Cover Image for Hindustani Relon Ki Sath-Sala Tarikh (हिन्दुस्तानी रेलों की साठ-साला तारीख) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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लेख•1915•12 मिनट

हिन्दुस्तानी रेलों की साठ-साला तारीख

Hindustani Relon Ki Sath-Sala Tarikh

सन् 1854 में लॉर्ड डलहौजी के काल से लेकर भारतीय रेल के 60 वर्षों के ऐतिहासिक विकास, विस्तार और देश की अर्थव्यवस्था पर उसके नफ़े-नुकसान का मुंशी प्रेमचंद कृत सारगर्भित ऐतिहासिक लेख।

Work Details

प्रकार: लेख
वर्ष: 1915
पठन समय: 12 मिनट (1,764 शब्द)

हिन्दुस्तान में पहली रेलवे लाइन 854 में कायम हुई। उस वक्त लार्ड डलहौज़ी-गवर्नर - जनरल थे। कोर्ट आफ डायरेक्टर्स ने पहले हिन्दुस्तान के मुख्तलिफ सूबाजात को रेलवे लाइन के ज़रिए से मिला देने क॑ खयाल को तवहहुम-आमेज़ ( भ्रान्त -काल्पनिक ) समझा। उनके खयाल में मुल्क की जुगराफी ( भौगोलिक ) हालत इस तजवीज़ ( प्रस्ताव) की माने (बाधक) थी, मगर लार्ड डलहौज़ी ने फौरन देख लिया, ये तजबीत्तें सरासर क़ाबिले-अमल हैं। उन्होंने एक यादगारी मरासले (पत्र) में रेलवे लाइनों का एक खाका पेश किया। मौजूदा शानदार रेलों का सिलसिला जो 34656 मील तक फंला हुआ है, लार्ड ममदृह की पॉलिसी का मुबारक नतीजा है। उन लोगों में से, जिहोंने रेल को पहली लाइन को, जो 854 ई« में होड़ा और पाण्डवा के दरम्यान कायम हुई ओर जिसका फासला कुल 37.5 मील था देखा, शायद बहुत कम आदमियों को इस हैरतअंगेज तरक्की का खयाल हुआ होगा, लेकिन मिस्टर हैनरी इलियट ने, जो गवर्नर- जनरल के प्राइवेट सेक्रेटरी थे और जिन्होंने अहदे-इस्लाम (इस्लामी युग) की एक जामे (ठोस) तारोख (इतिहास) तस्नीफ़ की है, (लिखी) उसके बारे में लिखा हे कि रेलवे हिन्दुस्तान के लिए वो कर दिग्बाएगी जो शानदार अकबर भी न कर सकका। वो हिन्दुस्तान को एक-मुन्तहिद (संयुक्त) कौम बना देगी। नताइज (परिणाम) बतला रहे हैं कि सर हैनरी इलियट का खयाल हक बजानिब (सत्य) था।

खास गवर्नमेंट को रेलवे को अमली फवाइद (लाभ) का बहुत ही जल्द सबूत मिला। 857 की बगावत में फौजों की नकल व हरकत (यातायात) से बहुत बड़ी

