शूद्रा का मूल पाठ
माँ और बेटी एक झोपड़ी में गाँव के उस सिरे पर रहती थीं। बेटी बाग से पत्तियाँ बटोर कर लाती, माँ भाड़ झोंकती। यही उनकी जीविका थी। सेर-दो सेर अनाज मिल जाता था, खाकर पड़ी रहती थीं। माता विधवा थी। बेटी कुंवारी, घर में और कोई आदमी न था। माँ का नाम गंगा था, बेटी का नाम गौरा।
गंगा को कई साल से यह चिन्ता लगी हुई थी कि कहीं गौरा की सगाई हो जाए, लेकिन कहीं बात पक्की न होती थी। अपने पति के मर जाने के बाद गंगा ने कोई दूसरा घर न किया था, न कोई दूसरा धंधा ही करती थी। इससे लोगों को सन्देह हो गया कि आखिर इसका गुजर कैसे होता है? और लोग तो छाती फाड़-फाड़कर काम करते हैं, फिर भी पेट-भर अन्न मयस्सर नहीं होता। यह स्त्री कोई धंधा नहीं करती, फिर भी माँ-बेटी आराम से रहती हैं, किसी के सामने हाथ नहीं फैलाती। इसमें कुछ-न-कुछ रहस्य अवश्य है। धीरे-धीरे यह सन्देह और भी दृढ़ हो गया, और यह अब तक जीवित था। बिरादरी में कोई गौरा से सगाई करने पर भी राजी न होता था। शूद्रों की बिरादरी बहुत छोटी होती है। दस-पाँच कोस से अधिक उसका क्षेत्र नहीं होता। इसलिए एक दूसरे के गुण-दोष किसी से छिपे नहीं रहते, न उन पर परदा ही डाला जा सकता है।
इस भ्रांति को शान्त करने के लिए माँ ने बेटी के साथ कई तीर्थ यात्रा की। उड़ीसा तक हो आयी, लेकिन सन्देह न मिटा। गौरी युवती थी, सुंदरी थी, पर उसे किसी न कुएँ पर या खेतों में हँसते-बोलते नहीं देखा। उसकी निगाह कभी ऊपर उठती ही न थी। लेकिन ये बातें भी सन्देह को और पुष्ट करती थीं। अवश्य कोई न कोई रहस्य है। कोई युवती इतनी सती नहीं हो सकती। कुछ गुप-चुप की बात अवश्य है।
यों ही दिन गुजरते जाते थे। बुढ़िया दिनोंदिन चिन्ता से घुल रही थी उधर सुंदरी की मुख-छवि दिनोंदिन निखरती थी। कली खिलकर फूल हो रही थी।
एक दिन एक परदेसी गाँव से होकर निकला। दस-बाहर कोस से आ रहा था। नौकरी की खोज में कलकत्ते जा रहा था। रात हो गयी। किसी कहार का घर पूछता हुआ गंगा के घर आया। गंगा ने उसका खूब आदर-सत्कार किया, उसके लिए गेहूँ का आटा लायी, घर से बर्तन निकालकर दिये। कहार ने पकाया, खाया, लेटा, बातें होने लगी। सगाई की चर्चा छिड़ गयी। कहार जवान था। गौरा पर निगाह पड़ी, उसका रंग-ढंग देखा, उसकी सलज्ज छवि आँखों में खूब गई। सगाई करने पर राजी हो गया। लौटकर घर चला गया। दो-चार गहने अपनी बहिन के यहाँ से लाया। गाँव के बजाज ने कपड़े उधार दे दिये। दो-चार भाई-बंदों के साथ सगाई करने आ पहुँचा। सगाई हो गई, यहीं रहने लगा। गंगा बेटी और दामाद को आँखों से दूर न कर सकती थी।
परन्तु दस ही पाँच दिनों में मंगरू के कानों में इधर-उधर की बातें पड़ने लगी। सिर्फ बिरादरी के नहीं अन्य जाति वाले भी उसके कान भरने लगे। ये बातें सुन-सुनकर मंगरू पछताता था कि नाहक यहाँ फंसा। पर गौरा को छोड़ने का खयाल करके उसका दिल काँप उठता था।
एक महीने के बाद मंगरू अपनी बहिन के गहने लौटाने गया। खाना खाने के समय उसका बहनोई उसके साथ भोजन करने बैठा। मंगरू को कुछ सन्देह हुआ, बहनोई से बोला- तुम क्यों नहीं आते?
बहनोई ने कहा- तुम खा लो, फिर खा लूँगा।
मंगरू- बात क्या है? तुम खाने क्यों नहीं बैठते।
बहनोई- जब तक पंचायत न होगी। मैं तुम्हारे साथ कैसे खा सकता हूँ? तुम्हारे लिए बिरादरी तो न छोड़ दूँगा। किसी से पूछा न गूछा, जाकर एक हरजाई से सगाई कर ली।
मंगरू चौके पर से उठ आया, मिर्जई पहनी और ससुराल चला आया। बहिन खड़ी रोती रह गई।
उसी रात को वह किसी से कुछ कहे-सुने बगैर, गौरा को छोड़कर कहीं चला गया। गौरा नींद में मगन थी। उसे क्या खबर थी कि वह रत्न, जो मैंने इतनी तपस्या के बाद पाया है, मुझे सदा के लिये छोड़े चला जा रहा है।
कई साल बीत गए। मंगरू का कुछ पता न चला। कोई पत्र तक न आया, पर गौरा बहुत प्रसन्न थी। वह माँग में सिंदूर डालती, रंग-बिरंगे कपड़े पहनती और अधरों पर मिस्सी के धड़े जमाती। मंगरू भजनों की एक पुरानी किताब छोड़ गया था। उसे कभी-कभी पढ़ती और गाती। मंगरू ने उसे हिंदी सिखा दी थी। टटोल-टटोल कर भजन पढ़ लेती थी।
पहले वह अकेली बैठी रहती थी। गाँव की और स्त्रियों के साथ बोलते-चालते उसे शर्म आती थी। उसके पास वह वस्तु न थी, जिस पर दूसरी स्त्रियाँ गर्व करती थीं। सभी अपने-अपने पति की चर्चा करतीं। गौरा का पति कहाँ था? वह किसकी बातें करती। अब उसके भी पति था। अब वह अन्य स्त्रियों के साथ इस विषय पर बातचीत करने की अधिकारिणी थी। वह भी मंगरू की चर्चा करती, मंगरू कितना स्नेहशील है, कितना सज्जन, कितना वीर। पति-चर्चा से उसे कभी तृप्ति ही न होती थी।
स्त्रियाँ पूछी- मंगरू तुम्हें छोड़कर क्यों चले गए?
गौरा कहती- क्या करते? मर्द कभी ससुराल में पड़ा रहता है? देश-परदेश में निकलकर चार पैसे कमाना ही तो मर्दों का काम है, नहीं तो मान-मर्यादा का निर्वाह कैसे हो?
जब कोई पूछता, चिट्ठी-पत्री क्यों नहीं भेजते, तो हंसकर कहती-अपना पता- ठिकाना बताने में डरते हैं। जानते हैं न कि गौरा आकर सिर पर सवार हो जाएगी। सच कहती हूँ उनका पता-ठिकाना मालूम हो जाए, तो मुझसे एक दिन भी न रहा जाए। वह बहुत अच्छा करते हैं कि मेरे पास चिट्ठी-पत्री नहीं भेजते। बेचारे परदेश में कहां घर-गृहस्थी सँभालते फिरेंगे? एक दिन किसी सहेली ने कहा- हम न मानेंगे, तुझसे जरूर मंगरू से झगड़ा हो गया है, नहीं तो बिना कुछ कहे-सुने क्यों चले जाते?
