रंगीले बाबू का मूल पाठ
बाबू रसिकलाल को मैं उस वक्त से जानता हूँ, जब वह लॉ कॉलेज में पढ़ते थे। मेरे सामने ही वह वकील हुए और आनन-फानन चमके । देखते-देखते बँगला बन गया, जमीन खरीद ली, मोटर रख ली और शहर के रईसों में शुमार होने लगे, लेकिन मुझे न जाने क्यों उनके रंग-ढंग कुछ बहुत जँचते न थे। मैं यह नहीं देख सकता कि कोई भला आदमी ख़्वामख़्वाह टेढ़ी टोपी लगाकर निकले या सुरमा लगाकर, माँग निकालकर, मुँह को पान से फुलाकर, गले में मोतिया या बेले के गजरे डाले, तंजेब का चुन्नटदार कुरता और महीन धोती पहने बाजार में कोठों की ताक-झाँक करता, ठट्ठे मारता निकले। मुझे उससे चिढ़ हो जाती है। वह मेरे पास म्यूनिसिपल मेम्बरी के लिए वोट माँगने आये तो कभी न दूँ, उससे याराना निभाना तो दूर की वात है। भले आदमी को जरा गम्भीर, ज़रा सादगी-पसन्द देखना चाहता हूँ। मुझे अगर किसी मुकदमे में वकील करना पड़े तो मैं ऐसे आदमी को कभी न करूँ, चाहे वह रासबिहारी घोष. ही का-सा कानूनदाँ क्यों न हो। रसिकलाल इसी तरह के रुंगीले आदमी हैं। उनकी तर्क-शक्ति ऊँचे दरजे की है, मानता हूँ। जिरह भी अच्छी करते हैं, यह भी मुझे स्वीकार है, लेकिन सीधी टोपी लगाने और सीधी चाल चलने से उनकी वकालत कुछ ठंडी न पड़ जायगी। मेरा तो ख़्याल यह है कि बॉकपन छोड़कर भले आदमी बन जायें तो उनकी प्रैक्टिस दूनी हो सकती है, लेकिन अपने को क्या पड़ी है कि किसी की बातों में दखुल दें ? जब कभी उनका सामना हो जाता है तो मैं दूसरी ओर ताकने लगता हूँ या किसी गली में हो रहता हूँ। मैं सड़क पर उनसे बातें करना मुनासिब नहीं समझता। क्या हुआ वह नामी वकील हैं और मैं बेचारा स्कूल-मास्टर हूँ ? मुझे उनसे किसी तरह का द्वेष नहीं । उन्होंने मेरा क्या बिगाड़ा है जो मैं उनसे जलूँ ? मेरी तो वह बड़ी इज्जत और ख़ातिर करते हैं। अपनी लड़की की शादी में मैं उनसे दरियाँ और दूसरा सम्मान माँगने गया था। उन्होंने दो ठेले भर दरियाँ, कालीनें, जाजिम, चौकियाँ, मसनदें भेज दीं। नहीं, मुझे उनसे जरा भी द्वेष नहीं-बहुत दिनों के परिचय के नाते मुझे उनसे स्नेह है, लेकिन उनका यह बॉँकपन मुझे नहीं अच्छा लगता। वह चलते हैं तो ऐसा जान पड़ता है, जैसे दुनिया को ललकारते चलते हों-देखूँ, मेरा कोई क्या कर सकता है ? मुझे किसी की परवाह नहीं है। एक बार मुझे स्टेशन पर मिल गये। लपककर मेरे कन्धे पर हाथ ही तो रख दिया-““आप तो मास्टर साहब, कभी नजर ही नहीं आते, कभी भला साल में एक-आध बार तो दर्शन दे दिया कीजिए ।” मैंने अपना कन्धा छुड़ाते हुए कहा, “क्या करें साहब, अवकाश ही नहीं मिलता ।”” बस, आपने चट एक बाजारी शेर पढ़ा :
तुम्हें गैरों से कब फुरसत?
