Cover Image for Meri Raseeli Pustakein (मेरी रसीली पुस्तकें) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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संस्मरण•1933•8 मिनट

मेरी रसीली पुस्तकें

Meri Raseeli Pustakein

अपने अध्ययन-प्रेम और बचपन से लेकर युवावस्था तक मन को छू लेने वाली प्रिय पुस्तकों पर प्रेमचंद का आत्मीय और रोचक संस्मरण।

Work Details

प्रकार: संस्मरण
वर्ष: 1933
पठन समय: 8 मिनट (1,106 शब्द)

काशी नागरी प्रचारिणाों सभी के आभिनंदनीन्‍्सव में आचाय॑ ट्रिवेते जी ने एक ' आत्म निबदन! पढ़ा था। बह दनिक आज # कई अंचां में लगातार छपरा था। मरे । व, हक हा 8 पप हक आज _्‌ नो _ के [३ मे 9 ॥६ हः का ह+

यती' में भी यह प्रकाशन हुआ है) उसके एक अझ में आचार्य दिदा

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ने अपनो एक अप्रकादित स्सीली पूस्त के की चर्चा की है। उसके संबंध में इलोटीविड!

'भारत' के ता» हे । जून के अंक में श्री पं* कृष्णकांत मालबीय ने एक लेख लिखा है। उस लेख में द्विवेदी जी के प्रति उचित आदर-भाव दिखाने हुए उन्होंने द्विवेदी जी से कई महत्त्वपूर्ण प्रश्न पूछे हैं। आशा की जाती है कि आचार्य द्विवेदी जी उन प्रश्नों का उत्तर देने की कृपा करेंगे।

द्विवेदी जी ने आज से तीस चालीस साल पहले, ' तत्कालीन मित्रों' और सलाहकारों के 'चकमे' में आकर, 'रुपये के लोभ' से, एक ऐसी 'पद्मात्मक पुस्तक लिख डाली '--'' जिसके प्रत्येक पद्म से रस की नदी नहीं, तो बरसाती नाला बह रहा था ।'' उनके मित्रों ने ऐसी ही पुस्तक लिखने की सलाह दी थी, यथा-'' अजी कोई ऐसी किताब लिखो जिससे टके सीधे हों, जिसका नाम ही सुनकर ओर विज्ञापन मात्र ही पढ़कर खरीददार पाठक उस पर इस तरह टूटें जिस तरह गुड़ नहीं, बहते हुए ब्रण या गंदगी पर मक्खियों के झुंड के झुंड टूटत है।'' यही सलाह मानकर उन्होन जो पद्चबद्ध पुस्तक लिखी थी, आत्म-निवेदन म अपने बुद्‌ढे मुह के भीतर धसा हुई जुबान से उसका उल्लेख करते' उन्हें 'बड़ी लज्जा मालम हुईं', पर "पापों का प्रायडिचत करने के लिए' उन्होंने 'शुद्ध हृदय' से उसका नाम बताया -'सोहाग २०।'

'सोहाग रात' सभ्य मानव-समाज मे बहत शुभ मानी जातो ह। इसक लिए अच्छी साइत री जाती है। के प्रकार की मगलमय ठिधिया संपन्न की ज्ती हैं। मनुष्य के जीवन में 'सोहाग रात! का बट़ा भारी महत्त्व है। प्राचीन समाज शास्त्र में भी इसकी विशेष महत्ता बताई गई है! तप्म्तत्र में यह हे भी वैसी हो। जब स॑ समाज ने इसका महत्त्व भूला दिया तब से समाज निर्बन और निस्‍्तेज हो गया नाना प्रकार की बुगड़ण पैदा हो गह। लोगों का यह अनुणन हे कि जब से समाज में ब्राल विवाह की कृप्रधा जद पक्रल गई, तब से 'सोहाग रात” हा महत्त्व लुप्त हो गया। जब तक समाज मे परण वयस्क बर कन्या का गठजोड़ हाता रहा, तब नक यह बड़ी शुभ रस्म मानी जाती रही। आज भी जहां कही समाज में उपयुक्त बय का विवाह प्रचलित है. हा उसका आदर मान अवश्य हें संसार का प्राय: सभी सभ्य जातियों में '(साहाग सात के दाभ रीति पाई जाती हे। * समाज इसका महत्व भूल गया हो, तो साममह टिलापया जा कनत्य है कि वे समान को इसको महिमा बतानें। जिम प्रकार जीवन के सभी सम्जाण पा पूस्क लिखी गई है उसी प्रकए सोहाग गत गए थी जब द तो एजक फियओों आज सर का के गनित जीवन में जैसे वैवाहिक संस्वारए 37 संबा। अधिझ माच्च हैं तेस हो अल क ग्कीए गोल गत ये करेज “कक जे: हज अजय 70 बना सकती है। जिसकी ' रा लग राह परश हह निगाद बाली उसका तेव्राहक जावन शायद ही सुखभय हा न के लि

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प्रत्येक गृहस्थ के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक है। उसी का ज्ञान न होने से समाज में आज दिन अधिकतर पशुता का प्राबल्य हो गया है। ऐसी आवश्यक वस्तु का निर्माण करके भी द्विवेदी जी ने उसे पाप-कर्म केसे समझा?