गौरा ने हंसकर कहा- बहिन, अपने देवता से भी कोई झगड़ा करता है? वह मेरे मालिक हैं, भला मैं उनसे झगड़ा करूँगी? जिस दिन झगड़े की नौबत आएगी, कहीं डूब मरूंगी। मुझसे कह के जाने पाते? मैं उनके पैरों से लिपट न जाती।
एक दिन कलकत्ते से एक आदमी आकर गंगा के घर ठहरा। पास ही के किसी गाँव में अपना घर बतलाया। कलकत्ते में वह मंगरू के पड़ोस में ही रहता था। मंगरू ने उससे गौरा को अपने साथ लाने को कहा था। दो साड़ियाँ और राह- खर्च के लिए रुपये भी भेजे थे। गौरा फूली न समायी। बूढ़े ब्राह्मण के साथ चलने को तैयार हो गई। चलते वक्त वह गाँव की सब औरतों से गले मिली। गंगा उसे स्टेशन तक पहुँचाने गयी। सब कहते थे, बेचारी लड़की के भाग जाग गए, नहीं कुढ़-कुढ़ कर मर जाती।
रास्ते भर गौरा सोचती जाती थी- न जाने वह कैसे हो गए होंगे। अब तो मूँछें अच्छी तरह निकल आई होंगी। परदेश में आदमी सुख से रहता है। देह भर आई होगी। बाबू साहब हो गए होंगे। मैं पहले दो-तीन दिन उनसे बोलूंगी नहीं। फिर पूछूंगी- तुम मुझे छोड़कर क्यों चले गए? अगर किसी ने मेरे बारे में कुछ बुरा-भला कहा ही था, तो तुमने उसका विश्वास क्यों कर लिया? तुम अपनी आँखों से न देखकर दूसरों के कहने पर क्यों गए? मैं भली हूँ या बुरी हूँ, हूँ तो तुम्हारी, तुमने मुझे इतने दिनों रुलाया क्यों? तुम्हारे बारे में अगर इसी तरह मुझसे कोई कहता, तो क्या मैं तुमको छोड़ देती? जब तुमने मेरी बाँह पकड़ ली, तो तुम मेरे हो गए। फिर तुममें लाख ऐब हों, मेरी बला से। चाहे तुम तुर्क ही क्यों न हो जाओ, मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकती। तुम क्यों मुझे छोड़कर आये? क्या समझते थे, भागना सहज है? आखिर झक मारकर बुलाया कि नहीं? कैसे न बुलाते? मैंने तो तुम्हारे ऊपर दया की, चली आयी, नहीं तो कह देती कि मैं ऐसे निर्दयी के पास नहीं जाती, तो तुम आप दौड़े आते। तप करने से तो देवता भी मिल जाते हैं, आकर सामने खड़े हो जाते हैं, तुम कैसे न आते? वह बार-बार उद्विग्न हो- होकर बूढ़े ब्राह्मण से पूछती, अब कितनी दूर है? धरती के छोर पर रहते हैं क्या? और भी कितनी ही बातें वह पूछना चाहती थी लेकिन संकोचवश न पूछ सकती थी। मन-ही-मन अनुमान करके अपने को संतुष्ट कर लेती थी। उनका मकान बड़ा-सा होगा, शहर में लोग पक्के घरों में रहते हैं। जब उनका साहब इतना मानता है, तो नौकर भी होगा। मैं नौकर को भगा दूँगी। मैं दिन-भर पड़े-पड़े क्या किया करूँगी?
बीच-बीच में उसे घर की याद भी आ जाती थी। बेचारी अम्मा रोती होंगी। अब उन्हें घर का सारा काम आप ही करना पड़ेगा। न जाने बकरियों को चराने ले जाती हैं या नहीं। बेचारी दिन भर में-में करती होंगी। मैं अपनी बकरियों के लिए महीने-महीने रुपये भेजूँगी। जब कलकत्ते से लौटेगी, तब सबके लिए साड़ियाँ लाऊंगी। तब मैं इस तरह थोड़े लौटूगीं। मेरे साथ बहुत-सा असवाब होगा। सबके लिए कोई-न-कोई सौगात लाऊंगी। तब तक तो बहुत-सी बकरियाँ हो जाएँगी। यही सुख स्वप्न देखते-देखते गौरा ने सारा रास्ता काट दिया। पगली क्या जानती थी कि मेरे मन कुछ और है, कर्ता के मन कुछ और। क्या जानती थी कि बूढ़े ब्राह्मणों के भेष में भी पिशाच होते हैं। मन की मिठाई खाने में मगन थी।
तीसरे दिन गाड़ी कलकत्ते पहुँची। गौरा की छाती धड़-धड़ करने लगी। वह यही कहीं खड़े होंगे। अब आते ही होंगे। यह सोचकर उसने घूंघट निकाल लिया और सँभल कर बैठी। मगर मंगरू वहाँ न दिखाई दिया। बूढ़ा ब्राह्मण बोला- मंगरू तो यहाँ नहीं दिखायी देता, मैं चारों ओर छान आया। शायद किसी काम में लग गया होगा, आने की छुट्टी न मिली होगी। मालूम भी तो न था कि हम लोग किस गाड़ी से आ रहे हैं। उनकी राह क्यों देखें, चलो डेरे पर चलें।
दोनों गाड़ी पर बैठकर चले। गौरा कभी ताँगे पर सवार न हुई थी। उसे गर्व हो रहा था कि कितने ही बाबू लोग पैदल जा रहे हैं, मैं ताँगे पर बैठी हूँ।
एक क्षण में गाड़ी मंगरू के डेरे के पास पहुँच गयी। एक विशाल भवन था, अहाता साफ-सुथरा, सायबान में फूलों के गमले रखे हुए थे। ऊपर चढ़ने लगी। विस्मय, आनन्द और आशा से उसे अपनी सुधि ही न थी। सीढ़ियों पर चढ़ते-चढ़ते पैर दुखने लगे, यह सारा महल उनका है। किराया बहुत देना पड़ता होगा। रुपये को तो कुछ समझते ही नहीं। उसका हृदय धड़क रहा था कि कहीं मंगरू ऊपर से उतरते आ न रहे हों। सीढ़ी पर भेंट हो गई, तो मैं क्या करूंगी? भगवान् करे, यह पड़े सोते हों, तब मैं जगाऊँ और वह मुझे देखते ही हड़बड़ा कर उठ बैठें। आखिर सीढ़ियों का अंत हुआ। ऊपर एक कमरे में गौरा को ले जाकर ब्राह्मण देवता ने बिठा दिया।
यह मंगरू का डेरा था। मगर मंगरू यहाँ भी नदारद! कोठरी में केवल एक खाट पड़ी हुई थी। एक किनारे दो-चार बर्तन रखे हुए थे। यही उनकी कोठरी है। तो मकान किसी दूसरे का है, उन्होंने यह कोठरी किराए पर ली होगी। देखती हूँ चूल्हा ठंडा पड़ा हुआ है। मालूम होता है, रात को बाजार में पूरियाँ खाकर सो रहे होंगे। यही उनके सोने की खाट है। एक किनारे घड़ा रखा हुआ था। गौरा के मारे प्यास के तालू सूख रहा था। घड़े से पानी लेकर पिया। एक किनारे एक झाडू रखा हुआ था। गौरा रास्ते की थकी थी, पर प्रेमोल्लास में थकन कहां? उसने कोठरी में झाडू लगाया, बर्तनों को धो-धोकर एक जगह रखा । कोठरी की एक- एक वस्तु यहां तक कि उसकी फर्श और दीवारों में उसे आत्मीयता की झलक दिखाई देती थी। उस घर में भी, जहाँ उसने अपने जीवन के 25 वर्ष काटे थे, उसे अधिकार का ऐसा गौरव-युक्त आनंद न प्राप्त हुआ था।
मगर उस कोठरी में बैठे-बैठे उसे संध्या हो गई और मंगरू का कहीं पता नहीं। अब छुट्टी मिली होगी। साँझ को सब जगह छुट्टी होती है। अब वह आ रहे होंगे। मगर बूढ़े बाबा ने उनसे कह तो दिया ही होगा, क्या वह अपने साहब से थोड़ी देर की छुट्टी न ले सकते थे? कोई बात होगी? तभी तो नहीं आए।
अँधेरा हो गया। कोठरी में दीपक न था। गौरा द्वार पर खड़ी पति की बाट देख रही थी। जीने पर बहुत से आदमियों के चलने-उतरने की आहट मिलती थी, बार-बार गौरा को मालूम होता था कि वह आ रहे हैं, पर इधर कोई न आता था।
नौ बजे बूढ़े बाबा आए। गौरा ने समझा, मंगरू है। झपटकर कोठरी के बाहर निकल आई। देखा तो ब्राह्मण! बोली-वह कहीं रह गए?
