पर्वत यात्रा का मूल पाठ
प्रातःकाल मुं. गुलाबाजखाँ ने नमाज पढ़ी, कपड़े पहने ओर महरी से किराये की गाड़ी लाने को कहा। शीरी बेगम ने पूछा -- आज सबेरे -- सबेरे कहाँ जाने का इरादा हे?
गुल -- जरा छोटे साहब को सलाम करने जाना हे।
शीरी -- तो पैदल क्यों नही चले जाते? कोन बड़ी दूर है।
गुल -- जो बात तुम्हारी समझ मे न आये, उसमें जबान न खोला करो।
शीरी - पूछती तो हूँ पेदल चले जाने मे क्या हरज हे? गाड़ीवाला एक रुपये से कम न लेगा।
गुल -- (हँसकर) हुक्काम किराया नही देते। उसकी हिम्मत हे कि मुझसे किराया माँगे! चालान करवा दूँ।
शीरी -- तुम तो हाकिम भी नही हो, तुम्हें वह क्यों ले जाने लगा!
गुल -- हाकिम केसे नही हूँ? हाकिम के क्या सींग-पूंछ होती हे, जो मेरे नही हैं? हाकिम को दोस्त हाकिम से कम रोब नही
रखता। अहमक नही हूँ कि सो काम छोड़कर हुक्काम की सलामी बजाया करती हूँ। यही इसी की बरकत है कि पुलिस माल दीवानी के अहलकार मुझे झुक-झुककर सलाम करते हे, थानेदार ने कल जो सोगात भेजी थी,वह किसलिए? मे उनका दामाद तो नही हूँ। सब मुझसे डरते है।
इतने में महरी एक ताँगा लाई। खाँ साहब ने फोरन साफा बाँधा ओर चले। शीरी ने कहा -- अरे, तो पान तो खाते जाओं!
गुल - हाँ, लाओं हाथ मे मेंहदी भी लगा दो। अरी नेकबख्त, हुक्काम के सामने पान खाकर जाना बेअदबी हे।
शीरी -- आओगे कब तक? खाना तो यही खाओगें!
गुल -- तुम मेरे खाने की फ्रिक न करना, शायद कुँअरसाहब के यहाँ चला जाऊँ। कोई मुझे पूछे तो कहला देना, बड़े साहब से मिलने गये हे।
खाँ साहब आकर ताँगे पर बेठे। ताँगेवाले ने पूछा -- हुजूर, कहाँ चलूँ?
गुल -- छोटे साहब के बंगले पर। सरकारी काम से जाना हे। ताँगे -- हुजूर को वहाँ कितनी देर लगेगी?
गुल -- यह मे केसे बता दूँ,यह तो हो नही सकता कि साहब मुझसे बार-बार बेठने को कहे ओर मे उठकर चला आऊँ। सरकारी काम हे,न जाने कितनी देर लगे। बड़े अच्छे आदमी हे बेचारे। मजाल नही कि जो बात कह दूँ, उससे इनकार कर दे। आदमी को गरूर न करना चाहिए। गरूर करना शैतान का काम है। मगर कई थानेदारों से जवाब तलब कर चुका हूँ। जिसको देखा कि रिआया को ईजा पहुँचाता है, उसके पीछे पड़ जाता हूँ।
ताँगे -- हुजूर पुलिस बड़ा अंधेर करती है। जब देखो बेगार कभी आधी रत को बुला भेजा, कभी फजिर को। मरे जाते हे हुजूर। उस पर हर मोड़ पर सिपाहियों को पेसे चाहिए। न दे, तो झूठा चालान कर दें।
गुल -- सब जानता हूँ जी, अपनी झोपड़ी मे बेठा सारी दुनिया की सेर किया करता हूँ। वही बेठे-बेठे बदमाशों की खबर लिया करता हूँ। देखो, ताँगे को बंगले के भीतर न ले जाना। बाहर फाटक पर रोक देना।
ताँगे -- अच्छा हुजूर। अच्छा, अब देखिये वह सिपाह मोड़ पर खड़ा है। पेसे के लिए हाथ फैलायेगा। न दूँ तो ललकारेगा। मगर आज कसम कुरान की, टका-सा जवाब दे दूँगा। हुजूर बेढे है तो क्या कर सकता हे।
गुल -- नही, नही, जरा-जरा सी बात पर मे इन छोटे आदमियों से नही लड़ता। पेसे दे देना। मे तो पीछे से बचा की खबर लूँगा। मुअत्तल न करा दूँ तो सही। दूबदू गाली-गलोज करना, इन छोटे आदमियों के मुँह लगना मेरी आदत नही।
ताँगेवाले को भी यह बात पसन्द आई। मोड़ पर उसने सिपाही को पैसे दे दिए। ताँगा साहब के बंगले पर पहुँचा। खाँ साहब उतरे, ओर जिस तरह कोई शिकारी पेर दबा-दबाकर चोकन्नी आँखो से देखता हुआ चलता है, उसी तरह आप बंगले के बरामदे मे जाकर खड़े हो गए। बेरा बरामदे मे बेठा था। आपने उसे देखते ही सलाम किया।
बेरा -- हुजूर तो अंधेर करते है। सलाम हमको करना चाहिए और आप पहले ही हाथ उठा देते है।
गुल -- अजी इन बातों मे क्या रक्खा है। खुदा की निगाह मे सब इन्सान बराबर हे।
बेरा -- हुजूर को अल्लाह सलामत रकखें, क्या बात कही है। हक तो यह है पर आदमी अपने को कितना भूल जाता हे! यहाँ तो छोटे-छोटे अमले भी इंतजार करते रहते हे कि यह हाथ उठावें। साहब को इत्तला कर दूँ?
