बम्बई के चीफ प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट ने शोलापुर दिवस मनाने के अपराध में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को दण्ड देते हुए फैसले में एक बड़े मजे की बात कही है। वह यह कि इस दिवस के मनाने का अर्थ है, खूनियों को प्रोत्साहित करना। यह बिल्कुल गलत है। इसका अर्थ केवल यह है कि इन आदमियों को जो सज़ा दी गयी है, वह जनता की दृष्टि में ज़रूरत से कहीं ज्यादा कठोर है और नौकरशाही ने समस्त देश के मत को कुचलकर उन्हें फाँसी दी है। मारने का अख्तियार आपको है लेकिन रोने का अख्तियार मार खाने वालों को है। यह अधिकार आप उनसे छीन नहीं सकते।
प्रकाशन इतिहास
[सम्पादकीय। 'हंस', जनवरी 1931 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-2 में संकलित।]
