कभी-कभी हमारे विचारशील नेता भी कोई मौलिक उक्ति निकालने की धुन में ऊटपटांग बकने लगते हैं। मौलाना शौकतअली ने तो दीवाने मुल्ला का रूप धर लिया है। आपने अपने एक व्याख्यान में कहा—'मैं एक लाख गांधियों से अकेला लड़ने को तैयार हूँ।' एक दूसरे अवसर पर आपने लाख की संख्या को करोड़ तक पहुँचा दिया। हम नहीं समझते, इस तरह के उन्मत्त प्रलाप से मौलाना का मंशा क्या है। यदि वह अपने अलौकिक बाहुबल का प्रदर्शन करना चाहते हैं, तो ऐसे वाक्यों से उनकी दुर्बलता और भी प्रकट होती है। महात्मा गांधी की शक्ति उनके बाहुबल में नहीं, उनके आत्मबल में है, जिसने भारतीय सरकार तक को हिला दिया है और जो निकट भविष्य में मुसलिम लीडरी भी उनके हाथों से छीन लेगी। ज़माने का रुख कहे देता है कि जो लोग राष्ट्रीयता से द्रोह करेंगे उन्हें मुँह की खानी पड़ेगी। वह दिन अब लदा जा रहा है, जब पृथकता और मुसलिम हितों का सब्जबाग दिखाकर मुसलिम जनता को ठगा गया था। अब जनता समझने लगी है कि भारत में हिन्दू और मुसलमान दोनों एक ही नाव पर सवार हैं। डूबेंगे, तो दोनों साथ डूबेंगे, पार लगेंगे तो दोनों साथ पार लगेंगे। कानपुर का दंगा, हमें विश्वास है, हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य का अंतिम उच्छ्वास था। आज नेशनलिस्ट मुसलमान समस्त भारतवर्ष में संगठित हो रहे हैं और शीघ्र ही दुनिया देखेगी कि पृथकता के उपासकों में सरकार के पिट्ठुओं के सिवा और कोई नहीं है।
अगर मौलाना शौकतअली ने इस प्रलाप से अपने को हास्यास्पद बना लिया है तो सरदार पटेल ने भी गुजरात में एक दूसरे तरह के प्रलाप से अपनी अनम्रता प्रकट की है। आपने एक व्याख्यान में फ़रमाया—'भारत में घोर संग्राम छिड़ने वाला है और जिन्हें अपनी जान प्यारी हो, उन्हें भारत से प्रस्थान कर जाना चाहिए।' सरदार पटेल को चाहे जान प्यारी न हो, लेकिन और तो सभी मनुष्यों को अपनी जान प्यारी होती है और जिसको जान जितनी ही प्यारी होती है, वह उस व्यवस्था को लाने में उतने ही उत्साह और त्याग से योग देता है, जिसमें जीवन अधिक सुखी हो। स्वराज्य के लिए हम इसीलिए लड़ रहे हैं कि हमें अपनी जान प्यारी है और हम उसे ऐसी परिस्थिति में देखना चाहते हैं, जहाँ वह स्वच्छन्द रूप से उन्नति कर सके। जो मर जाना ही अपने लिए शुभ समझता है, वह स्वराज्य में कदापि योग नहीं दे सकता। फिर सरदार साहब को जान प्यारी नहीं है, यह कौन कह सकता है? अभी दो साल पहले वह वकालत करते थे, विलायत कानून पढ़ने गये थे, इसलिए कि जान प्यारी थी। अगर दो साल से उन्हें विशेष जागृति हो गई है, तो क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जिन पर वह आज लांछन लगा रहे हैं कल उन्हें भी यही जागृति प्राप्त हो जाय। जिन परिस्थितियों में आपका अधिकांश जीवन बीता है, उन्हीं परिस्थितियों में और बहुत-से लोग आज भी अपना जीवन काट रहे हैं। अगर आप उनसे पहले चौंक पड़े, तो आपको उन पर कटाक्ष करने का अधिकार नहीं है। आपको चाहिए उन्हें अपने पुरुषार्थ और तप से सचेत करें, उन पर फ़िक़रे चुस्त करके आप उनका दिल दुखाने के सिवा और कुछ नहीं कर सकते।
फिर आप यह क्यों समझते हैं कि स्वराज्य का ठेका आपने ही लिया है? जिस तरह आप स्वराज्य के इच्छुक हैं, उसी तरह और लोग भी हैं। शायद ही कोई ऐसा अधम प्राणी हो, जो स्वराज्य का प्रेमी न हो। आप में ज्यादा शक्ति और साहस है, आप शस्त्र लेकर मैदान में आ जाते हैं, लेकिन क्या जो आदमी अनाज और गोली-बारूद और वर्दी-कपड़े से आपकी सहायता कर रहा है वह किसी गिनती में ही नहीं? कांग्रेस ने इस संग्राम में करोड़ों खर्च किया होगा। यह रुपये सरदार पटेल के घर से नहीं निकले, यह पब्लिक ने प्रदान किये थे। इस धन के बिना स्वराज्य का आंदोलन एक दिन भी न चल सकता। नम्रता योद्धाओं का श्रृंगार है। डींग मारना और दूसरों पर आवाजें कसना, उनकी शान के खिलाफ है।
प्रकाशन इतिहास
[सम्पादकीय। 'हंस', अप्रैल, 1931 में प्रकाशित। 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य' खण्ड-2 में संकलित।]
