बड़ी बहन का मूल पाठ
एक दिन मौज़ा शिवगंज में शाम के वक्त कई औरतें एक नीम के नीचे बातें कर रही थीं । तारा ने एक ऐसे खाविन्द का जिक्र करते हुए, जिसने अपनी बीवी को महज इसलिए डंडों से मारा था कि वह बिना उसकी इजाजत के गंगा नहाने चली गई थी, गुस्से के साथ कहा, “ऐसे आदमी के मुँह में आग लग जाये ।'
यह सुनकर औरतें सन्नाटें में आ गयीं। किसी ने हाथ सीने पर रख लिया, किसी ने दाँतों से जवान दबाई-तारा को यह कहना मुनासिब नहीं था। कुन्दन ने तेवर बदलकर कहा, “तारा बहन, तुम ज़बान सँभालकर बात नहीं करतीं। अपना शौहर था, मार ही बैठा तो क्या हुआ।”
कुन्दन जयगोपाल चौधरी की बीवी थी। बाबू जयगोपाल दुनिया के उन चन्द खुशक़रिस्मत आदमियों में थे जिन्हें बगैर हाथ-पैर हिलाए दोनों वक्त लुक्मयेतर (अच्छा भोजन, तरमाल) खाने को मिल जाता है। वह साल भर में एक बार लगान वसूल करने के लिए घर से बाहर निकलते थे। बाक़ी साल भर वह अपने दालान में बैठे गपशप किया करते। मगर यह गाँव इनकी मौरूसी मिल्क़ियत नहीं थी। मौरूसी जायदाद तो बाबू मदनगोपाल मरहूम के जमाने ही में खुर्द-बुर्द हो चुकी थी। जयगोपाल के ससुर ने तकलीफ़ में देखकर यह गाँव गुजारे के लिए दे दिया था। वह इसके अलावा हर महीने में अपने दामाद की इमदाद करता रहता था। जयगोपाल की खूब आराम से कटती थी और आइन्दा के लिए उन्हें कोई अन्देशा नहीं था। बूढ़ा ससुर लावलद (निःसंतान) था। उसके आँख मूँदते ही बीस हज़ार सालाना नफ़ा की जायदाद हाथ लगेगी। ऐसे खुशनसीब आदमी दुनिया में कितने होते हैं? यह तो नहीं कहा जा सकता कि जयगोपाल अपने ससुर की मुबारक मौत के ख़्यास्तगार (इच्छुक) थे, मगर साल में दो-तीन बार वह इस रोजे-सईद (शुभ-व्रत) की आरजू में सत्यनारायण का पाठ जरूर करवाते थे।
खैर ! जयगोपाल के दस साल बड़े आराम से गुजरे। तीन बच्चे हुए। पेट ने गुम्बदनुमा सूरत अख़्तियार की । चाँदी के बाल झड़ने लगे, खुशकिस्मती के आने का रास्ता साफ़ होने लगा। मगर आना किसे था, और कौन। जो बात न होनी चाहिए थी, वह हो गयी और उसने जयगोपाल का मुस्तकबिल (भविष्य) स्याह कर दिया। साठ बरस के सिन (आयु) में यूट़्रे ससुर के एक बच्चा हो गया। जयगोपाल ने सुना और सिर पीटकर रह गये। कुन्दन ने बूढ़े बाप को खूब जी भर कर कोसा और इस तिफ़ले-नौजाईदा (नवजात शिशु) की लाश देखने की तमन्ना जाहिर की। कहने लगी-““बूढ़ा साठ बरस का हुआ, मगर हविस नहीं गयी। अब उशे गले से बॉधे ।” यह सआदतमंद (सुयोग्य, आज्ञाकारी) बेटी थी! खुदगरजी ! वाह, ऐ खुदगरजी !