बूढ़ा-उनकी तो यहां से बदली हो गई। दफ्तर में गया था, तो मालूम हुआ कि वह कल अपने साहब के साथ यहाँ से कोई आठ दिन की राह पर चले गए। उन्होंने साहब से बहुत हाथ-पैर जोड़े कि मुझे दस दिन की मोहलत दे दीजिए, लेकिन साहब ने एक न मानी। मंगरू यहाँ लोगों से कह गए हैं कि घर से लोग आएँ तो मेरे पास भेज देना। अपना पता दे गए हैं। कल मैं तुम्हें यहाँ से जहाज पर बैठा दूँगा। उस जहाज पर हमारे देश के और भी बहुत से आदमी होंगे, इसलिए मार्ग में कोई कष्ट न होगा।
गौरी ने पूछा- कितने दिन में जहाज पहुँचेगा?
बूढ़ा- आठ-दस दिन से कम न लगेंगे, मगर घबराने की कोई बात नहीं। तुम्हें किसी बात की तकलीफ न होगी।
आब तक गौरा को अपने गाँव लौटने की आशा थी। कभी-न-कभी वह अपने पति को वहाँ अवश्य खींच ले जाएगी। लेकिन जहाज पर बैठकर उसे ऐसा मालूम हुआ कि अब फिर नाता टूट रहा है। वह देर तक घाट पर पड़ी रोती रही, जहाज और समुद्र देखकर उसे भय हो रहा था। हृदय दहला जाता था।
शाम को जहाज खुला। उस समय गौरा का हृदय एक अक्षय भय से चंचल हो उठा। थोड़ी देर के लिए नैराश्य ने उस पर अपना आतंक जमा लिया। न-जाने किस देश जा रही हूँ उनसे वहाँ भेंट भी होगी या नहीं। उन्हें कहीं खोजती, कोई पता-ठिकाना भी तो नहीं मालूम। बार-बार पछताती थी कि एक दिन पहले क्यों नहीं चली आई। कलकत्ते में भेंट हो जाती, तो मैं उन्हें वहाँ कभी न जाने देती।
जहाज पर और भी कितने ही मुसाफिर थे, कुछ स्त्रियाँ भी थीं। उनमें बराबर गाली-गलौज होती रहती थी, इसलिए गौरा को उनसे बातें करने की इच्छा न होती थी। केवल एक स्त्री उदास दिखाई देती थी। रंग-ढंग से वह किसी भले घर की मालूम होती थी। गौरा ने उससे पूछा- तुम कहां जाती हो बहिन?
उस स्त्री की बड़ी-बड़ी आंखें सजल हो गईं। बोली- क्या बताऊं बहिन, कहाँ जा -रही हूँ। जहाँ भाग्य लिये जाता है, वहीं जा रही हूँ। तुम कहां जाती हो? गौरा-मैं तो अपने मालिक के पास जा रही हूँ। जहाँ यह जहाज रुकेगा, वह वहीं नौकर हैं। मैं कल आ जाती, तो उनसे कलकत्ते में ही भेंट हो जाती। आने में देर हो गई। क्या जानती थी कि वह इतनी दूर चले जाएँगे, नहीं तो क्यों देर करती!
स्त्री- अरे बहिन, कहीं तुम्हें भी तो कोई बहका कर नहीं लाया है? तुम घर से किसके साथ आई हो?
गौरा- मेरे आदमी ने तो कलकत्ता से आदमी भेजकर मुझे बुलाया था। स्त्री- वह आदमी तुम्हारी जान-पहचान का था?
गौरा- नहीं, उसी तरफ का एक बूढ़ा ब्राह्मण था।
स्त्री- वही लम्बा-सा, दुबला-पतला। लकलक बुड्ढा, जिसकी एक आंख में फूली पड़ी हुई है।
गौरा-हाँ-हाँ वही। क्या तुम उसे जानती हो?
स्त्री- उसी दुष्ट ने तो मेरा भी सर्वनाश किया है। ईश्वर करे, उसकी सातों पुश्तें नरक भोगे, उसका निर्वंश हो जाए, कोई पानी देने वाला भी न रहे, कोढ़ी होकर मरे। मैं अपना वृतांत सुनाऊँ, तो तुम समझोगी कि झूठ है। किसी को विश्वास न आएगा। क्या कहूँ बस यही समझ लो कि इसके कारण मैं न घर की रह गई, न घाट की। किसी को मुँह नहीं दिखा सकती। मगर जान तो बड़ी प्यारी होती है। मिरिच के देश जा रही हूँ कि वहाँ मेहनत-मजूरी करके जीवन के दिन काटूंगी।
गौरा के प्राण नदी में समा गए। मालूम हुआ, जहाज अथाह जल में डूबा जा रहा है। समझ गई कि बूढ़े ब्राह्मण ने दगा की। अपने गाँव में सुना करती थी कि गरीब लोग मिरिच में भरती होने के लिए जाया करते हैं। मगर जो वहाँ जाता है, वह फिर नहीं लौटता। हे भगवान, तुमने मुझे किस पाप का यह दण्ड दिया? बोली- यह सब क्यों लोगों को इस तरह छल कर मिरिच भेजते हैं?
स्त्री- रुपये के लोभ से, और किसलिए,? सुनती हूँ आदमी पीछे इन सबों को कुछ रुपये मिलते हैं।
गौरा- तो बहिन, वहाँ हमें क्या करना पड़ेगा?
स्त्री- मजूरी।
गौरा सोचने लगी, अब क्या करूँ? वह आशा-नौका, जिस पर बैठी हुई वह चली जा रही थी, टूट गई थी, अब समुद्र की लहरों के सिवा उनकी रक्षा करने वाला कोई न था। जिस आधार पर उसने अपना जीवन-भवन बनाया था, वह जलमग्न हो गया। अब उसके लिए जल के सिवा और कहीं आश्रय है? उसको अपनी माता की, अपने घर की, अपने गाँव की सहेलियों की याद आई, और ऐसी घोर मर्म- वेदना होने लगी, मानो कोई सर्प अन्तस्तल में बैठा हुआ बार-बार डस रहा हो। भगवान्! अगर मुझे यही यातना देनी थी, तो तुमने मुझे जन्म ही क्यों दिया था? तुम्हें दुखिया पर दया नहीं आयी? जो पिरो हुए हैं, उन्हीं को पीसते हो। करुण स्वर से बोली- तो अब क्या करना होगा बहिन?
