Cover Image for Kalidas Ki Kavita (कालिदास की कविता) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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आलोचना•1914•30 मिनट

कालिदास की कविता

Kalidas Ki Kavita

महाकवि कालिदास की कविता में प्रकृति-चित्रण, सौंदर्य-सृष्टि, 'ऋतुसंहार' के ऋतु-वर्णन और उनकी काव्य-कला पर मुंशी प्रेमचंद का एक पांडित्यपूर्ण आलोचनात्मक निबंध।

Work Details

प्रकार: आलोचना
वर्ष: 1914
पठन समय: 30 मिनट (4,399 शब्द)

यों तो संस्कृत साहित्य की आज तक थाह नहीं मिली। एक सागर है कि जितना डूबों उतना ही गहरा मालूम होता है। मगर तीन कवि बहुत प्रसिद्ध हैं-वाल्मीकि, व्यास और कालिदास। इनकी कृतियां एक-एक युग का संपूर्ण इतिहास हैं और यही उनकी ख्याति का आधार है। वाल्मीकि सबसे पुराने थे। उनकी कविता में कर्त्तव्य और सच्चाई का रंग प्रधान है। व्यास, जो उनके बाद हुए, अध्यात्म और भक्ति की ओर झुके और कालिदास ने सौंदर्य और प्रेम को अपना क्षेत्र बनाया। रामायण वाल्मीकि की और महाभारत व्यास को लोकप्रिय पुस्तकें हैं और ये दोनों हिन्दू धर्म का अंग बन गई हैं। मगर कालिदास को हम कुछ भूल-सा गए थे और अगर अंग्रेज़ी विद्वानों और लेखकों ने हमारा मार्ग-दर्शन न किया होता तो हम शायद अब तक इस अमर कवि को गुमनामी के कोने में पड़ा रहने देते। कालिदास की इस वक्त जो कुछ चर्चा है वह अंग्रेज़ी शिक्षा की देन है। कई शताब्दियों के बाद कालिदास का सितारा चमका है और आज उसके जीवन, युग और कृतियों पर अंग्रेज़ी पत्र-पत्रिकाओं में बहुत खोज और विद्वत्तापूर्ण लेख लिखे जा रहे हैं। हिन्दुस्तान और यूरोप में एक से उत्साह के पाथ उसके संबंध में खोजबीए क्री जा रही है, यद्यपि अभी तक प्रामाणिक रूप से ग्सके जीवन के संबंध में सामग्री प्राप्त नहीं हुई।

कालिदास की कविता संक्षेप में कोमल भावनाओं और अलंकृत कल्पनाओं की कविता है। पुराने कवियों की कविता में सादगी और सहजता का रंग विशेष होता है, उपमाएं और रूपक सर्वसुलभ, भावनाएं सच्ची मगर सादा, वर्णन शैली सरल। और यही कारण है कि साधारण लोगों में पुराने कवियों को जो लोकप्रियता प्राप्त होती है उस पर बाद के कवि सदा ईर्ष्या किया करते हैं क्योंकि उनकी कऊंविता, जिसे काव्य-रुचि को आवश्यकताएं और युग की परिस्थितियां रंगीन, सूक्ष्म ओर उलझा हुआ बना देती हैं, साधारण लोगों की समझ से बाहर होती है। मगर बाद के कवियों में अनुकरण, कृत्रिमता और विषयों की दरिद्रता की जो सर्वसामान्य दुर्बलता पाई जाती है कालिदास की कविता उससे बिल्कुल अछूती है। रंगीनी और पृक्ष्ता के साथ उनकी कविता में वही सरलता, वही विषयों की नवीनता और वही कल्पनाओं की बाढ़ मौजूद है जो प्राचीन कवियों की कविता में पाई जा सकती है। उसको प्रतिभा कविता की हर शैली का रंग में एक-सी समर्थ है। उसकी नाच- गाने की महफिलें निज्ञामी को शर्मिन्दा कर देती हैं और लडाई के मैदान में फिरदौसी को कल्पना का घोड़ा भी ऐसी उड़ानें नहीं भरता। सिर्फ 'मेघदूत' में सौंदर्य और प्रेस, संयोग और वियोग की भावनाएं इतनी अधिक मात्रा में मिलती हैं कि उन पर किसी भाषा कौ कविता को गर्व हो सकता है। उसकी एक एक कल्पना पर काव्यमर्मज् चकित रह जाते हैं। पहले दिन पर एक नर्म असर हाता है और फिर फोर भावों की सूक्ष्मता, विचारों की विविधता और वर्णन के सौंदर्य को देखकर आरचर्य होने लगता है। हमारे उर्दू के प्रेमियों ने प्रात: समीर को दूत बनाया। मीर ने सबसे पहले ये सेवा प्रात: समीर को सौंपो और दाग को भी इससे अधिक

