यों तो इंग्लैंड ने पिछले सौ सालों में बड़ी-बड़ी अद्भुत चीजों का आविष्कार किया, बड़े-बड़े दार्शनिक और वैज्ञानिक तत्त्वों का निरूपण किया; लेकिन सबसे अद्भुत आविष्कार जो उसने हिन्दुस्तानी नौकरशाही के संयोग से किया है और जो अनन्तकाल तक उसके यश की ध्वजा को फहराता रक्खेगा, वह नीतिशास्त्र का यह चमत्कारपूर्ण, युगांतरकारी आविष्कार है, जिसे डंडाशास्त्र कहते हैं। यह बिलकुल नया आविष्कार है और इसके लिए इंग्लैंड और भारत दोनों ही सरकारों की जितनी प्रशंसा की जाय, वह थोड़ी है। इसने शासन-विज्ञान को कितना सरल, कितना तरल बना दिया है, कि इस आविष्कार के सामने डंडौत करने की इच्छा होती है। अब न कानून की ज़रूरत है, न व्यवस्था की, कौन्सिलें और एसेम्बलियाँ सब व्यर्थ, अदालतें और महकमे सब फ़िजूल। डंडा क्या नहीं कर सकता--वह अजेय है, सर्वशक्तिमान् है। बस डंडेबाज़ों का एक दल बना लो, पक्का, मज़बूत, अटल दल। वह सारी मुश्किलों को हल कर देगा। मजदूरों की सभा मजदूरी बढ़ाने का आन्दोलन करती है--दो डंडा! किसानों की फसल मारी गयी, वह लगान देने में असमर्थ हैं, कोई मुज़ायक़ा नहीं--दो डंडा! तान-तान कर, कस-कस कर। डंडा सर्वशक्तिमान् है--रुपये निकलवा लेगा। कोई ज़रा भी सिर उठावे, ज़रा भी चूँ करे--दो डंडा! वह युवक कपड़े की दूकान पर खड़ा है, खरीदारों से कह रहा है--विलायती कपड़े न खरीदो--दो डंडा! उसकी इतनी हिम्मत, कि इंग्लैंड की शान में ऐसी अनर्गल बात मुंह से निकाले, ऐसा मारो कि ज़बान ही बन्द हो जाय। वह देखना, एक स्वयंसेवक शराब-ताड़ी की दूकान पर जा पहुँचा। नशेबाज़ों को समझा रहा है--दो डंडा! देर न करो, ताबड़-तोड़ लगाओ, खूब कस-कर लगाओ। इन सिर-फिरों की यही दवा है। जहाँ कहीं राष्ट्रीयता की, जाग्रति की, आत्मगौरव की झलक देखो, बस तुरन्त डंडे से काम लो। इस मरज़ की यही अचूक दवा है, और इसका आविष्कार किया है--भारत सरकार और अंग्रेजी सरकार ने मिलकर। कुछ न पूछिए! कितनी जाँफ़िशानी और परेशानी के बाद यह आविष्कार हो पाया है। इसका पेटेंट करा लेना चाहिए, वरना शायद कोई दूसरी जाति इस पर अधिकार कर बैठे! हालाँकि जहाँ तक हम समझते हैं, भारत के सिवा, जिसने अहिंसा का व्रत ले रक्खा है, संसार के और किसी भाग में यह आविष्कार उपयोगी सिद्ध न होगा; बल्कि उलटे आविष्कारकों के हक में ही घातक सिद्ध होगा। अहा हा! कितना सुन्दर दृश्य है! वह सड़क पर कई हजार आदमी झंडा लिये, क़ौमी नारे लगाते चले आ रहे हैं। बच्चे भी हैं, स्त्रियाँ भी हैं, बूढ़े भी हैं। अपने देश से प्रेम करने के लिए उम्र की कैद नहीं है। इधर लट्ठबंद, भालेबंद और राइफ़लबंद पुलीस के जवान पैंतरे बदल रहे हैं, जैसे शिकारी कुत्ते शिकार को देखकर अधीर हो जाते हैं, कि कब छूटें और शिकार पर टूट पड़ें। जंजीर खोलते-खोलते आफ़त आ जाती है। बिलकुल यही हाल हमारे पुलीस के इन शूर-वीरों का है, जिनमें अंग्रेजी सर्जेंट तो उबला पड़ता है, बहादुरी का जोश उसके दिल में आँधी की तरह उमड़ा आ रहा है। हुक्म मिलता है--चार्ज! फिर देखिए इन सूरमाओं की बहादुरी। निहत्थे, सिर झुकाकर बैठे हुए, जबान बंद रखने वाले आदमियों पर डंडों और भालों का वार शुरू हो जाता है। और अगर किसी तरफ से एकाध पत्थर आ गया, चाहे वह खुफिया पुलीसवालों ही ने क्यों न फेंका हो, तो प्रलय हो गया! बस 'फायर' का हुक्म मिल गया। धड़ाधड़ बन्दूकें चलने लगीं और लोग पड़ापड़ गिरने लगे और हमारे अफसर लोग, जो ऐसे अवसरों पर तमाशा देखने के लिए अवश्य आ जाया करते हैं, खुश हो-होकर तालियाँ बजाने लगे। वाह क्या बहादुरी है, क्या डिसिप्लिन है, भारत के सिवा संसार में और कहाँ ऐसे वीर पैदा हो सकते हैं और इंग्लैंड के सिवा और कहाँ ऐसे जोशीले अफसर और नीतिज्ञ!