स्त्री- यह तो वहाँ पहुँचकर मालूम होगा। अब मजूरी ही करनी पड़े तो कोई बात नहीं, लेकिन अगर किसी ने कुदृष्टि से देखा, तो मैंने निश्चय कर लिया है कि या तो उसी के प्राण ले लूंगी या आपने प्राण दे दूँगी।
यह कहते-कहते उसे अपना वृत्तान्त सुनाने की वह उत्कट इच्छा हुई, जो दुखिया को हुआ करती है। बोली- मैं बड़े घर की बेटी और उससे भी बड़े घर की बहू हूं पर अभागिनी! विवाह के तीसरे ही साल पतिदेव का देहान्त हो गया। चित्त की कुछ ऐसी दशा हो गई कि नित्य मालूम होता कि वह मुझे बुला रहे हैं। पहले तो आंखें झपकते ही उनकी मूर्ति सामने आ जाती थी, लेकिन फिर तो यह दशा हो गई कि जागृत दशा में रह-रहकर उनके दर्शन होने लगे। बस, यही जान पड़ता था कि वह साक्षात् खड़े बुला रहे हैं। किसी से शर्म के मारे कहती न थी। पर मन में यह शंका होती थी कि जब उनका देहावसान हो गया है, तो वह मुझे दिखाई कैसे देते है? मैं उसे भ्रांति समझकर चित्त को शांत न कर सकती थी। मन कहता था, जो वस्तु प्रत्यक्ष दिखाई देती है, वह मिल क्यों नहीं सकती? केवल यह ज्ञान चाहिए। साधु-महात्माओं के सिवा ज्ञान और कौन दे सकता है? मेरा तो अब भी विश्वास है कि अभी ऐसी क्रियाएँ हैं, जिनसे हम मरे हुए प्राणियों से बातचीत कर सकते हैं, उनको स्थूल रूप में देख सकते हैं। महात्माओं की खोज में रहने लगी। मेरे यहाँ अक्सर साधु-सन्त आते थे, उनसे एकांत में इस विषय में बातें किया करती थी, पर वे लोग सदुपदेश देकर मुझे टाल देते थे। मुझे सदुपदेशों की जरूरत न थी। मैं वैधव्य-धर्म खूब जानती थी। मैं तो यह ज्ञान चाहती थी, जो जीवन और मरण के बीच का परदा उठा दे। तीन साल तक मैं इसी खेल में लगी रही। दो महीने होते हैं, वही बूढ़ा ब्राह्मण संन्यासी बना हुआ मेरे यहाँ आ पहुँचा। मैंने इससे यही भिक्षा माँगी। इस धूर्त ने कुछ ऐसा मायाजाल फैलाया कि मैं आँखें रहते हुए भी फंस गई। अब सोचती हूँ तो अपने ऊपर आश्चर्य होता है कि मुझे उसकी बातों पर इतना विश्वास क्यों हुआ? मैं पति-दर्शन के लिए सब कुछ झेलने को, सब कुछ करने को तैयार थी। इसने मुझे रात को अपने पास बुलाया। मैं घरवालों से पड़ोसिन के घर जाने का बहाना करके इसके पास गयी। एक पीपल के नीचे इसकी धूनी जल रही थी। उस विमल चाँदनी में यह बूढ़ा जटाधारी ज्ञान और योग का देवता-सा मालूम होता था। मैं आकर धूनी के पास खड़ी हो गई। उस समय यदि बाबाजी मुझे आग में कूद पड़ने की आज्ञा देते, तो मैं तुरंत आग में कूद पड़ती। इसने मुझे बड़े प्रेम से बिठाया और मेरे सिर पर हाथ रखकर न जाने क्या कर दिया कि मैं बेसुध हो गयी। फिर मुझे कुछ नहीं मालूम कि मैं कहां गयी, क्या हुआ। जब मुझे होश आया तो मैं रेल पर सवार थी। जी में आया कि चिल्लाऊँ, पर यह सोचकर कि अब गाड़ी रुक भी गई और मैं उतर भी पड़ी, तो घर में घुसने न पाऊंगी, मैं चुपचाप बैठी रह गई। मैं परमात्मा की दृष्टि में निर्दोष थी, पर संसार की दृष्टि में कलंकित हो चुकी थी। रात को किसी युवती का घर से निकल जाना कलंकित करने के लिए काफी था। जब मुझे मालूम हो गया कि सब मुझे मिर्च के टापू में भेज रहे हैं, तो मैंने जरा भी आपत्ति नहीं की। मेरे लिए अब सारा संसार एक-सा है। जिनका संसार में कोई न हो, उसके लिए देश-परदेश दोनों बराबर हैं। हां यह पक्का निश्चय कर चुकी हूँ कि मरते दम तक अपने सत की रक्षा करूंगी। विधि के हाथ में मृत्यु से बढ़कर कोई यातना नहीं। विधवा के लिए मृत्यु का क्या भय? उसका तो जीना और मरना-दोनों बराबर है। बल्कि मर जाने से जीवन की विपत्तियों का तो अंत हो जाएगा।
गौरा ने सोचा इस स्त्री में कितना धैर्य और साहस है। फिर मैं क्यों इतनी कातर और निराश हो रही हूँ? जब जीवन की अभिलाषाओं का अंत हो गया, तो जीवन के अंत का क्या डर! बोली- बहिन, हम और तुम एक ही जगह रहेंगे। मुझे तो अब तुम्हारा ही भरोसा है।
स्त्री ने कहा- भगवान् का भरोसा रखो और मरने से मत डरो।
सघन अन्धकार छाया हुआ था। ऊपर काला आकाश था, नीचे काला जल। गौरा आकाश की ओर ताक रही थी। उसकी संगिन जल की ओर। उसके सामने आकाश के कुसुम थे, इसके चारों ओर अनन्त अखण्ड, अपार अन्धकार था।
जहाज से उतरते ही एक आदमी ने यात्रियों के नाम लिखने शुरू किये। इसका पहनावा तो अंग्रेजी था, पर बातचीत से हिंदुस्तानी मालूम होता था। गौरा सिर झुकाए अपनी संगिनी के पीछे खड़ी थी। उस आदमी की आवाज सुनकर वह चौक पड़ी। उसने दबी आँखों से उसकी ओर देखा। उसके समस्त शरीर में सनसनी दौड़ गई। क्या स्वप्न तो नहीं देख रही हूँ? आंखों पर विश्वास न आया, फिर उस पर निगाह डाली। उसकी छाती वेग से धड़कने लगी। पैर थर-थर काँपने लगे। ऐसा मालूम होने लगा, मानो चारों ओर जल-ही- जल है, और उसमें बही जा रही हूँ। उसने अपनी संगिनी का हाथ पकड़ लिया, नहीं तो जमीन पर गिर पड़ती। उसके सम्मुख वही पुरुष खड़ा था, जो उसका प्राणाधार था और जिससे इस जीवन में भेंट की उसे लेश मात्र भी आशा न थी। यह मंगरू था, इसमें जरा भी सन्देह न था। हाँ उसकी सूरत बदल गई थी। यौवन-काल की वह कांतिमय सहारा, सदय छवि, नाम को भी न थी। बाल खिचड़ी हो गए थे। गाल पिचके हुए, लाल आँखों से कुवासना और कठोरता झलक रही थी। पर था मंगरू। गौरा के जी में प्रबल इच्छा हुई कि स्वामी के पैरों से लिपट जाऊं, चिल्लाने को जी चाहा, पर संकोच ने मन को रोका। बूढ़े ब्राह्मण ने बहुत ठीक कहा था। स्वामी ने अवश्य मुझे बुलाया था और मेरे आने से पहले यहाँ चले आए। उसने अपनी संगिनी के कान में कहा-बहिन, तुम उस ब्राह्मण को व्यर्थ ही बुरा कह रही थी। यही तो वह हैं, जो यात्रियों के नाम लिख रहे हैं।
स्त्री- सच, खूब पहचानती हो?
गौरा- बहिन, क्या इसमें भी धोखा हो सकता है?
स्त्री- तब तो तुम्हारे भाग जाग गए, मेरी भी सुधि लेना।
गौरा- भला, बहिन ऐसा भी हो सकता है कि यहाँ तुम्हें छोड़ दूँ।
मंगरू यात्रियों से बात-बात पर बिगड़ता था, बात-बात पर गालियाँ देता था, कई आदमियों को ठोकर मारे और कई को केवल अपने गाँव का जिला बता सकने के कारण उसने धक्का देकर गिरा दिया। गौरा मन-ही-मन गड़ी जाती थी। साथ ही अपने स्वामी के अधिकार पर उसे गर्व भी हो रहा था। आखिर मंगरू उसके सामने आकर खड़ा हो गया और कुचेष्टापूर्ण नेत्रों से देखकर बोला-तुम्हारा क्या नाम है?
गौरा ने कहा- गौरा।
मंगरू चौक पड़ा, फिर बोला- घर कहां है?
गौरा ने कहा- मदनपुर, जिला बनारस।
यह कहते-कहते उसे हंसी आ गई। मंगरू ने अबकी उसकी ओर ध्यान से देखा, तब लपक कर उसका हाथ पकड़ लिया और बोला- गौरा! तुम यहाँ कहां? मुझे पहचानती हो?
गौरा रो रही थी, मुँह से बात न निकली।
मंगरू फिर बोला- तुम यहाँ कैसे आई?
गौरा खड़ी हो गई, आंसू पोंछ डाले और मंगरू की ओर देखकर बोल- तुम्हीं ने तो बुला भेजा था।
मंगरू-मैंने! मैं तो सात साल से यहाँ हूँ।
गौरा- तुमने उस बूढ़े ब्राह्मण से मुझे लाने को नहीं कहा था?