इस बच्चे ने जयगोपाल की बेफिक्रियों और ऐशपरस्तियों का ख़ात्मा कर दिया। अपनी नन््ही-सी मुट्ठी से उसने जयगोपाल की सारी उम्मीदें और आरजूएँ, हौसले और अरमान मसल डाले। ससुराल ने नवेद आया, मगर वह शरीक न हो सके। उन्हें अब अपनी रोजी की फ़िक्र दामनगीर हुई। आसाम चले गये और एक चाय के कारखाने में मुलाजमत कर ली। जिंदगी में पहली बार इतना दूर-दराज सफर करना पड़ा । वह अब तक कभी तनहा नहीं रहे थे। बीवी और बच्चे उनकी जिन्दगी का जुज बन गये थे। कई माह तक उनकी तबीयत न जमी। ज्यूं-ज्यूं दिन गुजरते गये, त्यूं-त्यूं घर का ख़याल कमजोर होता गया। साल भर मुश्किल से गुजरा होगा कि जयगोपाल के दिल में एक नया जोश पैदा हुआ और वह यह था कि अब घर की हालत सुधारनी चाहिए। मोहब्बत की जगह इरादों ने छीन ली। पहले हफ्तावार खतूत जाते थे, फिर पन्द्रहवें दिन जाने लगे। यहाँ तक कि दूसरा साल गुजरते-गुजरते यह नौबत हो गई कि महीने में एक ख़त लिखने की भी फुर्सत न मिलती थी।
मगर कुन्दन की कैफ़ियत इसके बिलकुल बरअक्स (विपरीत) थी। जयगोपाल से उसे वही मोहब्बत थी जो आमतौर पर बीवियों को होती है, यानी शौहर की ख़िदमत दिलोजान से करती थी। वह मोहब्बत जो दिल को बेचैन करती है, जो आँखों को रुलाती और जिगर को तड़पाती है, वह पुरजोश जज्बा जो दिल के कल एहसासात पर हावी हो जाता है, कुन्दन को नहीं था। वह कभी अपने शौहर से अलग नहीं हुई थी और इसलिए उन एहसासात से, उन हसरतों से जो कुछ फिराक ही में अपना ज़ोर दिखाते हैं, वह मानूस (पर्रिधित) नहीं थी। रिश्ते-ए-मोहब्बत में गाँठ थी, मगर दीली, लेकिन जुदाई के इस झटके ने इस गॉँठ को मज़बूत कर दिया। मोहबत की आग, जो दबी हुई थी, जुदाई की हवा पाकर भड़क उठी। कुन्दन के दिल में एक नयी और पुरजोश मोहब्बत ने उद (जन्म) किया। वह अक्सर ख़ामोश और उदास रहने लगी। तनहाई से उसकी तबीयत मामूस होने लगी। कभी-कभी अकेले में रोया करती। खतूत ज्यादा पुरशौक (लालासा युक्त) होने लगे। वह सोचती-बला से मुझे मोटे कपड़े पहनने पड़ेंगे, मैं गाढ़ा पहनूँगी। बला से-मैं तकलीफ़ सहूँगी। कुन्दन अगर्चे कई बच्चों की माँ थी, मगर इस वक्त उसके दिल में एक नशा-ए-शबाब (यौवन का उल्लास) की मतवाली नाजनीन (सुंदर स्त्री) का जोशे-मोहब्बत उमड़ने लगा। उसको कितनी ही ऐसी बातें याद आती थीं जो उसने जयगोपाल का दिल दुखाने के लिए कही थीं। कितनी बार उनसे लड़ी थी। इन सब बातों को याद करके वह रोती थी। उसने सच्चे मानूमाना (निर्दोष) जोश के साथ अपने दिल में अहद किया कि अब मैं उन्हें कुछ न कहूँगी। वह जैसे रखेंगे, वैसे ही रहूँगी।
2
बुढ़ापे की औलाद बहुत प्यारी होती है। इस नौजाईदा बच्चे ने, जिसका नाम नौनीचन्द रखा गया था, अपने बूढ़े माँ-बाप की किस्मत जगा दी। उनकी मोहब्बत चारों तरफ़ से सिमटकर उस पर जम गयी। वह लड़का नहीं था, उनकी मुद्तर-उल-उमर (जीवन भर की) की दुआओं और आरजूओं ने इन्सानी शक्ल अख़्तियार कर ली थी।
मगर बूढ़े माँ-बाप की तकदीर में बच्चे का सुख देखना नहीं बदा था। तीसरे साल उसकी माँ बीमार पड़ी। उसे मालूम हुआ कि अब मैं नहीं बचूँगी। तब उसने कुन्दन को बुलाया। कुन्दन जाने से जरूर इन्कार कर देती, क्योंकि उसे अब अपने माँ-बाप से नफ़रत हो गयी थी। मगर उन दिनों शिवगंज में प्लेग फैला हुआ था। कुन्दन को इन्कार करने की जुरत न हो सकी।