गतिशील और वाणी-निरपेक्ष कोई दूत दिखाई न पड़ा। दो शताब्दियों तक प्रात:समीर ने यह सेवा की और अब भी उसका गला न छूटा। मगर कालिदास ने एक नया दूत ढूंढ निकाला। वह मेघ को अपनी व्यथा की कहानी सुनाता है। ऐसी ही अछूती बातों से उसकी कविता भरपूर है। संस्कृत कवियों का यह एक विशेष गुण है कि वे अपने काव्य में प्राकृतिक दृश्यों की खूब चाशनी देते हैं। उनकी कवि-कल्पनाएं सदाबहार फूलों और पत्तियों से सजी हुई नज़र आती हैं। कालिदास में यह गुण अपने चरम उत्कर्ष पर पहुंच गया है। फूल-पत्तियों का जिस खूबसूरती और अछ्तेपन से उसने प्रयोग किया है वह संस्कृत में भी किसी दूसरे कवि को सुलभ नहीं हुआ। उसकी उपमाएं नई-नई कोंपलें हैं और रूपक महकते हुए रंग-बिरंगे फूल। यह ठीक है कि उर्दू और फारसी के कवियों ने बेल-बूटों का इस्तेमाल किया है मगर उनके फूल-पत्ते मुर्शाए हुए, बेरंग और बेमज़ा हैं। उनकी कल्पना की उड़ानें उन्हैं आसमान पर उड़ा ले गईं और वहां ज़ोहल व अतारिद, ज़ोहरा व मुश्तरी

जैसे नक्षत्रों से उनका परिचय करा दिया, यहां तक कि अब किसी फारसी कसीद को समझने के लिएं ज्योतिष और अंतिरक्ष-विज्ञान का जानना जरूरी है। संस्कृत कविता इतने ऊंचे न उड़ सकी मगर उसने इसी दुनिया की हर चीज़ को खूब गौर से देखा-भाला और उस्कफ़रा अध्ययन किया। वह किसी मीनार की तरह ऊंची नहीं बल्कि एक हरे-भरे मैदान की तरह फैली हुई है जिसमें हिरन किलोलें करते हैं, रंग-बिंरगे पंछी चहचहाते हैं, हरियाली लहलहातो है और दर्पन- जैसे पानी के सोते बहते हैं। मतलब यह कि संस्कृत कविता को तीनों लोकों से समान रुचि है। वह जिस दुनिया में पेदा हुई है उसी दुनिया की हर चीज़ से परिचित है और यह सिर्फ शकुन्तला नाटक का पहला पार्ट पढ़ने से इस खूबी के साथ प्रकट हो जाता है जिसे बयान नहीं किया जा सकता। हिरन और भौंरा, माधवी.और कतकी, कदंब और नीम, ये सब हमारे सामने आते हैं, बेजान चीजों की तरह नहीं, कवि ने उनमें एक जान डाल दी हैं, उन सब में प्रकृति की संवेदना का समान आंदा है। इसी सीन को पढ़कर प्रसिद्ध कवि गेटे विभोर हो गया था, और वह भी कंबल अंग्रेजी अनुवाद के अध्ययन से। और अब इस बात को सिद्ध करने के लिए ज़्यादा दलीलों की ज़रूरत नहीं है कि वह नशे का सा असर जो संस्कृत कविता हमारे दिलों पर पैदा करती है, किसी दूसरी भाषा की कविता के सामर्थ्य से परे हैं. विशेषतया उर्दू कविता के जिसकी उपमा उन पौधों से दी जा सकती है जो अक्मः बागों में बनावटी ज़िंदगी बसर करते नज़र आते हैं, मुर्झाए हुए पत्ते, निर्जीव पीला रंग, सिमटी हुई शार्खे, न फल न फूल। फारस का पौधा हिन्दुस्तान में लगाया गया, न वह ज़मीन न वह आबहवा, न देखने से आंखों को ताज़गी होती है न दिल को खुशी। जहां तक उपमाओं और दृश्य-चित्रण का संबंध है उर्दू कचिता बड़ हद तक कृत्रिमता" और अवास्तविकता की एक पिटारी -है। संस्कृत कवियों के दृश्य और भावनाएं सब इसी धरती की हवा-पानी से बनी हैं और यही उनकी प्रभावोत्यादकता का रहस्य है। देखिए कालिदास वर्षा ऋतु में शहद की मक्खियों का शहद जमा करना किस नर्माो और खूबसूरती से दिखाता है-