यदि यह कहा जाय कि वह पद्चबद्ध पुस्तक अत्यंत अश्लीलतापूर्ण थी, तो इससे यह नहीं साबित होता कि 'सोहाग रात' लिखना पाप है। ब्रह्मचर्य-रक्षा पर भी कई अश्लील पुस्तकें मिलती हैं, तो इससे क्‍या 'ब्रह्मचर्य' विषय का महत्त्व घट गया? फिर यह भी नहीं कहा जा सकता कि हिन्दी में 'सोहाग रात' पुस्तक लिखकर कोई लेखक मालामाल हो जायगा। अगर द्विवेदी जी के कथनानुसार 'आजकल सोहाग रान का नाम बाजारू हो रहा है', तो यह वस्तुत: 'सोहाग रात' नहीं, 'कतल की रात' है। और यह किसी तरह संभव नहीं कि आज से तीस -चालीस वर्ष पहले भी द्विवेदी जो ने 'सोहाग रात' सरीखे महत्त्वपूर्ण विषय पर बाजारू ढंग की पुस्तक लिखी हो, क्योंकि उस समय भी वे हिन्दी-संसार कौ आवश्यकताओं से अपरिचित न थे। आरभ हो से उसमें सत्समालोचना की प्रवृत्ति भी उस समय भी समाज की दशा से अनभिज्ञ न थे। वे उन्‍नीसवीं सदी के अंतिम दस वर्षों में हिन्दी के सुपरिचित लेखक और कवि बन चुके थे। तब भी उन्होंने 'सोहाग रात' पर 'रस का पनाला' बहा डाला, यह सचमुच महान आश्चर्य का विषय है।

पंडित कृष्णकान्त जी मालवीय ने 'सोहाग रात' नाम से ही एक बहुत अच्छा पुस्तक लिखी है। उसकी भूमिका स्वर्गीय पंजाब-केसरी लालाजी ने लिखी है। अपने विषय की वह उत्तम पुस्तक है। समाज ने उसे अपनाया भी है, कितु बह 'बहल हुआ ब्रण' नहीं है, इसलिए पाठक उस पर ' मक्खियों के झुंड' की तरह न टूट सक। अब तक शायद उसके दो या तीन ही सस्करण हुए हैं। किंतु समाज की वर्तमान अवस्था के अनुसार उसके दर्जनों संस्करण होने चाहिये थे। इससे स्पष्ट है कि मालत्राय जी मालामाल न हो सके। आज हिन्दी का जैसा बोलबाला है, वैसा तीस चालीस वर्ष पहले न था। जब हिन्दी के अभ्युदय काल में 'साहाग रात' लिखकर पं* कृष्णकानत जी 'धनाधीश' न हो सके, तब भला हिन्दों के आर्रभक युग में द्विवेदी जी कैम यह कल्पना कर सके कि पुस्तक प्रकाशित होने पर उसे युक्तिपूर्वक बेचकर, वे ' माटर खरीदकर घूमने निकला करेंगे? उस जमाने में मोटर को कल्पना भी अद्भुव हा थी। संभव है द्विवेदी जी उस समय बंबई में रहने के ऋारण मोटर के सुख की कल्पना

करने में समर्थ हुए हों, पर उस समय हिन्दी पुस्तकों की जैसी थोड़ी खपत थी, उससे

भी तो द्विवेदीजी अवश्य ही कुछ परिचित रह होगे। ऐसी दशा में यह समझना कठिन है कि आचार्य द्विवेदी जी ने क्या सोचकर एसी कुछ बातें लिखीं, जिन्हें पढ़कर लांगा के मन में तरह-तरह की शंकाएं उत्पन्न हो रही हैं। पं* कृष्णकान्त जी ने अपने लख में जितने प्रश्न किये हैं, विश्वास है कि आचार्य द्विवेदी जी निश्चय हीं उनका संताषप्रद उत्तर देंगे, जिसके लिए सभी हिन्दी-प्रेमी बड़े उत्सुक हैं।


प्रकाशन इतिहास

[लेख। 'हंस', जून, 1933 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-3 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "मेरी रसीली पुस्तकें." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1933, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/meri-raseeli-pustakein. Accessed 22 Sep. 2026.