कुन्दन की माँ उसे देखकर बहुत खुश हुई और खूब रोई। बाप ने हजारों दुआएँ दीं, मगर मकान की महरियाँ और लौंडियाँ इस मेहमान को देखकर जल गयीं और उसकी तरफ़ तंज-आमेज (व्यंग्य-भरी) निगाहों से देखतीं। अक्सर उससे बेअदबी कर बैठतीं। महरी कहती-““अब कोई कहाँ तक पानी भरे ! दिन-भर पानी ढोते-ढोते कूल्हा रह जाता है।” महाराजिन कहती-यह लड़के जाने कहाँ के मरभूक्खे हैं। चूल्हा जला नहीं कि सब आकर घर घेर लेते हैं। कुन्दन यह सब सुनती और पी जाती। अपनी माँ की तक़लीफ़ देखकर उसका दिल कुछ-कुछ पिघल गया था। आख़िर एक रोज बूढ़ी औरत की हालत बहुत नाजुक हो गयी। उसने नौनीचन्द का हाथ पकड़कर कुन्दन के हाथ में दिया और रोती हुई दुनिया से सिधार गयी।
माँ के मरते ही कुन्दन के मिजाज में एक खुश-आयंद (खुशी लाने वाली) तब्दीली वाक्या हुई। नौनीचन्द से जो उसे नफ़रत थी, वह जाती रही । उस मुरझाये हुए यतीम बच्चे को देखकर उसे उस पर तरस आता। जब उसके अपने लड़के नौनी को मारते और वह आँखों में आँसू भरे हुए आता और “जीजी' का आँचल पकड़कर फरियाद करता, तो कुन्दन का कलेजा मसोस उठता था। और नौनी को मादराना जोश (ममता) के साथ गोद में उठा लेती और कलेजे से चिपटाकर प्यार करती। कुन्दन के मिजाज में यह तब्दीली क्यों वाके हुई, शायद इसलिए कि बूढ़ी माँ ने बच्चे को उसके सुपुर्द किया था। या मुमकिन है बेकसी के ख़याल ने नफ़रत पर फतह पायी हो। बहरहाल, कुन्दन अपने भाई को अपने बच्चे से ज्यादा चाहने लगी। नौनी की फरियादें अब अकारथ नहीं जातीं। अगर कभी तिफलाना मुनाफजत (बच्चों जैसे झगड़े) में नौनी ही जसारत (धृष्टता, पहल) करता तो भी कुन्दन उसे सजा न देती। नौनी को रोता देखकर उसका कलेजा फटने लगता था और बच्चा भी उससे कुछ ऐसा हिला कि अपनी माँ को भूल गया।
तीन महीने के बाद कुन्दन का बाप भी मरा। उसने अपनी वसीयत में जयगोपाल को नौनी का सरपरस्त करार दिया और गुज़ारे के लिए उसे एक गाँव भी दिया। क॒ुन्दन अब उस घर की मालिक हुई और नौनी उसके दिल का।
जयगोपाल खबर पाते ही आसाम से चले आये और जमींदारी का इन्तजाम करने लगे।
3
जयगोपाल अब पहले का बेफ़िकर, आजाद मनिश (मनमोजी, स्वेच्छाचारी) आदमी न था। अब वह शातिर (धूर्त, चालाक), मुअल्ला फहीम (उच्चकोटि का बुद्धिमान, विवेकी), दुनियादार बाबू बन गया था। उसे रुपये की चाट पड़ गयी थी और हरदम इसी धुन में रहता। परदेश में उसने खूब कमाया और खूब खर्च किया। चाय बागों में नाजायज नफ्सपरस्तियों (अनुचित वासनातृप्ति) के बेशुमार मौक़े हैं। उनसे उसने खूब दिल खोलकर फ़ायदा उठाया। खुलासा यह कि उसके मिजाज में अब छिछोरपन आ गया था और कुन्दन जैसी सीधी, भोली औरत, जिसकी निगाहों ने सामने ताकना नहीं सीखा था, अब उसके दिल को क़ाबू में न रख सकती थी। उसने एक अर्से-दराज (लम्बी अवधि) के बाद अपने शौहर को फिर पाया था और उसकी दिलजोई और खातिरदारी में पहले से भी ज्यादा सरगर्म हो गयी थी। मगर ज्यूँ-ज्यूँ नजदीक आने की कोशिश करती टूँ-त्यूँ जयगोपाल उससे दूर भागता था।
जयगोपाल ने पहले दिन ही से नौनीचन्द के साथ मुगायरत (बेगानापन, प्रतिकूलता) का बर्ताव करना शुरू किया उसकी तरफ़ देखता तो नफ़रत के साथ, बात करता तो तुर्श (कटु) लहजे में । कुन्दन भाई की मुहब्बत में शौहर को अपना शरीक बनाना चाहती थी लेकिन अगर वह कभी उसे गोद में लेकर जयगोपाल के पास चली जाती तो वह नफ़रत से मुँह फेर लेता। कुछ दिनों तक गरीब कुन्दन ने बहुत कोशिश की कि किसी तरह जयगोपाल के दिल में सफाई हो जाये; मगर आखिरकार उसे मालूम हो गया कि उसने नौनी का कुसूर अब तक नहीं माफ किया और न अब इसकी तवक््को (आशा) थी और वह कुसूर क्या था ? पैदा होना !
