कैफ़ार-ए-कारदार का मूल पाठ
आजमगढ़ जिले में सरजू नदी के किनारे एक छोटा-सा मैदान है। उसकी दूसरी तरफ एक बहुत बड़ी झील है, जो यहाँ से एक मील मशरिक (पूर्व) की तरफ चलकर सरजू नदी से मिल गयी है। तीसरी तरफ एक दुश्वार गुज़ार (पार होने में कठिन) अधाह दलदल है। चौथी तरफ नदी के नशेबो-फ्राज (ऊँची-नीची) में होती हुई एक पतली-सी पगडण्डी है, जिसने इस मैदान को दुनिया का एक हिस्सा बना रखा था। इसलिए गो यह मैदान जुगराफी इस्तिलाह (भौगोलिक परिभाषा) में न जजीरा (द्वीप) था और न जजीरानुमा। शायद जुगराफिया (भूगोल) में इसके लिए कोई अस्तिलाह (परिभाषा) मौजूँ नहीं है, मगर फिलबाकेई (सचमुच) वह एक गैरआबाद, वीरान जजीरा (द्वीप) था, जो दुनिया से बिलकुल अलग-थलग पड़ा हुआ था। कुछ अरसे से एक अहीर ने इस वीराने को आबाद कर रखा था। नहीं मालूम, जमीदार ने इसे गाँव से निकाल दिया या किसी वजह से इसे आबादी से दूर रहना पड़ा। इस गरीब ने इस दलदली मकाम (स्थान) में सुकूनत (निवास) इख़्तियार की थी। यहाँ एक छोटा-सा झोंपड़ा, चन्द गायें, भैसें, भेड़-बकरियों के गल्ले (झुण्ड, रेवड़) चरते नज़र आते थे। इस हौसलामंद अहीर ने, जिसे शिवराम कहते थे, एक छोटी-सी किश्ती बना रखी थी, जिए पर बैटकर वह करीब के कस्बे में ऊन, घी और दूध बेचने के लिए जाया करता था। कभी-कभी मछलियों का शिकार भी खेलता। शिवराम को उस वीराने को आबाद करना मुबारक न हुआ। यहाँ आने के थोड़े ही दिनों बाद उसकी बीवी मलेरिया की नज़र हो गयी। अब उसकी सिर्फ एक लड़की थी, जिसके सर पर गृहस्थी का सारा बोझा था। शिवराम इस ताक में था कि कहीं सगाई ठहर जाय तो बेचारी गोरा के सर से यह बला टले, मगर खुदा जाने क्यों, बिरादरी में लोग उसे इज्जत की निगाह से नहीं दखते थे। यही सबब था कि गोरा की उसने अब तक शादी नहीं की थी। यह एक साँवले 7ंग की, भोली सूरत वाली नाजनीन (सुकुमारी) थी, जिसे हसीन तो नहीं कह सकते, मगर दिलफ्रेब (मन को छलने वाली) जरूर कह सकते हैं। गौरा के लिए यह झोंपड़ा कैदख़ाना से कम न था। सुबह से शाम तक शिवराम या तो मवेशियों के साथ रहता या बाज़ार करने जाता या मछलियाँ पकड़ता और गोरा सारा दिन अकेली बैठी कभी घर का काम-काज करती, कभी लेटती, कभी उकता कर रोती, मगर झोंपड़े से बाहर उसे निकलने की मुमानियत थी और न वह निकल सकती थी। हाँ, अब इस कैदे-तन्हाई से जल्द रिहाई मिलने वाली थी, क्योंकि गोरा की मैँगनी एक नौजवान अहीर से हो गई थी, जो सरजू के तवे-साहिल एक दूसरे गाँव में रहता था, लेकिन जब गोरा सोचती कि मुझे अब यहा से जाना पड़ेगा तो उसका दिल बैठ जाता और वह ईश्वर से मनाती कि यह कैदे-तन्हाई हमेशा कायम रहे।