हम अपने गम से कब फुरसत,
चलो, बस हो चुका मिलना
न तुम खाली न हम खाली।
मेंने हँस तो दिया-जो आदमी अपना लिहाज करे, उससे कोई कैसे रुखाई करे ? फिर बड़े आदमियों से बिगाड़ करना भी नहीं चाहता, न जाने कब अपनी गरज लेकर उनके पास जाना पड़े-लेकिन मुझे उनकी यह बेतकल्लुफ़ी कुछ अच्छी न लगी। यों मैं न कोई तपस्वी हूँ, न जाहिद। अरसिक होना उस बॉकपन से भी बुरा है। शुष्क जीवन भी कोई जीवन है, जिसमें विनोद के लिए स्थान न हो ? वन की शोभा हरे-भरे. सरस वृक्षों से है, सूखे हुए ढूँठों से नहीं, लेकिन मैं चाहता हूँ, आदमी जो कुछ करे छिपाकर करे। शराब पीना चाहते हो, पियो. मगर पियो एकान्त में | इसकी क्या जरूरत कि शराब में मस्त होकर बहकते फिरो ? रूप क॑ उपासक बनना चाहते हो, बनो | लेकिन इसकी क्या जरूरत है कि वेश्याओं को दायें-बायें बैठाये मोटर में अपने छैलपन का ढिंढोरा पीटते फिरो ? फिर, रसिकता की भी एक उम्र होती है। जब लड़के जवान हो गये, लड़कियों की शादी हो गई, बाल पक चले, तो मेरे ख्याल में आदमी को कुछ गम्भीर हो जाना चाहिए। आपका दिल अभी जवान है, बहुत अच्छी बात है, मैं तुम्हें इस पर बधाई देता हूँ। वासना कभी बूढ़ी नहीं होती, मेरा तो अनुभव है कि उम्र के साथ-साथ वह भी प्रौढ़ होती जाती है, लेकिन इस उम्र में कुलेलें करना मुझे ओछापन मालूम होता है। सींग कटाकर बछड़ा बनने वाली मनोवृत्ति का मैं कायल नहीं। कोई किसी का क्या कर लेगा ? लेकिन चार भले आदमी उँगली उठायें, ऐसा काम क्यों करो ? तुम्हें भगवान ने सम्पन्न बनाया है, बहुत अच्छी बात है, लेकिन अपनी सम्पन्नता को इस विपन्न संसार में दिखाते फिरना, जो क्षुधा से व्याकुल हैं उनके सामने रसगुल्ले उड़ाना, इसमें न तो रसिकता है, न आदमियत। रसिकलाल की बड़ी लड़की का विवाह था। मथुरा से बारात आयी थी। ऐसे ठाठ की
बारात यहाँ शायद ही कभी आयी हो। बड़ी धर्मशाला में जनवासा था। वर का पिता किसी रियासत का दीवान था। मैं भी बारातियों की सेवा-सत्कार में लगा हुआ था। एक हजार आदमी से कम न थे। इतने आदमियों का सत्कार करना हँसी नहीं है। यहाँ तो किसी बरात में सौ-पचास आदमी आ जाते हैं तो उनकी भी अच्छी तरह ख़ातिर नहीं हो पाती। फिर बारातियों के मिजाज का क्या कहना। सभी तानाशाह बन जाते हैं। कोई चमेली का तेल माँगता है, कोई आँवले का; कोई केशरंजना, कोई शराब माँगता है; कोई अफीम ! साबुन चाहिए, इत्र चाहिए। एक हजार आदमियों के खाने का प्रबन्ध करना कितना कठिन है। मैं समझता हूँ, बीस-पच्चीस हज़ार के वारे-न्यारे हुए होंगे, लेकिन रसिकलाल के माथे पर शिकन न आयी। वही बाँकपन था, वही विनोद, वही बेफ़िक्री । न झुँअलाना, न बिगड़ना। बारातियों की ओर से ऐसी-ऐसी बेहूदा फरमाइशें होती थीं कि हमें गुस्सा आ जाता था। पाव-आध-पाव भंग बहुत है, यह पंसेरी भर भंग लेकर क्या उसकी धूनी देंगे ? जब सिनेमा के एक सौ अव्वल दरजे के टिकटों की फ्रमायश हुई तो मुझसे न रहा गया। रसिकलाल को खूब डॉट बताई, और उसी क्रोध में जनवासे की ओर चला कि एक-एक