गुल -- आराम मे हो तो रहने दो, अभी ऐसी कोई जल्दी नहीं।
बेरा -- जी नही हुजूर हाजिरी पर से तो कभी के उठ चुके, कागज-वागज पढ़ते होगें।
गुल -- अब इसका तुम्हें अख्तियार हे, जेसा मोका हो वेसा करो। मौका-महल पहचानना तुम्हीं लोगो का काम है। क्या हुआ, तुम्हारी लड़की तो खेरियत से है न?
बैरा -- हाँ हुजूर, अब बहुत मजे मे हे। जब से हुजूर ने उसके घरवालों को बुलाकर डाँट दिया है, तब से किसी ने चूँ भी नही किया। लड़की हुजूर की जान-माल को दुआ देती हे।
बेरे ने साहब को खाँ साहब की इत्तला की, ओर एक क्षण मे खाँ साहब जूते उतार कर साहब के सामने जा खंडे हुए ओर सलाम करके फर्श पर बेठ गए। साहब का नाम काटन था।
काटन -- ओ!ओ! यह आप क्या करता हे, कुर्सी पर बेठिए, कुर्सी पर बेठिए।
काटन -- नहीं, नहीं आप हमारा दोस्त है। खाँ -- हुजूर चाहे मेरे को आफताब बना दें, पर मैं तो अपनी हकीकत समझता हूँ। बंदा उन लोगों मे नहीं है जो हुजूर के
करम से चार हरफ पढ़कर जमीन पर पाँव नही रखते ओर हुजूर लोगों की बराबरी करने लगते हे।
काटन -- खाँ साहब आप बहुत अच्छे आदमी हैं। हम आत के पाँचवे दिन नेनीताल जा रहा है। वहाँ से लोटकर आपसे मुलाकात करेगा। आप तो कई बार नेनीताल गया होगा। अब तो सब रईस लोग वहाँ जाता हे।
खाँ साहब नेनीताल क्या, बरेली तक भी न गये थे, पर इस समय केसे कह देते कि में वहाँ कभी नहीं गया। साहब की नजरों से गिर न जाते! साहब समझते कि यह रईस नही, कोई चरकटा है। बोले -- हाँ हुजूर कई बार हो आया हूँ।
काटन -- आप कई बार हो आया हे? हम तो पहली दफा जाता है। सुना बहुत अच्छा शहर हे।?
खाँ -- बहुत बड़ा शहर हे हुजूर, मगर कुछ ऐसा बड़ा भी नहीं
हे।
काटन -- आप कहाँ ठहरता? वहाँ होटलो मे तो बहुत पैसा लगता हे।
खाँ -- मेरी हुजूर न पूछें, कभी कहीं ठहर गया, कभी कहीं ठहर गया। हुजूर के अकबाल से सभी जगह दोस्त है।
काटन -- आप वहाँ किसी के नाम चिट्टी दे सकता हे कि मेरे ठहरने का बंदोबस्त कर दें। हम किफायत से काम करना
चाहता है। आप तो हर साल जाता हे, हमारे साथ क्यों नहीं चलता।
खाँ साहब बड़ी मुश्किल में फंसे। अब बचाव का कोई उपाय न था। कहना पड़ा -- जैसा हुजूर के साथ ही चला चलूँगा। मगर मुझे अभी जरा देर हे हुजूर।
काटन -- ओ कुछ परवाह नहीं, हम आपके लिए एक हफ्ता ठहर सकता है। अच्छा सलाम। आज ही आप अपने दोस्त को जगह का इन्तजाम करने को लिख दें। आज के सातवें दिन हम ओर आप साथ चलेगा। हम आपको रेलवे स्टेशन पर मिलेगा।
खाँ साहब ने सलाम किया, ओर बाहर निकले। ताँगे वाले से कहा -- कुँअर शमशेर सिंह की कोठी पर चलो।
कुँअर शमशेर सिंह .खानदानी रईस थे। उन्हें अभी तक अंग्रेजी रहन-सहन की कवा न लगी थी। दस बजे दिन तक सोना, फिर दोस्तों और मुसाहिबों के साथ गपशप करना, दो बजे खाना खाकर फिर सोना, शाम को चोक की हवा खाना ओर घर आकर बारह-
एक बजे तक किसी परी का मुजरा देखना, यही उनकी दिनचर्या थी। दुनिया में क्या होता है, इसकी उन्हें कुछ खबर न होती थी। या हुई भी तो सुनी-सुनाई। खाँ साहब उनके दोस्तों में थे।
जिस वक्त खाँ साहब कोठी में पहुंचे दस बज गये थे, कुँअर साहब बाहर निकल आये थे,मित्रगण जमा थे। खाँ साहब को देखते ही कुँअर साहब ने पूछा -- कहिए खाँ, साहब, किधर से?
खाँ साहब -- जरा साहब से मिलने गया था। कई दिन बुला-बुला भेजा, मगर फुर्सत ही न मिलती थीं। आज उनका आदमी जबर्दस्ती खींच ले गया। क्या करता, जाना ही पड़ा। कहाँ तक बेरूखी करूँ।
कुँअर -- यार, तुम न जाने अफसरों पर क्या जादू कर देते हो कि जो आता हे तुम्हारा दम भरने लगता है। मुझे वह मन्त्र क्यों नहीं सिखा देते।
खाँ -- मुझे खुद ही नहीं मालूम कि क्यों हुक्काम मुझ पर इतने मेहरबान रहते हैं। आपको यकीन न आवेगा, मेरी आवाज सुनते ही कमरे के दरवाजे पर आकर खड़े हो गये ओर ले जाकर अपनी खास कुर्सी पर बेठा दिया।
कुँअर -- अपनी खास कुर्सी पर?
