Cover Image for Manushyata Ka Akaal (मनुष्यता का अकाल) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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निबंध•1924•21 मिनट

मनुष्यता का अकाल

Manushyata Ka Akaal

सांप्रदायिक विद्वेष और नैतिक पतन के दौर में सच्ची इंसानियत के अभाव पर प्रेमचंद का अत्यंत संवेदनशील और मर्मस्पर्शी चिंतन।

Work Details

प्रकार: निबंध
वर्ष: 1924
पठन समय: 21 मिनट (3,096 शब्द)

हिन्दू-मुस्लिम एकता के बारे में इस वक्‍त मुसलमान कौम के बड़े लोगों ने बार - बार की उत्तेजना के बावजूद जो अच्छी रविश अख्तियार की है, और जिस सूझ- बू और दूरंदेशी का सबूत दिया है उस पर हिन्दुओं को शर्मिंदा होना चाहिए। अब तक उन्हें यह दावा था कि स्वराज्य के लिए हम जितनी कुर्बानियां कर सकते हैं, उतनी मुस्लिम संप्रदाय नहीं करता। वह हिन्दुस्तान में रहकर, हिन्दुस्तान का दाना पानी खाकर अरब और अजम के सपने देखा करता है। उसे 'स्वराज्य की उतनी फिक्र नहीं है जितनी पैन-इसलाम की। एक बार जब मोलाना शौकत अली ने किसी खिलाफत के जलसे में कहा था कि अगर मुसलमान को किसी कौमी काम के लिए एक रुपया देना मंजूर हो, तो वह चौदह आने खिलाफत को दे और दो आने कांग्रेस को, इस कौल को हिन्दू अखबारों ने बड़े निष्ठुर ढंग से बहुत ज्यादा महत्त्व दिया और उसने अपनी बात को प्रमाण के रूप में पेश किया।

इस कौल का तकाजा तो यह था कि हिन्दू महाशय अपने दिल में लज्जित होते कि एक मुसलमान को जो अपना सब कुछ भारतमाता कौ नजर कर चुका हो, इस तरह दोनों में भेद करने की जरूरत पड़ी क्योंकि जाहिर है कि अगर हिन्दुओं ने खिलाफत के मसले को महात्मा गांधी की व्यापक दृष्टि से देखा होता तो मौलाना साहब को यह बात कहने का कोई मौका ही न था। मगर सच्चाई यह है कि हिन्दुओं ने कभी खिलाफत के महत्त्व को ही नहीं समझा और न समझने की कोशिश की, बल्कि उसको संदेह की दृष्टि से देखते रहे। मगर अब जिसे न्याय की दृष्टि मिली हुई हो, वह चाहे तो देख सकता है कि वही व्यक्ति हिन्दू-मुस्लिम एकता को, जो दूसरे शब्दों में स्वराज्य है, कितना महत्त्वपूर्ण समझता है और उसके लिए कितनी बड़ी कुर्बानियां करने के लिए तैयार है। हिन्दू कौम कभी अपनो राजनीतिक उदारता