पहले जब कभी नौनी और उसके भानजों में जंग होती तो कुन्दन हमेशा अपने भाई की तरफ़ रहा करती। इसलिए उनको नौनी के साथ सख्ती से पेश आने की हिम्मत न होती थी मगर अब अदालत का रुख़ पलट गया था। नये मुंसिफ ने आकर नया कानून जारी किया था, जो फ़रियाद करता था उसी की पूजा होती थी। जब कभी जयगोपाल नौनी को मारते और वह अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से आँसू भरे आहिस्ता-आहिस्ता कुन्दन के पास आता तो वह उसे गोद में उठा लेती और मकान के किसी गोशे में जाकर खूब रोती और जब तक नौनी उसे चुप न कराता, रोया करती। ज्यों-ज्यों जयगोपाल नौनी के साथ ज़्यादा बेरहमी करते, त्यों-त्यों कुन्दन के दिल में उसकी मोहब्बत ज़्यादा होती।
जयंगोपाल को नौनी का रोना और बोलना सुनकर बुखार-सा आ जाता और जिस वक्त वह नींद में होते, उस वक्त तो नौनी की ज़बान का खुलना गोया शामत का आना था। जब वह सोते तो कुन्दन अपने भाई को गोद में लेकर सबसे ऊँची मुँडेर पर चली जाती और उसे थपक-थपककर लोरियाँ सुनाती और सुलाती। इसी बिना पर कभी-कभी जयगोपाल कुन्दन को भी सख्त-सुस्त कह बैठता था | दुर्गा-पूजा में उसने अपने लड़कों के लिए रेशमी कपड़े बनवाये, मगर नौनी के लिए मामूली कपड़े भी न बनवा सका। कुन्दन अपने बेकस भाई पर वह जुल्म देखती और दिल-ही-दिल में बल खाकर रह जाती। नौनी उससे इस कदर हिल गया था कि दोनों वजूदों (शरीरों, अस्तित्वों) में कोई फ़र्क़ न बाकी रहा था। कुन्दन के दिल में अब जयगोपाल की इज्जत रोज-ब-रोज़ कम होती जाती थी। वह उसे मुश्तबह (संदिग्ध) निगाहों से देखती । वह कभी नौनी को उसके पास तनहा न रहने देती। इस क़दर बदगुमान हो गयी थी। वह इस मामले में बावजूद दिली कोशिश के जयगोपाल के साथ वफ़ादारी का बर्ताब नहीं कर सकती थी। जयगोपाल भी कुन्दन की जानिब (ओर, तरफ) से हद दरजा बदजन हो गया था। पहले वह नौनी को अपनी ख़्वाबे-जिन्दगी का परेशान करने वाला समझता था, अब कुन्दन को। कुन्दन ही उस रास्ते में एक रुकावट थी जो उसे दौलत-ओ-सरवत (धन-वैभव) की तरफ़ ले जा रहा था। उसे अपनी बीवी से अब मुत्तक (बिलकुल) हमदर्दी न थी। कुन्दन के दिल में यही एक मुअम्मा (उलझन, पहेली) था जो उसकी समझ में नहीं आता था।
4
भैया दोज की तकरीब (शुभ अवसर, उत्सव) आयी। कुन्दन ने आज व्रत रखा। आज के लिए उसने पहले से ही तैयारियाँ कर रखी थीं। नौनी के लिए उसने गुलाबी रंग का रेशमी कोट, नीले किनारे की धोती, सुनहरा रेशमी दुपट्टा मँगा रखा था। सुबह उसने नौनी को उबटन से मला, नहलाया, कपड़े पहनाये और दस्तूर के मुआफ़िक उसके माथे पर दही और चावल का टीका लगा दिया। नौनी खुशरंग कपड़े पहने गाँव में खेलता-फिरता था। साफगो (स्पष्टवादी) तारा भी