तो आजकल डंडे भगवान का राज है! सारे देश में शान्ति है!! आश्चर्य है, कि इस बीसवीं सदी में और सभ्यता के शिखर पर बैठनेवालों के हाथों, भारतवासियों का यह हाल हो रहा है। कौन-सा हृदय है, जो आहत और दलित नहीं, कौन-सी आँख है, जो खून के आँसू नहीं रो रही है। शायद हमारे सर्वज्ञ और दयालु विधाता समझते हैं, कि लाठी से चोट नहीं लगती; मगर वास्तव में लाठी की चोट गोली के जख्मों से कहीं अधिक कष्टसाध्य होती है। पिंडारियों का हाल इतिहास में पढ़ा करते थे; पर आजकल जो अनीति हो रही है और प्रजा को जिस तरह कुचला जा रहा है, उस पर तो पिंडारी भी दाँतों उंगली दबाते; पर अंग्रेजी सभ्यता का एक अंग यह भी है, कि अपनी बुराइयों पर तो पर्दा डाला जाय और दूसरों पर खूब कीचड़ फेंका जाय। धरसाना, वीरमगाम, विलीपाली, लखनऊ, मिदनापुर, बंबई, दिल्ली, कहाँ तक गिनाएँ। यह अंग्रेजी शौर्य और पराक्रम की एक अविश्रांत कथा है। निहत्थों पर, स्त्रियों पर, बालकों पर, राह चलते पथिकों पर, घर में बैठे हुए प्राणियों पर डंडों का वार करना ऐसी ही वीर जाति का काम है और अगर कोई इसको यथार्थ रूप में बयान करने का साहस करे, तो उसके लिए पुलीस की दफ़ाएँ हैं, जेल है, डंडे हैं। इतना ही नहीं, नीचे से ऊपर तक, पुलीस के छोटे अधिकारियों से लेकर वाइसराय और सेक्रेटरी तक एक स्वर से पुकारते हैं--पुलीस का व्यवहार प्रशंसनीय था, उसने बड़े जब्त से काम लिया। फिर कोई लाख कहे, हमारे बड़े से बड़े नेता फ़रियाद करें, चारों ओर से यही आवाज़ आती है। हमें तो इस पुलीस-प्रेम में सरकार की दुर्बलता ही का प्रमाण मिलता है। वह पुलीस को हरेक प्रकार से, क़ायदे और न्याय की परवा न करके, उसकी नीच मनोवृत्तियों को पोषित करके, उसकी पीठ ठोंककर अपने काबू में रखना चाहती है; क्योंकि वह खूब समझ रही है, यह हाथ से गये और फिर सर्वनाश हुआ। जो शक्तियाँ किराये के मनुष्यों पर अवलंबित होती हैं--जनता के विश्वास, प्रेम और सहयोग पर नहीं--उनका यही हाल होता है। उन क्रूर कथाओं की कल्पना करके रोमांच हो जाता है।
इधर तो विदेशी वस्त्रों का प्रचार आर्डिनेंसों से हो रहा है, उधर सरकार की ओर से विदेशी चीज़ों के लिए प्रोपेगैंडा भी किया जा रहा है। विलायती चीज़ों के सस्तेपन और पायदारी की सराहना की जा रही है और उसके व्यवहार न करने से हिन्दुस्तान को जो हानि होगी, उसका रोना रोया जा रहा है। हमारी प्रजा-वत्सल सरकार से यह नहीं देखा जाता, कि उसकी नादान जनता, रद्दी स्वदेशी चीज़ों पर अपना धन नष्ट करे! हमारे विधाता जनता की इस मूर्खता और अदूरदर्शिता से बड़े दुखी हो रहे हैं, बेचारों को दाना-पानी हराम हो रहा है; पर जनता उनकी ओर मुखातिब भी नहीं होती। क्या अब भी किसी को संदेह हो सकता है, कि अंग्रेजी सरकार किसके लिए भारत का शासन कर रही है?
प्रकाशन इतिहास
[सम्पादकीय। 'हंस', जून, 1930 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-3 में संकलित।]
