शान्ति स्थापित करने के दो साधन हैं। एक तो मानवीय है, दूसरा दानवीय। एक मशीनगन है, दूसरा देश की वास्तविक दशा को समझना और उसके अनुकूल व्यवहार करना। सरकार ने अपने स्वभावानुसार मशीनगन से काम लेना ही उचित समझा है। इसका परिणाम कया होगा, सरकार को इसकी चिन्ता नहीं। पुलिस और सेना उसके पास हैं। देश में जितने स्वाधीनता के उपासक हैं, वे सब बड़ी आसानी से तोप का शिकार बनाये जा सकते हैं। भारत गरीब है, यहां ऐसे आदमियों की कभी कमी न रहेगी, जो पेट के लिए अपने भाइयों का गला काटने को तैयार रहें। कांग्रेस के लोग जेल में पहुंच ही गए। और दलों के इने-गिने आदमी हैं, उनको फांस लेना और भी आसान है। रहे हमारे लिबरल भाई, उनकी परवा ही किसे है? सरकार उनकी सहायता के बगेर भी राज कर सकती है। टेक्सों को दूना कर देने का उसे अख्तियार है। इस तरह वह इससे बड़ी फौज भी रख सकती है। मशीनगनों के सामने चूं करने का किसे हौसला हो सकता है। अंग्रेज अधिकारियों के वेतन बड़ी आसानी से बढ़ाए जा सकते हैं। कुछथोड़े से ओहदे हिन्दुस्तानियों को देकर बड़ी आसानी से काम लिया जा सकता है। समाचार
पत्रों को एकदम बन्द कर देने से फिर कहीं से विरोध की आवाज भी न आवेगी। सरकार अपने दिल में सन््तोष कर सकती है कि अब किसी को कोई शिकायत नहीं रही। रिफॉर्म की, गोलमेज-कान्फ्रेस्स की और डोमिनियन स्टेट्स की चर्चा ही व्यर्थ है। यह इसी दानवी नीति का फल है कि आज भारत में अंग्रेजों का कोई दोस्त नहीं है। जो लोग अपने स्वार्थवश सरकार की खुशामद करते हैं, वे भी उसके भक्त नहीं हैं। ऐसी प्रजा पर राज करना अगर अंग्रेजों के लिए गौरव की बात है, तो हम नहीं समझने कि वह अपनी सभ्यता और उच्चता का किस मुंह से दावा कर सकती है। अगर अंग्रेजों की जगह इस वक्त हबशी होते, तो वे भो दमन ही तो करते। दमन शासन का सबसे निकृष्ट रूप हे ओर अंग्रेजों ने उसी का आश्रय लिया है। क्या उनका खयाल है कि जिस शक्ति से दबकर उन्होंने सुधार किये और कान्फ्रेस के वादे किये, वह शक्ति अब गायब हो गई हैं? दमन उस शक्ति को दिन-दिन मजबूत कर रहा हैं। उस राज्य के लिए इससे बढ़कर कलंक की दूसरी बात नहीं हो सकती कि उसे हर एक बात क लिए मशीनगनों ही की शरण लना पड़े। जिम राज्य में जनता पर महज इसलिए गोलियां चलाई जाय॑ कि वह अपने लीडरों की गिरफ्तारी पर शोक मनाने के लिए जमा होती है, उसके चल-चलाव के दिन अब आ गए हैं। पेशावर में जो हत्याकांड हुआ है, वह कभी न होता, अगर नौकरशाही ने मशीनगनों और फोजी हथियारों से जनता को धमकाया न होता। वह जमाना गया, जब जनता पशुबल के प्रदर्शन से डर जाया करती थी। अब वह इरती नहीं, वह उसे अपनी पराधीनता का हेतु समझकर उसकी जड् खोदने के लिए और दृढ़ संकल्प कर लेती है। नमक कानृन दूट गया। सरकार की मशौनगनें उसको न बचा सकीं। लाखों नमक बनाने वाले आज गर्व से सिर उठाए घूम रहे हैं। आर्डिनेंस भी टूट जायगा। कोई कानून॑, जिसको राष्ट्र के नेताओं ने स्वीकार नहीं किया है और जिसका केवल पशुबल आधार है, अब जनता उसके सामने सिर झुकाने को तैयार नहीं है। सरकार अगर आंखें बन्द रखना चाहती है तो रक्खे, पर उसके आंखें बन्द कर लेने से देश की स्थिति नहीं बदल सकती। देश अब अपनी किस्मत का मालिक आप बनना चाहता है और उसकी कीमत अदा करने का निश्चय कर
प्रकाशन इतिहास
[सम्पादकीय। 'हंस', अप्रैल, 1930 में प्रकाशित। 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य' खण्ड-2 में संकलित।]