तलाशे शहद में हैं मक्खियां सुबुक परवाज़ मगर मिज़ाज्ञ में ये सादगी के हैं अंदाज़ कि नाचते कहीं आते हैं जब नज़र ताऊस फिजाये दश्त में फेैलाये बाल-ओ-पर ताऊस तराने गाती हुई जब करीब आती है कंवल के फूलों के धोखे में बैठ जाती है। महक रही है हवा केतकी के फूलों से बसी हुई है सबा केतकी के फूलों से हर एक रविश पे है जमघट परीजमालों का अजब बनाव है फूलों के गहने वालों का चमन में करती हुई सुब्हदम गुलअफशानी लचक लचक के हे पौदों को दे रही पानी कहीं कदम के दरख्तों पर छा रही है बहार हरे हरे किसी जानिब हैं नीम के अशजार सरो, शमशाद और सनोबर के मुकाबले में कदम्ब और नीम और केतकी कैसे अपने जान पड़ते हैं। कविता की इन खूबियां क अलावा कालिदास ने मानव चरित्र को भी बड़ी गहरी आंखों से देखा था। मानव-स्वभाव के उलट- फेर का उसे पूरा ज्ञान था। किन बातों से आदमी के दिल में कैसी भावनाएं और विचार पैदा होते हैं वे उसने आश्चर्यजनक बास्तविकता के साथ दिखलाए हैं। उसके नाटक मानव चरित्र के चित्र हैं जिनके अंग- प्रत्यंग के संतुलन, रंगों की उपयुक्तता और चेहरे-मोहरे की सुघरता की तारीफ पूरी तरह नहीं की जा सकती। और इश्क की घातें और मुहब्बत के इशारे तो उसने ऐसी नजाकत के दिखाए हैं जो काव्य-रसिकों को मुग्ध कर देते हैं। इस रंग में कोई उसका प्रतिद्वेंदी है न उसकी बराबरी का दावा करने वाला वह इस रंग का उस्ताद है, गोकि यह सच है कि कभी कभी उसका कलम अपनी शोखोी में हद से आगे बढ गया है। क्योंकि वह स्वच्छंद स्वभाव का आदमी था। मगर इसमें कोई संदेह नही कि उसने दाम्पत्य ही को प्रेम की सबसे ऊंची कसौर्टी माना है। 'मेघदूत' में विरही यक्ष जिस प्रेमिका की याद में तड़पा है वह उसकी पत्नी थी। 'ऋतुसंहार' में भी जहां- तहां इसके संकेत हैं-- वो महवरें जो बदलतो हैं करवटें शब भर रुला रही है लहू जिनको दूरिये शौहर बरस रही है उदासी अब उनकी सूरत पर जिगर की आग कयामत है इक कयामत पर कालिदास आमतौर पर हिन्दुस्तान का शेक्सपियर कहा जा.; है और इसमें तनिक भो अत्युक्ति नहीं। दुनिया में सिर्फ शेक्सपियर ही ऐसा कवि है जिसकी उससे तुलना फो जा सकतो है। दोनों नाटककार हैं, दोनों मानव-हृदय के मर्मज्ञ। उनकी कल्पनाएं उनको बादेशें बहुत जगहों पर लड़ गई हैं। एक ही कवि-मन प्रकृति की ओर से

दोनों को मिला था। किसी चीज़ को जिस निगाह से शेक्सपियर देखता है उसी निगाह से कालिदास भी उसे देखता है। व्यथा और शोक, निराशा और प्रतिशोध, प्रेम और वियोग में आदमी के दिल में कैसी भावनाएं लहरें मारती हैं, इसको जिस खूबी से शेक्सपियर ने दिखाया है, उसी रंगीनी के साथ कालिदास ने भो दिखाया है। शेक्सपियर के जितने कैरेक्टर हैं वह सब एक दुसरे से भिन्‍न हैं। हर एक में कोई न कोई अपनी विशेषता है। कालिदास के कैरेक्टरों की भी यही स्थिति है। शेक्सपियर के मैकबेथ, ओथेलो, रोमियो, जूलियट की तस्वीरों को कालिदास के दुष्यंत, शकुन्तला, प्रियंवदा की तस्वीरों के मुकाबले में रखने से साफ मालूम हो जाता है कि इन दोनों कवियों को मनुष्य की प्रकृति का कैसा ज्ञान था। शेक्सपियर और कालिदास में अगर कुछ अंतर है तो यह है कि शेक्सपियर को मानव-चरित्र के चमत्कार दिखाने में अधिक कौशल है और कालिदास को प्रकृति के चित्रण में। शेक्सपियर को मानव-स्वभाव के भोतर जो पहुंच थी वही कालिदास को प्रकृति के चमत्कारों में थी। इसीलिए शेक्सपियर का साहित्य गंभीर है और कालिदास का रंगीन। शेक्सपियर जिस तरह अपने पहले और बाद के कवियों से बड़ा है उसी तरह कालिदास के साहित्य की रंगीनी और नर्मी संस्कृत में बेजोड़ है।