के लिए मशहूर नहीं रही और इस मौके पर तो उसने जितनी संकीर्णता का परिचय दिया है, उससे मजबूरन इस नतीजे पर पहुंचना पड़ता है कि इस कौम का राजनीतिक दीवाला हो गया वर्ना कोई वजह न थी कि सारी हिन्दू कौम सामूहिक रूप से कुछ थोड़े से उन्मादग्रस्त तथाकथित देशभकक्‍्तों की प्रेरणा से इस तरह पागल हो जाती। हम कहते हैं कि अगर हिन्दुओं में एक भी किचलू, मुहम्मद अली या शौकत अली होता तो हिन्दू-संगठन और शुद्धि की इतनी गर्मबाजारी न होती और इन हंगामों में काफी कमी हो जाती जो इस वैमनस्य के कारण दिखाई पड़ते हैं। मगर अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि कांग्रेस ने भी समग्र रूप से इन आंदोलनों से अलग-अलग रहने के बावजूद व्यक्तिगत रूप से उसमें शामिल होने में कुछ भी उठा नहीं रक्खा। इतना ही नहीं, एक भी जिम्मेदार कांग्रेस नेता ने ऐलान करके इन आंदोलनों के खिलाफ आवाज बुलंद करने का साहस नहीं किया। पंडित मोतीलाल नेहरू, पं* जवाहरलाल नेहरू, लाला भगवानदास, लाला श्रीप्रकाश इन आदमियों में, जिनसे ज्यादा नैतिक साहस से काम लेने की आशा की जा सकती थी, मगर इन सभी लोगों ने एक रोज अपने बिरोध और अपनी आशंका को व्यक्त करके दूसरे रोज उसका खंडन कर दिया ओर डंके की चोट पर यह कहा कि शुद्धि और संगठन के बारे में हमने जो खयाल जाहिर किया «॥ नह गलतफहमियों पर आधारित था। जब ऐसे-ऐसे लोग दबाव में आ जाएं तो फिर इंसाफ को उम्मीद किससे की जाएं। अगर मौलाना मुहम्मद अली और शौकत अली की तरह इन सज्जनों ने भी अपनी कौम को इन आंदोलनों के हानिकर और सांघातिक परिणाम बतलाए होते और उसके खिलाफ बाकायदा व्यवस्थित ढंग से प्रयत्न करते तो यक्रीनन आज हिन्दू-मुस्लिम संबंध इतने खिंचे हुए न होते। मगर जो राजनोतिक दूरदर्शिता सदियों से खत्म हो चुकी हो उससे और कया हो सकता है। एक स्त्री ने सारे योरोप को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया। हिन्दुओं में ऐसे व्यक्ति पैदा करने के लिए अभो सदियां लगेंगी। आज कौन-कौन हिन्दू है जो हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए जी -जान से काम कर रहा हो, जो उसे हिन्दोस्तान कौ सबसे महत्त्वपूर्ण समस्या समझता हो, जो स्वराज्य के लिए एकता की बुनियादी शर्त समझता हो! कौम का यह दर्द, यह टीस, यह तड़प आज हिदुओं में कहीं दिखाई नहीं देती।

दस-पांच हजार मलकानों को शुद्ध करके लोग फूले नहीं समाते, मानो अपने लक्ष्य पर पहुंच गए, अब स्वराज्य हासिल हो गया | हमें याद नहीं आता कि आज तक किसी हिन्दू ने वैसे पवित्र, ऊंचे, दैवी प्रेरणा के भाव व्यक्त किए हों जो इस रगमलखन की जोड़ी ने जेल से निकलते हो रौ-रोकर भीगी हुई आंखों से निकलती हुईं दर्द की एक आवाज की तरह व्यक्त किए हैं। यह है वह राष्ट्रीय भावना जो राष्ट्रों के बेड़े पार करती है, उनकी नैया किनारे लगती है। यह कौमी मेल-जोल और एक दूसरे के प्रति सहिष्णुता का चमत्कार है। हमारे पास वह शब्द नहीं है जो उस कृतज्ञता को ज्ञापित कर सके, जो हर एक देशभक्त हिन्दू के दिल में इन आदरणीय व्यक्तियों के लिए उबल रहा हेै।

हमको यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि इन दोनों संप्रदायों में कशमकश

