Cover Image for Nadan Dost (नादान दोस्त) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1928•16 मिनट

नादान दोस्त

Nadan Dost

प्रेमचंद की कहानी 'नादान दोस्त' दो भाई-बहन, केशव और श्यामा की मासूमियत और नादानी की कहानी है, जो चिड़िया के अंडों की रक्षा की कोशिश में उन्हें अनजाने में नष्ट कर बैठते हैं।

पात्र:केशव, श्यामा, अम्माँ
स्थान:एक भारतीय घर का आँगन और कार्निस

नादान दोस्त का मूल पाठ

केशव के घर में कार्निस के ऊपर एक चिड़िया ने अंडे दिए थे। केशव और उसकी बहन श्यामा दोनों बड़े ध्यान से चिड़िया को वहां आते-जाते देखा करते। सवेरे दोनों आंखें मलते कार्निस के सामने पहुंच जाते और चिड़ा या चिड़िया दोनों को वहां बैठा पाते। उनको देखने में दोनों बच्चों को न मालूम क्या मजा मिलता, दूध और जलेबी की सुध भी न रहती थी। दोनों के दिल में तरह-तरह के सवाल उठते। अंडे कितने बड़े होंगे ? किस रंग के होंगे ? कितने होंगे ? कया खाते होंगे ? उनमें से बच्चे किस तरह निकल आएंगे ? बच्चों के पर कैसे निकलेंगे ? घोंसला कैसा है ? लेकिन इन बातों का जबाव देने वाला कोई नहीं। न अम्मां को घर के काम-धंधों से फर्सत थी न बाबूजी को पढ़ने-लिखने से। दोनों बच्चे आपस ही में सवाल-जवाब करके अपने दिल को तसलल्‍्ली दे लिया करते थे।

श्यामा कहती-क्यों भइया, बच्चे निकलकर फुर्र से उड़ जाएंगे ?

केशव विद्वानों जैसे गर्व से कहता-नहीं री पगली, पहले पर निकनैंगे। बगैर परों के बेचारे कैसे उड़ेंगे ?

श्यामा-बच्चों को क्या खिलाएगी बेचारी ?

केशव इस पेचीदा सवाल का जवाब कुछ न दे सकता था।

इस तरह तीन-चार दिन गुजर गए। दोनों बच्चों की जिज्ञासा दिन-दिन बढ़ती जाती थी। अंडों को देखने के लिए वे अधीर हो उठते थे। उन्होंने अनुमान लगाया कि अब जरूर बच्चे निकल आए होंगे। बच्चों के चारे का सवाल अब उनके सामने आ खड़ा हुआ। चिड़िया बेचारी इतना दाना कहां पाएगी कि सारे बच्चों का पेट भरे। गरीब बच्चे भूख के मारे चूं-चूं करके मर जाएंगे।

इस मुसीबत का अंदाजा करके दोनों घबरा उठे। दोनों ने फैसला किया कि कार्निस पर थोड़ा-सा दाना रख दिया जाय। श्यामा खुश होकर बोली-तब तो चिड़्यों को चारे के लिए कहीं उड़कर न जाना पड़ेगा न ? न्‍

केशव-नहीं, तब क्‍यों जाएंगी ?

श्यामा-क्यों भइया, बच्चों को धूप न लगती होगी ?

केशव का ध्यान इस तकलीफ की तरफ न गया था। बोला-जरूर तकलीफ हो रही होगी। बेचारे प्यास के मारे तड़पते होंगे। ऊपर छाया भी तो कोई नहीं।

आखिर यही फैसला हुआ कि घोंसले के ऊपर कपड़े की छत बना देनी चाहिए।

पानी की प्याली और थोड़े से चावल रख देने का प्रस्ताव भी स्वीकृत हो गया।

दोनों बच्चे बड़े चाव से काम करने लगे। श्यामा मां की आंख बचाकर मठके से चावल निकाल लाई। केशव ने पत्थर की प्याली का तेल चुपके से जमीन पर गिरा दिया और उसे खूब साफ करके उसमें पानी भरा।

अब चांदनी के लिए कपड़ा कहां से आए ? फिर ऊपर बगैर छड़ियों के कपड़ा ठहरेगा कैसे और छड़ियां खड़ी होंगी कैसे ?

