यह भी नशा वह भी नशा का मूल पाठ
होली के दिन राय साहब पण्डित घसीटेलाल की बारहदरी में भंग छन रही थी कि सहसा मालूम हुआ, जिलाधीश मिस्टर बुल आ रहे हें। बुल साहब बहुत ही मिलनसार आदमी थे और अभी हाल ही में विलायत से आये थे। भारतीय रीति-नीति के जिज्ञासु थे, बहुधा मेले-ठेलों में जाते थे। शायद इस विषय पर कोई बड़ी किताब लिख रहे थे। उनकी खबर पाते ही यहाँ बड़ी खलबली मच गयी। सब-के-सब नंग-धड़ेंग, मूसरचन्द बने भंग छान रहे
थे। कोन जानता था कि इस वक्त साहब आएँगे। फुर-से भागे, कोई ऊपर जा छिपा, कोई घर में भागा, पर बिचारे राय साहब जहाँ के तहाँ निश्चल बेठे रह गये। आधा घण्टे में तो आप काँखकर उठते थे ओर घण्टे भर में एक कदम रखते थे,इस भगदड़ में केसे भागते। जब देखा कि अब प्राण बचने का कोई उपाय नहीं है, तो ऐसा मुँह बना लिया मानो वह जान बूझकर इस स्वदेशी ठाट से साहब का स्वागत करने को बेठे हैं। साहब ने बरामदे में आते ही कहा -- हेलो राय साहब, आज तो आपका होली हे?
राय साहब ने हाथ बाँधकर कहा -- हाँ सरकार, होली है। बुल -- खूब लाल रंग खेलता हे? राय साहब -- हाँ सरकार, आज के दिन की यही बहार हे।
साहब ने पिचकारी उठा ली। सामने मटकों में गुलाल रखा हुआ था। बुल ने पिचकारी भरकर पण्डितजी के मुँह पर छोड़ दी तो पण्डितजी नहीं उठे। धन्य भाग! केसे यह सोभाग्य प्राप्त हो सकता है। वाह रे हाकिम! इसे प्रजावात्सल्य कहते हैं। आह! इस वक्त सेठ जोखनराम होते तो दिखा देता कि यहाँ जिला में अफसर इतनी कृपा करते हैं। बताएँ आकर कि उन पर किसी गोरे ने भी पिचकारी छोड़ी हे, जिलाधीश का कहना ही क््या। यह पूर्व-तपस्या का फल हे, ओर कुछ नहीं। कोई पहले एक सहस्न वर्ष तपस्या करे, तब यह परम पद पा सकता है। हाथ जोड़कर बोले -- धर्मावतार, आज जीवन सफल हो गया। जब सरकार ने होली खेली है तो मुझे भी हुक्म मिले कि अपने हृदय की अभिलाषा पूरी कर लूँ।
यह कहकर राय साहब ने गुलाल का एक टीका साहब के माथे पर लगा दिया।
बुल -- इस बड़े बरतन में क्या रखा हे, राय साहब?
राय -- सरकार, यह भंग है। बहुत विधिपूर्वक बनाई गयी हे हज्र!
बुल -- इसके पीने से क्या होगा?