मंगरू- कह तो रहा हूँ मैं सात साल से यहाँ हूँ और मरने पर ही यहाँ से जाऊंगा। भला तुम्हें क्यों बुलाता।
गौरा को मंगरू से इस निष्ठुरता की आशा न थी। उसने सोचा, अगर यह सत्य भी हो कि इन्होंने मुझे नहीं बुलाया, तो भी इन्हें मेरा यों अपमान न करना चाहिए था। क्या यह समझते हैं कि मैं इनकी रोटियों पर आई हूँ? यह तो इतने ओछे स्वभाव के न थे। शायद दरजा पाकर इन्हें मद हो गया है। नारी सुलभ अभिमान से गर्दन उठाकर उसने कहा- तुम्हारी इच्छा हो, तो अब लौट जाऊँ, तुम्हारे ऊपर भार बनना नहीं चाहती?
मंगरू कुछ लज्जित होकर बोला- अब तुम यहाँ से लौट नहीं सकती गौरा? यहाँ आकर बिरला ही कोई लौटता है।
यह कहकर यह कुछ देर चिन्ता में मग्न खड़ा रहा, मानो संकट में पड़ा हुआ हो कि क्या करना चाहिए। उसकी कठोर मुखाकृति पर दीनता का रंग झलक पड़ा। तब कातर स्वभाव से बोला- जब आ गई हो, तो रहो। जैसी कुछ पड़ेगी देखी जाएगी।
गौरा- जहाज फिर का लौटेगा?
मंगरू- तुम यहाँ से पाँच बरस के पहले नहीं जा सकतीं।
गौरा- क्यों, क्या कुछ जबरदस्ती है?
मंगरू- हाँ? यहाँ का यही हुक्म है।
गौरा- तो फिर मैं अलग मजूरी करके अपना पेट पालूंगी।
मंगरू ने सजल- नेत्र होकर कहा- जब तक मैं जीता हूँ, तुम मुझसे अलग नहीं रह सकती।
गौरा- तुम्हारे ऊपर भार बनकर न रहूंगी।
मंगरू- मैं तुम्हें भार नहीं समझता, लेकिन यह जगह तुम-जैसी देवियों के रहने लायक नहीं है, नहीं तो अब तक मैंने तुम्हें कब का बुला लिया होता। वही बूढ़ा आदमी, जिसने तुम्हें बहकाया, मुझे घर से आते समय पटना में मिल गया और झाँसे देकर मुझे यहाँ भरती कर दिया। तब से यहीं पड़ा हुआ हूँ। चलो, मेरे घर में रहो, वहाँ बातें होगी यह दूसरी औरत कौन है?
गौरा- यह मेरी सखी है। इन्हें भी बूढ़ा बहका लाया है।
मंगरू- यह तो किसी कोठी में जाएंगी। इन सब आदमियों की बाँट होगी। जिसके हिस्से में जितने आदमी आएंगे, उतने ही हर एक कोठी में जाएंगे।
गौरा- यह तो मेरे साथ रहना चाहती है।
मंगरू -अच्छी बात है, इन्हें भी लेती चलो।
यात्रियों के नाम तो लिखे ही जा चुके थे, मंगरू ने उन्हें एक चपरासी को सौंपकर दोनों औरतों के साथ घर की राह ली। दोनों ओर सघन वृक्षों की कतारें थी। जहाँ तक निगाह जाती थी, ऊख-ही-ऊख दिखाई देती थी। समुद्र की ओर से शीतल, निर्मल वायु के झोंके आ रहे थे। अत्यंत सुरम्य दृश्य था। पर मंगरू की निगाह उस ओर न थी। वह भूमि की ओर ताकता सिर झुकाए, संदिग्ध चाल से चला जा रहा था, मानो मन-ही-मन कोई समस्या हल कर रहा है।
थोड़ी ही दूर गए थे कि सामने से दो आदमी आते दिखाई दिए। समीप आकर दोनों रुक गये और एक ने हँसकर कहा-मंगरू, इनमें से एक हमारी है। दूसरा बोला- और दूसरी मेरी।
मंगरू का चेहरा तमतमा उठा था। भीषण क्रोध से काँपता हुआ बोला- यह दोनों मेरे घर की औरतें हैं। समझ गए?
इन दोनों ने जोर से कहकहे मारा और एक ने गौरा के समीप आकर उसका हाथ पकड़ने की चेष्टा करके कहा- यह मेरी है। चाहे तुम्हारे घर की हो, चाहे बाहर की। बच्चा, हमें चकमा देते हो।
मंगरू- कासिम, इन्हें मत छेड़ो, नहीं तो अच्छा न होगा। मैंने- कह दिया, मेरे घर की औरतें हैं।
मंगरू की आँखों से अग्नि की ज्वालामुखी निकल रही थी। वे दोनों उसके मुख का भाव देखकर कुछ,सहम गए और समझ लेने की धमकी देकर आगे बढ़े। किन्तु मंगरू के अधिकार-क्षेत्र से बाहर पहुँचते ही एक ने पीछे से ललकार कर कहा- देखें, कहां लेकर जाते हो।
मंगरू ने उधर ध्यान न दिया। जरा कदम बढ़ाकर चलने लगा। जैसे संध्या के एकान्त में हम कब्रिस्तान के पास से गुजरते हैं और हमें पग-पग पर यह शंका होती है कि कोई शब्द कान में न पड़ जाए, कोई सामने आकर खड़ा न हो जाए, कोई जमीन के नीचे से कफन ओढ़े उठ न खड़ा हो।
गौरा ने कहा- ये दोनों बड़े शोहदे थे।
मंगरू और मैं किस लिए कह रहा था कि यह जगह तुम-जैसी स्त्रियों के रहने लायक नहीं है।
सहसा दाहिनी तरफ से एक अंग्रेज घोड़ा दौड़ता हुआ आ पहुँचा और मंगरू से बोला- वेल जमादार, ये दोनों औरतें हमारी कोठी में रहेगा। हमारे कोठी में कोई औरत नहीं है।
मंगरू ने दोनों औरतों को अपने पीछे कर लिया और सामने खड़ा होकर बोला- साहब, ये दोनों मेरे घर की औरतें हैं।
साहब- ओ-हो? तुम झूठा आदमी। हमारे कोठी में कोई औरत नहीं तुम दो ले जाएगा। ऐसा नहीं हो सकता। (गौरा की ओर इशारा करके) इसको हमारे कोठी पर पहुंचा दो।
मंगरू ने सिर-से-पैर तक काँपते हुए कहा- ऐसा नहीं हो सकता।
मगर साहब आगे बढ़ गया था, उसके कान में बात न पहुँची। उसने हुक्म दे दिया था और उसकी तामील करना जमादार का काम था।
शेष मार्ग निर्विघ्न समाप्त हुआ। आगे मजूरों के रहने के मिट्टी के घर थे। द्वारों पर स्त्री-पुरुष जहाँ-तहाँ बैठे हुए थे। सभी इन दोनों स्त्रियों की तरफ घूरते थे और आपस में इशारे करते और हंसते थे। गौरा ने देखा, उसमें छोटे-बड़े का लिहाज नहीं है, न किसी की आँखों में शर्म है।
एक भदैसल औरत ने हाथ पर चिलम पीते हुए अपनी पड़ोसिन से कहा- चार दिन की चाँदनी फिर अँधेरा पाख ।
दूसरी अपनी चोटी गूंथती हुई बोली- कलोर हैं न।
मंगरू दिन-भर द्वार पर बैठा रहा, मानो कोई किसान आपने मटर के खेत की रखवाली कर रहा हो। कोठरी में दोनों स्त्रियाँ बैठी अपने नसीबों को रो रही थीं। इतनी देर में दोनों को वहाँ की दशा का परिचय हो गया था। दोनों भूखी-प्यासी बैठी थीं। यहाँ का रंग देखकर भूख-व्यास सब भाग गई थी।
रात के दस बजे होंगे कि एक सिपाही ने आकर मंगरू से कहा- चलो, तुम्हें एजेण्ट साहब बुला रहे हैं।
मंगरू ने बैठे-बैठे कहा- देखो नब्बी, तुम भी हमारे देश के आदमी हो। कोई मौका पड़े, तो हमारी मदद करोगे न? जाकर साहब से कह दो, मंगरू कहीं गया है। बहुत होगा, जुर्माना कर देंगे ।
नब्बी- न भैया, गुस्से में भरा बैठा है, पिए हुए है, कहीं मार चले तो बस, यहाँ चमड़ा इतना मजबूत नहीं है।
मंगरू- अच्छा, तो जाकर कह दो, नहीं आता।
नब्बी- मुझे क्या, जाकर कह दूँगा, पर तुम्हारी खैरियत नहीं है।
मंगरू ने जरा देर सोचकर लकड़ी उठाई और नब्बी के साथ साहब के बँगले पर चला। यह यही साहब थे, जिनसे आज मंगरू से भेंट हुई थी। मंगरू जानता था कि साहब से बिगाड़ करके यहाँ एक क्षण भी निर्वाह नहीं हो सकता। जाकर साहब के सामने खड़ा हो गया। साहब ने दूर ही से डाँटा, वह औरत कहां हैं? तुम उसे अपने घर में क्यों रखा है?
