Cover Image for Bombay Ke Ek Magistrate Ka Bhram (बम्बई के एक मजिस्ट्रेट का भ्रम) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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सम्पादकीय•1931•1 मिनट

बम्बई के एक मजिस्ट्रेट का भ्रम

Bombay Ke Ek Magistrate Ka Bhram

शोलापुर दिवस मनाने पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं को दंड देने वाले बम्बई के मजिस्ट्रेट के तर्क का खंडन करते हुए प्रेमचंद अन्याय के विरुद्ध रोने और विरोध करने के स्वाभाविक अधिकार का समर्थन करते हैं।

Work Details

प्रकार: सम्पादकीय
वर्ष: 1931
पठन समय: 1 मिनट (119 शब्द)

बम्बई के चीफ प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट ने शोलापुर दिवस मनाने के अपराध में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को दण्ड देते हुए फैसले में एक बड़े मजे की बात कही है। वह यह कि इस दिवस के मनाने का अर्थ है, खूनियों को प्रोत्साहित करना। यह बिल्कुल गलत है। इसका अर्थ केवल यह है कि इन आदमियों को जो सज़ा दी गयी है, वह जनता की दृष्टि में ज़रूरत से कहीं ज्यादा कठोर है और नौकरशाही ने समस्त देश के मत को कुचलकर उन्हें फाँसी दी है। मारने का अख्तियार आपको है लेकिन रोने का अख्तियार मार खाने वालों को है। यह अधिकार आप उनसे छीन नहीं सकते।


प्रकाशन इतिहास

[सम्पादकीय। 'हंस', जनवरी 1931 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-2 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "बम्बई के एक मजिस्ट्रेट का भ्रम." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1931, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/bombay-ke-ek-magistrate-ka-bhram. Accessed 22 Sep. 2026.