राय -- हुजूर की आँखें खुल जाएँगी। बड़ी विलक्षण वस्तु है सरकार।
बुल -- हम भी पीएगा।
राय साहब को जान पड़ा मानो स्वर्ग के द्वार खुल गये हैं ओर वह पुष्पक विमान पर बेठे ऊपर उड़े चले जा रहे हैं। ग्लास तो साहब को देना उचित न था, पर कुल्हड़ में देते संकोच होता था। आखिर बहुत ऊँच-नीच सोचकर ग्लास में भंग उँडली ओर साहब को दी। साहब पी गये। मारे सुगन्ध के चित्त प्रसन्न हो गया।
दूसरे दिन राय साहब इस मुलाकात का जवाब देने चले।
प्रातःकाल ज्योतिषी से मुहूर्त पूछा | पहर रात गये साइत बनती थी, अतएव दिन-भर खूब तेयारियाँ कीं। ठीक समय पर चले। साहब उस समय भोजन कर रहे थे। खबर पाते ही सलाम दिया। राय
साहब अन्दर गये तो शराब की दुर्गन्ध से नाक फटने लगी। बेचारे अंग्रेजी दवा न पीते थे, अपनी उम्र में शराब कभी न छुई थी। जी में आया कि नाक बन्द कर लें, मगर डरे कि साहब बुरा न मान जाएँ। जी मचला रहा था, पर साँस रोके बेठे हुए थे। साहब ने एक चुस्की ली ओर ग्लास मेज पर रखते हुए बोले -- राय साहब हम कल आप का बंग पी गया, आज आपको हमारा बंग पीना पड़ेगा। आपका बंग बहुत अच्छा था। हम बहुत-सा खाना खा गया।
राय -- हुजूर, हम लोग मदिरा हाथ से भी नहीं छूते। हमारे शास्त्रों में इसको छूना पाप कहा गया हे।
बुल -- (हँसकर) नहीं, नहीं, आपको पीना पड़ेगा राय साहब! पाप- पुन कुछ नहीं है। यह हमारा बंग है, वह आपका बंग है। कोई फरक नहीं है। उससे भी नशा होता है, इससे भी नशा होता हे, फिर फरक केसा?
राय - नहीं, धर्मावतार, मदिरा को हमारे यहाँ वर्जित किया गया
हे
बुल -- ऐसा कभी होने नहीं सकता। शास्त्र मना करेगा तो इसको भी मना करेगा, उसको भी मना करेगा। अफीम को भी मना करेगा। आप इसको पिएँ, डरें नहीं। बहुत अच्छा हे।
यह कहते हुए साहब ने एक ग्लास में शराब उँडेलकर राय साहब के मुँह से लगा ही तो दी। राय साहब ने मुँह फेर लिया ओर आँखें बन्द करके दोनों हाथों से साहब का हाथ हटाने लगे। साहब की समझ में यह रहस्य न आता था। वह यही समझ रहे थे कि यह डर के मारे नहीं पी रहे हैं। अपने मजबूत हाथों से राय साहब की गरदन पकड़ी ओर ग्लास मुँह की तरफ बढ़ाया। राय साहब को अब क्रोध आ गया। साहब खातिर से सब कुछ कर सकते थे; पर धर्म नहीं छोड़ सकते थे। जरा कठोर स्वर में बोले -- हुजूर, हम वेष्णव हैं। हम इसे छूना भी पाप समझते हें।
राय साहब इसके आगे ओर कुछ न कह सके। मारे आवेश में कण्ठावरोध हो गया। एक क्षण बाद जरा स्वर को संयत करके फिर बोले -- ह॒जूर, भंग पवित्र वस्तु हे। ऋषि, मुनि, साधु, महात्मा, देवी, देवता सब इसका सेवन करते हैं। सरकार, हमारे यहाँ इसकी बड़ी महिमा लिखी है। कोन ऐसा पण्डित हे, जो बूटी न छानता हो। लेकिन मदिरा का तो सरकार, हम नाम लेना भी पाप
समझते हें।
बुल ने ग्लास हटा लिया ओर कुरसी पर बेठकर बोला -- तुम पागल का माफिक बात करता है। धरम का किताब बंग और शराब दोनों को बुरा कहता है। तुम उसको ठीक नहीं समझता।
नशा को इसलिए सारा दुनिया बुरा कहता है कि इससे आदमी का अकल खत्म हो जाता है। तो बंग पीने से पण्डित ओर देवता लोग का अकल केसे खप्त नहीं होगा, यह हम नहीं समझ
सकता। तुम्हारा पण्डित लोग बंग पीकर राक्षस क्यों नहीं होता! हम समझता हे कि तुम्हारा पण्डित लोग बंग पीकर खप्त हो गया है, तभी तो वह कहता है, यह अछूत है, वह नापाक हे, रोटी नहीं खाएगा, मिठाई खाएगा। हम छू लें तो तुम पानी नहीं पीएगा।
यह सब खप्त लोगों का बात। अच्छा सलाम!