एक दिन शाम के वक्त गोरा अपने झोंपड़े में बैठी हुई आईने पें अपना मुँह देख रही थी। उसके ससुराल से एक सुर्ख़ साड़ी उसके लिए आई थी। गोरा ने उसे जैबेतन (पहना) किया था और आईने में देख रही थी कि यह मुझ पर खिलती है या नहीं। कभी वह आँचल को आधे सा तक रखती, कभी माथे तक। उसका चेहरा बहुत शगुफ्ता था, क्योंकि खुशरंग साड़ी उसने कभी नहीं पहनी थी और न वह खुद अपनी निगाहों में ऐसी हसीन मालूम हुई थी। उसे अपने भोले-भाले हुस्न का आज बहुत थोड़ा-सा अन्दाज़ा हुआ, और आईने के सामने से हटी तो उसकी आँखों में इत्मीनान और ग़रूर की दिलआवेज झलक मौजूद थी। उसे याद नहीं आता था कि अपने से ज़्यादा अच्छी सूरत कभी देखी है या नहीं।
इतने में दरवाज़े पर किसी के पाँवों की आहट हुई। उसने समझा, मेरे पिता आ गये हैं। जल्दी से माथा छुपा लिया और आईने को उठाकर चारपाई के नीचे डाल दिया। मगर जब बजाय उसके बाप के एक अजनबी सूरत के नौजवान ने दरवाज़ा खोलकर कमरे में झाँका तो गोरा के मुँह से एक चीख़ निकल आई और दिल धड़कने लगा। उसने काँपती हुई आवाज से पूछा, “तुम कौन हो ?” और यह कहकर हाथ में एक सोटा लेकर खड़ी हो गई।।
नौजवान कमरे के अंदर चला आया और बहुत मिन्नत-आमेज लहजे से बोला, “तुम डरो मत। मैं तुम से कुछ नहीं बोलूँगा। मुझे बहुत भूख लगी है। कुछ खाने को दो | भूख से मरा जाता हूँ।”
गोरा, “तुम कौन हो ? कहाँ से आए हो ?”
नौजवान, “एक बदनसीब आदमी हूँ और कौन हूँ ! दिनभर से जंगल की ख़ाक छान रहा हूँ। सैकड़ों आदमी मेरी तलाश में घूम रहे हैं। गाँव-गाँव मेरे खून का प्यासा हो रहा है। कल रात को हरदतपुर में एक बड़ा डाका पड़ा। वहाँ का नम्बरदार इस डाके में मारा गया | अब मुझ गरीब पर लोग शुबा कर रहे हैं। मगर मैं ईश्वर से कहता हूँ कि मैं इस गुनाह में बिल्कुल नहीं शरीक था। यह मेरे दुश्मनों की शरारत है। इस वक़षत मुझे किस्मत यहाँ ले आई। मगर यहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं मिलता। जिधर जाता हूँ पानी और दलदल के सिवा कुछ नहीं सूझता। अगर उसी रास्ते से लौट जाऊँ जिधर से आया हूँ तो जरूर गिरफ्तार हो जाऊंगा, क्योंकि लोग मेरी घात में लगे हुए हैं। तुम मुझे कुछ खाने को दे दो और तब मुझे यहाँ से जान लेकर भाग निकलने का कोई रास्ता बता दो। तुम्हारे दिल में रहम है। ईश्वर तुम्हें इस नेकी का बदला देंगे।'”
गोरा यह सरगुजिश्त (घटना) सुनकर काँप उठी। उसे इस नौजवान की बेगुनाही का यकीन न आया-“ज़रूर यह कातिल है। और मैं इस सुनसान जगह में उसके सामने खड़ी हूँ। यह मुझे भी मार डाले और यहाँ की सारी चीज़ें उठा ले जाय तो क्या करूँगी ? फ्रियाद भी तो नहीं कर सकती। यहाँ कौन बैठा हुआ है ? दादा न मालूम कब तक आयेंगे। या ईश्वर, तू मेरी मदद कर ।” इस तरह दिल में सोचकर उसने नौजवान से कहा, “मैं तुम्हें खाने को दे दूँ तो तुम भाग जाओगे न ? जगर जल्द न भागोगे तो मेरे बाप आकर तुम्हें पकड़ लेंगे ?”
नौजवान ने जवाब दिया, “क्या तुम्हारे बाप जल्द आ जायेंगे ?'