और संदेह और घृणा की जड़ें इतिहास में हैं। मुसलमान विजेता थे, हिन्दू विजित। मुसलमानों की तरफ से हिन्दुओं पर अक्सर ज्यादतियां हुईं और यद्यपि हिन्दुओं ने मौका हाथ आ जाने पर उनका जवाब देने में कोई कसर नहीं रखी, लेकिन कुल मिलाकर यह कहना ही होगा कि मुसलमान बादशाहों ने सख्त-से-सख्त जुल्म किए। हम यह भी मानते हैं कि मौजूदा हालात में अजान और कुर्बानी के मौकों पर मुसलमानों की तरफ से ज्यादतियां होती हैं और दंगों में भी अक्सर मुसलमानों ही का पलडा भारी रहता है। ज्यादातर मुसलमान अब भी “मेरे दादा सुल्तान थे' नारे लगाता है और हिन्दुओं पर हावी रहने की कोशिश करता रहता है। तबलीग के मामले में ज्यादती मुसलमानों ने की और हिन्दुओं की रोज-ब-रोज घटती हुई संख्या का कारण भी किसी हद तक वही है। मगर इन सारे कारणों और दलीलों और घटनाओं के नजर के सामने रखते हुए हम यह कहना चाहते हैं कि हिन्दुओं को इससे कहीं ज्यादा राजनीतिक सहिष्णुता से काम लेने की जरूरत है। इतिहास से उत्तराधिकार में मिली हुई अदावतें मुश्किल से मरती हैं, लेकिन मरती हैं, अमर नहीं होतीं। दुनिया के इतिहास में इसको मिसालें न मिलती हों, ऐसी बात नहीं है और अगर न भी मिलती हों तो कोई वजह नहीं कि हम इसे तावीज की तरह अपने गले में लटकाए रहें। हिन्दुओं के त्योहारों और जुलूसों के मौके पर अक्सर मुसलमानों की तरफ से यह तकाजा होता है कि मस्जिदों के सामने नमाज के मौके पर बाजा और शादियाने न बजाये जायें। यह बहुत ही स्वाभाविक मांग है। शोर-गुल से निश्चय ही उपासना में विघ्न पड़ता है और अगर मुसलमान इस शोर-गुल को बंद करने पर जोर देते हैं तो हिन्दुओं को चाहिए कि वह उनको दिलजोई करें। यह तो हिन्दुओं का उनके आग्रह के बिना भो, भगवान के प्रति सम्मान की दृष्टि से ही कर्त्तव्य है, न कि जब कोई उन्हें उनका कर्त्तव्य याद दिलाए तो उससे लड़ने के लिए तैयार हो जाएं। हिन्दू कहेंगे कि हमारे मंदिरों के सामने से मुसलमानों के जुलूस भी बाजे बजाते न निकलें। ऊपरी दृष्टि से तो यह बात बिल्कुल न्याय की मालूम होती है लेकिन व्यवहार में इसका यह परिणाम होना संभव है कि शहरों में बाजे कतई बंद कर दिए जाएं क्योंकि मंदिरों की संख्या इतनी अधिक है कि किन्‍्हीं-किन्हीं शहरों में तो हर एक घर के बाद मंदिर दिखाई पड़ता है। फिर हिन्दुओं की संध्या-हवन तो एकांत में होती है लेकिन देवताओं को पूजा अक्सर घंटे और घड़ियाल के साथ हुआ करती है। तो जब वह उपासना के लिए स्वयं भी मौन आवश्यक नहीं समझते तो किस मुंह से मुसलमानों से इस चीज की मांग कर सकते हैं। तो भी हम यह कह देना उचित समझते हैं कि जब उपासना एक ही परमात्मा कौ है और केवल उसके बाह्य रूप में भेद है तो हिन्दू लोग क्यों इसकी राह देखें कि जब मुसलमान हमारे धर्म का आदर करेंगे तो हम भी उनके धर्म का आदर करेंगे। अगर धर्म का आदर करना अच्छा है तो हर हालत में अच्छा है। इसके लिए किसी शर्त की जरूरत नहों। अच्छा काम करने बाले को सब अच्छा कहते हैं। दुनियावी मामलों में दबने से आबरू में बट्रा लगता है, दीन-धर्म के मामल में दबने से नहीं। हम यह कल्पना नहीं कर सकते कि हम किसी के धर्म का आदर करें और वह हमारे धर्म का अपमान करे। थोड़ी देर के लिए यह भी सुन लें। आए

