फौजों को भारतीय बनाने के लिए फौजी अफसरों की जरूरत है और अफसरों की फौजी तालीम के लिए एक कालेज होना चाहिए। वैसे ही एक कालेज बनाने की स्कीम तैयार करने के लिए एक कमेटी बनायी गयी थी, जिसके सभापति भारत के फौजी लाट थे। उस कमेटी ने अब अपनी रिपोर्ट प्रकाशित कर दी है। उसे देखकर हमें निराशा हुई। लाट साहब साठ अफसर प्रतिवर्ष उस विद्यालय से निकालना चाहते हैं। कमेटी के गैर-सरकारी सदस्य उस संख्या को एक सौ बीस तक ले जाते हैं। भारत में चार हजार फौजी अफसर हैं। इस हिसाब से यदि बीच में कोई अंग्रेज अफसर न लिया जाय, तो इतने अफसरों के तैयार करने में पैंतीस वर्ष लग जायेंगे। और लाट साहब की संख्या के हिसाब से सत्तर वर्ष। इससे तो यही साबित होता है कि सरकार अपने फौजी आधिपत्य की अवधि को अधिक से अधिक बढ़ाना चाहती है।
जिन दिनों योरोप में लड़ाई हो रही थी, युवकों को चंद हफ्ते कवायद सिखाकर काम पर भेज दिया जाता था, और वहाँ वे अफसर बड़ी योग्यता से अपना काम करते थे। कम से कम उनके विरुद्ध कोई शिकायत नहीं सुनी गयी। पर भारत में चार हजार फौजी अफसर तैयार करने में पैंतीस या सत्तर वर्ष लगते हैं! इससे सरकार की नीयत साफ जाहिर होती है। हम पूछते हैं, हमें चार हजार अफसरों की जरूरत ही क्या है? जब हमारी देश-रक्षा का भार हमारे ऊपर होगा, तो हम निश्चय कर लेंगे कि हमें इससे कम अफसरों की जरूरत है, या ज्यादा। इतने ही खर्च में हम ऐसे-ऐसे दो विद्यालय खोल सकते हैं और पैंतीस वर्ष में जो काम होगा, उसे सत्रह वर्षों में पूरा कर सकते हैं।
हमारा तो ख्याल है कि फौजी कालेज के अलग होने की जरूरत नहीं। हमारे विद्यालयों में जैसे साइंस का प्रबन्ध है, वैसे ही फौजी तालीम का भी प्रबन्ध हो सकता है। पहाड़ खोदकर चुहिया निकालना हमारी सरकार की पुरानी नीति है। खैर, हमें यही खुशी है कि कई कमीशनों और कमेटियों के बाद यह नौबत तो आयी। अब यह देखना है कि इस रिपोर्ट को कार्य रूप में लाने में कितना समय लगता है। रिपोर्ट में 1932 से कालेज खोल देने की बात कही गयी है। देखिए।
प्रकाशन इतिहास
[सम्पादकीय। 'हंस', सितम्बर, 1931 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-3 में संकलित।]