गोरा, “हाँ, वह आते ही होंगे। तुम खाना खा लो और फौरन भाग जाओ ।”
यह कहकर उसने थोड़ा-सा दूध और चन्द रोटियाँ एक थाली में रखकर उसे दे दीं। नौजवान खाने पर ऐसा टूटा, गोया कभी दाने की सूरत न देखी थी। जब तक वह खाता रहा, गोरा सोटा मजबूती से पकड़े हुए उसकी तरफ गौर से देखती रही। उसका दिल धड़क रहा था और कान शिवराम के कृदमों की आहट सुनने के लिए बेक्रार हो रहे थे। जब नौजवान खा चुका तो गोरा ने देखा कि वह इधर-उधर शरारत-आमेज निगाहों से ताक रहा है, गोया किसी लाठी की तलाश में है। गोरा ने डॉट कर कहा, “अब तुम यहाँ से चले जाओ ।”
नौजवान, “जाने-मन ! मैं घुड़कियाँ सुनने का आदी नहीं हूँ। तुम्हारे हाथ में सोटा देखकर मैं ज़रा भी नहीं डरता। मैं चाहूँ तो अभी तुम्हारे हाथ से वह हथियार छीन लूँ। मगर तुमने मेरे साथ नेकी की है, इसलिए मैं तुम्हें ज्यादा तकलीफ नहीं दूँगा। तुम चलकर मुझे रास्ता बता दो।”
गोरा का खून सर्द हो गया। नौजवान ने जो कुछ कहा, वह बिल्कुल सही था। बोली, “यहाँ से कहाँ जाओगे ? कहीं रास्ता नहीं है।”
नौजवान, “नदी के किनारे कोई नाव नहीं है ?”
गोरा, “मेरे बाप की नाव है। मगर तुम उसे ले जाओगे तो वापस कौन लायेगा ?”
नौजवान, “उससे मुझे कोई सरोकार नहीं है। बस, तुम मुझे उस नाव तक पहुँचा दो।”
गोरा के लिए मफुर (बचाव) की कोई सूरत न थी। वह सोटा लिए हुए नदी के किनारे चली। नौजवान पीछे-पीछे उसके साथ चला। किनारे पर पहुँच कर यकायक वो दरशत (सख्त) लहजे में बोला, “अपने कपड़े उतारकर मुझे दे दो। जनाना लिबास में मुझे कोई न पहचान सकेगा ! बदों, ज्या सोचती हो ? यह मेरी शराफृत है कि जिस चीज को बजोर ले सकता हूँ, उसके लिए तुमसे फुकीरों की तरह सवाल करता हूँ। कया एक इन्सान की जान बचाने के लिए इतनी-सी तकलीफ भी बरदाश्त नहीं करोगी ?”
बेकस और बेबस गौरा ने उस नौजवान से ज्यादा सवाल व जवाब करना फिजूल समझा । रोते हुए उसने अपनी खुशरंग साड़ी उतार कर उसे दे दी और जल्दी से उस साफे को, जिसे नोजवान ने इसकी तरफ फेंक दिया था, पहन लिया। तब उस जालिम ने साड़ी पहनी और लम्बा घपूँघट निकालकर किश्ती की तरफ चला। यकायक कुछ सोचकर वह मुड़ा और तेजी से लपक कर गोरा की हाथ से डंडे को छीन लिया। गोरा खोफ से बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़ी और तब नौजवान ने इस बेहोशी को देर तक कायम रखने के लिए जोर से एक डंडा उसके सिर पर मारा और किश्ती पर बैठकर एक तरफ को चल दिया। “अब अगर तुम्हारा बाप आया भी तो तुम न बता सकोगी कि मैं कौन हैं और किधर गया ।”
2