किसी काम से इस गाँव में आ गयी थी। यहाँ तरह-तरह के चर्चे हो रहे थे। तारा ने सुना और गुस्से से भरी हुई कुन्दन के पास आकर बोली, “बहन, क्या-क्या स्वॉग रचती हो। दिखावे के लिए तो नौनी का ऐसा लाड़-प्यार है, मगर घर भर उसकी जान का गाहक हो रहा है। सोने के कोर में जहर मिलाकर दे रही हो ।” कुन्दन ने गुस्से से कहा, “तारा बरस-बरस के दिन ऐसी बातें जबान से न निकालो |”
तारा ने जवाब दिया, “मैं कोई बात अपने मन से बनाकर थोड़े ही कहती हूँ। गाँव में जो कुछ सुना है, वह तुमसे आकर कह दिया। जिसकी बदौलत तुम्हें सारी दुनिया का सुख मिल रहा है, उसी के लिए अब काटे बोये जा रहे हैं। शेखूपुरा में आठ आने पर तुम्हारे भानजे खरूद गोपाल का नाम चढ़ा दिया गया है और कई इलाक़ों में ऐसी ही चालें चली जा रही हैं। मगर याद रखो, ऐसी दौलत कभी हजम नहीं होती। ईश्वर सब देखता है।”
कुन्दन रोनी लगी। जब जयगोपाल घर में आये तो उसने यह जिक्र छेड़ा। जयगोपाल बोले, “मैं तो चाहता था कि यह बात तुम्हारे कान तक न पहुँचे। मुझे खुद बड़ा धोक़ा हुआ। बात यूँ है कि मैंने शेखूपुरा का इंतिजाम खरूद के सुपुर्द कर दिया था, मगर खरूद ने सरकारी लगान बाक़ी डाल दी और जब वह गाँव नीलाम पर चढ़ा तो उसे अपने नाम से खरीद लिया। मुझे भी तो कल मालूम हुआ है।”
कुन्दन, “तो उज्दारी क्यों नहीं करते ?”
जयगोपाल, “उज़दारी से अब कोई काम न चलेगा। अलावा इसके अपने भानजे से मुकदमेबाजी करना बदनामी की बात है। लोग हँसी उड़ाएँगे ।”
कुन्दन को इत्मीनान नहीं हुआ। वह समझ गयी, यह सब चालें नौनी को तबाह करने के लिए चली जा रही हैं। उसकी अक्ल अब कुछ काम नहीं करती थी। औरत इन मामलात को क्या समझे। मैं कैसे नोनी को बचाऊँ ! क्या बेकसों का कोई मददगार नहीं है ? क्या दुनिया में कोई इन्साफ़ करने वाला नहीं है ? कोई मुझे कलक्टर साहिब के पास ले चलता तो मैं उनसे सब हाल कह सुनाती। मुझे खुद जाना चाहिए। मैं बड़े लाट तक फ़रियाद ले जाऊँगी। मगर नौनी पर जुल्म न होने दूँगी।
5
इसके कुछ दिनों बाद नौनी बीमार पड़ा। बरसात के दिन थे। चारों तरफ़ मलेरिया फैला हुआ था। नौनी भी उसका शिकार हुआ। तीन दिन बुखार न उतरा और न बच्चे ने आँखें खोलीं। गाँव में एक बैद्यजी थे। दोनों वक्त आते और दवा देते, मगर उनकी दवाओं से मुत्लक इफ़ाका (रोग में कमी) न हुआ। चौथे दिन कुन्दन ने जयगोपाल से कहा, “जाकर शहर से सारदा बाबू को ले आते तो अच्छा होता। नौनी का बुखार अब तक नहीं उतरा |”
जयगोपाल ने लापरवाही से कहा, “सारदा बाबू जाने शहर में हैं या नहीं। अभी दो-चार रोज और बैद्यजी की टवा खिलाओ ।”
कुन्दन, “बैद्यजी की दवाई से कोई फ़ायदा नहीं हुआ और उसकी हालत ख़राब होती जाती है।”