केशव बड़ी देर तक इसी उधेड़बुन में रहा। आखिरकार उसने यह मुश्किल भी हल कर दी। श्यामा से बोला-जाकर कूड़ा फेंकने वाली टोकरी उठा लाओ। अम्माजी को मत दिखाना ।

श्यामा-वह तो बीच से फटी हुई है। उसमें से धूप न जाएगी ?

केशव ने झुंझलकार कहा-तू टोकरी तो ला, मैं उसका सूराख बंद करने की कोई हिकमत निकालूंगा।

श्यामा दौड़कर टोकरी उठा लाई। केशव ने उसके सूराख में थोड़ा-सा कागज ढूंस दिया और तब टोकरी को एक टहनी से टिकाकर बोला-देख, ऐसे ही घोंसले पर उसकी आड़ कर दूंगा! न कैसे धूप जाएगी ?

श्यामा ने दिल में सोचा, भइया कितने चालाक हैं !


2

गर्मी के दिन थे। बाबूजी दफ्तर गए हुए थे। अम्मां दोनो बच्चों को कमरे में सुलाकर खुद सो गई थीं। लेकिन बच्चों की आंखों में आज नींद कहां ? अम्मांजी को बहलाने के लिए दोनों दम रोके आंखें बंद किये मौके का इंतजार कर रहे थे। ज्योंही मालूम हुआ कि अम्मांजी अच्छी तरह से सो गई, दोनों चुपके से उठे और बहुत धीरे से दरवाजे की सिटकनी खोलकर बाहर निकल आए । अंडों की हिफाजत की तैयारियां होने लगा ' केशव कमरे से एक स्टूल उठा लाया, लेकिन जब उससे काम न चला तो नहाने की चौकां लगाकर स्टूल के नीचे रखी और डरते-डरते स्टूल पर चढ़ा।

श्यामा दोनों हाथों से स्टूल पकड़े हुए थी। स्टूल-चारों टांगें बराबर न होने के कारण जिस तरफ ज्यादा दबाव पाता था, जरा-सा हिल जाता था। उस वक्‍त केशव को कितनी तकलीफ उठानी पड़ती थी यह उसी का दिल जानता था। दोनों हाथों से कार्निस पकड़ लेता और श्यामा को दवी आवाज से डांटता, अच्छी तरह पकड़, वरना उतरकर बहुत मारूंगा। मगर बेचारी श्यामा का दिल तो ऊपर कार्निस पर था। बार-बार उसका ध्यान उधर चला जाता और हाथ दीले पड़ जाते।

केशव ने ज्यों ही कार्निस पर हाथ रखा, दोनो िड़ियां उड़ गईं। केशव ने देखा, कार्निस पर थोड़े तिनके बिछे हुए हैं, और उन पर तीन अंडे पड़े हैं। जैसे घोंसले उसने पेड़ों पर देखे थे, वैसा कोई घोंसला नहीं है। श्यामा ने नीचे से पूछा-के बच्चे हैं भइया ?

केशव-तीन अंडे हैं, अभी बच्चे नहीं निकले।

श्यामा-जरा हमें दिखा दो भइ्या, कितने बड़े हैं ?

केशव-दिखा दूंगा, पहले जरा चिथड़े ले आ, नीचे बिछा दूं। बेचारे अंडे तिनकों पर पड़े हैं।

श्यामा दौड़कर अपनी पुरानी धोती फाड़कर एक टुकड़ा लाई। केशव ने झुककर कपड़ा ले लिया, उसकी कई तह करके उसने एक गही बनाई और उसे तिनकों पर बिछाकर तीनों अंडे धीरे से उस पर रख दिए।

श्यामा ने फिर कहा-हमको भी दिखा दो भइया !