कालिदास की कविताओं और नाटकों से प्रकट होता है कि वह काव्य-शिल्प और पिंगल आदि के ज्ञान के अलावा विभिन्‍न शास्त्रों और कलाओं में भी सिद्ध थे। उनके साहित्य में जगह-जगह दार्शनिक विचार बिखरे पड़े हैं जिनसे सिद्ध होता है कि वह सांख्यदर्शन और योग पर अधिकार रखते थे। वह शिव के उपासक थे मगर उनका विचार वेदांत की ओर झुका हुआ था। आत्मा और परमात्मा, शरीर और प्राण, माया और संसार आदि पेचोदा आध्यात्मिक प्रश्नों पर उन्होंने अपने साहित्य में बड़ी स्वतंत्रता के साथ विचार किया है। ज्योतिष को इस युग में बड़ी चर्चा थी। उज्जैन इस विद्या का उन दिनों केन्द्र था। वराहमिहिर, जो बड़ा प्रसिद्ध ज्योतिषी हुआ है, कालिदास के मित्रों में था और इसमें अब कोई संदेह नहीं हो सकता कि कालिदास को इस विद्या का प्रकांड ज्ञान था। उन्होंने खुद ज्योतिषी पर एक माक की किताब लिखी है जो आज तक चलती है। उनका भौगोलिक ज्ञान भी बहुत विस्तृत था। उन्होंने हिन्दुस्तान के हर कोने में सफर किया था। मेघदूत में उनके भौगोलिक ज्ञान का काफो प्रमाण मिलता है। जहां कहीं समुद्रो दृश्य चित्रित किए हैं उनसे यह सिद्ध होता है कि वह किसी आंखों-देखे दृश्य की तम्वीर खींच रहे हैं। प्रकृति-विज्ञान में भी उनको दृष्टि गहरी और ठीक थी। ज्वार-भारा, तूफान, चन्द्र, और सूर्य -ग्रहण आदि प्रकृति के चमत्कारों के संबंध में उन्होंने जो चर्चा की है, उनसे मालूम होता है कि उनके बारे में उन्हैं वही ज्ञान था जिस पर आज के वैज्ञानिक एकमत हैं। और राजनीति के तो वे जेसे एक सागर थ। 'रघुवंश' में शुरू से आखिर तक राजाओं ही का ज़िक्र है। इसमें सैकड़ों ऐसे प्रसंग हैं जिनसे पता चलता है कि उन्हैं राजनीति का पूरग ज्ञान था। राजा किसे कहते हैं? उसका क्या धर्म है? प्रजा के साथ उसका कैसा बर्ताव होना चाहिए? प्रजा के उस पर क्‍या अधिकार हैं? इन बातों को जैसा कुछ कालिदास समझते थे शायद आज बड़े-बड़े बादशाहों को भी वह ज्ञान न होगा। कहने का मतलब