नौजवान डाकू तेजी से डॉडा चलाता हुआ चार मील तक चला आया और तब उसे किनारे पर एक गाँव के आसार नजर आये। जाबजा (जहाँ-तहाँ) धुँधती रोशनी के चिराग टिमटिमा रहे थे, जिनका अक्स पानी में गुल फिशानी (हिलता) करता हुआ मालूम होता था। घाट पर कुछ औरतें पानी भर रही थीं। कुछ नहा रही थीं। मल्लाहों के झोंपड़ों में चूल्हे जल रहे थे। किश्तियाँ मेखों (कीलों) से बँधी हुई पानी में हिलकोरे जे रही थीं। नौजवान ने यहाँ रात बसर करने की नीयत से किश्ती किनारे पर लगा दी और उसे एक मेख (कील) से बॉँधकर लपकता हुआ गाँव में जा पहुँचा । गाँवों में बिलउमूम (प्रायः) लोग सरे-शाम ही से सो जाथा करते हैं। हाँ, जाबजा (जगह-जगह) बूढ़े आदमी बैठे हुए अपने हुक्के से दिल बहलाते हुए नज़र आते थे, जिससे ज़्यादा हमदर्द और गमगुसार (सहानुभूति रखने वाला) आलमे-जईफी (वृद्धावस्था) में और कोई नहीं हो सकता। डाकू की मंशा यह थी कि अँचेरे में कोई भला-मानस मिल जाय तो उस पर हाथ साफ करूँ कि वहीं ठंडा हो जाय और किस्मत जो कुछ दिलाये उसे लेकर नदी के किनारे अपनी किश्ती पर जा बैदूँ और दो घंटे रात रहे, फिर उठकर आगे को चल दूँ। वह इन्हीं मंसूबों में था कि दफअतन (सहसा) एक नौजवान लालटेन हाथ में लिये सामने से आता हुआ दिखाई दिया। उसने इस जनाने डाकू को देखा तो चौंक पड़ा और बोला, “कौन है, गोरा ? तुम यहाँ कहाँ ? ख्ैरियत तो है ?” यह वही आदमी था जिससे गोरा की मँगनी हुई थी। वह खुशरंग (सुवर्ण) साड़ी जो इस वक्त कातिल के गुनाहों पर परदा डाले हुए थी, उसने गोरा के लिए भेजी थी। गाँव में इस वजा (ढंग) की साड़ी किसी दूसरी औरत के पास नहीं थी। इसलिए उसे मअन (तत्क्षण) ख्याल गुजरा कि शायद वह गोरा है। उसका बाप किसी काम से यहाँ आया होगा। उसके साथ वह भी चली आई होगी। नौजवान डाकू यह आवाज सुनते ही चौंका और कृदम तेज कर दिये, ताकि किसी (तारीक) अँधेरी गली में पहुँच जाय, मगर इस देहाती नौजवान ने लपक कर उसका हाथ पकड़ लिया और बोला, “गोरा ! इस वक्त मत शरमाओ | तुम यहाँ कैसे आयीं ? तुम्हारे दादा भी आये हैं ?”
डाकू ने अपने हाथों को झटका दिया ताकि भाग जाए।
मगर उस देहकानी नौजवान ने उसे खूब मजबूत पकड़ा था। उसने घूँघट हटा दिया और एक मरद का चेहरा देखकर कहकहा मार कर हँसा, “वाह ! आप तो कोई भगत जी मालूम होते हैं। यह जनाना भेस कब से लिया ? आइये चौकीदार के यहाँ ज़रा मिजाजपुर्सी करूँ। आज आप किसी मनहूस आदमी का मुँह देखकर उठे थे। गोवर्धन के हाथ में फेंस कर चोरों का कचूमर निकल जाता है। सर का एक बाल भी नहीं रहता। वही गत तुम्हारी होगी। प्यारी गोरा के घर में सेंध डाली है। यह वही साड़ी है जो मैंने कल उसके लिए भेजी थी। क्यों, है न यही बात ?”