मुसलमानों का आम गैर-जिम्मेदार तबका हमारे बाजों को मस्जिदों के सामने बंद होते देखकर तालियां बजाएगा और बड़ी शान के साथ कहेगा “दब गए, दब गए' तो इतना सुन लेने में क्या बुराई है। निश्चय ही मुसलिम लीडरान इस हालत को ज्यादा अर्से तक कायम न रहने देंगे। यह किसी मजहब के लिए शान की बात नहीं है कि वह दूसरों की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाए। गौकशी के मामले में हिन्दुओं ने शुरू से अब तक एक अन्यायपूर्ण ढंग अख्तियार किया है। हमको अधिकार हैं कि जिस जानवार को चाहें पवित्र समझें, लेकिन यह उम्मीद रखना कि दूसरे धर्म को मानने वाले भी उसे वैसा ही पवित्र समझें, खामखाह दूसरों से सर टकराना है। गाय सारी दुनिया में खाई जाती है, इसके लिए क्‍या आप सारी दुनिया को गर्दन मार देने के काबिल समझेंगे? यह किसी खूं- खार मजहब के लिए भी शान की बात नहीं हो सकती कि वह सारी दुनिया से दुश्मनी करना सिखाए, न कि हिन्दू जैसे दार्शनिक व्यापक और सुसंस्कृत के लिए जिसका सबसे पवित्र सिद्धांत हो ' अहिंसा परमो धर्म: ' आगर हिन्दुओं को अभी यह जानना बाकी है कि इंसान किसी हैवान से कहीं ज्यादा पवित्र प्राणी है, चाहे वह गोपाल की गाय हो या ईसा का गधा, तो उन्होंने अभी सभ्यता की वर्णमाला भी नहीं समझी। हिन्दुस्तान जैसे कृषि-प्रधान देश के लिए गाय का होना एक व. ४7 है, मगर आर्थिक दृष्टि के अलावा उसका और कोई महत्त्व नहीं है। लेकिन गोरक्षा का सारे हो-हल्ले के बावजूद हिन्दुओं ने गोरक्षा का ऐसा कोई मामूहिक प्रयत्न नहीं किया जिससे उनके दावे का व्यावहारिक प्रमाण मिल सकता। गौरक्षणी सभाएं कायम करके धार्मिक झगड़े पैदा करना भी गोरक्षा नहीं है। इस सूबे में अधिकांश जमींदार हिन्दू हैं। उन्होंने गोचर जमीन का कोई इंतजाम किया या जहां पहले से इंतजाम था वहां उसे खत्म नहीं कर दिया? जिस मुल्क में तंबाकू और वाय और नील और रबर की खेती के लिए काफी जमीन हो वहां मौजों में गोचार का न होना आर्थिक खींच-तान की दलील हो सकती है, गोरक्षा की दलील हरगिज नहीं हो सकती। जब हम देखते हैं कि बैलों के लिए चारा मयस्सः नहीं तो गायों क लिए (वह भी जब बुड़ी, मरियल, कमजोर हो जाएं) चारा इकट्ठा करते की दिक्कत का हाल किसी किसान से पूछिए। वह गायों को भूख से एडियां रगड़-रगड़कर मरने के बदले उन्हें कसाई के हवाले कर देना ज्यादा अच्छा समझता है।

रहा तबलीग का मसला। इसमें दो रायें नहीं हो सकतीं, क्योंकि हर मजहब को इसका काफी अखितयार है बशरते कि उद्देश्य सच्चे अर्थों में धर्म का संस्कार और सिद्धांतों का प्रचार हो। जब उसमें कोई राजनीतिक उद्देश्य छिपा होता है तो वह फौरन एक सियासी मामले की सूरत अख्तियार कर लेता है। दुर्भाग्य से वर्तमान समय में प्र विश्वासों के संस्कार का साधन नहीं, राजनीतिक स्वार्थ-सिद्धि का साधन बना लिया गया है। उसकी हैसियत पागलपन की-सी हो गई है जिसका वसूल हे कि मब कुछ अपने लिए और दूसरों के लिए कुछ नहीं। जिस दिन यह आपस कौ होड़

दूसरे से आगे बढ़ जाने का खयाल धर्म से दूर हो जाएगा, उस दिन धर्म-परिवर्तन पर किसी के कान न खडे होंगे।