यह कि कालिदास एक अत्यंत गुणी व्यक्ति, सिद्धहस्त कवि और ज्ञान का सागर था। उसकी बुद्धि के विस्तार पर हमको आरचर्य होता है। उपमाओं में दुनिया का कोई कवि उससे आंखें नहीं मिला सकता। उसकी उपमाएं ऐसी उपयुक्त, ऐसी सटीक, ऐसी सजीव हैं कि अगर उन्हैं श्लोक में से निकाल दीजिए तो एलोक बिल्कुल नीरस और फीका हो जाता है। प्रकृति का कोई ऐसा चमत्कार नहीं जिससे उसने उपमा न ली हो। यह ठीक है कि हिन्दुस्तान को उसकी जन्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है मगर सच तो यह है कि वह हिन्दुस्तान का नहीं बल्कि सारी दुनिया का कवि है। हिन्दुस्तानियों को उसके काव्य से जो आनंद प्राप्त हो सकता है वही किसी दूसरे देश के आदमी को हासिल हो सकता है। उसके लिए दुनिया कविता की एक पिटारी थी। जिस चौज़ पर निगाह डाली है उसे अपनी कविता का आभूषण बना लिया है। वेद, पुराण, इतिहास, दर्शन आदि विधायें जिन्हैं कवि रूखा-सूखा समझते थे और जिनका कविता से कोई संबंध नहीं बतलाया जाता वह कालिदास की कविता के अहाते में आकर कुछ और ही रंग-रूप अख्तियार कर लेती है। पदार्थ जगत्‌ को कविता के आभूषण से सजाने वाला, दूंठ पेड़ों और वोरान खंडहरों में वह मज़ा पैदा करने वाला जो हरे- भरे पेड़ों और सजे हुए महलों से न मिल सके, ऐसा समर्थ कवि दुनिया में दूसरा नहीं पैदा हुआ और जब तक कविता के मर्मज्ञ और सौंदर्य-रसिक बाकी रहेंगे तब तक कालिदास का नाम कायम रहेगा। वह संस्कृत कविता का पूरनम का चांद है और जिस व्यक्ति में कविता की जितनी ही रुचि और सच्ची परख है वह कालिदास की कविता से उतना ही आनंद उठा सकता है। कालिदास की कृतियां, जिनका अब तक पता चला है, संख्या में सोलह हैं मगर उनकी ख्याति और लोकप्रियता जिन पुस्तकों पर आधारित है वे सात से ज़्यादा नहों, और इन सातों में कोई एक पुस्तक भी उसकी अमरता के लिए काफी है। इन मात तारों के चार अंग चार काव्य हैं-. रघुबंश, 2. कुमारसंभव, 3. मेघदूत, 4 ऋतुसंहार। और बाकी तीन वे नाटक हैं जिन्होंने कलाविदों को आश्चर्य में डाल दिया है-] शकुन्तला, 2 विक्रमोर्वशी , 3. मालविकाग्निमित्र। सभ्य संसार में इन पुस्तकों का जो कीर्ति मिली है वह शायद ही किसी दूसरे कवि को नसीब हुई हो। यूरोप की अधिकांश भाषाओं में उनका अनुवाद हो जाना, उनको लोकप्रियता का सशक्त प्रमाण है। हिन्दुस्तान की लगभग सब भाषाओं में भी उनके अनुवाद हो गए हैं। नाटकों की लोकप्रियता का हाल यह है कि वह यूरोप और अमरीका के थियेटरों में खेले जा चुके हैं और कालिदास की रचनाओं की थोड़ी-बहुत जानकारी रखना सभ्य कहलाने के लिए जरूरी हो गया है। आज हिन्दुस्तान के चित्रकार कालिदास के कैरेक्टरों और श्यों को खींचना अपनी कला का उत्कर्ष समझते हैं। राजा रवि वर्मा का चित्र 'शकुन्तला- पत्र लेखन' स्वयं सौंदर्य और प्रेम की एक दुनिया है, जहां प्रकृति ने बेदना के मधुर और मोहक साधन एकत्र कर दिए हैं। ऐसी ही कल्पनाओं और दृश्यों से कालिदास का कविता भरी हुई है। नाटकों में प्रथम दो का अनुवाद उर्दू भाषा में भी हो गया है। 'शकुन्तला' का अनुवाद स्वर्गीय राजा शिवप्रसाद ने किया था और 'विक्रमोर्वशी ' का कुछ साल पहले मोलवी मोहम्मद अज़ीज्ञ मिर्जा साहब ने। ' शकुन्तला ' का अनुवाद

मूल संस्कृत से किया गया है और इसलिए मूल का रस कुछ बाकी है। 'विक्रमोर्वशी ' शायद अंग्रेज़ी से उर्दू में आई है इसलिए मूल का आनंद उसमें न पैदा हो सका। तब भी काफी गनीमत है। मगर चारों काव्यों में से एक का अनुवाद भी उर्दू में अब तक नहीं हुआ। इस कमी की शिकायत मुसलमान साहित्यकारों से नहीं, मगर हिन्दू सज्जनों के लिए यह बड़ी लज्जा की बात है। कितने ही हिन्दू लोग हैं जिनमें कविता की रुचि है, जो गज़लें और कसीदे लिखते हैं और गुल-ओ-बुलबुल के झगड़ों में सर खपाते हैं मगर इतना न हुआ कि संस्कृत कवियों की कविता से जाति और भाषा को लाभ पहुंचाएं। उर्दू शेरोसुखन का चर्चा ज़्यादातर कायस्थों और करश्मीरियों में है और ये दोनों सम्प्रदाय अब तक आमतौर पर संस्कृत के अध्ययन से अलग-थलग हैं। मगर अब चूंकि संस्कृत की ओर रुझान होने लगा है इससे उम्मीद की जाती है कि शायद कुछ दिनों में हम रघुवंश, मेघदूत और कुमारसंभव को उर्दू भाषा में पढ़ सकें। रहा 'ऋतुसंहार' उसका अनुवाद मिस्टर शाकिर की मदद से स्वर्गीय सुरूर साहब ने किया है और अधिकांश ऋतुओं की कविताएं 'ज़माना' के पाठकों के सामने पेश हो चुकी हैं।

हम लिख चुके हैं कि 'ऋतुसंहार' कालिदास के चार सर्वश्रेष्ठ काव्यों में से एक है। इसमें कवि ने हिन्दुस्तान की छ: ऋतुओं के दृश्य और उनके परिवर्तनों और उनसे पैदा होने वाली भावनाओं और विचारों को बहुत ही सुंदर ढंग से बयान किया है। चूंकि उर्दु-फारसी में तीन ही मौसम माने गए हैं इसलिए मुनासिब मालूम होता है कि इन छहों ऋतुओं को यहां स्पष्ट कर दिया जाय-