डाकू समझ गया कि अब यहाँ से छुटकारा पाना गैरमुमकिन है। किस्मत ने कहाँ लाकर पटका। बोला, “ईश्वर गवाह है गोरा ने मुझ पर तरस खाकर यह साड़ी मुझे दे दी है। मैंने उसके घर में सेंध नहीं मारी। मैं चोर नहीं हूँ। ऐसी भोली औरत को मैं नुकसान नहीं पहुँचा सकता था, चाहे चोर या कातिल ही क्यों न होता । जिस आदमी की हालत पर गोरा ने रहम किया है, क्या गोरा का मँगेतर उसी आदमी के गले पर छुरी फेरेगा ? मैं किस्मत का सताया हुआ गरीब आदमी हूँ। भूलता-भटकता गोरा के झोंपड़े तक जा पहुंचा । उसने मेरी राम-कहानी सुनी । उसे रहम आ गया। यह साड़ी मुझे दे दी कि किसी तरह मेरी जान बच जाय। मैं बिल्कुल सच कहता हूँ, जरा भी झूठ नहीं है।”
गोवर्धन फिर हँसा और बोला, “बेशक, आप बहुत सच्चे और धरमात्मा आदमी हैं। कुछ अपना हाल मुझसे भी कहो तुम्हारा घर कहाँ है ? शिवराम के मकान पर कैसे पहुँचे ” यूँ में नहीं छोड़ने का, समझ गए ।”
डाकू, “मैं सारी कहानी कह दूँगा। कल रात को हरदतपुर में एक डाका पड़ा। लम्बरदार मारा गया | डाकू भाग गये। मगर वहाँ लोगों का शुबहा है कि मैं भी उस डाके में शरीक था। मगर वह दुश्मनों की कारिस्तानी है। ख़ामख़्वाह मेरे सर पर यह इल्जाम थोप दिया। मजबूर होकर मैं भाग निकला। कल सारा दिन नालों और गड्डों में छिपता फिरा, वरना इस वक्त तुम्हारे सामने खड़ा न होता |!”
गोवर्धन, “अच्छा, तो आप हरदतपुर के डाक॒ओं में हैं, यह कहिए। गोरा शायद बड़ी रहमदिल है जो डकैतों की जान बचाती फिरती है। अच्छा, यही सही। मगर उसने अपनी पुरानी साड़ी क्यों नहीं दी ? वह नयी साड़ी क्यों दी जो मैं उसके लिए बरहलगंज से तीन रुपये में लाया हूँ और जिसे पहनकर वह रानी मालूम होती है। यह बताओ, कोई अपने मंगेतर की दी हुई चीज़ को यूँ लुटाता फिरता है ?”
डाकू कुछ सिटपिटा गया। मगर सेभल कर बोला, “तुम्हारी दी हुई साड़ी तो वह खुद पहने हुए है। वह भला मुझे क्यों देती ! यह साड़ी बिल्कुल उसी रंग की है। यह उसके बाप ने उसे दी है। दोनों साड़ियाँ बिल्कुल एक रंग की हैं।”
गोवर्धन, “अच्छा, यह भी सही। तो उसने अपने बाप की नाव तुम्हें क्यों दे दी ? क्या वह इतना नहीं जानती कि नाव आप ही आप अपने ठिकाने पर नहीं चली आती? इसका जवाब दीजिए। उसको अगर नुकसान का ख्याल नहीं हुआ तो कया अपने बाप का खौफ भी न हुआ ?”