को फटकारूँ। लड़के का ब्याह करने आये हैं या किसी भले आदमी की इज्जत बिगाड़ने ? एक दिन बगैर सिनेमा देखे नहीं रहा जाता ? ऐसे ही बड़े शौकीन हो तो जेब से पैसे क्यों नहीं खर्च करते ? लेकिन रसिकलाल खड़े हँस रहे थे। भाईसाहब, क्यों इतना बिगड़ रहे हो ? ये लोग तुम्हारे मेहमान हैं, मेहमान दस जूते भी लगाए तो बुरा न मानिए। यह सब जिन्दगी के तमाशे हैं। तमाशे में हम खुश होते जाते हैं, वहाँ रोना भी पड़े तो उसमें आनन्द है। लपककर सिनेमाघर से सौ टिकट ला दीजिए, सौ-दो-सौ रुपये का मुँह न देखिए। मैंने मन में कहा, मुफ़्त का धन बटोरा है तो लुटओ और नाम लूटो। यह कोई सत्कार नहीं है कि मेहमान की गुलामी की जाय। मेहमान उसी वक्त तक मेहमान है, जब वह मेहमान की तरह रहे। जब वह रौब जमाने लगे, बेइज्जती करने पर आमादा हो जाय, तो वह मेहमान नहीं, शैतान है।
इसके तीन महीने बाद सुना कि रसिकलाल का दामाद मर गया, वही जिसकी नयी शादी हुई थी। सिविल सर्विस के लिए इंग्लैण्ड गया हुआ था। वहीं न््यूमोनिया हो गया। यह ख़बर सुनते ही मुझे रोमांच हो आया। उस युवक की सूरत आँखों में दौड़ गई । कितना सौम्य, कितना प्रतिभाशाली लड़का था और मरा जाकर इंग्लैंड में कि घर वाले देख भी न सके। और उस लड़की की क्या दशा होगी, जिसका सर्वनशा हो गया ? अभी हाथ की मेहंदी भी तो न छूटी थी। चुन्दरी भी तो अभी मैली नहीं हुई | वाह रे दयालु भगवान ! और वाह रे तुम्हारी लीला ! प्राणियों की होली बनाकर उसकी लपटों का तमाशा देखते हो। उसी वक्त भागा हुआ रसिकलाल के पास गया और उनकी सूरत देखते ही मन की कुछ ऐसी दशा हुई कि चिंघाड़ मार कर रो' पड़ा। रसिकलाल आरामकरर्सी पर लेटे हुए थे। उठकर मुझे गले लगा लिया और उसी स्थिर, अविचलित, निर्दद्ध भाव से बोले, “वाह मास्टर साहब, आपने तो बालकों को भी मात कर दिया, जिनकी मिठाई कोई छीनकर खा जाय तो रोने लगते हैं ! बालक तो इसलिए रोता है कि उसके बदले में दूसरी मिठाई मिल जाय। आप तो ऐसी चीज़ के लिए रो रहे हैं जो किसी तरह मिल ही नहीं सकती। अरे साहब, यहाँ बेहया बनकर रहिए। मार खाते जाइए और मूँछों पर ताव देते जाइए। मजा तो तब है कि जल्लाद के पैरों-ले आकर भी वही अकड़ बनी रहे ! अगर ईश्वर है, मुझे तो कुछ मालूम नहीं, लेकिन सुनता हूँ कि वह दयालु है और दयालु ईश्वर भला निर्दयी कैसे हो सकता है? वह किसे मारता है, किसे जिलाता है, हमसे मतलब नहीं । उसके खिलीने हैं, खेले या तोड़े, हम क्यों उसके बीच में दखल दें ? वह हमारा दुमन नहीं, न जालिम बद्धाह है कि हमें सताकर खुश हो। मेरा लड़का घर में आग भी लगा दे तो मैं उसका दुश्मन न बनूँगा। मैंने तो उसे पाल-पोसकर बड़ा किया है, उससे कया दुमनी करूँ? भला ईश्वर कभी निर्दयी हो सकता है, जिसके प्रेम का स्वरूप यह ब्रह्माण्ड है ? अगर ईश्वर नहीं है, मुझे मालूम नहीं, और कोई ऐसी शक्ति है, जिसे हमारी विपत्ति में आनन्द मिलता है तो साहब यहाँ रोने वाले नहीं। हाथों में ताकत होती और दुश्मन नज़र आता तो हम भी कुछ जवॉमर्दी दिखाते। अब अपनी बहादुरी दिखाने का इसके सिवा और कया साधन है कि मार खाते जाओ और हँसते जाओ, अकड़ते जाओ ! रोये तो अपनी हार को स्वीकार करेंगे। मार ले साले, जितना चाहे मार ले, लेकिन हँसते ही रहेंगे। मक्कार भी है, जादूगर भी | छिपकर वार करता है। आ जाय सामने तो दिखाऊँ। हमें तो अपने उन बेचारे शायरों की अदा पसन्द है जो कृब्र में भी माशूक के पाज़ेब की झंकार सुनकर मस्त होते रहते हैं।