केशव-दिखा दूंगा, पहले जरा वह टोकरी तो दे दो, ऊपर छाया कर दूं।

श्यामा ने टोकरी नीचे से थमा दी और बोली-अब तुम उतर आओ, मैं भी तो देखूं।

केशव ने टोकरी को एक टहनी से टिकाकर कहा-जा, दाना और पानी की प्याली ले आ, मैं उतर आऊं तो तुझे दिखा दूंगा।

श्यामा प्याली और चावल भी लाई। केशव ने टोकरी के नीचे दोनों चीजें रख दीं और आहिस्ता से उतर आया।

श्यामा ने गिड़गिडाकर कहा-अब हमको भी चढ़ा दो भइया !

केशव-तू गिर पड़ेगी।

श्यामा-न गिरूंगी भइया, तुम नीचे से पकड़े रहना।

केशव-न भइया, कहीं तू गर-गिरा पड़े तो अम्मांजी मेरी चटनी ही कर डालेंगी | कहें कि तूने ही चढ़ाया था। क्या करेगी देखकर ? अब अंडे बड़े आराम से हैं। जब बच्चे निकलेंगे, तो उनको पालेंगे।

दोनों चिड़ियां बार-बार कार्निस पर आती थीं और बगैर बैठे ही उड़ जाती थीं। केशव ने सोचा, हम लोगों के डर से नहीं बैठतीं । स्टूल उठाकर कमरे में रख आया, चौकी जहां की धी, वहां रख दी।

श्यामा ने आंखों में आंसू भरकर कहा-तुमने मुझे नहीं दिखाया, मैं अम्मांजी से कह दूंगी।

केशव-अम्मांजी से कहेगी तो बहुत मारूंगा, कहे देता हूं।

श्यामा-तो तुमने मुझे दिखाया क्‍यों नहीं ?

केशव-और गिर पड़ती तो चार सर न हो जाते !

श्यामा-हो जाते, हो जाते। देख लेना मैं कह दूंगी !

इतने में कोठरी का दरवाजा खुला और मां ने धूप से आंखों को बचाते हुए कहा-तुम दोनों बाहर कब निकल आए ? मैंने कहा न था कि दोपहर को न निकलना ? किसने किवाड़ खोला ?

किवाड़ केशव ने खोला था, लेकिन श्यामा ने मां से यह बात नहीं कही । उसे डर लगा कि भइया पिट जाएंगे। केशव दिल में कांप रहा था कि कहीं श्यामा कह न दे। ओडे न दिखाए थे, इससे अब उसको श्यामा पर विश्वास न था। श्यामा सिर्फ मुहब्बत के मारे चुप थी या इस कसूर में हिस्सेदार होने की वजह से, इसका फैसला नहीं किया जा सकता। शायद दोनों ही बातें थीं।

मां ने दोनों को डांट-डपटकर फिर कमरे में बंद कर दिया और आप धीरे-धीरे उन्हें पंखा झलने लगी। अभी सिर्फ दो बजे थे। बाहर तेज लू चल रही थी। अब दोनों बच्चों को नींद आ गई थी।


3

चार बजे यकायक श्यामा की नींद खुली। किवाड़ खुले हुए थे। वह दौड़ी हुई कार्निस के पास आई और ऊपर की तरफ ताकने लगी। टोकरी का पता न था। संयोग से उसकी नजर नीचे गई और वह उलटे पांव दौड़ती हुई कमरे में जाकर जोर से बोली-भइया, अंडे तो नीचे पड़े हैं, बच्चे उड़ गए।

केशव घबराकर उठा और दौड़ा हुआ बाहर आया तो क्या देखता है कि तीनों अंडे नीचे टूटे पड़े हैं और उनसे कोई चूने की-सी चीज बाहर निकल आई है। पानी की प्याली भी एक तरफ टूटी पड़ी है।

उसके चेहरे का रंग उड़ गया। सहमी हुई आंखों से जमीन की तरफ देखने लगा।

श्यामा ने पूछा-बच्चे कहां उड़ गए भइया ?