मदद मिली, जिससे यह गदर जल्द ही फरू (ख़त्म) हो गया। मुख्तलिफ असबाब (कारण) के बाइस इब्तिदअन (शुरू में) रेलवे तामीर (निर्माण) में मसारिफ (खर्च) बहुत ज़्यादा हुए और गवर्नमेंट की ज़मानत पहले सरमायादार लोग रुपया लगाने में ताम्मुल करते थे (बचते थे)। आखिर गवर्नमेंट को नफा की एक मुकररा शरह (दर) की जमानत करनी पड़ी। मगर चूंकि रेलों की आमदनी से यह आमदनी पूरी न होती थी, इसलिए गवर्नमेंट को हमेशा दूसरे ज़राए (साधनों) से यह नुकसान पूरा करना पड़ता था। हत्ताकि (यहां तक कि) 860 ई० में यह रकम डेढ़ करोड़ रुपये तक जा पहुंची। इसलिए साथ ही खारजी (विदेशी) तिजारत ने भी हैरतअंगेज़ तरक्की की। पहली रेलवे लाइन खुलने के तीन साल के अंदर दरआमद व बरआमद (आयात- निर्यात) की मिकदार बत्तीस से नवासी करोड़ हो गई और 93 ई० में इसका तख्मीना चार अरब और पिहचत्तर करोड़ रुपये था। तिजारत की इस शानदार तरक्की ने आम महासिल (करों) में भी इज़ाफा कर दिया। मौजूदा नफा गोया उन इब्तिदाई नुक्सानात ( हानियों) का मुआवज़ा है जो गवर्नमेंट को जरे-नफा (नफे की रकम) की तौर पर देने पड़े थे। इस इंतज़ाम में एक बड़ा नुक्स यह था कि जिन लोगों ने रुपये लगाए थे, उन्हैं गवर्नमेंट से अपना नप्मा मिल जाता था, इसलिए इखराजात (खर्चों) में तत्लफीफ (कमी ) या किफायत की जरूरत ही उनको महसूस न होती थी। बिल आखिर (अन्ततः:) इस सिलसिला-ए-इंतज़ाम मे इतनी कबाहतें (कठिनाइयां) पैदा हुई कि गवर्नमेंट ने खुद अपनी मिल्कियत और इंतज़ाम में रेलवे लाइन को चलाने की पॉलिसी अख्तियार की। सरमायेदार लोग अब भोी बगैर गवर्नमेंट की ज़मानत के रुपया निकालते हुए डरते थे, इसलिए रेलों की तामीर (निर्माण) को रफ्तार सुस्त रही। आखिर 869 में गवर्नमेंट ने रेलों को अपनी मिल्कियत बनाकर इस कज़िए (विवाद) का फेसला कर दिया।

इसके छ: साल बाद रेल का सालाना सर्फ -ए-तामीर (निर्माण-व्यय ) चार करोड़ तक बढ़ा दिया गया, लेकिन कहत (अकाल) और जंग ने एक दूसरी ही तदबीर की ज़रूरत पैदा की। पहले रेलें नैरो-गेज नमूने की थीं। अब उनक चोड़ा करने ऋी जरूरत महसूस हुई और एक नया इंतज़ाम जारी किया गया, जिसके मुताबिक सरकारी लाइनें सौदागरों के इंतजाम में दे दी गईं, मगर इस नये इंतज़ाम में भी वही भकाइस (दोष) मौजूद थे, जो पहले ज़मानतो इंतज़ाम में थे। बजुज्ञ ( अलावा ) इसके कि गवर्नमेंट का रेलों पर इख्तियार ज़्यादा था। 874 से रेलों की तामोर ज़्यादा सरगर्मी (उत्साह) से होना शुरू हुई, क्योंकि गवर्नमेंट को विलायत में कर्ज़ा आसानी से दस्तयाब (प्राप्त) हो गया। इसके बाद पच्चोस साल की मुद्दत में रेलों की तोसी (विस्तार) जिस सुरअत * तेजी) से हुई, उसका अंदाजा इससे किया जा सकता है कि 874 में रेलवे लाइन छः: हजार मील से भी कम थी, मगर बीसवीं सदो के आगाज़ (आरंभ) में बीस हजार मील से ज़ाइद ( अधिक ) थी। 870 ई० और 80 ई० के दरम्या., मुतवातिर ( लगातार ) खुर्क सालियों (सूखों) के बाइस मुल्क की माली हालत कुछ गैर मुतमइन ( असंतुष्ट ) हो गई थी। उस वक्त हाउस ऑफ कामंस, में एक कमेटी ने रेलों और नहरों के लिए सरमाया (धन) पैदा करने के मसले पर गौर किया और सिफारिश की कि यह रकम इस हद तक रखी जाए जो हिन्दुस्तान में आसानी से बहम (उपलब्ध) हो सके

ओर रेल के लिए सालाना दो करोड़ का तआइयुन (तय) किया। बाज़गुज्ञार (कर देने वाली ) रियासतों को अपने मक्वज़ात (अधिकार- क्षेत्र ) में बगैर खारजी (बाहरी ) इमदाद के रेलों के तामीर करने की तरगीब दी (रुचि पैदा की) गई। निज्ञाम स्टेट रेलवे, जो तीन सौ तीस मील लंबी थी, इस पॉलिसी का पहला समर (फल) है। मुतवातिर खुश्कसालियों (सूखा) ने तौसी-ए-रेलबे ( रेलों के विस्तार) कौ ज़रूरत को खूब ज़हन- नशीन (दिमाग में बैठाना) कर दिया था, और कहत की इमदाद का एक हिस्सा रेलों की तामीर में सफे किया गया।

