अधिक वसूल करने पर तुले हुए हैं, दूसरी ओर हमारे कार्यकर्ता, जिनमें कुछ बड़े-बड़े नाम भी हैं, महात्मा जी के आदेशों पर ध्यान न देकर किसान भाइयों को अपना शिकार बना रहे हैं। इन वीर पुरुषों में होड़-सी लगी हुई है कि कौन गर्म से गर्म बात कहकर जनता पर अपने नेतृत्व का सिक्का जमा दे। सच्चा लीडर हम उसे कहेंगे, जो देश को धर्म के रास्ते पर चलाए, जिसके कर्म और वचन में कोई अन्तर न हो, जो भीतर से भी वैसा ही हो, जैसा बाहर से।
बार-बार कहना कि हमें युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए, मानो समझौते की मुहलत केवल इसीलिए मिली है कि युद्ध की तैयारी की जाय, देश को धोखा देना है। देश को भारतीय चर्चिलों और रॉदरमियरों से बचाने की ज़रूरत है, वरना यह लोग स्वराज्य संग्राम को रक्तमय बना कर इसे बदनाम कर देंगे और संसार की सहानुभूति खो बैठेंगे। धर्म-युद्ध की जीत, धर्म को मज़बूत पकड़े रहने में है। जनता स्वयं विचार करने की शक्ति नहीं रखती। जनतंत्र में भी राष्ट्र की बागडोर गिने-गिनाये हाथों में ही रहती है। उसे जिस रास्ते पर लगाया जाय, उसी पर चलने लगती है। ज़रूरत है वातावरण को शान्त बनाने की। जहरीले वातावरण का परिणाम अभी हम कानपुर में देख चुके हैं। देश को जल की ज़रूरत है, अग्नि की नहीं। आग लगाकर जलाने के सिवा और क्या किया जा सकता है। क्रान्ति-क्रान्ति की दुहाई देकर, वक्तृताओं में हिंसा की पुट देकर, जोशीले और अदूरदर्शी कार्यकर्ताओं की पीठ ठोंककर, देश में जो आग लगाई जा रही है, उसका परिणाम अच्छा न होगा।
घरेलू युद्ध से घातक कोई युद्ध नहीं होता और उपद्रव हो जाने पर उससे अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाले, जलते हुए घरों से अपने हाथ सेंकने वाले कितने आदमी कहाँ से निकल आते हैं, यह हम सभी जानते हैं। हम देश को इस परिस्थिति से बचाना चाहते हैं, क्योंकि हमने अब तक जो कुछ किया है, शान्त रह कर ही किया है और आगे भी जो हमारी जीत होगी, वह अहिंसा ही के बल से होगी। हिंसा का भूत हमारे सिर सवार हुआ और हमारा सर्वनाश हुआ। केवल मौखिक अहिंसा से काम नहीं चल सकता। हमें मनसा, वाचा, कर्मणा अहिंसा का अनुयायी होना पड़ेगा। यह कहना कि हमारा सर्वनाश तो पहले ही हो चुका है, कानपुर उस सर्वनाश की ताज़ा मिसाल है। जो लोग उस नरमेध की आहुति बन गये हैं जिनका सर्वस्व लुट चुका है और आज जिन्हें रोटियों का सहारा नहीं, उनसे पूछो कि इस दशा और पूर्व दशा में क्या अन्तर है?
हमारा अपने किसान भाइयों से यही अनुरोध है कि वह महात्मा जी को अपना सच्चा नेता मानें और उनके बताये हुए मार्ग से जौ भर भी विचलित न हों। गरीबों और विचलितों का, महात्मा जी से बड़ा शुभचिन्तक संसार में दूसरा नहीं है। दूसरा कोई आदमी अगर उनसे कुछ और कहता है, तो उससे कह दें, कि पहले आकर हमारी तरह हल में जुतो, पसीना बहाओ, हमारी ही बिरादरी के एक अंग बन जाओ, तब हम तुम्हारी सुनेंगे। अपनी वकालत चलाने के लिए, आने वाले चुनाव में वोट लेने के लिए, अथवा अपनी व्यवसाय-वृद्धि के लिए हमारी खुशामद न करो। तुम टट्टी की आड़ से जो शिकार खेल रहे हो, उसे हम खूब जानते हैं। जो लोग महलों में रहते हैं, अमीरों की जिन्दगी बसर करते हैं, मोटर के नीचे एक कदम नहीं चल सकते, जिनको भोजन के लिए तर माल चाहिए, वह क्या जानें कि गरीबों पर क्या गुज़रती है। वह तो आग लगाकर चल देते हैं, घर जलते हैं गरीबों के। इस वक्त अगर हमारे किसान भाई सोच-विचार से काम न लेंगे और महात्मा जी के मार्ग से हट जायेंगे, तो उन्हें हमेशा के लिए पछताना पड़ेगा।
प्रकाशन इतिहास
[सम्पादकीय। 'हंस', जून, 1931 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-2 में संकलित।]