हिन्दी महीने अंग्रेजी महीने

  • जेठ-असाढ जून-जुलाई सावन- भादों अगस्त -सितंबर

कुआर-कातिक अक्टूबर -नवंबर अगहन-पूस दिसंबर-जनवरी माघ-फागुन फरवरी-मार्च चैत-वैशाख अप्रैल- मई

उर्द-फारसी कवियों ने मौसमी भावनाओं को सिर्फ उसी हद तक अपने शेरों में दखल दिया है जहां तक कि बसंत और पतझड़ का संबंध है, यहां तक कि पतझड़ और बसंत भी केवल रूपक हैं। खुशी के दिनों और गम के दिनों के लिए। हां, काले बादलों को देखकर कभी कभी साकी की याद आ जाती है- तुंद ओ पुरशोर सियह मस्त जे कोहसार आमद साकिया मुज़दा के अब्र आमद ओ बिसियार आमद हिन्दुस्तान में मौसमी भावनाएं हमारे सामाजिक जीवन में दाखिल हो गई हैं। हमेशा से उनकी अभिव्यक्ति होती आई है। वर्षा ऋतु आई और घरों में झुूले पढ़ गए, सावन और मल्हार की तानें गूंजने लगीं, लड़कियों ने हाथ-पांव में मेंहदी रचाई,

प्यार के दर्द भरे भाव ने दिलों को बेचैन करना शुरू किया, यहां तक कि गलियों और बाज़ारों में जहां-तहां इसकी आवाज़ें सुनाई देने लगीं। संस्कृत कवियों ने बसंत को ऋतुराज या मौसमों का राजा माना है। पेड़ों में नई नई कोंपलें निकलीं, आम की बौर की महक से हवा सुर्गंधित हो गई, खलिहानों में सुनहरी बालों के ढेर लग गए, कोयल आम की डाली पर बैठकर कूकने लगी, प्रेमीजनों को रोने की सूझी, उत्सुकता ने दिलों को गुदगुदाया, प्रेमिकाएं अपना रूठना भूल गईं, बसंत की सुहानी पुकार कानों में आई- आयी बंसत बहार बलम घर न आये सखी

कालिदास ने ऋतुओं के इन्हीं दुश्यों को अपनी चमत्कारिक लेखनी से अंकित किया है और इस खूबी से अंकित किया है कि हर एक मौसम का समां आंखों में फिर जाता है। खासतौर पर बसंत ऋतु का वर्णन ऐसा सरस, ऐसा यथार्थ और सुकुमार भावनाओं से ऐसा अलंकृत है कि उसकी तारीफ नहीं की जा सकती-

फूल खिलते हैं जो टेसू के बियाबानों में जान पड़ जाती है उश्शाक के अरमानों में आते हैं एप पे आमों के इसी रुत में शजर कोयल आती है इसी रुत में दरख्तों पे नज़र छेड़ती है लबे जू आके तराना अपना सारे आलम को सुनाती है फसाना अपना भौरे फूलों पे हैं सरमस्त मये जोशे बहार झूमते हैं असरे बादे सबा में अशजार चुटकियां लेती हैं रह रहके उमंगे दिल में नशए शौक की उठती हैं तरंगें दिल में

कालिदास को अन्य कृतियों की तरह 'ऋतुसंहार' का अनुवाद भी योरप को अधिकांश भाषाओं में हो गया है। हिन्दी भाषा में लाला सीताराम साहब और राजकुमार बाबू देवकीनन्दन साहब ने उनका पद्चबद्ध अनुवाद किया है। कुछ समय हुआ बंगाल के प्रसिद्ध चित्रकार बाबू अवनीन्द्रनाथ ठाकुर ने ' ऋतुसंहार ' के मौसमी दृश्यों की तस्वीरें खींची थीं जो बहुत पसंद की गईं। इनके अलावा बंबई के प्रसिद्ध चित्रकार मिस्टर धुरंधर ने भी 'ऋतुसंहार' से संबद्ध छ: तस्वीरें खींची हैं जो देखने योग्य हैं। योरोपियन कलामर्मज्ञ इस छोटे से कितु मार्मिक काव्य को बड़ी प्रशंसा की आंखों से देखते हैं। जाना-माना इतिहासकार एलफिन्सटन कहता है-

' भावनाओं को अंकित करने के साथ-साथ यह कवि उन तमाम स्थितियों का चित्र खींच देता है जो उन भावनाओं के प्रेरक हुए और दृश्यों की खूबियां और उनके आकर्षण ऐसे जादू-भरे शब्दों में बयान करता है कि वह आदमो भी जो इन पौधों और जे से अपरिचित हो हिन्दुस्तानी दुश्य का खाका अपने दिल में कायम कर सकता है।'

प्राव्यविदों का शिरोमणि मोनियर विलियम्स लिखता है-

इस काव्य का एक-एक श्लोक किसी-न-किसी भारतीय दृश्य का एक संपूर्ण

चित्र है।'