खाँ -- हाँ साहब, हेरत में आ गया, मगर बेठना ही पड़ा। फिर सिगार मँगवाया, इलाइच, मेवे, चाय सभी कुछ आ गए। यों कहिए कि खासी दावत हो गई। यह मेहमानदारी देखकर में दंग रह गया।
कुँअर -- तो वह सब दोस्ती भी करना जानते हें।
खाँ -- अजी दूसरा क्या खाँ के दोस्ती करेगा। अब हद हो गई कि मुझे अपने साथ नेनीताल चलने को मजबूर किया।
कुँअर -- सच!
खाँ -- कसम कुरान की। हेरान था कि क्या जबाब दूँ। मगर जब देखा कि किसी तरह नहीं मानते, तो वादा करना ही पड़ा। आज ही के दिन कूच हे।
कुँअर -- क्यों यार, में भी चला चलूँ तो कया हरज हें? खाँ -- सुभानअल्लाह, इससे बढ़कर क्या बात होगी।
कुँअर -- भई, लोग, तरह-तरह की बातें करते हैं, इससे जाते डर लगता हैं। आप तो हो आये होंगे?
खाँ -- कई बार हो आया हूँ। हाँ,इधर कई साल से नहीं गया।
कुँअर -- क्यों साहब, पहाड़ों पर चढ़ते-चढ़ते दम फूल जाता
होगा?
राधाकान्त व्यास बोले -- धर्मावतार, चढ़ने को तो किसी तरह चढ़ भी जाइए पर पहाड़ों का पानी ऐसा खराब होता हे कि एक बार लग गया तो प्राण ही लेकर छोड़ता हे। बदरीनाथ की यात्रा करने जितने यात्री जाते हैं, उनमें बहुत कम जीते लौटते हैं ओर संग्रहणी तो प्रायः सभी को ही जाती हे।
कुँअर -- हाँ, सूना तो हमने भी है कि पहाड़ों का पानी बहुत लगता है।
लाला सुखदयाल ने हामी भरी -- गोसाई जी ने भी तो पहाड़ के पानी की निन््दा की है --
लागत अति पहाड़ का पानी।
बड़ दुख होत न जाई बखानी। । खाँ -- तो यह इतने अंग्रेज वहाँ क्यों जाते हे साहब? ये लोग अपने वक्त के लुकमान है। इनका कोई काम मसलहत से खाली नहीं होता? पहाड़ों की सैर से कोई फायदा न होता तो क्यो जातें, जरा यह तो सोचिए।
व्यास -- यही सोच-सोचकर तो हमारे रईस अपना सर्वनाश कर रहे है। उनकी देखी-देखी धन का नाश, धर्म का नाश,बल का नाश होता चला जाता हे, फिर भी हमारी आँखें नहीं खुलतीं।
लाला - मेरे पिता जी एक बार किसी अंग्रेज के साथ पहाड़ पर गये। वहाँ से लोटे तो मुझे नसीहत की कि खबरदार, कभी पहाड़ पर न जाना। आखिर कोई बात देखी होगी, जमी तो यह नसीहत की।
वाजिद -- हुजूर, खाँ साहब जाते हैं जाने दीजिए, आपको में जाने की सलाह न दूँगा। जरा सोचिए, कोसों की चढ़ाई, फिर रास्ता इतना खतरनाक कि खुदा की पनाह! जरा-सी पगड़डी ओर दोनों तरफ कोसों का खड्ड। नीचे देखा ओर थरथरा कर आदमी गिर पड़ा और जो कहीं पत्थरों में आग लग गई, तो चलिए वारा-न्यारा हो गया। जल-भुन के कबाब हो गये।
खाँ -- ओर जो लाखों आदमी पहाड़ पर रहते हें?
वाजिद -- उनकी ओर बात हे भाई साहब।
खाँ -- और बात केसी? क्या वे आदमी नहीं हें?
वाजिद -- लाखों आदमी दिन-भर हल जोतते हें, फावड़े चलाते हें, लकड़ी फाड़ते हैं, आप करेंगे? हे आप में इतनी दम? हुजूर उस चढ़ाई पर चढ़ सकते हें?
खाँ -- क्यों नहीं टट्टुओं पर जाएँगे।
वाजिद -- टटटुओं पर छः कोस की चढ़ाई! होश की दवा कीजिए।
कुँअर -- टट्टओं पर! मई हमसे न जाया जायगा। कहीं टट्टू भड़के तो कहीं के न रहे।
लाला - गिरे तो हड्डियाँ तक न मिले! व्यास -- प्राण तक चूर-चूर हो जाय।
वाजिद -- खुदावंद, एक जरा-सी ऊँचाई पर से आदमी देखता हें, तो काँपने लगता हे, न कि पहाड़ की चढ़ाई।
कुँअर - वहाँ सड़कों पर इधर-उधर ईंट या पत्थर की मुंडेर नहीं बनी हुई हें?
वाजिद -- खुदावंद, मंजिलों के रास्तें में मुंडेर केसी! कुँअर -- आदमी का काम तो नहीं है। लाला -- सुना वहाँ घेघा निकल आता हे।
कुँअर -- ओरे भई यह बुरा रोग हे। तब मे वहाँ जाने का नाम भी न लूँगा।
खाँ -- आप लाल साहब से पूछें कि साहब लोग जो वहाँ रहते हें, उनको घेघा क्यों नहीं हो जाता?
लाला -- वह लोग ब्रांडी पीते है। हम ओर आप उनकी बराबरी कर सकते हैं भला। फिर उनका अकबाल!
वाजिद -- मुझे तो यकीन नहीं आता कि खाँ साहब कभी नेनीताल गये हों। इस वक्त डींग मार रहे हे। क्यों साहब, आप कितने दिन वहाँ रहे?
खाँ -- कोई चार बरस तक रहा था।
वाजिद -- आप वहाँ किस मुहल्ले में रहते थे?