मंगरू- हुजूर, वह मेरी ब्याहता औरत है।
साहब- अच्छा, वह दूसरी कौन है?
मंगरू- वह मेरी सगी बहन है हुजूर?
साहब- हम कुछ नहीं जानता। तुमको लाना पड़ेगा। दो में से कोई, दो में से कोई।
मंगरू पैरों पर गिर पड़ा और रो-रोकर अपनी सारी राम-कहानी सुना गया। पर साहब जरा भी न पसीजे। अंत में वह बोला-हुजूर, यह उन दूसरी औरतों की तरह नहीं हैं। अगर यहाँ आ भी गईं, तो प्राण दे देंगी।
साहब ने हँसकर कहा- ओ। जान देना इतना आसान नहीं है।
नब्बी- मंगरू अपनी दाँव रोते क्यों हो! तुम हमारे घर में नहीं घुसे थे? अब भी जब घात पाते हो, जा' पहुँचते हो। अब रोते क्यों हो?
एजेंट- श्री, यह बदमाश है। अभी जाकर लाओ, नहीं तो हम तुमको हण्टरों से पीटेगा।
मंगरू- सरकार जितना चाहें पीट लें, मगर मुझसे यह काम करने को न कहें, जो मैं जीते जी नहीं कर सकता।
एजेण्ट- हम एक सौ हण्टर मारेगा।
मंगरू- हुजूर एक हजार हण्टर मार लें, लेकिन मेरे घर की औरतों से न बोलें।
एजेण्ट नशे में चूर था। हण्टर लेकर मंगरू पर पिल पड़ा और लगा सड़ा सड़ जमाने। दस-बारह कोड़े तो मंगरू ने धैर्य के साथ सहे, फिर हाय-हाय करने लगा। देह की खाल फट गयी थी और मांस पर जब चाबुक पड़ता था, तो बहुत जब्त करने पर भी कण्ठ से आर्त्त ध्वनि निकल आती थी और अभी एक सौ में कुल पन्द्रह चाबुक पड़े थे।
रात के दस बज गए थे। चारों ओर सन्नाटा छाया था और उस नीरव अंधकार में मंगरू का करुण विलाप किसी पक्षी की भांति आकाश में मँडरा रहा था। वृक्षों के समूह भी हतबुद्धि से खड़े मौन रुदन की मूर्ति बने हुए थे। यह पाषाण-हृदय, लम्पट, विवेक-शून्य जमादार इस समय एक अपरिचित स्त्री के सतीत्व की रक्षा करने के लिए अपने प्राण तक देने को तैयार था, केवल इसी नाते कि वह उसकी पत्नी की संगिनी थी। वह समस्त संसार की नजरों में गिरना गवारा कर सकता था, पर अपनी पत्नी की भक्ति पर अखंड राज्य करना चाहता था। इसमें अणुमात्र की कमी भी उसके लिए असह्य थी, उस अलौकिक भक्ति के सामने उसके जीवन का क्या महत्त्व था?
ब्राह्मणी तो जमीन पर ही सो गई थी, पर गौरा बैठी पति की बाट-जोह रही थी। अभी तक वह उससे कोई बात न कह सकी थी। सात वर्षों की विपत्ति- कथा कहने और सुनने के लिए बहुत समय की जरूरत थी, रात के सिवा वह समय फिर कब मिल सकता था? उसे ब्राह्मणी पर कुछ क्रोध-सा आ रहा था कि यह क्यों मेरे गले की हार हुई। इसी के कारण तो वह घर में नहीं आ रहे हैं। एकाएक वह किसी का रोना सुनकर चौंक पड़ी। भगवान्, इतनी रात गए कौन दुःख का मारा रो रहा है। अवश्य कोई कहीं मर गया है। वह उठकर द्वार पर आई तो यह अनुमान करके कि मंगरू बैठा हुआ है, बोली- वह कौन रो रहा है? जरा जाकर देखो तो।
लेकिन जब कोई जवाब न मिला, तो वह स्वयं कान लगाकर सुनने लगी। सहसा उसका कलेजा धक से हो गया। यह तो उन्हीं की आवाज है। अब आवाज साफ सुनाई दे रही थी। मंगरू की आवाज थी। वह द्वार के बाहर निकल आई। उसके सामने एक गोली के टप्पे पर एजेण्ट का बँगला था। उसी तरफ से आवाज आ रही थी। कोई उन्हें मार रहा है। आदमी मार पड़ने पर ही इस तरह रोता है। मालूम होता है, वही साहब उन्हें मार रहा है। वह खड़ी न रह सकी, पूरी शक्ति से उस बँगले की ओर दौड़ी, रास्ता साफ था। एक क्षण में वह फाटक पर पहुँच गई। फाटक बंद था। उसने जोर से फाटक पर धक्का दिया, लेकिन वह फाटक न खुला और कई बार जोर-जोर से पुकारने पर भी कोई बाहर न निकला, तो वह फाटक के जंगलों पर पैर रखकर भीतर कूद पड़ी और उस पार जाते ही उसने एक रोमाँचकारी दृश्य देखा। मंगरू नंगे बदन से बरामदे में खड़ा था और एक अंग्रेज उसे हण्टरों से मार रहा था। गौरा की आंखों के सामने अँधेरा छा गया। वह एक छलांग में साहब के सामने जाकर खड़ी हो गई और मंगरू को अपने अक्षय-प्रेम-सबल हाथों से ढांप कर बोली- सरकार, दया करो, इनके बदले मुझे जितना चाहो मारो, पर इनको छोड़ दो।
एजेण्ट ने हाथ रोक लिया और उन्मत्त की भांति गौरा की ओर कई कदम आकर बोला- हम इसको छोड़ दें, तो तुम मेरे पास रहेगा?
मंगरू के नथुने फड़कने लगे। यह पामर, नीच, अंग्रेज मेरी पत्नी से इस तरह की बातें कर रहा है। अब वह जिस अमूल्य रत्न की रक्षा के लिए इतनी यातनाएँ सह रहा था, यही वस्तु साहब के हाथ में चली जा रही है, यह असह्य था। उसने चाहा कि लपक कर साहब की गर्दन पर चढ़ बैठूं जो कुछ होना हो, हो जाए। यह अपमान सहने के बाद जीकर क्या करूंगा? नब्बी ने तुरन्त पकड़ लिया और कई आदमियों को बुलाकर उसके हाथ-पाँच बाँध दिए। मंगरू भूमि पर छटपटाने लगा।
गौरा रोती हुई साहब के पैरों पर गिर पड़ी और बोली -हुजूर, इन्हें छोड़ दें, मुझ पर दया करें।
एजेण्ट- तुम हमारे पास रहेगा?