डाकू अब चौकन्ना हो गया थधा। बोला, “उसने मुझे कहा कि तुम नाव ले जाओ। मेरे दादा पूछेंगे तो मैं कह दूँगी एक पुरानी नाव के खो जाने से अगर किसी बेगुनाह की जान बच जाय तो उसका अफृसोस नहीं करना चाहिए। मैं तो खुद इसे नहीं लेता था, मगर उसने जबरदस्ती मुझे इस पर बैठा दिया और कहने लगी, “मेरे दादा ऐसे लालची और खुदगर्ज नहीं हैं। तुम इसे ले जाओ। अगर हो सके तो कल तक किसी मोतबर (विश्वस्त) आदमी की मार्फूत भेज देना ।”
गोवर्धन को अपने एतराज़ात का जवाब तो मिला, मगर दिल को इत्मीनान न हुआ, बोला, “भाई सुनो ! मुझे तुम्हारी बातों पर विश्वास नहीं आता। मुझे शक है कि तुमने ज़रूर शिवराम महतो का घर लूटा और शायद गोरा को मार भी डाला हो तो ताज्जुब नहीं । तुम डाकू हो तुम्हारा यही पेशा है। इसलिए जब तक उसकी जबान पर तुम्हारी बातों की तस्दीक नहीं होगी मैं हरगिज न मानूँगा। अभी बहुत रात नहीं गई है। दस बजते-बजते हम लोग पहुँच जायेंगे। मुझे गोरा के देखने का एक बहाना हाथ आ जायगा। दो-चार मीठी-मीठी बातें सुनूँगा। अच्छे-अच्छे खाने खाऊँगा, और सुबह लौट आऊँगा; लेकिन अगर तुमने उसका बाल भी बॉका किया है तो तुम्हारी जान की ज्ैर नहीं। कुत्तों से बोटी-बोटी नुचवा लूँगा।”
यह कहकर गोवर्धन ने अपनी माँ को घर में बुलाया और चन्द लफ्जों में सूरते-हाल बयान करके बोला कि मैं शिवराम महतो के घर तक जाता हूँ। रात को न आऊंगा। किवाड़ बन्द कर लेना। बुड्ठी औरत ने मना किया कि रात को मत जा। डाकू है, न जाने क्या पड़े, क्या न पड़े, सुबह को जाना। मगर गोवर्धन ने उसकी तशफ़्फी (तसल्ली) की और डाकू को खींचता हुआ घाट तक लाया। उसकी किश्ती खोली और उसे उसमें बैठाकर खुद डॉडा हाथ में ले लिया। पानी की धारा तेज थी और किश्ती को चढ़ाव की तरफ जाना था। आहिस्ता-आहिस्ता चलने लगी।
आध घण्टे तक इन दो आदमियों में से एक भी न बोला। यकायक डाकू ने पूछा, “अगर तुम्हें साबित हो जायगा कि मैंने शिवराम के घर में सेंध नहीं मारी तो मुझे छोड़ दोगे न ?”
गोवर्धन, “मैं अभी कुछ नहीं कह सकता। वहाँ चलकर बताऊँगा।'
डाकू, “मैं वहाँ तक इस शर्त पर चलुँगा, अगर मैंने शिवराम के घर में सेंध नहीं मारी हो और गोरा को कोई तकलीफ न दी हो तो तुम मुझे छोड़ दोगे। वरना मैं यहीं नदी में कूद पहूँगा और तैर के कहीं निकल जाऊँगा। पुलिस के हाथों में मैं नहीं जाना चाहता ।”
गोवर्धन, “तुम्हारा इख़्तियार है, जी चाहे पानी में कूद पड़ो या अपना सर पटक लो, तुम्हारी खातिर से इतना कहता हूँ कि अगर तुमने वहाँ कोई शरारत नहीं की है तो तुम्हें पुलिस के हवाले न करूँगा।”
डाकू, “कसम खाओ।”
गोवर्धन, “तुम्हारे सर की कसम ।”
डाकू खामोश हो गया। थोड़ी देर के बाद किश्ती किनारे पर लगी और एक आवाज़ सुनायी दी, “दादा, आज तुमने इतनी देर क्यों की ?”
गोवर्धन ने आवाज़ पहचान ली और खुश-खुश डाकू का हाथ पकड़े हुए किश्ती से उतर कर बोला, “क्या अभी तुम्हारे दादा नहीं आए ? आधी रात होने को आयी है, कया तुम यहाँ देर से खड़ी हो ?”
गोरा ने गोवर्धन को डाकू के साथ देखा तो मारे शरम के अरकृ-अरक् (पानी-पानी) हो गई। उसने सर झुका लिया और वहाँ से ज़रा हट गयी। गोवर्धन ने देखा कि उसकी साड़ी घुटने से ऊपर तक आके रह गयी है। घूँघट निकालने की कोशिश में उसकी पीठ खुली जाती है। गोरा इस वक्त वहाँ से भाग जाना चाहती थी। अपने मँगेतर के सामने इस बुरी हैसियत से वह कभी नहीं आई थी, मगर गोवर्धन डाकू का हाथ पकड़े हुए गोरा के सामने आया और बोला, “देखो गोरा ! इस वक्त शरमाओ मत । जब महतो आवें तो जी भरकर लजा लेना। तुम इस औरत को जानती हो ?”