खाँ -- (गड़बड़ा कर) जी - में।
वाजिद -- आखिर आप चार बरस कहाँ रहे?
खाँ -- देखिए याद आ जाय तो कहूँ।
वाजिद -- जाइए भी। नेनीताल की सूरत तक तो देखी नहीं, गप हांक दी कि वहाँ चार बरस तक रहे!
खाँ -- अच्छा साहब, आप ही का कहना सही। में कभी नेनीताल नहीं गया। बस, अब तो आप खुश हुए।
कुँअर -- आखिर आप क्यों नहीं बताते कि नेनीताल में आप कहाँ ठहरे थे।
वाजिद -- कभी गए हों, तब न बताएँ।
खाँ -- कह तो दिया कि में नहीं गया, चलिए छुट्टी हुई। अब आप फरमाइए कुँअर साहब, आपको चलना हे या नहीं? ये लोग
जो कहते हैं सब ठीक है। वहाँ घेघा निकल आता हे, वहाँ का पानी इतना खराब है कि .खाना बिल्कुल नहीं हजम होता, वहाँ हर रोज दस-पाँच आदमी खड्ड में गिरा करते है। अब आप क्या फेसला करते हे? वहाँ जो मजे हे वह यहाँ ख्वाब में भी नहीं मिल सकते। जिन हुक्काम के दरवाजे पर घंटों खड़े रहने पर भी मुलाकात नहीं होती, उनसे वहाँ चोबीसों घंटों खड़े रहने पर भी मुलाकात नहीं होती। उनसे वहाँ चोबीसों घंटों का साथ रहेगा। मिसों के साथ झील में सेर करने का मजा अगर मिल सकता है तो वहीं। अजी सेकड़ों अंग्रेजों से दोस्ती हो जाएगी। तीन महीने वहाँ रहकर आप इतना नाम हासिल कर सकते हैं जितना यहाँ जिन्दगी-भर भी न होगा। बस, ओर क्या कहूँ।
कुँअर - वहाँ बड़े-बड़े अंग्रेजों से मुलाकात हो जाएगी?
खाँ -- जनाब, दावतों के मारे आपको दम मारने की मोहलत न मिलेगी।
कुँअर -- जी तो चाहता है कि एक बार देख ही आएँ।
खाँ -- तो बस तैयारी कीजिए।
सभाजन ने जब देखा कि कुँअर साहब नेनीताल जाने के लिए तेयार हो गए तो सब के सब हाँ में हाँ मिलाने लगे।
व्यास -- पर्वत-कंदराओं में कभी-कभी योगियों के दर्शन हो जाते है।
लाला -- हाँ साहब, सुना हे -- दो-दो सो साल के योगी वहाँ मिलते हे।
जिसकी ओर एक बार आँख उठाकर देख लिया, उसे चारों पदार्थ मिल गये।
वाजिद -- मगर हुजूर चलें, तो इस ठाठ से चलें कि वहाँ के लोग भी कहें कि लखनऊ के कोई रईस आये हे।
लाला -- लक्ष्मी हथिनी को जरूर ले चलिए। वहाँ कभी किसी ने हाथी की सूरत काहे को देखी होगी। जब सरकार सवार होकर निकलेंगे ओर गंगा-जमुनी होौदा चमकेगा तो लोग दंग हो जाएँगे। व्यास -- एक डंका भी हो, तो कया पूछना।
कुँअर -- नहीं साहब, मेरी सलाह डंके की नहीं है। देश देखकर भेष बनाना चाहिए।
लाला - हाँ, डंके की सलाह तो मेरी भी नहीं है। पर हाथी के गले में घंटा जरूर हो।
खाँ -- जब तक वहाँ किसी दोस्त को तार दे दीजिए कि एक पूरा बंगला ठीक कर रक्खे। छोटे साहब को भी उसी में ठहरा लेंगे।
कुँअर -- वह हमारे साथ क्यों ठहरने लगे। अफसर हे।
खाँ -- उनको लाने का जिम्मा हमारा। खींच-खींचकर किसी न किसी तरह ले ही आऊँगा।
कुँअर -- अगर उनके साथ ठहरने का मौका मिले, तब तो में समझूँ नेनीताल का जाना पारस हो गया।
एक हफ्ता गुजर गया। सफर की तैयारियाँ हो गई। प्रातःकाल काटन साहब का खत आया कि आप हमारे यहाँ आएँगे या मुझसे स्टेशन पर मिलेंगे। कुँअर साहब ने जवाब लिखवाया कि आप इधर ही आ जाइएगा। स्टेशन का रास्ता इसी तरफ से हे। में तेयार रहूँगा। यह खत लिखवा कर कुँअर साहब अन्दर गए तो देखा कि उनकी बड़ी साली रामेश्वरी देवी बेठी हुई है। उन्हें देखकर बोली -- क्या आप सचमुच नेनीताल जा रहे हे?
कुँअर -- जी हाँ, आज रात की तेयारी हे।
रामेश्वरी -- अरे! आज ही रात को! यह नहीं हो सकता। कल बच्चा का मुंडन है। में एक न मानूगी। आप ही न होगे तो लोग आकर क्या करेंगे।
कुँअर -- तो आपने पहले ही क्यों न कहला दिया, पहले से मालूम होता तो में कल जाने का इरादा ही क्यों करता। रामेश्वरी -- तो इसमें लाचारी की कोन-सी बात हैं, कल न सही दो-चार दिन बाद सही।
कुँअर साहब की पत्नी सुशीला देवी बोली -- हाँ, और क्या, दो-चार दिन बाद ही जाना, क्या साइट टली हे?