केशव ने करुण स्वर में कहा-अंडे तो फूट गए।

“और बच्चे कहां गए ?”

केशव-तेरे सर में देखती नहीं है अंडों में से उजला-उजला पानी निकल आया है। वही तो दो-चार दिन में बच्चे बन जाते।

मां ने सोटी हाथ में लिए हुए पूछा-तुम दोनों वहां धूप में क्या कर रहे हो ?

श्यामा ने कहा-अम्मांजी, चिड़िया के अंडे टूटे पड़े हैं।

मां न आकर टूटे हुए अण्डों को देखा और गुस्से से बोलीं-तुम लोगों ने अंडों को छुआ होगा।

अब तो श्यामा को भइया पर जरा भी तरस न आया। उसी ने शायद अंडों को इस तरह रख दिया कि वह नीचे गिर पड़े। इसकी उसे सजा मिलनी चाहिए। बोली-इन्‍्होंने अंडों को छेड़ा था अम्मांजी ।

मां ने केशव से पूछा-क्यों रे ?

केशव भीगी बिल्ली बना खड़ा रहा।

मां-तू वहां पहुंचा कैसे ?

श्यामा-चौके पर स्टूल रखकर चढ़े अम्मांजी।

केशव-तू स्टूल थामे नहीं खड़ी थी ?

श्यामा-तुम्हीं ने तो कहा था !

मां-तू इतना बड़ा हुआ, तुझे अभी इतना भी नहीं मालूम कि छूने से चिड़ियों के अंडे गन्दे हो जाते हैं। चिड़िया फिर उन्हें नहीं सेतीं ।

श्यामा ने डरते-डरते पूछा-तो क्‍या चिड़िया ने अंडे गिरा दिए हैं अम्मांजी ?

मां-और क्या करती। केशव के सिर इसका पाप पड़ेगा। हाय, हाय, तीन जानें ले लीं दुष्ट ने !

केशव रोनी सूरत बनाकर बोला-मैंने तो सिर्फ अंडों को गद्दी पर रख दिया था

अम्मांजी !

मां को हंसी आ गई। मगर केशव को कई दिनों तक अपनी गलती पर अफसोस होता रहा। अंडों की हिफाजत करने के जोम में उसने उनका सत्यानाश कर डाला। इसे याद करके वह कभी-कभी रो पड़ता था।

दोनों चिड़ियां वहां फिर न दिखाई दीं।


नादान दोस्त का सारांश

'नादान दोस्त' बाल-मनोविज्ञान, अबोध जिज्ञासा और अनजाने में हुए अपराध-बोध पर आधारित मुंशी प्रेमचंद की अत्यंत लोकप्रिय एवं मर्मस्पर्शी कहानी है। केशव और उसकी छोटी बहन श्यामा के घर के आँगन में कार्निस के ऊपर एक चिड़िया ने अंडे दिए थे। दोनों बच्चे सुबह सोकर उठते ही कार्निस के सामने पहुँच जाते और चिड़ा-चिड़िया को कौतूहल से देखा करते। उनके बाल-सुलभ मन में अंडों के आकार, रंग, उनके फूटने, बच्चों के निकलने, उनके पंखों और खान-पान को लेकर ढेरों सवाल उठते थे। परंतु घर के काम-काज में व्यस्त माँ और पठन-पाठन में लीन बाबूजी के पास उनके इन प्रश्नों का उत्तर देने की फुर्सत न थी।

गर्मी के मौसम में दोनों बच्चों के मन में यह चिंता समा गई कि अंडों से निकलने वाले नन्हे बच्चे तेज धूप और भूख-प्यास से तड़पकर मर जाएँगे। अपनी इसी भोली संवेदना और नासमझी में उन्होंने अंडों की 'हिफाजत' करने का निश्चय किया। उन्होंने कार्निस पर थोड़े से चावल के दाने और पानी की एक प्याली रखने तथा धूप से बचाव के लिए कूड़े फेंकने वाली एक पुरानी टोकरी की आड़ लगाने की योजना बनाई।