इसके बाद रसिकलाल ने उर्दू शेरों का ताँता बाँध दिया और इस तरह तन्मय होकर उनका आनन्द उठाने लगे, मानो कुछ हुआ ही नहीं है। फिर वोले, “लड़की रो रही है। मैंने कहा, ऐसे बेवफा के लिए क्या रोना जो तुम्हें छोड़कर चल दिया ! अगर उससे प्रेम है तो रोने की कोई जरूरत नहीं ! प्रेम तो आनन्द की वस्तु है। अगर कहो, क्या करें दिल नहीं मानता, तो दिल को मनाओ। बस, दुःखी मत हो । दुःखी होना ईश्वर का अपमान करना है, और मानवता को कलंकित करना |”
मैं रसिकलाल का मुँह ताकने लगा। उन्होंने यह कथन कुछ ऐसे उदात्त भाव से किया कि एक क्षण के लिए मुझ पर भी उसने जादू कर दिया। थोड़ी देर के बाद मैं वहाँ से चला तो दिल का बोझ बहुत-कुछ हलका हो गया था। मन में एक प्रकार का ताहस उदय हो गया था जो विपत्ति और बाधा पर हँस रहा था।
थोड़े दिनों के बाद वहाँ से तवादला हो गया और रसिकलालजी की कोई ख़बर नहीं मिली । कोई साल भर के बाद एक दिन गुलाबी लिफाफे पर सुनहरे अक्षरों में छपा हुआ एक निमन्त्रण-पत्र मिला। रसिकलाल के बड़े लड़के का विवाह हो रहा था। नवेद के नीचे कुलम से आग्रह किया गया था कि अवश्य आइए, वरना मुझे आपसे बड़ी शिकायत रहेगी। आधा मजा जाता रहेगा। एक उर्दू का शेर भी था- इस शौके फिरावाँ की या रब, आखिर कोई हद भी है कि नहीं; इन्कार करे वह या वादा, हम रास्ता देखते रहते हैं।
एक सप्ताह का समय था। मैंने नयी रेशमी अचकन बनवाई, नये जूते खरीदे और खूब बन-ठनकर चला। वधू के लिए एक अच्छी-सी कशमीरी साड़ी ले ली। महीनों एक जगह रहते-रहते और एक ही काम करते-करते मन कुछ कुण्ठित-सा हो गया था। तीन-चार दिन खूब जलसे रहेंगे, गाने सुनूँगा, दावतें उड़ाऊँगा। मन बहाल हो जाएगा। रेलगाड़ी से उतरकर वेटिंग रूम में गया और अपना नया सूट पहना । बहुत दिनों बाद नया सूट पहनने की नौबत आई थी, पर आज भी मुझे नया सूट पहनकर वही खुशी हुई जो लड़कपन में होती थी। मन कितना ही उदास हो, नया सूट पहनकर हरा > जाता है। मैं तो कहता हूँ, बीमारी में बहुत-सी दवाएँ न खाकर हम नया सूट बनवा लिया करें तो कम-से-कम उतना फायदा तो ज़रूर ही होगा जितना दवा खाने से होता है। क्या यह कोई बात ही नहीं कि जरा देर के लिए आप अपनी ही आँखों में कुछ ऊँचे हो जायें ? मेरा अनुभव तो यह कहता है कि नया सूट हमारे अन्दर एक नया जीवन डाल देता है, जैसे साँप केंचुल बदले या वसन्त में वृक्षों में नयी कोंपलें निकल आयें।