कुँअर -- आह! छोटे साहब से वादा कर चुका हूँ, वह रात ही को मुझे लेने आएँगे। आखिर वह अपने दिल में कया कहेंगे? रामेश्वरी -- ऐसे-ऐसे वादे हुआ ही करते हैं। छोटे साहब के हाथ कुछ बिक तो गये नहीं हो।
कुँअर -- में क्या कहूँ कि कितना मजबूर हूँ! बहुत लज्जित होना पड़ेगा।
रामेश्वरी -- तो गया जो कुछ है वह छोटे साहब ही हें, में कुछ नहीं!
कुँअर -- आखिर साहब से क्या कहूँ, कोन बहाना करूँ?
रामेश्वरी -- कह दो कि हमारे भतीजे का मुंडन हैं, हम एक सप्ताह तक नहीं चल सकते। बस, छुट्टी हुई।
कुँअर -- (हँसकर) कितना आसान कर दिया है आपने इस समस्या कों ऐसा हो सकता है कहीं। कहीं मुँह दिखाने लायक न रहूँगा। सुशीला -- क्यों, हो सकने को क्या हुआ? तुम उसके गुलाम तो नहीं हो?
कुँअर -- तुम लोग बाहर तो निकलती-पेठती नहीं हो, तुम्हें क्या मालूम कि अंग्रेजों के विचार केसे होते है।
रामेश्वरी -- अरे भगवान्! आखिर उसके कोई लड़का-बाला हे, या निगोड़ नाठा है। त्योहार और व्योहार हिन्दू-मुसलमान सबके यहाँ होते है।
कुँअर -- भई हमसे कुछ करते-धरते नहीं बनता।
रामेश्वरी -- हमने कह दिया, हम जाने नहीं देगे। अगर तुम चले गये तो मुझे बड़ा रंज होगा। तुम्हीं लोगों से तो महफिल की शोभा होगी और अपना कोन बेठा हुआ हे।
कुँअर -- अब तो साहब को लिख भेजने का भी मोका नहीं है। वह दफ्तर चले गये होंगे। मेरा सब असबाब बंध चुका है।
नोकरों को पेशगी रुपया दे चुका कि चलने की तेयारी करें। अब केसे रुक सकता हूँ!
रामेश्वरी -- कुछ भी हो, जाने न पाओंगे।
सुशीला -- दो-चार दिन बाद जाने में ऐसी कौन-सी बड़ी हानि हुई जाती हैं? वहाँ कौन लट्डू धरे हुए है?
कुँअर साहब बड़े धर्म-संकट में पड़े, अगर नहीं जाते तो छोटे साहब से झूठे पड़ते हे। वह अपने दिल में कहेंगें कि अच्छे बेहुदे आदमी के साथ पाला पड़ा। अगर जाते हे तो स्त्री से बिगाड़ होती हैं, साली मुँह फुलाती है। इसी चक्कर में पड़े हुए बाहर आये तो मियाँ वाजिद बोले -- हुजूर इस वक्त कुछ उदास मालूम होते
हे।
व्यास -- मुद्रा तेजहीन हो गई हे।
कुँअर -- भई, कुछ न पूछो, बड़े सकंट में हूँ।
वाजिद -- क्या हुआ हुजूर, कुछ फरमाइए तो?
कुँअर -- यह भी एक विचित्र ही देश हे।
व्यास -- धर्मावतार, प्राचीन काल से यह ऋषियों की तपोभूमि हे।
लाला -- क्या कहना हे, संसार में ऐसा देश दूसरा नहीं।
कुँअर - जी हाँ, आप जेसे गोखे ओर किस देश में होंगे। बुद्धि तो हम लोगों को भी छू नहीं गई।
वाजिद - हुजूर, अक़्ल के पीछे तो हम लोग लट्ट लिए फिरते हे।
व्यास -- धर्मावतार, कुछ कहते नहीं बनता। बड़ी हीन दशा है।
कुँअर -- नेनीताल जाने को तेयार था। अब बड़ी साली कहती हे कि मेरे बच्चे का मुंडन हे, में न जाने दूँगी। चले जाओंगे तो मुझे रंज होगा। बतलाइए, अब क्या करूँ। ऐसी मूर्खता ओर कहाँ देखने में आएगी। पूछो मुंडन नाई करेगा, नाच-तमाशा देखने वालों की शहर में कमी नहीं, एक में न हूँगा न सही, मगर उनको कोन समझाये।
व्यास -- दीनबन्धु, नारी-हठ तो लोक प्रसिद्ध ही है।
कुँअर -- अब यह सोचिए कि छोटे साहब से क्या बहाना किया जायगा।
वाजिद -- बड़ा नाजुक मुआमला आ पड़ा ह॒जूर।
लाला -- हाकिम का नाराज हो जाना बुरा हे।
वाजिद -- हाकिम मिट्टी का भी हो, फिर भी हाकिम ही हे।
कुँअर - में तो बड़ी मुसीबत में फँस गया।
लाला -- हुजूर, अब बाहर न बेठे। मेरी तो यही सलाह है। जो कुछ सिर पर पड़ेगी, हम ओढ़ लेंगे।
वाजिद -- अजी, पसीने की जगह खून गिरा देंगे। नमक खाया हे कि दिल्लगी हे।
लाला -- हाँ, मुझे भी यही मुनासिब मालूम होता है। आप लोग कह दीजिए, बीमार हो गए हे।
अभी यही बातें हो रही थी कि खिदमतगार ने आकर हाँते हुए कहा -- सरकार, कोऊ आया हे, तौन सरकार का बुलावत हे। कुँअर -- कोन हे पूछा नहीं?