गुजिश्ता दस-बारह साल से रेलों की काबिले-इत्मीनान माली हालत का मुकाबला उस वक्त से किया जाये, जबकि वह ज़मानती इंतज़ाम में थी तो कितना इख्तिलाफ (भिन्‍न) नज़र आता है। 893 ई० में चांदी की निर्ख (भाव) अरजां (सस्ता) हो जाने की बाइस एक बार फिर रेलवे लाइनों को कम्पनियों के ज़ेर-ए-इंतज़ाम चलाने की नाकाम कोशिश की गयी। अब की नफा की ज़मानत ज़रे-इमदाद (सहायता को रकम) की सूरत में मुंतकिल (स्थान-परिवर्तित ) कर दी गयी, जो मुख्तलिफ तरमीम ( संशोधन) व तगय्युर (परिवर्तन) के बाद अब सरमाया पर साढे तीन फीसदी है, मगर ये शराइत (शर्तें) बावजूद इसके कि उन्हैं दिल-पज़ोर (आकर्षक) बनाने में कोई कसर नहीं रखी गयी है, ताजराना हौसला मंदियों (व्यापारकि उत्साह) को उभारने में कामयाब न हुई। अब रेलवे तामीरगात की मौजूदा सूरत ये है कि खालिस मुकामी (स्थानीय) लाइनों की तामीर का बार डिस्ट्रिक्ट बोर्डों पर है, जो उनके मुनाफा की ज़मानत पर सरमाया पैदा करती हैं। बाज़गुज़ार (कर देने वाली) रियासतें इन रेलबे के लिए जो उनके मुल्क में बनती हैं, या उनके मुल्क से होकर गुज़रती हैं, अपने महासिल से या कर्ज से रुपया निकालती है। बाकी रेलवे लाइनों क॑ लिए गवर्नमेंट अमबने महासिल से मुकर्रगा सालाना रक्रम मुहैया (उपलब्ध) करती है।

रेलवे लाइनें और नहरों की तामीर के मसले पर अर्स से मुबाहसे होते आये हैं और उसके मुताल्लिक भी कुछ बयान करना ज़रूरी मालूम देता है। एक फरीक (पक्ष) जिसमें हिन्दुस्तानियों की तादाद गालिब ( अधिक?) है, नहरों को रेलों के मुकाबले में ज़्यादा ज़रूरी और मुफीद (लाभकारी) समझता है। सर आर्थर कॉटन कावेरी और गोदावरी को नहरों के मशहूर-ओ-मारूफ इंजीनियर थे। उन्होंने इस मुबाहसे को बहुत जिंदादिली से निबाहा। पार्लियामेंट की एक कमेटी के रूबरू सन्‌ 878 ई* में उन्होंने कहा था कि मेरा मंशा सिर्फ यह बता देना है कि हिन्दुस्तान को आबी (पानी क) रास्तों को ज़रूरत है। रेलवे बिल्कुल नाकाम साबित हुई है। वह सिर्फ गरां (महंगी) ही नहीं, बल्कि नाकाफी है और उन्हैं चलाने के लिए मुल्क को चार करोड़ रुपया सालाना सफ करने को ज़रूरत होती है। दुरवानी कश्तियों (कोयले से चलने वाली नावों) का सिलसिला इस सरमाये के आठवें हिस्से में कायम हो सकता है। उस पर शरह अर्जा (सस्ती दर), रफ्तार नेज, गुंजाइश बेहद, उसे खजाने से मदद को ज़रूरत नहीं। जॉन ब्राइट, लार्ड लारेंस, सर विलियम और दोगर जीअसर (प्रभावशाली 2 हज़रात ने इंजीनियर साहब की हिमायत की। सर आर्थर कॉटन की तज़वीज़ थी कि रेलों की तामीर बंद कर दी जाये और उनके बजाय जहाज़रानी के काबिल नहरें बनवाई

जाएं, जिनका सर्फा (खर्चा) तीन करोड़ पौंड कहा जाता है, मगर विलायत की जम्हूर (प्रजातंत्र) को नहरों से कुछ दिलचस्पी न थी। रेलों से वो मानूस (मुहब्बत करने वाले) थे, नहरें उनके लिए बिल्कुल एक नयी चीज़ थीं। रेलों पर दस करोड़ पोंड लग चुके थे। मगर इसमें उनको कोई शिकायत न थी। नहरों पर तीन करोड़ के सर्फे की ज़रूरत उनकी समझ में न आयी थी। बिलआखिर सर आर्थर कॉटन की तजवीज़ (योजना) नाक़ाबिले-अमल समझी गयी।