राय साहब की जान-में-जान आयी। गिरते-पड़ते बरामदे में आये, गाड़ी पर बेठे ओर घर की राह ली।
यह भी नशा वह भी नशा का सारांश
'यह भी नशा वह भी नशा' होली के त्योहार की पृष्ठभूमि में लिखी गई एक अत्यंत हास्य-व्यंग्यात्मक कहानी है, जो धार्मिक पाखंड, नशे के दोहरे मापदंडों और औपनिवेशिक काल की दास-मानसिकता पर करारी चोट करती है। होली के दिन राय साहब पंडित घसीटेलाल की बारहदरी में भंग का दौर चल रहा था कि अचानक जिलाधीश मिस्टर बुल पहुँच गए। राय साहब के सभी साथी डरकर भाग गए, परंतु स्थूलकाय राय साहब वहीं फंसे रह गए। नए आए अंग्रेज अफसर मिस्टर बुल ने सहज भाव से राय साहब पर पिचकारी छोड़ी और उनके द्वारा बनाई गई भंग बड़े चाव से पी। राय साहब जिलाधीश की इस कृपा से खुद को धन्य और परम पद प्राप्त समझने लगे।
अगले दिन राय साहब शुभ मुहूर्त देखकर जिलाधीश के बंगले पर उनका धन्यवाद करने और भेंट का जवाब देने पहुँचे। वहाँ मिस्टर बुल भोजन के साथ मदिरा (शराब) का सेवन कर रहे थे। मिस्टर बुल ने राय साहब को शराब पीने का निमंत्रण देते हुए तर्क दिया कि "यह हमारा भंग है और वह आपका भंग... दोनों से नशा होता है, तो फर्क क्या है?" पंडित घसीटेलाल मदिरा को महापाप और अछूत मानते हुए उसे पीने से साफ इंकार कर देते हैं तथा तर्क देते हैं कि भंग तो पवित्र है जिसे ऋषि-मुनि और देवता भी ग्रहण करते हैं।
मिस्टर बुल राय साहब के इस कुतर्क और धार्मिक अंधविश्वास पर हँसते हैं। वे खरी-खरी सुनाते हुए कहते हैं कि नशा चाहे भंग का हो या शराब का, वह मनुष्य की बुद्धि को भ्रष्ट ही करता है। वे भारतीय समाज में व्याप्त छुआछूत और पंडितों की संकीर्ण मानसिकता पर व्यंग्य करते हैं। पंडित जी जब किसी तरह जान बचाकर वहाँ से निकलते हैं, तब उनकी जान में जान आती है।
प्रकाशन इतिहास
प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।
महत्त्व और विषय-विमर्श
- धार्मिक पाखंड और दोहरे मापदंड पर व्यंग्य: कहानी में पंडित घसीटेलाल के माध्यम से धार्मिक अंधविश्वास पर प्रहार किया गया है, जहाँ शास्त्र और परंपरा का हवाला देकर भंग जैसे मादक पदार्थ को 'पवित्र' और मदिरा को 'पाप' ठहराने की हास्यास्पद कोशिश की जाती है।
- अंग्रेज अधिकारी का यथार्थवादी दृष्टिकोण: मिस्टर बुल का पात्र औपनिवेशिक तार्किकता का प्रतिनिधित्व करता है। वे बिना किसी पूर्वाग्रह के यह उजागर करते हैं कि नशा केवल नशा है और वह इंसान की सोचने-समझने की क्षमता को नष्ट कर देता है।
- सामंती चाटुकारिता और दासता की प्रवृत्ति: ब्रिटिश अफसरों के सामने राय साहब का समर्पण और उनके द्वारा फेंके गए गुलाल या पिचकारी को 'पूर्व जन्मों की तपस्या का फल' मानना भारतीय रईसों की गुलाम मानसिकता को उजागर करता है।
- रूढ़िवादिता और छुआछूत पर चोट: कहानी के अंत में मिस्टर बुल के संवाद भारतीय समाज की संकीर्णता, छुआछूत और खान-पान के आडंबरों का पर्दाफाश करते हैं, जो विवेक के स्थान पर रूढ़ियों को सर्वोपरि मानते हैं।
- कहानी का व्यापक महत्त्व: यह कहानी हल्की-फुल्की शैली में समाज के गंभीर सामाजिक और वैचारिक अंतर्विरोधों को सामने लाती है। यह संदेश देती है कि धर्म के नाम पर बुराइयों का महिमामंडन करना विवेकहीनता है।