गौरा ने खून का घूंट पीकर कहा- हाँ रहूँगी।
बाहर मंगरू बरामदे में पड़ा कराह रहा था। उसकी देह में सूजन थी और घावों में जलन, सारे अंग जकड़ गए थे। हिलने की भी शक्ति नहीं थी। हवा घावों में शर के समान चुभती थी, लेकिन यह सारी व्यथा वह सह सकता था। असह्य यह था कि साहब गौरा के साथ इसी घर में विहार कर रहा है और मैं कुछ नहीं कर सकता। उसे अपनी पीड़ा भूल-सी गई थी, कान लगाकर सुन रहा था कि उनकी बातों की भनक कान में पड़ जाए, देखूँ तो क्या बातें हो रही हैं। गौरा अवश्य चिल्लाकर भागेगी और साहब उसके पीछे दौड़ेगा। अगर मुझसे उठा जाता, तो उस वक्त बचा को खोदकर गाड़ ही देता। लेकिन बड़ी देर हो गई, न तो गौरा चिल्लायी न बँगले से निकलकर भागी! वह उस सजे-सजाए कमरे में साहब के पास बैठी सोच रही थी- क्या इसमें तनिक भी दया नहीं है? मंगरू का पीड़ा-क्रंदन सुन सुन-सुनकर उसके हृदय के टुकड़े हुए जाते थे। क्या इसके अपने भाई-बाप, माँ- बहिन नहीं हैं? माता यहाँ होती, तो उसे इतना अत्याचार न करने देती। मेरी अम्मा लड़कों पर कितना बिगड़ती थीं, जब वह किसी पेड़ पर ढेले चलाते देखती थीं। पेड़ में भी प्राण होते हैं। क्या इसकी माता इसे एक आदमी के प्राण लेते देखकर भी मना न करती! साहब शराब पी रहा था और गौरा गोश्त काटने का छुरा हाथ में लिये खेल रही थी।
सहसा गौरा की निगाह एक चित्र की ओर गई। उसमें एक माता बैठी हुई थी। गौरा ने पूछा- साहब, यह किसकी तस्वीर है?
साहब ने शराब का गिलास मेज़ पर रखकर कहा- ओ, वह हमारे खुदा की माँ मरियम है।
गौरा- बड़ी अच्छी तस्वीर है! क्यों साहब, तुम्हारी माँ जीती हैं न।
साहब- वह मर गया, जब हम यहाँ आया, तो वह बीमार हो गया। हम उसको देख भी नहीं सका।
साहब के मुख-मण्डल पर करुणा की झलक दिखाई दी।
गौरा बोली- तब तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ होगा। तुम्हें अपनी माता से भी प्यार नहीं था। वह रो-रोकर मर गई और तुम देखने भी न गए! तभी तुम्हारा दिल कड़ा है।
साहब- नहीं, नहीं, हम अपनी माता को बहुत चाहता था। वैसा औरत दुनिया में न होगा। हमारा बाप हमको बहुत छोटा-सा छोड़कर मर गया। माता ने कोयले की खान में मजूरी करके हमको पाला।
गौरा- तब तो वह देवी थी। इतनी गरीबी का दुःख सहकर भी तुम्हें दूसरों पर तरस नहीं आता? क्या वह दया की देवी तुम्हारी बेदर्दी देखकर दुःखी न होती होगी, उनकी कोई तस्वीर तुम्हारे पास है?
साहब- ओ, हमारे पास उनके कई फोटो हैं। देखो, वह उन्हीं की तस्वीर है, वह दीवाल पर।
गौरा ने समीप जाकर तस्वीर देखी और करुण स्वर में बोली- सचमुच देवी थीं। जान पड़ता है, दया की देवी हैं। वह तुम्हें कभी मारती थी कि नहीं? मैं तो जानती हूँ यह कभी किसी पर न बिगड़ती रही होंगी। बिलकुल दया की मूर्ति हैं।
साहब- ओ, मामा हमको कभी नहीं मारता था। वह बहुत गरीब था, वह अपने कमाई में कुछ-न-कुछ जरूर खैरात करता था। किसी बे-बाप के बालक को देखकर उसकी आंखों में आंसू भर आता था। वह बहुत ही दयावान था। गौरा ने तिरस्कार के स्वर में कहा- और उसी देवी के पुत्र होकर तुम इतने निर्दयी हो! क्या वह होतीं तो तुम्हें किसी को इस तरह हत्यारों की भांति मारने देतीं? वह स्वर्ग में रो रही होंगी। स्वर्ग-नरक तो तुम्हारे यहाँ भी होगा। ऐसी देवी के पुत्र तुम कैसे हो गए?
गौरा को ये बातें कहते हुए जरा भी भय न होता था। उसने अपने मन में एक दृढ़ संकल्प कर लिया था और अब उसे किसी प्रकार का भय न था। जान से हाथ धो लेने का निश्चय कर लेने के बाद भय की छाया भी नहीं रह जाती। किन्तु वह हृदय-शून्य अंग्रेज इन तिरस्कार पर आग हो जाने के बदले और भी नम्र होता जाता था। गौरा मानवी भावों से कितनी ही अनभिज्ञ हो, पर इतना जानती थी कि अपनी जननी के लिए प्रत्येक हृदय में, चाहे वह साधु का हो या कसाई का, आदर और प्रेम का एक कोना सुरक्षित रहता है। ऐसा भी कोई अभागा प्राणी है, जिसे मातृ-स्नेह की स्मृति थोड़ी देर के लिए रुला न देती हो, उसके हृदय के कोमल भाव को जगा न देती हो?
साहब की आँखें डबडबा गई थीं, सिर झुकाए बैठा रहा। गौरा ने फिर उसी ध्वनि में कहा- तुमने उसकी सारी तपस्या धूल में मिला दी। जिस देवी ने मर- मरकर तुम्हारा पालन किया, उसी को मरने के पीछे तुम इतना कष्ट दे रहे हो? क्या इसीलिए माता अपने पुत्र को रक्त पिला-पिलाकर पालती है? अगर वह बोल सकतीं, तो क्या चुप बैठी रहतीं, तुम्हारे हाथ पकड़ सकतीं, तो न पकड़ती? मैं तो समझती हूँ वह जीती होती, तो इस वक्त विष खाकर मर जातीं।
साहब अब जब्त न कर सके। नशे में क्रोध की भांति ग्लानि का वेग सहज ही में उठ आता है। दोनों हाथों से मुँह छिपाकर साहब ने रोना शुरू किया, और इतना रोया कि हिचकी बँध गई। माता के चित्र के सम्मुख जाकर वह कुछ देर तक खड़ा रहा, मानों माता से क्षमा माँग रहा हो तब आकर आर्द्र-स्वर से बोला- हमारे मां को अब कैसे शान्ति मिलेगा? हाय-हाय! हमारे सबब से उसको स्वर्ग में भी सुख नहीं मिला। हम कितना अभागा है!
गौरा- अभी जरा देर में तुम्हारा मन बदल जाएगा और तुम फिर दूसरों पर यही अत्याचार करने लगोगे।
साहब- नहीं, नहीं, अब हम मां को कभी दुःख नहीं देगा। हम अभी मंगरू को अस्पताल भेजता है।
रात ही को मंगरू अस्पताल पहुँचा दिया गया। एजेण्ट खुद उसको पहुँचाने आया। गौरा भी उसके साथ थी। मंगरू को ज्वर हो आया था, बेहोश पड़ा हुआ था।
मंगरू ने तीन दिन आंखें न खोलीं और गौरा तीनों दिन उसके पास बैठी रही। एक क्षण के लिए भी वहाँ से न हटी। एजेण्ट भी कई बार हाल-चाल पूछने आ जाता और हर मर्तबा गौरा से क्षमा माँगता।
चौथे दिन मंगरू ने आंखें खोलीं तो देखा, गौरा सामने बैठी हुई है। गौरा उसे आँखें खोलते देखकर पास खड़ी हुई और बोली- अब कैसा जी है? मंगरू ने कहा- तुम यहाँ कब आई?
गौरा- मैं तो तुम्हारे साथ ही यहाँ आई थी, तब से यही हूँ।
मंगरू - साहब के बंगले में क्या जगह नहीं है?
गौरा- अगर बंगले की चाह होती, तो सात समुद्र पार तुम्हारे पास क्यों आती?
मंगरू- आकर कौन-सा सुख दे दिया है? तुम्हें वही करना था, तो मुझे मर क्यों न जाने दिया?