स्टेशन से निकलकर मैंने ताँगा लिया और रसिकलाल के द्वार पर पहुँचा। तीन बजे होंगे। लू चल रही थी। मुँह झुलसा जाता था। द्वार पर शहनाइयाँ बज रही थीं। बन्दनवारे बँधी हुई थीं। ताँगे से उतरकर अन्दर के सहन में पहुँचा। बहुत से आदमी आँगन के सहन के बीच में घेरा बाँधे खड़े थे। मैंने समझा कि शायद जोड़े-गहने की नुमाइश हो रही होगी। भीड़ चीरकर घुसा-बस कुछ न पूछो, क्या देखा, जो ईश्वर सातवें बैरी को भी न दिखाए। अर्थी थी, पक्के काम के दोशाले से ढकी हुई, जिस पर फूल बिखरे हुए थे। मुझे ऐसा मालूम हुआ कि गिर पडूँगा।
सहसा रसिकलाल पर मेरी निगाह पड़ गयी। रंगीन कपड़ों का एक गट्टर लिये अन्दर से आये थे। न आँखों में आँसू, न मुख पर वेदना, न माथे पर शिकन। वही बाँकी टोपी थी, वही रेशमी कुरता, वही महीन तंजेब की धोती। सब रो रहे थे, कोई आँसुओं के वेग को रोके हुए था, कोई शोक से विहल ! ये बाहर के आदमी थे। कोई मित्र था, कोई बन्धु और जो मरने वाले का बाप था, वह इन डगमगाने वाली नौकाओं और जहाजों के बीच में स्तम्भ की भाँति खड़ा था। मैं दौड़कर उनके गले से लिपटकर रोने लगा। वह पानी की बूँद, जो पत्ते पर रुकी हुई थी, जरा-सी हवा पाकर ढ्वुलक पड़ी।
रसिकलाल ने मुझे गले से लगाते हुए कहा, “आप कब आये ? कया अभी चले आ रहे हैं? वाह, मुझे ख़बर ही न हुई। शादी की तैयारियों में ऐसा फँसा कि मेहमानों की ख़ातिरदारी भी न कर सका। चलकर कपड़े उतारिए, मुँह-हाथ धोइए । अभी बारात में चलना पड़ेगा। पूरी तैयारी के साथ् चलोगे। बैण्ड, बीन, ताशा, शहनाई, नगाड़ा, डफली सभी कुछ साथ होंगे। कोतल घोड़े, हाथी सवारियाँ सब कुछ मँगवाई हैं। आतिशवाजी, फूलों के तख्त, खूब धूम से चलेंगे। जेठे लड़के क व्याह है, खूब दिल खोलकर करेंगे। गंगा के तट पर जनवासा होगा ।”
इन शब्दों में शोक की कितनी भयंकर, कितनी अथाह वेदना थी ! एक कुहराम मच गया। “ रसिकलाल ने लाश के सिर पर बेलों का मौर पहनाकर कहा, “क्या रोते हो भाइयो यह कोई नयी बात नहीं हुई है। रोज ही तो यह तमाशा देखते हैं, कभी अपने घर में, कर्भ दूसरे के घर में। रोज़ ही तो रोते हो, कभी अपने दुख से, कभी पराये दुख से । कौन तुम्हा रोने की परवाह करता है, कौन तुम्हारे आँसू पोंछता है, कौन तुम्हारी चीत्कार सुनता है? तु रोये जाओ, वह अपना काम किये जायेगा। फिर रोकर क्यों अपनी दुर्बलता दिखाते हो उसकी चोटों को छाती पर लो और हँसकर दिखा दो तुम ऐसी चोटों की परवाह नहीं करते उससे कहो, तेरे अस्त्रालय में जो सबसे घातक अस्त्र हो वह निकाल ला। यह कर सुइया-सी चुभोता है ? पर हमारी कोई दलील नहीं सुनता। न सुने ! हम भी अपनी अक न छोड़ेंगे। उसी धूम-धाम से बारात निकालेंगे, खुशियाँ मनायेंगे।
रसिकलाल रोध तो और लोग भी उन्हें समझाते | इस विद्रोहभरी ललकार ने सबद स्तम्भमित कर दिया। समझाता कौन ? हमें वह ललकार विक्षिप्त वेदना-सी जान पड़ी आँसुओं से कहीं मर्मान्तक थी। चिनगारी के स्पर्श से आबले पड़ जाते हैं। दहकती आग में पाँव पड़ जाय तो भुन जायगा, आबले न पड़ेंगे। रसिकलाल की वेदना वही दहक हुई आग थी।
लाश मोटर पर रखी गयी। मोटर गुलाब के फूलों से सजाया गया था। किसी ने पुकारा, “राम नाम सत्य है !”