मगर अब भी हिन्दुस्तान में कितने ही मोहरीने इक्तसादियात (अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ) हैं, जिनका खयाल है कि अगर सर आर्थर कॉटन की तज़वीज़ पर अमल किया जाता और उनकी तज़हीक (उपहास) न की जाती तो गुज़िश्ता सदी के आरिब्ररी सालों की खुश्कसालियों (सूखा) से ऐसे तबाहकुन नताइज (ध्वंसपूर्ण परिणाम) न पैदा होते। सूबा मद्रास में नदियों से अनहार (नहरें) निकालने की तजबीज्ञ को सर आर्थर कॉटन की तामीरात ने खुद मुफीद और करीबुलइमकान (संभाव्य) साबित ऊर दिया है। शुमाली (उत्तरी) हिन्दुस्तान में भी नहरें मौजूद हों। रेलों और नहरों के हकुक के मुताल्लिक मिस्टर रमेशदत्त मरहूम ने फरमाया है-नहरों से आगाज (आरंभ) ही में नफा होने लगता है, रेलवे से काफी नफा नहीं होता। नहरें गवर्नमेंट के महासिल ( राजस्त) का एक जरिया हैं रेलें साल -ब-साल नुकसानात का। नहरें गलने की पैदावार में इजाफा करती हैं, मगर रेले सिफ एक सिम्त (दिशा) से दूसरी सिम्त को गल्ला ल॑ जा सकती हैं। मुल्क कौ पैदावार पर इनका कोई असर नहीं हे।

ऐसी हालत में कुदरतन यह सवाल होता है कि बावजूद इंसानात नुक्सानात और परेशानियों के गवर्नमेंट ने क्यूं रेल को नहर पर तरजीह दिया मगर इसका जवाब आसान है। अंग्रेज़ों को नहरों का कोई तजुरबा न था। रेलों के फवाइद (लाभों) से वो कामिल तौर पर (पूर्णरूप से) वाकिफ थे। इंगलिस्तान की रेलों से बेशुमार फवाइद (लाभ) हासिल हो चुके थे। इंगलिस्तान जैसे सनअती मुल्क (ओद्योगिक देश) के फ्वाइद को हिन्दुस्तान जैसे जराअती मुल्क (कृषि प्रधान देश) के फवाइद से मुमय्यज़ (पृथक) न कर सके। अलावा -बरीं (इसके अलावा) विलायत में ताजिरां ( व्यापारियों) का एक मुकतदिर ( प्रभुत्वशील ) गिरोह रेलों को ज़रूरत पर हमेशा गवनंमेंट को मुखातिब करता रहता था, क्योंकि रेलों की तोौसीअ (विस्तार) से उसे अपने मसनूआत ९ उत्पादित वस्तुओं) की बिक्री और खाम (कच्ची) पैदावार के हासिल करने का यकीन था। इसलिए रेलों की उस मुल्क में इस कदर तरक्की हुई। फरवरी, 9]2 में वाइसराय की कौंसिल में ऑनरेबुल मिस्टर गोखले की सरकर्दगी (नेतृत्व) में इस मसले पर एक दिलचस्प बहस शुरू हुई थो। मिस्टर वाचा ने उस वक्त कई काबिलाना मजामीन (लेखों) में गवर्नमेंट की रेलवे पॉलिसी पर बहस कौ और साबित किया कि अब तक गवर्नमेंट को रेलों से चालीस करोड़ का नुकसान हो चुका है। मिस्टर वाचा का खयाल है, अगर आने वाले दस वर्षों में भी रेलों का नफा इस नुकसान को पूरा कर दे तो हमको अपने तईं खुशनसीब समझना चाहिए।


प्रकाशन इतिहास

[उर्दू लेख' उर्दू मासिक पत्रिका 'ज़माना', जनवरी, 1915 में प्रकाशित। ' प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य ' खण्ड-2 में संकलित]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "हिन्दुस्तानी रेलों की साठ-साला तारीख." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1915, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/hindustani-relon-ki-sath-sala-tarikh. Accessed 22 Sep. 2026.