गोरा ने आहिस्ता से कहा, “हाँ ।” हे
गोवर्धन, “इसने तुम्हारे यहाँ से कोई चीज़ चुराई ?”
गोरा, “नहीं।” |
गोवर्धन, “तुमने अपनी साड़ी इसे दे दी ?”
गोरा, “इसने मुझसे छीन ली |”
डाकू ने बोलना चाहा, मगर गोवर्धन ने डॉट कर उसे खामोश कर दिया और फिर गोरा से जिरह करने लगा, “तुमने अपनी नाव इसे दी ?”
गोरा, “इसने जबरदस्ती खोल ली। मैं तो मना करती रही ।”
गोवर्धन, “तुम्हें इसने मारा तो नहीं ?”
गोरा जबान से नहीं बोली। मगर उसकी धीमी-धीमी सिसकियाँ सुनाई दीं। गोवर्धन से अब सब्र न हो सका। उसने वही डंडा उठा लिया जो डाकू ने गोरा से छीना था और डाकू के पीछे दौड़ा । डाकू जान बचाकर भागा और उस तरफ जिधर अथाह दलदल था, तेजी से भागा हुआ चला गया। सुबह को जब लोगों ने जाकर देखा तो दलदल में उन्हें उन्हीं पैरों के निशान नजर आए। इसके बाद एक गहा-सा दिखाई दिया। लोग समझ गये कि यही उस डाकू की कृब्र है। जैसी करनी वैसी भरनी।
[प्रथम प्रकाशन उर्दू में, 'अदीब”, जुलाई, 92 में प्रकाशित। हिन्दी रूप इसी शीर्षक से "प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य” खण्ड-1 में संकलित |]
कैफ़ार-ए-कारदार का सारांश
'कैफ़ार-ए-कारदार' (कर्मफल अथवा जैसी करनी वैसी भरनी) एक रोमांचक और नीतिपरक कहानी है। आजमगढ़ जिले में सरजू नदी, विशाल झील और खतरनाक दलदल से घिरे एक अत्यंत वीरान और अलग-थलग टापू जैसे मैदान में शिवराम अहीर अपनी भोली-भाली पुत्री गोरा के साथ रहता है। शिवराम पशुपालन और मछली पकड़कर जीवन-यापन करता है। गोरा उस सुनसान झोंपड़े में अकेलेपन का जीवन बिताती है। उसकी सगाई नदी के दूसरे किनारे पर बसे गाँव के एक साहसी युवक गोवर्धन से तय हुई है, जिससे गोरा को इस एकांत कारागार से मुक्ति की आशा बंधी है।
एक शाम गोरा झोंपड़े में अकेली बैठी अपने मंगेतर गोवर्धन द्वारा भेजी गई एक सुंदर सुर्ख (लाल) साड़ी पहनकर दर्पण में अपना रूप निहार रही थी। तभी अचानक एक अज्ञात, डरावना युवक कमरे में घुस आता है। भयभीत गोरा जब हाथ में सोटा उठाती है, तो वह युवक गिड़गिड़ाकर दया की भीख माँगता है। वह बताता है कि हरदतपुर में हुए डाके और नंबरदार की हत्या के बाद लोग और पुलिस उसके खून के प्यासे हैं और वह दिन भर से भूखा-प्यासा दलदल में भटक रहा है। गोरा को उस पर तरस आ जाता है और वह उसे दूध व रोटियाँ खाने को देती है। किंतु पेट भरते ही डाकू का कृतघ्न और क्रूर स्वभाव जाग उठता है। वह गोरा को डराता है, नदी पार करने के लिए उसके पिता की नाव माँगता है, और पुलिस से बचने के लिए जनाना वेश धारण करने हेतु गोरा से उसकी वही नई लाल साड़ी जबरन उतरवा लेता है। यही नहीं, अपनी पहचान छिपाए रखने के लिए वह गोरा के हाथ से लाठी छीनकर उसके सिर पर जानलेवा वार कर देता है, जिससे वह अचेत होकर गिर पड़ती है। इसके बाद डाकू घूँघट काढ़े साड़ी पहनकर नाव खेता हुआ भाग निकलता है।