काव्य-मर्मज्ञों का विचार है कि 'ऋतुसंहार' कालिदास के यौवन-काल की कृति है और कई कारणों से इस विचार की पुष्टि होती है। यौवन-काल सौंदर्य और प्रेम और भोग-विलास का समय होता है। इस वक्त तक गम के कांटे पहलू में नहीं खटकते और दुनिया की कठोरताओं का अनुभव नहीं होता। नौजवान कवि की कविता निराशा और वेदना और शोक और विपत्ति के भावों से मुक्त होती है। कवि को मुहब्बत की दास्तान, मिलन की खुशियों और प्रेमिका की गुपचुप बातों से इतनी फुर्सत ही नहीं मिलती कि वह वेदना का राग गाए। जब दिल हंसता हो तो आंखों क्योंकर रोएं। 'ऋतुसंहार' शुरू से लेकर आखिर तक प्रेम के रस में डूबा हुआ है। अरमानो के दिन हैं, मुरादों की रातें। वह तेज़ी, वह जोश, वह बेतकल्लुफी, वह रंगीनी, वह ताज़गी, वह चहल-पहल जो जवानी की खासियतें हैं इस कविता में शुरू से आखीर तक भरी हुई हैं। सुंदरियों की चर्चा से कवि का जी नहीं भरता। कहीं उनके गलो के गजरों का बयान है, कहीं उनकी मेंहदी-रची हथेलियों का। कवि ने हर एक मौसम को सुंदरियों की आंखों से देखा है। हर एक कल्पना, हर एक भाव यहां तक कि रूपक और अन्वय सुंदरियों के रूप से सजे हुए हैं। यह भी नोजवान कवि की एक खासियत है कि उसे हर जगह औरत ही सूझती है। नौजवान कवि के दिल पर कोई जादू इतना असर नहीं करता जितना कि रूप का जादू। सुंदर स्त्री ही उसको भावनाओं को उभारती है, सुंदर स्त्री उसकी आशाओं का आरंभ और उसकी उमंगों की सीमा और उसके आकर्षणों का स्रोत होती है। कहने का आशय यह कि ऋतुसंहार एक जवान कविता है, जवानी की खुशियों से चमकती हुई, जवानी की मुहब्बत से महकता हुई और जवानी की उम्मीदों से भरी हुई। हे

हज़रत 'सुरूर' के अलावा-मौलवी अब्दुल हलीम साहब ' शरर' ने अपने रिसाले 'दिलगुदाज़' में 'ऋतुसंहार' की तीन ऋतुओं का अनुवाद गद्य में किया है। जून, सन्‌ 9]4 के 'दिलगुदाज़' में उन्होंने इस काव्य के बारे में इन शब्दों में अपना विचार व्यक्त किया है-

“हिन्दुस्तान के शेक्सपियर कालिदास ने ऋतुसंहार के नाम से छ: कविताए, छ: ऋतुओं के संबंध में लिखी हैं जिनमें खास हिन्दुस्तान की ये ऋतुएं इस खूबी और मज़े के साथ दिखाई हैं कि पढ़ने से मौसमी कैफियत की तस्वीरें आंखों मे फिर जाती हैं....इन कविताओं में नई उपमाएं, नई कल्पनाएं और नई बंदिशें हैं जो इस लिटरेचर के लिए, जिसका जन्म हिन्दुस्तान में हुआ, अंग्रेजी और फारसी लिटरेचर की लेखन-शैली से ज़्यादा उपयुक्त और प्रभावशाली हैं।''

मूल-काव्य में कालिदास की रंगीन-बयानी कहीं-कहीं हद से आगे बढ़ गई है। फल जब ज़्यादा मीठा हो जाता है तो उसमें कीड़े पड़ जाते हैं। मगर अनुवादक ने इन स्थलों को, जैसा कि उसका नैतिक कर्त्तव्य था, नज़र से ओझल कर दिया है। काश उर्दू के कवि मौलाना शरर की तरह समझते कि इन कविताओं की +ई उपमाएं, नई कल्पनाएं, और नई बंदिशें उर्दू लिटरेचर के लिए अंग्रेज़ी और फारसी लिटरेचर की लेखन-शैली से अधिक उपयुक्त हैं तो आज उर्दू शायरी को इतने ताने