गरज कि जिन कारणों का ऊपर जिक्र हुआ उनमें एक भी ऐसा नहीं है जो

हिन्दुओं के लिए 'हमारी जान खतरे में है' की हांक लगाने को उचित ठहरा सके। इस खास मौके पर हिन्दू संगठन की पुकार ने हिन्दु-मुस्लिम एकता को जो ठेस पहुंचाई है, उसका बुरा असर अगर दूर भी होगा तो बहुत दिनों में होगा। हिन्दू और मुसलमान न कभी दूध और चीनी थे, न होंगे और न होने चाहिए। दोनों की अलग-अलग सूरतें बनी रहनी चाहिए और बनी रहेंगी। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि उनके नेताओं में परस्पर सहिष्णुता और उत्सर्ग की भावना हो। आमतौर पर हमारे नेता वह सज्जन होते हैं जो अपने संप्रदाय की मुसीबतों और शिकायतों का हमेशा बहुत सरगर्मी से रोना सेया करते हैं। वह अपने संप्रदाय के लोगों की दृष्टि में लोकप्रिय बनने के लिए उसकी भावनाओं को उकसाते रहते हैं और समझौते के मुकाबिले में, जो उनके उस विलाप को बंद कर देगा, झगड़े को कायम रखना ज्यादा जरूरी समझते हैं। हिन्दुओं में इस वक्‍त सहिष्णु नेताओं का अकाल है। हमारा नेता वह होना चाहिए जो गंभीरता से समस्याओं पर विचार करे। मगर होता यह है कि उसकी जगह शोर मचाने वालो के हिस्से में आ जाती है जो अपनी जोरदार आवाज से जनता की गंदी भावनाओं को उभाड़कर उन पर अपना अधिकार जमा लिया करते हैं। वह कौम को दरगुजर करना नहीं सिखाता, लड़ना सिखाता है, उसका फायदा इसी में है। कोई आदमी ऐसी उल्टी बुद्धि का नहीं हो सकता कि उसे इस नाजुक मौके पर दोनों संप्रदायों की आपसी खींच-तान के नतीजे न दिखाई दें और अगर है तो हमें उसकी नीयत में संदेह है। इस संदेह की पुष्टि इस कारण से और भी होती है कि इस आंदोलन के शुरू करने वाले और कार्यकर्ता अधिकतर वह लोग हैं जो राजनीतिक मामलों में हिस्‍सा लेने से कावा काटते रहते हैं या उसमें हिस्सा लेते भी हैं तो आबरू बचाए हए वर्ना हिन्दू संगठन के बनारस में आयोजित जलसे में जमींदारों और राजाओं की इतर्नी बड़ी संख्या न दिखाई देती। जिधर देखिए राजे-महाराजे और सेठ-महाजन ही नगर आते थे। उनके पीछे चलने वालों में अधिकतर वह लोग थे जिनका पुड्तैनी पेशा गुलामी है, जिन्हें शुरू से यह शिकायत है कि मुसलमान सरकारी नौकरियां हड़प कर जाते हैं और हमारा हाल पूछने वाला कोई नहीं है, जिनके लिए एक मुसलमान सब-इंसपेक्टर या कुर्क अमीन की नियुक्ति चीन के इंकलाब या तुर्को की फनह से ज्यादा बड़ी घटना है।

हमारे रईंसों ने जन-आंदोलनों की तरफ अब तक जो रवैया अख्तियार किया उसने उन्हें एक नापने का आला बना दिया है जिससे हुक्काम के हथकंडों का साफ साफ पता चलता है। हिन्दु-मुस्लिम एकता हुक्काम की नजरों में कांटे की तरह खटकतो थी , इसलिए जब धनी-मानी लोग किसी ऐसे आंदोलन का उत्साह से स्वागत करें जिससे एकता को नुकसान पहुंचने का यकीन हो तो जाहिर है कि उनक्का उसमें शरीक हाती उनके अपने मन की बात नहीं, बल्कि किसी की प्रेरणा से होमे वाली बात हैं। वन जिन लोगों ने सख्त कानून पास करने में गवर्नमेंट का साथ दिया वह हिन्दू संगठन क जलसे में इस जोर-शोर से हरगिज शरीक न होते। मगर यहां तो यकीन था कि हमार कोशिशें ऊपर वालों की दुनिया में कब्र की निगाहों से देखी जा रही हैं। तो फिर क्यों न हाथों से पुण्य लूटें, कौम रहे या मिटे, इसकी क्या फिक्र। यह एक सच्ची बात है

कि हुक्‍्काम ने भी हिन्दू संगठन के आंदोलन से हमदर्दी दिखलाई। इसलिए रईसों का उसमें जोर-शोर से बड़ी संख्या में शरीक होना जरूरी था। उनके योगदान पर खुशी जाहिर करना घटनाओं से अपनी नादानी जाहिर करना है।