गौरा ने झुँझलाकर कहा- तुम इस तरह की बातें मुझसे न करो। ऐसी बातों से मेरी देह में आग लग जाती है।
मंगरू ने मुँह फेर लिया, मानो उसे गौरा की बात पर विश्वास नहीं आया।
दिन-भर गौरा मंगरू के पास बेदाना-पानी खड़ी रही। गौरा ने कई बार उसे बुलाया, लेकिन वह चुप्पी साधे रह गया। यह संदेहयुक्त निरादर कोमल हृदय गौरी के लिए असह्य था। जिस पुरुष को वह देवतुल्य समझती थी, उसके प्रेम से वंचित होकर वह कैसे जीवित रह सकती थी? यही प्रेम उसके जीवन का आधार था। उसे खोकर अब वह अपना सर्वस्व खो चुकी थी।
आधी रात से अधिक बीत चुकी थी। मंगरू बेखबर सोया हुआ था, शायद कोई स्वप्न देख रहा था। गौरा ने उसके चरणों पर सिर रखा और अस्पताल से निकली। मंगरू ने उसका परित्याग कर दिया था। वह भी उसका परित्याग करने जा रही थी।
अस्पताल के पूर्व दिशा में एक फलांग पर एक छोटी-नदी बहती थी गौरा कगार पर खड़ी हो गई। अभी कई दिन पहले वह अपने गाँव में आराम से पड़ी हुई थी। उसे क्या मालूम था कि जो वस्तु इतनी मुश्किल से मिल सकती है, वह इतनी आसानी से खोई भी जा सकती है। उसे अपनी माँ की, अपने घर की, अपनी सहेलियों की, अपने बकरी के बच्चों की याद आई। वह सब छोड़कर इसीलिए यहाँ आ गई थी? पति के ये शब्द- ‘क्या साहब के बंगले में जगह नहीं है' उसके मर्मस्थान में बाणों के समान चुभे हुए थे। यह सब मेरे ही कारण तो हुआ? मैं न रहूँगी, तो वह फिर आराम से रहेंगे। सहसा उसे ब्राह्मणी की याद आ गई। उस दुखिया के दिन यहाँ कैसे कटेंगे? चलकर साहब से कह दूँ कि उसे या तो उसके घर भेज दें या किसी पाठशाला में काम दिला दें।
वह लौटना ही चाहती थी कि किसी ने पुकारा-गौरा! गौरा!!
यह मंगरू का करुण-कम्पित स्वर था। वह चुपचाप खड़ी हो गई। मंगरू ने फिर पुकारा- गौरा! तुम कहाँ हो? मैं ईश्वर से कहता हूँ कि…'
गौरा ने और कुछ न सुना। वह धम्म-से नदी में कूद पड़ी। बिना अपने जीवन का अंत किए वह स्वामी की विपत्ति का अंत कर सकती थी।
धमाके की आवाज खुलते ही मंगरू भी नदी में कूद पड़ा। वह अच्छा तैराक था। मगर कई बार गोते मारने पर भी गौरा का कहीं पता न चला।
प्रातःकाल दो लाशें साथ-साथ नदी में तैर रही थीं। जीवन-यात्रा में उन्हें यह चित्र-संग कभी न मिला था। स्वर्ग-यात्रा में दोनों साथ-साथ जा रहे थे।
शूद्रा का सारांश
'शूद्रा' प्रेमचंद की एक अत्यंत मार्मिक और त्रासदीपूर्ण कहानी है, जो औपनिवेशिक शोषण, गिरमिटिया मज़दूरी, छलावे और स्त्री के आत्मसम्मान की रक्षा पर आधारित है। गंगा एक निर्धन विधवा है जो अपनी सुंदर और सुशील बेटी गौरा के साथ गाँव के किनारे एक झोपड़ी में रहती है। सामाजिक उपेक्षा और सन्देहों के बीच किसी तरह मंगरू नाम के एक कहार युवक से गौरा का विवाह हो जाता है। विवाह के बाद दोनों में अटूट प्रेम हो जाता है और मंगरू गौरा को पढ़ना-लिखना भी सिखाता है। किंतु पारिवारिक विवाद और जाति-बिरादरी के तानों से व्यथित होकर मंगरू एक रात चुपचाप घर छोड़कर चला जाता है। वर्षों तक कोई संदेश न मिलने पर भी गौरा उसके प्रति अपनी निष्ठा और सुहाग चिन्हों को बनाए रखती है।
एक दिन एक चालाक बूढ़ा ब्राह्मण गौरा के घर आकर यह झूठ बोलता है कि मंगरू ने उसे कलकत्ता बुलवाया है। गौरा पति से मिलने की आस में उसके साथ चली जाती है। कलकत्ता पहुँचाकर वह बूढ़ा उसे धोखे से एक जहाज़ पर चढ़ा देता है, जो गिरमिटिया मजदूरों को मॉरिशस ले जा रहा था। वहाँ पहुँचने पर गौरा को पता चलता है कि मंगरू स्वयं सात वर्षों से बंधुआ मजदूर के रूप में फँसा हुआ है और उसने कभी कोई बुलावा नहीं भेजा था। दोनों के मिलन का हर्ष औपनिवेशिक व्यवस्था की क्रूरता में दब जाता है। वहाँ का अंग्रेज बागान अधिकारी गौरा पर अपनी कुदृष्टि डालता है और मंगरू द्वारा विरोध किए जाने पर उसे नंगा करके चाबुक से क्रूरतापूर्वक पिटवाता है।
गौरा अपने पति के प्राण बचाने के लिए अंग्रेज अधिकारी से एक छद्म समझौता करती है कि मंगरू के स्वस्थ होने के बाद वह उसके पास आ जाएगी। वह अस्पताल में रात-दिन जागकर मंगरू की सेवा करती है। किंतु होश में आने पर मंगरू कड़वे शब्दों में उस पर संदेह व्यक्त करता है। पति का यह संदेह और औपनिवेशिक अधिकारी के सामने अपनी अस्मिता गंवाने की स्थिति गौरा के लिए असह्य हो जाती है। वह अपने आत्मसम्मान और सतीत्व की रक्षा के लिए पास की नदी में कूदकर आत्महत्या कर लेती है। गौरा के पीछे मंगरू भी नदी में छलांग लगा देता है और अगले दिन दोनों के शव जल में एक साथ तैरते हुए पाए जाते हैं।
प्रकाशन इतिहास
प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।
महत्त्व और विषय-विमर्श
- गिरमिटिया प्रथा और औपनिवेशिक शोषण: कहानी भारत से छल-प्रपंच द्वारा दूरस्थ टापुओं (जैसे मॉरिशस) में ले जाए जाने वाले गिरमिटिया मजदूरों की दुर्दशा और औपनिवेशिक बागान व्यवस्था के अमानवीय शोषण का पर्दाफाश करती है।
- स्त्री का आत्मसम्मान और पति-निष्ठा: गौरा का चरित्र परम निष्ठा, त्याग और आत्मसम्मान का प्रतीक है। वह पति के प्राण बचाने के लिए यातना सहती है, लेकिन अपनी गरिमा बेचने के बजाय मृत्यु को गले लगाना स्वीकार करती है।
- आंतरिक छल और मध्यस्थों की भूमिका: कहानी दिखाती है कि औपनिवेशिक शोषण केवल विदेशी हुकूमत तक सीमित नहीं था, बल्कि भारतीय समाज के भीतर के स्वार्थी और चालाक मध्यस्थ (जैसे बूढ़ा ब्राह्मण भर्तीकर्ता) भी गरीबों के विश्वास का अनुचित लाभ उठाते थे।
- सामाजिक संकीर्णता और जातिगत उत्पीड़न: 'शूद्रा' शीर्षक समाज के निचले तबके की आर्थिक और सामाजिक लाचारी की ओर संकेत करता है, जिसके कारण निर्धन और असहाय लोग आसानी से छले जाते हैं और अपनी रक्षा करने में असमर्थ रहते हैं।
- कहानी का व्यापक महत्त्व: 'शूद्रा' प्रेमचंद की औपनिवेशिक संदर्भ में लिखी गई एक दुर्लभ और सशक्त कहानी है, जो प्रवासी भारतीयों के दर्द, स्त्री की अस्मिता, और क्रूर सामाजिक-औपनिवेशिक संरचना के विरुद्ध आत्मसम्मानजनक नैतिक प्रतिरोध को रेखांकित करती है।