न मिलते और उसे इतना बुरा-भला न कहा जाता। मगर मौलाना शरर ने इस काव्य का अनुवाद गद्य ही में लिखने पर संतोष किया, हालांकि यह ज़ाहिर है कि कवि की कल्पनाएं कविता में ही मज़ा देती हैं। गद्य की काया में आकर उनकी वही हालत हो जाती है जो मज़ेदार शराब की रूखे-सूखे वैरागियों के गिरोह में या किसी सुंदरी की नग्नता के परिधान में। बहरहाल कालिदास के विचारों को उर्दू पद्य में रूपांतरित करने का काम जवानी में ही सिधार जाने वाले सुरूर साहब के ज़िम्मे रहा और इसको उन्होंने जिस शानदार कामयाबी के साथ पूरा किया है उसकी तमाम उर्दू पब्लिक को कद्र करनी चाहिए। दरअसल शायर ने अनुवाद में मूल का रस पैदा कर दिया है। सरलता इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता है। संस्कृत में पेचीदा और जटिल भावों को पद्य में रूपांतरित करते समय सरलता का ध्यान रखना और उसमें कामयाब हो जाना कवि के कौशल और काव्य-शक्ति का प्रमाण है। थे बरंगे दीदये उश्शाक जो चश्मे पुरआब उड़ रही है खाक उनमें सूरते मौजे सराब सत्हे गदूं को समझ कर चश्मये आबे रखां तक रहे हैं दीदये हसरत से होकर नीमजां कितना सच्चा और नेचुलल खयाल है और कितनी खूबसूरती से कविता में बांधा गया है- धूप से हैं ऐसे घबराये हुए मारे सियाह बाजुये ताऊस के साये में लेते हैं पनाह मोर सांप का दुश्मन है मगर सख्त गर्मी ने उनक॑ होश-हवास इस तरह उड़ा दिए हैं कि न सांप को डर रहा और न मोर को शिकार करने की ताब। उर्दू में ऐसे विचार देखने को नहीं मिलते और अनुवादक ने प्रशंसनीय सामर्थ्य से उन्हैं पद्यबद्ध किया है- धूप की शिद्दत से यूं आतश बजां ताऊस हैं बाजुए ज़र्र नहीं हैं शोल-ए-फानूस हैं कैसा अछूता और अनूठा खयाल है और जितने संक्षेप में इस भाव क! व्यक्त किया 'गया है वह सोने में सुहागा है ' ठुण्ड कुछ सूखे हुए आते हैं सहरा में नज़र चोंच खोले जिसपे दम लेतीं हैं चिडियां बैठकर कैसी तस्वीर खींच दी है। इसी का नाम शायरी है। शायर की निगाह किस कदर पैनी है। जंगली झरबेरियां और करोंदे के पेड़ भी उससे नहीं बचे जिनको तरफ उर्दू शायर कभी भूलकर भी आंख नहीं उठाता- अजब अंदाज़ से बेलों को हिलाती है नसीम और करोौंदे के दरख्तों को नचातो है उसीम यूं हर एक फूल पर टेसू की बरसती है बहार सुर्ख जैसे किसी तोते की नुकोली मिनकार फूल शाखों पे हैं खोले हुए आगोश निशात भौरे कुजों में हैं सरमस्त मये जोशे निशात

इन उदाहरणों से पाठकों के सामने स्पष्ट हो गया होगा कि अनुवाद में कितने संक्षेप से काम लिया गया है और प्रवाह जो किसी मौलिक कविता में पाया जाता है यहां शुरू से आखिर तक मौजूद है। इस बात को अधिक स्पष्ट रूप से दिखाने के लिए कि कवि को किस हद तक अनुवाद में सफलता मिली है, उचित तो यह था कि संस्कृत के श्लोक और उनके अनुवाद आमने-सामने लिखे जाते मगर उर्दू में संस्कृत के समझने वाले बहुत कम हैं और इस बाल की खाल निकालने से कुछ हासिल नहीं। ग्रीष्म ऋतु की कविता को अनुवादक ने कुछ छोटा कर दिया है क्योंकि इसमें अधिकतर ऐसे जानवरों का ज़िक्र था जिनके नाम से भी उर्दू पाठक परिचित न होंगे। कालिदास की काव्य-सामर्थ्य का एक प्रमाण यह भी है कि वह एक ही विचार को बार-बार अलग-अलग ढंग से व्यक्त करता है और विचार की ताज्ञगी में फर्क नहीं आता। उर्दू जैसी दरिद्र भाषा में शब्दों की यह बहुतायत कहां । ऐसे विचार चूंकि खूबसूरतो से कविता में नहीं आ सकते थे इसलिए शायद पुनरावृत्ति के भय से अनुवादक ने नज़र से ओझल कर दिया है ओर हमारे खयाल में यह विवशता उनकी नहीं बल्कि उर्दू भाषा की है।


प्रकाशन इतिहास

[उर्दू लेख। “कालिदास की शायरी ' शीर्षक से उर्दू मासिक पत्रिका ' ज़माना', अगस्त, 1914 में प्रकाशित। हिन्दी रूप 'विविध प्रसंग' भाग-1 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "कालिदास की कविता." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1914, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/kalidas-ki-kavita. Accessed 22 Sep. 2026.