चार मील आगे चलकर डाकू एक गाँव के घाट पर नाव बाँधता है और किसी को लूटने की नीयत से अँधेरे में गाँव की तरफ बढ़ता है। रास्ते में सामने से लालटेन लिए गोवर्धन आ रहा होता है। गोवर्धन उस खास लाल साड़ी को देखकर समझता है कि गोरा आई है। जब वह घूँघट हटाता है, तो एक पुरुष का चेहरा देखकर स्तब्ध रह जाता है और उसे तुरंत पकड़ लेता है। डाकू बचने के लिए झूठी कहानी गढ़ता है कि गोरा ने रहम खाकर उसे साड़ी और नाव दान में दी है। चतुर गोवर्धन उसकी बातों में नहीं आता; उसे संदेह होता है कि डाकू ने गोरा के साथ कोई अनर्थ किया है। वह डाकू को नाव में बैठाकर आधी रात को ही शिवराम के झोंपड़े की ओर ले चलता है।
घाट पर पहुँचने पर सिर पर गहरी चोट खाए और आधी साड़ी में लिपटी गोरा सिसकती हुई मिलती है। गोवर्धन के पूछने पर वह रोते हुए खुलासा करती है कि इस दुष्ट ने जबरदस्ती साड़ी व नाव छीनी और उसके सिर पर डंडे से प्रहार किया। सच्चाई सामने आते ही गोवर्धन का खून खौल उठता है। वह डाकू द्वारा गोरा से छीना गया वही डंडा उठाकर उस पर झपटता है। डाकू जान बचाने के लिए अंधाधुंध भागता है और पास के अथाह, दलदली दलदल में जा धँसता है। अगली सुबह दलदल में डाकू के पैरों के निशान एक गहरे गड्ढे में समाप्त मिलते हैं—दलदल उसे अपने भीतर समा चुका था। इस प्रकार उस पापी को अपने दुष्कर्मों का तत्काल फल मिल जाता है।
प्रकाशन इतिहास
यह कहानी सर्वप्रथम उर्दू में उर्दू पत्रिका अदीब के जुलाई, 1912 के अंक में प्रकाशित हुई थी। बाद में इसका हिन्दी रूपांतर इसी शीर्षक से प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य (खण्ड-1) में संकलित किया गया।
महत्त्व और विषय-विमर्श
- कर्मफल और अपरिहार्य न्याय (कैफ़ार-ए-कारदार): कहानी का मूल संदेश यह है कि अन्याय और क्रूरता का फल मनुष्य को भोगना ही पड़ता है। डाकू जिस लाठी और छल से एक निरीह युवती पर वार करके भागा था, उसी लाठी के भय से भागता हुआ वह दलदल में समाकर अपनी जीवन-लीला समाप्त कर बैठता है।
- कृतघ्नता बनाम परोपकार की टकराहट: गोरा द्वारा शरण और भोजन देने की पवित्र मानवीय संवेदना के विपरीत डाकू का उसके साथ विश्वासघात, लूट और हिंसा करना मनुष्य के भीतर छिपे पाशविक और कृतघ्न रूप को दर्शाता है।
- ग्रामीण स्त्री का एकाकीपन और असुरक्षा: बीहड़ और सुनसान इलाके में अकेली रहने वाली ग्रामीण युवती की असहायता और भय को प्रेमचंद ने बड़ी गहराई से उभारा है।
- सतर्कता, विवेक और पौरुष: गोवर्धन का चरित्र केवल एक प्रेमी का नहीं, बल्कि सजग और साहसी युवक का है। वह डाकू के झूठ को पकड़ता है, सत्य की पड़ताल करता है और अन्यायी को दंड दिलाने में तनिक भी देर नहीं करता।
- कहानी का व्यापक महत्त्व: 'कैफ़ार-ए-कारदार' लोक-संस्कृति के नैतिक विश्वास—'जैसी करनी वैसी भरनी'—को रोमांचक कथा-शिल्प में ढालती है। प्रेमचंद यहाँ यह आश्वस्ति देते हैं कि प्रकृति और समाज में कोई भी दुराचारी अपने कुकर्मों के परिणाम से बच नहीं सकता।
