Cover Image for Naya Press Bill (नया प्रेस बिल) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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सम्पादकीय•1931•4 मिनट

नया प्रेस बिल

Naya Press Bill

प्रेमचंद का सम्पादकीय जिसमें उन्होंने ब्रिटिश सरकार द्वारा लाये गए दमनकारी प्रेस बिल का विरोध करते हुए प्रेस की स्वतंत्रता और अहिंसक मूल्यों का पक्ष लिया है।

Work Details

प्रकार: सम्पादकीय
वर्ष: 1931
पठन समय: 4 मिनट (593 शब्द)

सरकार ने समाचार-पत्रों के लिए एक नया दंड-विधान सोच निकाला। क्रांतिकारियों की अमानुषीय लीलाओं को रोकने के लिए यही उपाय सबसे सरल समझा गया है। सरकार का कथन है कि समाचार-पत्रों में उत्तेजना पैदा करने के लिए लेख निकलते हैं, हत्याकारियों की तस्वीरें छपती हैं, और अप्रत्यक्ष रूप से उनकी प्रशंसा की जाती है। यदि ऐसे समाचार-पत्र हैं, और इसमें संदेह नहीं कि हैं, तो उनके साथ कानूनी बर्ताव होना चाहिए। इस वक्त भी जो कानून मौजूद है, उसके द्वारा सरकार ऐसे पत्रों की जबान बन्द कर सकती है, उसकी हस्ती मिटा सकती है। लेकिन एक नया कानून बनाकर अधिकारियों को यह अधिकार दे देना कि वे जिस पत्र को चाहें, कुचल डालें और सरकारी नीति की निष्पक्ष आलोचना करने के लिए भी पत्रों को दण्ड दे सकें, खतरे की बात है। और यह कानून उस वक्त बनाया जा रहा है, जब भारत को स्वराज्य देने की बातचीत हो रही है। इस वक्त तो कहा जा रहा है, ज़िम्मेदार पत्रों को इस विधान से डरने का कोई कारण नहीं है, लेकिन अधिकारियों को कोई अधिकार देकर यह आशा करना कि वह उसका व्यवहार सोच-समझकर करेंगे और अपनी कारगुजारी दिखाने के लिए निरपराधियों पर भी आघात न कर बैठेंगे, तजरबे से गलत साबित हुआ है।

महात्मा गांधी से बड़ा अहिंसावादी व्यक्ति और कौन होगा, पर उन्होंने भी इस विधान का विरोध किया है और इसे भारतीय जनमत के विकास में बाधक समझा है। अधिकारियों को कानून की सर्वशक्तिमानता पर अखंड विश्वास है। वह कानून की निरर्थकता को आँखों से नित्य देख-देखकर भी कोई उपदेश नहीं ग्रहण करते। रोज नये-नये कानून बनते हैं और रोज नये-नये अपराधों का आविष्कार होता है और यह होड़ बराबर चली जाती है। मगर, जैसे बाहरी लीप-पोत से जीर्ण दीवार नहीं संभल सकती, उसी भाँति विषमता से भरा हुआ समाज कानूनों से स्वस्थ नहीं रह सकता। चोरी, डाका, जाल, हत्या, इन सभी अपराधों का कारण सामाजिक वैषम्य है। जब इस वैषम्य में जाति-द्वेष मिल जाता है, तो इसका रूप और भी भयंकर हो जाता है। कोई भी समझदार आदमी हत्याकारियों की प्रशंसा नहीं कर सकता। संसार में इससे बड़ी भूल नहीं हो सकती कि हत्याओं से किसी देश का उद्धार हो सकता है। लड़ाई से लड़ाई का अंत हो सकता, तो आज संसार में शान्ति का राज्य होता। लड़ाई और द्वेष को प्रेम ही जीत सकता है। प्रेम, शक्ति का संचय किये बगैर नहीं हो सकता। अहिंसा कायरों का कर्तव्य नहीं, महान बलवानों का कर्तव्य है। प्रेम वही कर सकता है, जो शक्तिमान हो, चाहे वह शक्ति आत्मा की हो, या देह की।

इन अपराधों का दमन करना सरकार का ही धर्म नहीं, राष्ट्र का धर्म भी है, क्योंकि ऐसे कृत्यों से राष्ट्र को हानि पहुँचती है। उसके नाम में ही कलंक नहीं लगता, उसका भविष्य भी अंधकार में पड़ जाता है। जब तक हमारी मनोवृत्ति ऐसी रहेगी कि ऐसी हत्याओं की गुप्त रूप से प्रशंसा करते रहें, किसी अंग्रेजी या हिन्दुस्तानी कर्मचारी की हत्या की खबर सुनते ही फड़क उठें, पत्र खोलकर पहले यही देखें कि कहीं कोई हत्या हुई या नहीं, उस वक्त तक हत्याओं का अंत न होगा। हमारा ऐसा विश्वास होना चाहिए कि द्वेषमय हिंसा करना ही धर्म-विरुद्ध नहीं, उसकी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सराहना करना भी धर्म-विरुद्ध है। राष्ट्रों में लड़ाइयाँ होती हैं। वह खुल्लम-खुल्ला, ललकार कर होती हैं। क्षात्र धर्म में वैसी लड़ाई के लिए स्थान है। वीरता की प्रशंसा की गयी है और की जायगी। पर, छिपकर स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध की हत्या करना अत्यन्त घृणित है, और जो मनोवृत्ति ऐसे काम की तारीफ करती है, वह निस्सन्देह अस्वस्थ है।


प्रकाशन इतिहास

[सम्पादकीय। 'हंस', सितम्बर, 1931 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-2 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "नया प्रेस बिल." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1931, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/naya-press-bill. Accessed 22 Sep. 2026.