जयगोपाल, “अभी कुल तीन ही दिन तो बुखार आया है।'
कुन्दन, “तुम ज़रा चल के उसे देखो तो, कैसा पीला हो गया है।'
जयगोपाल, “अच्छा, कल मैं डॉक्टर बाबू के पास जाऊँगा।”
जयगोपाल सवेरे उठे और दिन भर गायब रहने के बाद शाम को ख़बर लाये कि डॉक्टर साहिब घर पर नहीं हैं, कहीं मुफ़स्सलात (नगर के आसपास की छोटी आबादियों में) में गये हैं। कुन्दन को शौहर की बातों पर यक्नीन न आया। रात को जब सब सो गये तो उसने नौनी को गोद ले लिया। गाँव से मिली हुई सारद नदी बहती थी। घाट पर आकर एक किश्ती किराये पर की और बारह बजे वह डॉक्टर साहिब के मकान पर पहुँची। सारदा बाबू उसके फैमिली डॉक्टर थे। देखते हौ पहचान गये। कुन्दन को इस हालत में देखकर उन्हें बहुत रंज हुआ। सूरतेहाल समझ गये। कुन्दन के लिए दो कमरे ख़ाली कर दिये। एक मेहरी का इन्तिजाम किया और नौनी के मुआलजे (चिकित्सा) में मसरूफ़ हुए।
रात गुजरी । अलीअल (तड़के) जयगोपाल जामे से बाहर गुस्से से कॉँपते हुए पहुँचे और कुन्दन से कहा, “ख्रैरियत चाहती हो तो इसी वक्त मेरे साथ घर चलो |” कुन्दन ने जवाब दिया, “तुम इस वक्त मेरा गला भी काट डालो तो मैं न जाऊँगी ।/” जयगोपाल, “अच्छा तो अब मेरे घर मत आना, समझी |” कुन्दन ने अब की तनकर जवाब दिया, “तुम्हारा घर ! वह घर तो मेरे भाई का है।”
जयगोपाल घूँसा तानकर रह गया। उसी वक्त वहाँ से आकर रहने का मकान और बाग अपने बड़े लड़के के नाम लिखवा लिया और दूसरे दिन उसकी रजिस्ट्री भी हो गयी।
कुन्दन हफ़्ता भर डॉक्टर साहिब के यहाँ रही। नौनी को सेहत हो चली थी। उसका इरादा और एक हफ्ते भर रहने का था। मगर घर और बाग के बय (बिक्री) होने की ख़बर ने उसे वहाँ न ठहरने दिया। डेढ़-दो हजार की जायदाद हाथ से निकली जाती है। अपने बेटे को कुन्दन उस वक्त गैर समझ रही थी। भाई बेटे से भी ज़्यादा प्यारा हो गया था।
6
कलक्टर साहिब मौसिमे-सर्मा (शरद ऋतु) का दौरा कर रहे थे। शेखूपुरा में कायाम किया । सुबह के वक्त वह अपने खेमे में सामने बैठे हुए थे। आस-पास के मवाजआत (ग्राम समूह) से जमींदार और रऊसा (तअल्लुकेदार, अमीर) सलाम करने को हाजिर हुए थे। बाबू जयगोपाल भी सियाह अलपाके की अचकन पहने, सफ़ेद पगड़ी बॉघे सलाम को हाजिर हुए। साहिब बहादुर ने उनकी गैरमामूली तौर पर इज्जत की और उनके लिए कुर्सी मँगाई | जयगोपाल को हफ़्तुलक़्लीम (सारे संसार) की दौलत मिल गयी। ऐसा खुशनसीब कौन होगा। ज्ञानपुर के चक्रवर्ती और शाहगंज के चौधरी यही अरमान लिये बैकुंठ सिधार गए। जयगोपाल ने चारों तरफ़ तफाखुराना अन्दाज (गर्वपूर्ण भंगिमा) से देखा। गाँव के वनिये और मजदूर उनकी यह इज्जत देखकर सकते (चकित होने की अवस्था) में आ गये। अफ़सोस ! सामगंज के मित्र बाबू यहाँ नहीं हैं, वर्ना देखते कि मेरी कैसी इज़्ज़त है।