इन धार्मिक आवेशों को भड़काने का इल्जाम सबसे ज्यादा कौंसिलों की मांग करने वालों की गर्दनों पर है। चाहे वह हिन्दू हों या मुसलमान। कांग्रेस ने लिबरल नेताओं का पर्दाफाश कर दिया था। रईस ओर ताल्लेदार भी जनता की नजरों से गिर चुके थे। वह हजरात जिन्होंने देशभक्ति के अपने तमाम दावों के बावजूद वकालत या सरकारी नौकरी न छोड़ी थी, पब्लिक की निगाहों में अपनी प्रतिष्ठा खो बैठे थे। इस बहुसंखयक जमात के लिए अपनी खोई हुई आबरू हासिल करने का, अपनी साख जमाने का, अपनी कौमेपरस्ती का सबूत देने का, और ऐसे मौके पर जब कौंसिलों का चुनाव पास था, इससे बेहतर और कौन मौका हाथ आ सकता था? 'हिन्दू कौम खतरे में है' का नारा मारकर वह लोग हिन्दुओं के हितैषी बनना चाहते थे। मुसलिम जमात में भी उनकी तादाद कम न थी। धार्मिक पक्षपातों को भड़काना शुरू किया गया। राय साहब और खान साहब अपने गुप्त स्थानों से निकल पड़े और जनता की दोस्ती का दम भरने लगे। एक तरफ से आवाज आई, हिन्दुओं को खिलाफत के आंदोलन से सावधान रहना चाहिए क्‍योंकि यह उनको हस्ती को मिटा देगा। दूसरी तरफ नारए- -तकबीर बुलंद हुआ, हिन्दू हम पर हावी होते जा रहे हैं, स्वराज्य से दूर रहना हमारा कर्त्तत्य है। कहीं किसी म्युनसिपैलिटी ने कानूनन्‌ गौकुशी बंद की। बावेला मच गया। शोर मचाने बालों की कमी न थी। जेल जाना था, तब शांतिपूर्वक अपने-अपने कोनों में दुबके बैठे थे। अब जेल का डर नहीं, इज्जत बढ़ने की उम्मीद थी। फिर क्‍यों चुप रहें। सवाल-जवाब शुरू हुआ। रोज-ब-रोज लहजा सख्त होता गया। इधर 'लीडर' था तो उधर ढेरों उर्दू अखबार ऐंग्लो-इंडियन अफसरों के निर्देशानुसार मैदान में आ खडई हुए। युद्ध को घोषणा हो गई। जो इस हंगामे को ठंडा कर सकते थे वह जेल में थे। उनकी जगह लिबरल हजरात ने ली। नतीजा जो कुछ हुआ, जाहिर है। वह कौम के दोस्त साबित हो गए। सरकार से भी वाहवाही मिली। फूट का बीज बोया गया, कांग्रेस की जड़ खोदने के लिए। उसकी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिलाने के लिए। उसे पब्लिक की नजरों में जलील करने के लिए। और चूंकि कांग्रेस का एक हिस्सा खुद ही लिबरल सज्जनों के से स्वार्थ वाला था, उसने भी इस चिनगारी को भड़काया कि कहीं हम अपना भरम न खो बैठें। कांग्रेस के लीडरों ने भी अपराधियों जैसे मौन से काम लिया। यह है उस खींचतान का भेद जो इस वक्‍त कौम का सबसे नाजुक मसला बना हुआ है। यह सारी आग लगाने की कोशिशें या तो महज कौंसिलों में वोट हासिल करने के लिए की गई या सरकार को खुश करने के लिए। बस | लेकिन सका असर लक्ष्य-सिद्धि के बाद बरसों तक कायम रहेगा। सितम यह है कि अब ही हिन्दू कौम के अलमबरदार एकता के महत्त्व को समझने मे असमर्थ हैं। चुनांचे "सिलों में जाने बालों की कमी नहीं है, हिन्दू संगठन तो ताकत पहुंचाने वालों की कमी नहीं है, ऐतिहासिक विद्वेषों के मुर्दे उखाड़ने वालों कौ कमी नहीं है-कमी है 7 एकता के लिए अपने को समर्पित कर देने वालों की, एकता के लिए मिट ज़ाने

वालों की। मुसलमानों में अली बरादरान, मौलाना अबुलकलाम आजाद , डॉक्टर किचलू एकता के लिए अपने को समर्पित कर चुके हें। हिन्दुओं में यह कतार खाली है। कितने शर्म की बात है कि जिस एकता को महात्मा गांधी ने स्वराज्य की पहली सीढ़ी करार दिया हो उसके लिए एक प्रभावशाली हिन्दू बुजुर्ग पूरी तरह तैयार नहों हैं। अगर यही रफ्तार है तो स्वराज्य मिल चुका और अगर हलवाई की दुकान परदादे का फातिहा पढ़ा जाना मुमकिन हो तो हमें स्वराज्य के नाम पर फातिहा पद लना चाहिए।


प्रकाशन इतिहास

[उर्दू लेख। 'कहतुरिजाल' शीर्षक से उर्दू मासिक पत्रिका 'ज़माना', फरवरी, 1924 में प्रकाशित। प्रथम प्रकाशन उर्दू। हिन्दी रूप 'मनुष्यता का अकाल' शीर्षक से 'विविध प्रसंग' भाग-2 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "मनुष्यता का अकाल." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1924, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/manushyata-ka-akaal. Accessed 22 Sep. 2026.