खिद. - कोऊ रंगरेज है सरकार, लाला-लाल मुँह हें, घोड़ा पर सवार है।
कुँअर -- कहीं छोटे साहब तो नहीं हें, भई में तो भीतर जाता हूँ। अब आबडरू तुम्हारे हाथ है।
कुँअर साहब ने तो भीतर घुसकर दरवाजा बन्द कर लिया। वाजिदअली ने खिड़की से झाँककर देखा, तो छोटे साहब खड़े थे। हाथ-पाँव फूल गये। अब साहब के सामने कौन जाय? किसी की हिम्मत नहीं पड़ती। एक दूसरे को ठेल रहा है।
लाला -- बढ़ जाओं वाजिदअली। देखो क्या कहते हें?
वाजिद -- आप ही क्यों नहीं चले जाते? लाला -- आदमी ही तो वह भी हैं, कुछ खा तो न जाएगा। वाजिद -- तो चले क्यों नहीं जाते।
काटन साहब दो-तीन मिनट खड़े रहे। अब यहाँ से कोई न निकला तो बिगड़कर बोले -- यहाँ कोन आदमी हे? कुँअर साहब से बोलो, काटन साहब खड़ा हे।
मियाँ वाजिद बोखलाये हुए आगे बढ़े ओर हाथ बांधकर बोले -- खुदावंद, कुँअर साहब ने आज बहुत देर से खाना खाया, तो तबियत कुछ भारी हो गई है। इस वक्त आराम में हैं, बाहर नहीं आ सकते।
काटन -- ओह! तुम यह क्या बोलता हे? वह तो हमारे साथ नैनीताल जाने वाला था। उसने हमको खत लिखा था।
वाजिद -- हाँ, हुजूर, जाने वाले तो थे, पर बीमार हो गये। काटन - बहुत रंज हुआ। वाजिद -- हुजूर, इत्तफ़ाक हे।
काटन -- हमको बहुत अफसोस है। कुँअर साहब से जाकर बोलो, हम उनको देखना माँगता है।
वाजिद -- हुजूर, बाहर नहीं आ सकते। काटन -- कुछ परवाह नहीं, हम अन्दर जाकर देखेंगा।
कुँअर साहब दरवाजे से चिमटे हुए काटन साहब की बातें सुन रहे थे। नीचे की सांस नीचे थी, ऊपर की ऊपर। काटन साहब को घोड़े से उतरकर दरवाजे की तरफ आते देखा, तो गिरते-पड़ते दोड़े ओर सुशीला से बोले - दुष्ट मुझे देखने घर में आ रहा हे। में चारपाई पर ले जाता हूँ,चटपट लिहाफ निकलवाओं ओर मुझे ओढ़ा दो। दस-पाँच शीशियाँ लाकर इस गोलमेज पर रखवा दो।
इतने में वाजिदअली ने द्वार खटखटाकर कहा -- महरी, दरवाजा खोल दो, साहब बहादुर कुँअर साहब को देखना चाहते हे। सुशीला ने लिहाफ माँगा, पर गर्मी के दिन थे, जोड़े के कपड़े सन्दूकों में बन्द पड़ें थे। चटपट सन्दूक खोलकर दो-तीन मोटे- मोटे लिहाफ लाकर कुँअर साहब को ओढा दिये। फिर आलमारी से कई शीशियाँ ओर कई बोतल निकालकर मेज पर चुन दिये ओर महरी से कहा -- जाकर किवाड़ खोल दो, में ऊपर चली जाती हूँ। काटन साहब ज्यों ही कमरे में पहुंचे, कु अर साहब ने लिहाफ से मुँह निकला लिया और कराहते हुए बोले -- बड़ा कष्ट हे हुजूर। सारा शरीर फुँका जाता हे।
काटन -- आप दोपहर तक तो अच्छा था, खाँ साहब हमसे कहता था कि आप तेयार हें, कहाँ दरद हे?
कुँअर -- हुजूर पेट में बहुत दर्द हैं। बस, यही मालूम होता हे कि दम निकल जायेगा।
काटन -- हम जाकर सिविल सर्जन को भेज देता है। वह पेट का दर्द अभी अच्छा कर देगा। आप घबरायें नहीं, सिविल सर्जन हमारा दोस्त हे।
काटन चला गया तो कुँअर साहब फिर बाहर आ बेठे। रोजा बख्शाने गये थे, नमाज गले पड़ी। अब यह फिक्र पेदा हुई कि सिविल सर्जन को केसे टाला जाय।
कुँअर -- भई, यह तो नई बला गले पड़ी।
वाजिद -- कोई जाकर खाँ साहब को बुला लाओं। कहना, अभी चलिए ऐसा न हो कि वह देर करें ओर सिविल सर्जन यहाँ सिर पर सवार हो जाय।
लाला -- सिविल सर्जन की फीस भी बहुत होगी?
कुँअर -- अजी तुम्हें फीस की पड़ी है, यहाँ जान आफत में है। अगर सो दो सो देकर गला छूट जाय तो अपने को भाग्यवान समझूँ।
वाजिदअली ने फिटन तैयार कराई ओर खाँ साहब के घर पहुँचें देखा ते वह असबाब बँधवा रहे थे। उनसे सारा किस्सा बयान किया ओर कहा -- अभी चलिए। आपको बुलाया हे।
खाँ -- मामला बहुत टेढ़ा है। बड़ी दोड़-धूप करनी पड़ेगी। कसम खुदा की, तुम सबके सब गर्दन मार देने के लायक हो। जरा-सी देर के लिए में टल क्या गया कि सारा खेल ही बिगाड़ दिया।
वाजिद -- खाँ साहब, हमसे तो उड़िए नहीं। कुँअर साहब बोखलाये हुए हैं। दो-चार सो का वारा-न्यारा है। चलकर सिविल सर्जन को मना कर दीजिए।
खाँ -- चलो, शायद कोई तरकीब सूझ जाये।
दोनों आदमी सिविल सर्जन की तरफ चले। वहाँ मालूम हुआ कि साहब कुँअर साहब के मकान पर गये हैे। फोरन फिटन घुमा दी, ओर कुँअर साहब की कोठी पर पहुंचे। देखा तो सर्जन साहब एनेमा लिये हुए कुँअर चाहब की चारपाई के सामने बेठे हुए है। खाँ -- में तो हुजूर के बंगले से चला आ रहा हूँ। कुँअर साहब का क्या हाल हे?