यकायक एक औरत सिर से पैर तक चादर ओढ़े एक पाँच साला लड़के की अंगुली पकड़े आयी और खड़ी हो गयी । साहिब ने पूछा, “तुम कौन हो ?” क॒न्दन बोली, “'हजूर, में इस गाँव की एक दुखियारी औरत हूँ। आपके पास फ़रियाद लेकर आयी हूँ।
साहिब, “अच्छा, इजलास के कमरे में चलो। हम अभी आता है।”
कुन्दन, “नहीं हुजूर, मेरी अर्ज यहीं सुन ली जाये ।”
जयगोपाल के चेहरे पर एक रंग आता था और एक रंग जाता था। खिसियाए हुए बन्दर की तरह कुन्दन को घूर रहा था। अगर साहिब का खौफ़ न होता तो वह जरूर उस पर हमला कर बैठता।
कुन्दन कहने लगी, “हुजूर, यह लड़का मेरा भाई है। मैं बाबू मधुसूदन की लड़की हूँ जिनका दो साल हुए इन्तकाल हो गया। यह वाबू साहिब जो आपके सामने बैठे हुए हैं मेरे शौहर हैं। मेरे बाप का जब इन्तकाल हुआ तो उन्होंने इन बाबू साहिब को अपने नाबालिग बच्चे का वली (संरक्षक) करार दिया और अपनी जमींदारी का दो आने इनके गुजारे के लिए वसीयत में लिख गए। मगर इन बाबू साहिब की अब नीयत बदली हुई है। यह मेरे गरीब भाई की सारी जायदाद अपने और अपने लड़कों के नाम करते जाते हैं। कोई इनका हाथ रोकने वाला नहीं । मैं इनकी बीवी हूँ। इनके काबू में हूँ, कुछ बोल नहीं सकती । इसका नतीजा यह होगा कि हुजूर के राज में एक यतीम पर कहर टूट जायेगा और उसकी जायदाद दूसरों के तसर्रुफ़ (अधिकार) में आ जायेगी। इसलिए मैं आपकी खिदमत में हाजिर हुई हूँ, यह लड़का आपको सौंप दूँ। अब इसके साथ इन्साफ़ करना आपका धर्म है। आप जो मुनासिब समझें, वही करें ॥'
यह कहकर कुन्दन खामोश हो गयी। जयगोपाल ने फर्ते-गजब (क्रोधावेग) से बीच में कई बार छेड़ने की जुररत की, मगर साहिब के तेवर दखकर ख़ामोश हो गये। आखिर
साहिब ने उनसे पूछा, “यह सब सच है *”
जयगोपाल बोले, “हजूर, मैं क्या अर्ज करूँ ? बाबू माधुसूदन कर्ज छोड़ गये थे। सो हुजूर, कुछ जमीन मक्फूल (रेहन) करके कर्ज अदा किया गया |”
साहिब-“अच्छा, अच्छा, कुल कागजात हमारे सामने पेश करो |”
जयगोपाल-- बहुत अछ्छा, हुजूर ।'
साहिब ने तब कुन्दन से कहा-''अच्छा, अब तुम जाओ। हम इस मुआमले में खूब कोशिश करेंगे। तुम्हारे भाई की जायदाद कोई नहीं ले सकता। तुम्हारी नेकी और मुस्तकिन मिजाजी (निश्चय की स्थिरता) से हम वहत खुश हुआ ।”
कुन्दन ने झुककर जमीन चूमी और नौनी को गोद से उतारकर साहिब के सामने खड़ा कर दिया। नौनी रोने लगा मगर साहिब ने उसे चुमकारा और एक टेनिस का गेंद देकर उसे बहलाया। जब कुन्दन चलने लगी तो साहिब ने पूछा, “इस लड़के को अपने साथ लेती जाओ। क्या कोई खौफ़ है २”
कुन्दन-“हुजूर, अब मैं उसे आपके सिपुर्द कर चुकी हूँ। भर साथ नहीं रह ₹कता ।”
साहिब-“और तुम कहाँ जाओगी ?”