रसिकलाल ने उसे विनोदभरी आँखों से देखा, “तुम भूले जाते हो, लाला। यह विवाह का उत्सव है। हमारे लिए सत्य जीवन है, उसके सिवा जो कुछ है, मिथ्या है।”
बाजे-गाजे के साथ बाराज चली। इतना बड़ा जुलूस तो मैंने शहर में नहीं देखा। विवाह के जुलूस में दो-चार सौ आदमियों से ज़्यादा न होते। इस जुलूस की संख्या लाखों से कम न थी। धन्य हो रसिकलाल ! धन्य तुम्हारा कलेजा ! रसिकलाल उसी बाँकी अदा से मोटर के पीछे घोड़े पर सवार चले जा रहे थे। जब लाश चिता पर रखी गयी तो रसिकलाल ने एक बार जोर से छाती पर हाथ मारा। मानवता ने विद्रोही आत्मा को आन्दोलित किया, पर दूसरे ही क्षण उनके मुख पर वही कठोर मुस्कान चमक उठी। मानवता वह थी या यह, कौन कहे ?
उसके दो दिन बाद मैं नौकरी पर लौट गया। जब छुट्टियाँ होती हैं तो रसिकलाल से मिलने आता हूँ। उन्होंने उस विद्रोह का एक अंश मुझे भी दे दिया है। अब तो कोई उनके आचार-व्यवहार पर आक्षेप करता है तो मैं केवल मुस्करा देता हूँ।
[प्रथम प्रकाशन हिन्दी में। “भारत”, अर्द्ध-साप्ताहिक, गुरुवार, 20 जनवरी, 1933 में प्रकाशित । प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य” भाग-1 में संकलित |]
रंगीले बाबू का सारांश
'रंगीले बाबू' मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित एक अत्यंत प्रभावशाली, दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक गहराई से परिपूर्ण कहानी है। कहानी का कथावाचक एक सादगी-पसंद स्कूल-मास्टर है, जो बाबू रसिकलाल को उनके छात्र जीवन से जानता है। रसिकलाल एक बेहद सफल और धनी वकील बन चुके हैं। उनका जीवन-ढंग अत्यंत रंगीला, छैल-छबीला और बाँकपन से भरा है—टेढ़ी टोपी, महीन चुन्नटदार कुरता, इत्र-फुलेल और विलासिता। कथावाचक को उनका यह बाह्य दिखावा और छिछोरापन पहले बिल्कुल पसंद नहीं आता था, यद्यपि रसिकलाल कथावाचक का अत्यधिक सम्मान करते थे।
रसिकलाल की बड़ी पुत्री के विवाह में जब बारातियों की अनुचित फरमाइशों और नखरों से मास्टर साहब क्षुब्ध हो उठते हैं, तब रसिकलाल मुस्कुराते हुए कहते हैं कि यह सब जीवन का तमाशा है और मेहमानों के हर नखरे को सहज भाव से लेना चाहिए। विवाह के महज तीन महीने बाद समाचार मिलता है कि रसिकलाल का होनहार दामाद, जो आई.सी.एस. की तैयारी के लिए इंग्लैंड गया था, वहाँ न्यूमोनिया से असमय काल-कवलित हो गया। मास्टर साहब व्यथित होकर रसिकलाल के घर पहुँचते हैं और दहाड़ मारकर रो पड़ते हैं। किंतु रसिकलाल पूरी तरह अविचलित और शांत रहते हैं। वे कहते हैं कि नियति के प्रहारों के आगे रोना अपनी दुर्बलता और पराजय स्वीकार करना है; मनुष्य की असली वीरता इसी में है कि वह मार खाते हुए भी मूँछों पर ताव देता रहे और मुस्कुराकर विपत्ति को ललकारे।