डाक्टर -- पेट मे दर्द हे। अभी पिचकारी लगाने से अच्छा हो जायेगा।
कुँअर -- हुजूर, अब दर्द बिल्कुल नहीं हे। मुझे कभी-कभी यह मर्ज हो जाता है ओर आप ही आप अच्छा हो जाता है।
डाक्टर -- ओ, आप डरता है। डरने की कोई बात नहीं हे। आप एक मिनट में अच्छा हो जाएगा।
कुँअर - हुजूर, में बिल्कुल अच्छा हूँ। अब कोई शिकायत नहीं है।
डाक्टर -- डरने की कोई बात नहीं, यह सब आदमी यहाँ से हट जाय, हम एक मिनट में अच्छा कर देगा।
खाँ साहब ने डाक्टर से काम में कहा -- हुजूर अपनी रात की डबल फीस ओर गाड़ी का किराया लेकर चले जाएँ, इन रईसों के फेर में न पड़ें,यह लोग बारहों महीने इसी तरह बीमार रहते हे। एक हफ्ते तक आकर देख लिया कीजिए।
डाक्टर साहब की समझ में यह बात आ गई। कल फिर आने
का वादा करके चले गये। लोगों के सिर से बला टली। खाँ साहब की कारगुजारी की तारीफ होने लगी!
कुँअर -- खाँ साहब आप बड़े वक्त पर काम आये। जिन्दगी-भर आपका एहसान मान्गा।
खाँ -- जनाब, दो सो चटाने पड़े। कहता था छोटे साहब का हुक्म हैं। में बिला पिचकारी लगाये न जाऊँगा। अंग्रेजों का हाल तो आप जानते है। बात के पक्के होते है।
कुँअर -- यह भी कह दिया न कि छोटे साहब को मेरी बीमारी की इत्तला कर दें ओर कह दें, वह सफर करने लायक नहीं है। खाँ -- हाँ साहब, और रुपये दिये किसलिए, क्या मेरा कोई रिश्तेदार था? मगर छोटे साहब को होगी बड़ी तकलीफ। बेचारे ने आपको बंगले के आसरे पर होटल का इन्तजाम भी न किया था। मामला बेढब हुआ।
कुँअर -- तो भई, में क्या करता, आप ही सोचिए।
खाँ -- यह चाल उल्टी पड़ी। जिस वक्त काटन साहब यहाँ आये थे, आपको उनसे मिलना चाहिए था। साफ कह देते, आज एक सख्त जरूरत से रुकना पड़ा। लेकिन खेर, में साहब के साथ रहूँगा, कोई न कोई इंतजाम हो ही जायगा।
कुँअर -- क्या अभी आप जाने का इरादा कर ही रहे है! हलफ से कहता हूँ, में आपको न जाने दूँगा, यहाँ न जाने केसी पढें, मियाँ वाजिद देखों, आपको घर कहला दो,बारह न जायेंगे।
खाँ -- आप अपने साथ मुझे भी डुबाना चाहते हे। छोटे साहब आपसे नाराज भी हो जाएँ तो क्या कर लेंगे। , लेकिन मुझसे नाराज हो गये, तो खराब ही कर डालेंगे।
कुँअर -- जब तक हम जिन्दा है भाई साहब, आपको कोई तिरछी नजर से नहीं देख सकता। जाकर छोटे साहब से कहिए, कुँअर साहब की हालत अच्छी नहीं, में अब नहीं जा सकता। इसमें मेरी तरफ से भी उनका दिल साफ हो जाएगा और आपकी दोस्ती देखकर आपकी और इज्जत करने लगेगा।
खाँ -- अब वह इज्जत करें या न करें, जब आप इतना इसरार कर रहे है तो में भी इतना बे-मुरौवत नहीं हूँ कि आपको छोड़कर चला जाऊँ। यह तो हो ही नहीं सकता। जरा देर के लिए घर चला गया, उसका तो इतना तावान देना पड़ा नेनीताल चला जाऊँ तो शायद कोई आपको उठा ही ले जाय।
कुँअर -- मजे से दो-चार दिन जलसे देखेंगे, नेनीताल में यह मजे कहाँ मिलते। व्यास जी, अब तो यों नहीं बेठा जाता। देखिए,
आपके भण्डार में कुछ हें, दो-चार बोतलें निकालिए, कुछ रंग जमे।
पर्वत यात्रा का सारांश
'पर्वत यात्रा' प्रेमचंद द्वारा रचित एक अत्यंत हास्य-व्यंग्यात्मक कहानी है, जो औपनिवेशिक काल की चाटुकारिता, झूठी शानो-शौकत, सामंती आलस्य और अंग्रेजों के प्रति भारतीय रईसों के अंध-भय को उजागर करती है।
कहानी के मुख्य पात्र मुंशी गुलाबाज खाँ लखनऊ के एक ऐसे व्यक्ति हैं जो अपनी झूठी धाक जमाने में माहिर हैं। वे अपनी पत्नी और मोहल्ले वालों के सामने डींग मारते हैं कि अंग्रेज अफसर (छोटे साहब 'काटन') उनके घनिष्ठ मित्र हैं। जब वे काटन साहब से मिलने जाते हैं, तो साहब नैनीताल जाने की बात करते हैं और खाँ साहब से वहाँ ठहरने का इंतजाम करने को कहते हैं। गुलाबाज खाँ, जो कभी बरेली से आगे नहीं गए थे, अपनी इज्ज़त बचाने के लिए झूठ बोल देते हैं कि वे हर साल नैनीताल जाते हैं और काटन साहब के साथ नैनीताल चलने का वादा कर बैठते हैं।