कुन्दन-''मैं अपने शीहर के साथ जाऊँगी।'
कुन्दन ने नौनी को गले लगाकर प्यार किया और आँखों में आँसू भरे रुख़सत हो गयी।
एक हफ़्ते में हलका कोर्ट-ऑफ वार्डस् के जेरे-तहत (अधिकार में) आ गया और नौनी को पढ़ाने के लिए मास्टर रख लिया गया । जयगोपाल आसाम चले गये, मगर कुन्दन को फिर किसी ने न देखा। वह जिस दिन साहिब के यहाँ से लोटी उसी दिन उसे हैजा हो गया, मगर गाँव वाले अब भी इसे तसलीम नहीं करते और साफगो तारा अब भी कहती है कि कुन्दन को हैजा नहीं हुआ था।
बड़ी बहन का सारांश
मौजा शिवगंज में रहने वाली कुंदन, बाबू जयगोपाल चौधरी की पत्नी है। जयगोपाल को बिना अधिक परिश्रम के मिली आरामदेह जिंदगी ने उसे निष्क्रिय और स्वार्थी बना दिया है। कहानी की शुरुआत ही कुंदन के ऐसे दृष्टिकोण से होती है, जिसमें वह पति द्वारा पत्नी पर किए गए अत्याचार को भी स्वाभाविक मानती दिखाई देती है। आगे चलकर परिवार, संपत्ति और रिश्तों से जुड़े प्रश्न उसके और जयगोपाल के बीच तनाव का कारण बनते हैं।
कहानी में जायदाद के अधिकार और उसके बँटवारे का विवाद धीरे-धीरे पारिवारिक संबंधों को प्रभावित करता है। वसीयत, हिस्सेदारी और भाँजे से जुड़े दावे के प्रसंग में जयगोपाल का स्वार्थ और अधिकार-लोलुपता सामने आती है, जबकि कुंदन भी पारिवारिक हित और अपने दृष्टिकोण के बीच उलझी दिखाई देती है। इस तरह कहानी घरेलू जीवन के भीतर मौजूद संपत्ति, अधिकार, पितृसत्तात्मक सोच और स्वार्थ के टकराव को सामने लाती है।
प्रकाशन इतिहास
“बड़ी बहन” प्रेमचंद की आरंभिक और लंबे समय तक कम चर्चित रही कहानियों में शामिल है। उपलब्ध प्रकाशन-सूचियों के अनुसार इसका पहला प्रकाशन उर्दू पत्रिका अदीब में जुलाई 1911 में हुआ था। बाद में यह कहानी प्रेमचंद की दुर्लभ/अप्राप्य रचनाओं के संकलनों में शामिल हुई। इसका पाठ प्रेमचंद रचनावली के भाग 11 में भी संकलित है।
महत्त्व और विषय-विमर्श
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पारिवारिक सत्ता और स्वार्थ: कहानी पारिवारिक संबंधों के भीतर संपत्ति, अधिकार और निजी स्वार्थ के टकराव को प्रमुखता से सामने लाती है।
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जायदाद और उत्तराधिकार: वसीयत, हिस्सेदारी और संपत्ति पर अधिकार का प्रश्न कहानी के कथानक को आगे बढ़ाता है और रिश्तों की वास्तविकता को उजागर करता है।
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पितृसत्तात्मक मानसिकता: कुंदन की शुरुआती प्रतिक्रिया और जयगोपाल के व्यवहार के माध्यम से उस सामाजिक मानसिकता को दिखाया गया है जिसमें पति का अधिकार और स्त्री पर उसका नियंत्रण सामान्य मान लिया जाता है।
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स्त्री की पारिवारिक भूमिका: कुंदन केवल पारिवारिक जीवन की पात्र नहीं है; संपत्ति और परिवार से जुड़े निर्णयों में उसका दृष्टिकोण भी कहानी के संघर्ष का हिस्सा बनता है।
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सामाजिक प्रतिष्ठा बनाम नैतिकता: जयगोपाल का बाहरी सामाजिक स्थान और उसके निजी स्वार्थ के बीच का अंतर कहानी में व्यक्ति के चरित्र को परखने का आधार बनता है।
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प्रारंभिक सामाजिक यथार्थ: कहानी प्रेमचंद के उस आरंभिक कथा-लेखन की ओर संकेत करती है जिसमें घरेलू जीवन, संपत्ति और सामाजिक व्यवहार के माध्यम से व्यक्ति की मानसिकता को परखा जाता है।