एक दिन दोपहर में जब माँ दोनों को सुलाकर सो गईं, तो बच्चे दबे पाँव उठे। केशव ने नहाने की चौकी पर स्टूल रखा और उस पर चढ़कर कार्निस पर पहुँचा, जबकि श्यामा नीचे से स्टूल थामे रही। कार्निस पर तिनकों के बीच तीन अंडे रखे थे। केशव ने अंडों को तिनकों की चुभन से बचाने के लिए श्यामा की पुरानी धोती के कपड़े की गद्दी बनाई और तीनों अंडों को उठाकर उस गद्दी पर रख दिया। साथ ही टोकरी से छाया कर दी और दाना-पानी रख दिया। श्यामा ने भी अंडों को देखने की बहुत मिन्नतें कीं, किंतु केशव ने उसे गिरने के डर से ऊपर नहीं चढ़ने दिया।

शाम को जब श्यामा की नींद खुली और वह बाहर आई, तो उसने देखा कि तीनों अंडे ज़मीन पर गिरकर टूट चुके हैं और उनमें से उजला तरल पदार्थ बह रहा है। केशव ने आकर देखा तो उसका चेहरा फक पड़ गया। तभी माँ हाथ में सोटी लिए आ पहुँचीं। श्यामा ने माँ से कह दिया कि केशव ने अंडों को छेड़ा था। तब माँ ने दोनों को डांटते हुए प्रकृति का यह नियम समझाया कि मनुष्य के छू लेने से चिड़ियों के अंडे गंदे हो जाते हैं और चिड़िया फिर उन्हें कभी नहीं सेती; चिड़िया ने स्वयं ही उन्हें नीचे गिराकर फोड़ दिया है। केशव यह जानकर सन्न रह गया और रोने लगा कि उसने तो केवल अंडों की रक्षा और सुख के लिए उन्हें गद्दी पर रखा था, किंतु उसकी नादानी ने तीन नन्हीं जानों का अंत कर दिया। इस पश्चात्ताप और आत्मग्लानि की टीस केशव के हृदय में कई दिनों तक बनी रही और वह चिड़िया का जोड़ा फिर कभी उस कार्निस पर नहीं लौटा।


प्रकाशन इतिहास

प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • बाल-मनोविज्ञान और बाल-सुलभ जिज्ञासा: प्रेमचंद ने बच्चों के कोमल मन में प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति उठने वाले कौतूहल, उनकी कल्पनाओं और पारस्परिक स्नेह व नोक-झोंक का अत्यंत सजीव चित्रण किया है।
  • सद्भावनापूर्ण अज्ञानता का त्रासद परिणाम: कहानी यह महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाती है कि केवल शुभ भावना या अच्छी नीयत होना ही पर्याप्त नहीं है; बिना सही ज्ञान और समझ के किया गया परोपकार कभी-कभी विनाशकारी सिद्ध हो सकता है।
  • प्रकृति और मानव का संबंध: मनुष्य की अज्ञानता और अनावश्यक हस्तक्षेप से प्रकृति और जीव-जगत के सहज चक्र में किस तरह व्यवधान पड़ता है, इसका कहानी में अत्यंत मार्मिक चित्रण मिलता है।
  • अपराध-बोध और चारित्रिक विकास: अनजाने में हुई भूल के बाद केशव का रोना और पश्चात्ताप की अग्नि में तपना उसके संवेदनशील हृदय और नैतिक चेतना के विकास को उजागर करता है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'नादान दोस्त' बाल-साहित्य की एक अमर और कालजयी कहानी है। यह अभिभावकों को बच्चों की जिज्ञासा के प्रति सतर्क और संवादरत रहने का संदेश देती है तथा यह सिखाती है कि विवेकहीन दया भी अनर्थ का कारण बन सकती है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "नादान दोस्त." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1928, https://munshipremchand.com/works/short-stories/nadan-dost. Accessed 22 Sep. 2026.