वहाँ से निकलकर गुलाबाज खाँ अपने मित्र कुँअर शमशेर सिंह की कोठी पर पहुँचते हैं। कुँअर शमशेर सिंह एक परंपरागत आलसी और विलासी रईस हैं, जिनका दिन देर से सोकर उठने, मुसाहिबों के साथ गपशप करने और रात को मुजरा देखने में बीतता है। खाँ साहब कुँअर साहब के सामने डींग हाँकते हैं कि काटन साहब उन्हें ज़बरदस्ती नैनीताल ले जा रहे हैं। बड़े अफसरों से दोस्ती गांठने के लालच में कुँअर साहब भी नैनीताल जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। उनके मुसाहिब (राधाकांत व्यास, लाला सुखदयाल और वाजिद अली) पहले तो पहाड़ों के खतरों (घेघा रोग, खड्ड में गिरना, खराब पानी) का डर दिखाते हैं, लेकिन कुँअर साहब को तैयार देखकर तुरंत हाँ में हाँ मिलाने लगते हैं और यहाँ तक सलाह दे डालते हैं कि नैनीताल हाथी और डंके के साथ चलना चाहिए।
सफर की पूरी तैयारियाँ हो जाती हैं, परंतु रवानगी के दिन कुँअर साहब की बड़ी साली रामेश्वरी देवी उनके भतीजे के मुंडन संस्कार का हवाला देकर कुँअर साहब को जाने से रोक देती हैं। कुँअर साहब नारी-हठ के सामने विवश हो जाते हैं, लेकिन काटन साहब के सामने झूठा पड़ने के डर से घबरा जाते हैं। तभी काटन साहब स्वयं घोड़े पर सवार होकर कुँअर साहब को लेने कोठी आ पहुँचते हैं।
काटन साहब को आते देख कुँअर साहब डर के मारे कमरे में छिप जाते हैं। वाजिद अली काटन साहब को बहाना बनाता है कि कुँअर साहब के पेट में अचानक भयंकर दर्द उठ गया है। काटन साहब कुँअर साहब का हाल देखने अंदर आते हैं, तो कुँअर साहब भीषण गर्मी में भी मोटे-मोटे लिहाफ ओढ़कर लेट जाते हैं और मेज पर दवा की शीशियाँ सजवा देते हैं। काटन साहब सहानुभूति जताते हुए अपने मित्र सिविल सर्जन को भेजने की बात कहते हैं।
कुछ ही देर में सिविल सर्जन 'एनिमा' (पिचकारी) का उपकरण लेकर पहुँच जाता है। एनिमा के डर से कुँअर साहब कातर होकर बार-बार कहते हैं कि वे बिल्कुल ठीक हो गए हैं। तभी गुलाबाज खाँ बीच-बचाव करते हुए डॉक्टर को उसकी फीस दिलाकर विदा करते हैं और कुँअर साहब से झूठ बोलते हैं कि उन्होंने डॉक्टर को दो सौ रुपये रिश्वत देकर एनिमा लगाने से बचाया है।
अंततः नैनीताल की यात्रा रद्द हो जाती है। काटन साहब और नैनीताल के खतरों से छुटकारा पाने की खुशी में कुँअर शमशेर सिंह गुलाबाज खाँ का एहसान मानते हैं और अपनी कोठी पर ही दोस्तों के साथ शराब की बोतलें खोलकर जश्न मनाने की घोषणा करते हैं।
प्रकाशन इतिहास
प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।
महत्त्व और विषय-विमर्श
- सामंती विलासिता और आलस्य पर व्यंग्य: कहानी में कुँअर शमशेर सिंह के माध्यम से प्रेमचंद ने औपनिवेशिक दौर के उन रईसों और ज़मींदारों का सजीव चित्रण किया है, जिनका पूरा जीवन आलस्य, गपशप, शराब और मुजरे की महफ़िलों तक सीमित था।
- औपनिवेशिक चाटुकारिता और डींगबाज़ी: मुंशी गुलाबाज खाँ का पात्र उस सामाजिक प्रवृत्ति को दर्शाता है जहाँ लोग गोरे साहबों (अंग्रेज अफसरों) से अपनी कथित नज़दीकियों का झूठा प्रदर्शन करके समाज में रोब और प्रभाव जमाने का प्रयास करते थे।
- मुसाहिबों और चाटुकारों की भूमिका: कहानी में व्यास जी, लाला सुखदयाल और वाजिद अली जैसे चमचों का चरित्र सामने आता है जो रईस के हर अनुचित या हास्यास्पद फैसले पर जी-हुज़ूरी करते हैं और स्थिति के अनुसार तुरंत अपने विचार बदल लेते हैं।
- अंग्रेजी सत्ता का खौफ और ढोंग: कहानी यह उजागर करती है कि भारतीय रईस और चाटुकार अंग्रेजों के सामने बराबरी का ढोंग रचते थे, लेकिन हकीकत में उनके सामने आने पर डर से काँपने लगते थे और बीमारी का ढोंग रचकर छिपने को मजबूर हो जाते थे।
- कहानी का व्यापक महत्त्व: 'पर्वत यात्रा' प्रेमचंद की हास्य और व्यंग्य शैली की एक उत्कृष्ट रचना है, जो 20वीं सदी के शुरुआती दौर के उच्च-मध्यम वर्गीय भारतीय समाज के खोखलेपन, दब्बूपन और पाखंड को हँसाते-हँसाते बेनकाब करती है।