लगभग एक वर्ष बाद रसिकलाल के ज्येष्ठ पुत्र के विवाह का निमंत्रण पाकर मास्टर साहब उनके शहर पहुँचते हैं। घर के बाहर शहनाई बज रही होती है और वंदनवार बँधे होते हैं। किंतु आँगन में पहुँचते ही मास्टर साहब स्तब्ध रह जाते हैं—वहाँ विवाह के जोड़े के बजाय रसिकलाल के जवान बेटे का शव दोशाले में लिपटा रखा था। पूरा परिवार और मित्रगण रो रहे थे, किंतु रसिकलाल उसी रंगीली वेशभूषा में बाहर आते हैं। वे अपने मृत पुत्र के सिर पर मौर बाँधते हैं और घोषणा करते हैं कि वे रोकर नियति के सामने घुटने नहीं टेकेंगे, बल्कि अपने बेटे की अंतिम यात्रा को बारात की तरह धूमधाम और बाजे-गाजे के साथ निकालेंगे। गुलाब के फूलों से सजी मोटर पर शव रखकर और स्वयं घोड़े पर सवार होकर रसिकलाल लाखों लोगों के विशाल जुलूस के साथ गंगा तट की ओर बढ़ते हैं। चिता पर शव रखते समय एक पल के लिए पिता की वेदना उमड़ती है, किंतु अगले ही क्षण वे पुनः वही कठोर मुस्कान ओढ़ लेते हैं। रसिकलाल के इस विद्रोही संकल्प और अदम्य साहस को देखकर कथावाचक का दृष्टिकोण पूरी तरह बदल जाता है।
प्रकाशन इतिहास
यह कहानी सर्वप्रथम हिंदी अर्द्ध-साप्ताहिक पत्रिका भारत में 20 जनवरी 1933 को प्रकाशित हुई थी। बाद में यह प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य (भाग-1) में संकलित की गई।
महत्त्व और विषय-विमर्श
- नियति और मृत्यु के विरुद्ध विद्रोही जिजीविषा: रसिकलाल का चरित्र केवल एक शौकीन वकील का नहीं, बल्कि नियति के क्रूरतम आघातों के सम्मुख अडिग खड़े रहने वाले एक दार्शनिक योद्धा का है। वे शोक के सम्मुख घुटने टेकने के बजाय उत्सव मनाकर और मुस्कुराकर मृत्यु को ललकारते हैं।
- शोक और वेदना की पराकाष्ठा का मनोवैज्ञानिक चित्रण: प्रेमचंद ने दर्शाया है कि अत्यधिक गहरा दुख केवल आँसुओं में नहीं बहता, बल्कि कभी-कभी वह एक विद्रोही, अस्वाभाविक मुस्कान और कठोरता का रूप ले लेता है, जो साधारण रुदन से कहीं अधिक मर्मान्तक और दहकती हुई आग के समान होता है।
- बाह्य छैल-छबीलेपन के भीतर का जीवन-दर्शन: जिसे दुनिया केवल 'रंगीलापन', फूहड़ बाँकपन या दिखावा समझती है, उसके पीछे जीवन के प्रति एक निर्भीक और निस्पृह दृष्टिकोण हो सकता है, जो संसार को केवल एक 'तमाशा' मानकर हर दुख-सुख को स्वीकार करता है।
- कथावाचक के दृष्टिकोण में आंतरिक रूपांतरण: शुरुआत में रसिकलाल के दिखावे और आचरण की आलोचना करने वाला कथावाचक अंत में उनके असीम आत्मबल, साहस और विद्रोही दर्शन से गहराई से प्रभावित होकर उनका प्रशंसक बन जाता है।
- कहानी का व्यापक महत्त्व: 'रंगीले बाबू' प्रेमचंद के कथा-संसार की एक अत्यंत अद्वितीय कहानी है। यह मानवीय गरिमा, मृत्यु के प्रति विद्रोही चेतना और जीवन के अंतिम सत्य के सम्मुख मनुष्य की अडिग इच्छाशक्ति का अमर आख्यान प्रस्तुत करती है।
