विशेषांक के निकलने में कदाचित समस्त हिन्दी पत्रिकाओं में 'चांद' ही को प्रथम स्थान प्राप्त है। अपने जन्म से लेकर अब तक 'चांद' के नो विशेषांक निकल चुके हैं। इस वर्ष भी उसने चार विशेषांक निकालने का निश्चय कर लिया है। उसका वर्ष नवम्बर से शुरू होता है ओर गत मास 'चांद' का प्रवेशांक निकल चुका है। उसके बाद ही गल्पांक प्रकाशित करने का प्रस्ताव, उसके सम्पादक और व्यवस्थापक के अदम्य उत्साह का द्योतक है। हिन्दी में पत्र-पत्रिकाओं की जो दशा है वह सुहृदजनों से छिपी नहीं है। इन कठिनाइयों से जरा भी आशंकित न होकर, बराबर आगे कदम बढाते जाना अजेय आशावादिता के सिवा और क्या कहा जा सकता है। किसी कवि ने कहा है-
'ज़िन्दगी ज़िन्दादिली का नाम है
मुर्दादिल क्या खाक जिया करते हैं।'
यही उत्साहशीलता, यही आशावादिता जीवन है और जीवन में आकर्षण का होना
स्वाभाविक है। यही कारण है कि जो ' चांद' आज से चार-पांच वर्ष पहले एक हजार छपता था, आज समस्त भारतवर्ष की मासिक पत्रिकाओं में, सर्वोच्च स्थान पर आरूढ होने पर गर्व कर सकता है। 'चांद' आकर्षण-शक्ति का आगार भी तो है ।
आज से एक महीना पहले जब “चांद' के सुयोग्य सम्पादक ने मुझसे गल्पांक प्रकाशित करने का प्रस्ताव किया, तो में विस्मित रह गया। प्रस्ताव बिल्कुल नूतन और असाधारण था। मुझे भय हुआ कि कहीं गल्पांक का मजाक न उड़ाया जाय। नये विचार सनातन धर्मावलम्बियों की दृष्टि में हास्यास्पद होते ही हैं। लोग नाक न सिकोडने लगें, यह क्या खुराफात है। भला कोई तुक भी तो हो गल््पों में ऐसी कौन-सी विशेषता है कि उनको यह महत्व दिया जाय। किन्तु साहित्य में गल्प के महत्व पर जब विचार किया तो मुझे इस प्रस्ताव का सहर्ष स्वागत करने और इस अंक का सम्पादन-भार लेने में कोई बाधा न दिखायी दी। गलप वर्तमान साहित्य में एक नयी चीज है। लेकिन इसके साथ ही उसका अनिर्वाय अंग है। कोई पत्रिका गलपों के बिना रोचक नहीं हो सकती ओर हिन्दी में न सही, अन्य समुन्नत भाषाओं में तो ऐसी कितनी ही पत्रिकाएं हैं जिनमें गल्पों के सिवा ओर कुछ होता ही नहीं। वास्तव में गल्प में सिवा ओर किसी प्रकार के लेखों में यह गुण नहीं है कि वह अव्यक्त, अदृश्य और अलक्षित रूप से समाज में नवीन भावों, सिद्धांतों ओर तत्वों का प्रचार कर सके। हमारे देश में पराधीनता के कारण जीवन-संग्राम इतना भीषण है कि हमारी सारी मानसिक और शारीरिक शक्ति उसमें समाप्त हो जाती है। शुष्क और दुष्ग्राह्म विषयों का अध्ययन करने की हममें क्षमता ही नहीं रह जाती। हम नये विचार ग्रहण ता करना चाहते हैं, पर इस तरह कि हें परिश्रम या अध्ययन न करना पडे। यह विभूति गल्प ही में है कि वह मनोरंजन करते हुए हमें विज्ञान, अर्थशास्त्र, राजनीति, इतिहास, भूगोल, गणित, शिल्प, स्वास्थ्य, वाणिज्य, आदि की शिक्षा दे सकती है, यहां तक कि आज औषधियों की बिक्री का भी काम इससे लिया जाता है। इसे आप औषधालय की अमृतधारा समझिये, जो जुकाम से लेकर तपेदिक तक में समान रूप से अपना चमत्कार दिखाती है। आजकल सिनेमा का प्रचार दिनोंदिन डाकगाड़ी की चाल की तरह बढ़ रहा है। इसने साहित्य के एक प्रधान अंग नाटक का गला घोंट दिया। अभी सिनेमा में स्वर की कमी है। संसार के विद्वान इस समस्या को हल करने में दत्तचित्त हें और आशा है कि बहुत थोडे काल में सिनेमा के चित्र बातें भी करेंगे, गीत भी गायेंगे। उस दिन ड्रामा का प्राणान्त ही समझिए। कविता कंवल भावा स सम्बन्ध रखने वाली वस्तु हं। वह हमारे उत्कृष्ट कोमल भावों ही को कम्पित कर सकती है। किन्तु कविता-देवी को कल-कारखानों, घनी बस्तियों, ऊंची-नीची अट्टालिकाओं और वाणिज्य तथा व्यापार की कंचन- भरी र्ोठियों से घृणा है। उसे तो हरे-भरे जल-तट, मधुर स्वर से गाने वाली नदियों, निर्जन पवित्र स्थानों ही से कुछ विशेष प्रेम है। वर्तमान परिस्थिति उसके लिए अनुकूल नहीं। उसे संग्राम, संघर्ष ओर द्वन्द्र से चिढ हैं। अब ओर साहित्य में क्या रह गया? निबन्ध। हां, निस्सन्देह, लेकिन, यह शिक्षा को मनन करने की वस्तु है, मनोरंजन की नहीं। अब उपन्यास ही बाकी बच रहता है। लेकिन जिस सिनेमा ने नाटक की हत्या कर डाली वही उपन्यासों का भी खून कर रहा है। रुपये, आठ आने का खर्च करके केवल दो- तीन घंटे में जब हम विक्टर ह्यूगो, टॉल्स्टॉय, कैरे 6'ग हार्डी जैसे धुरन्धर विद्वानों की सर्वोत्कृष्ट रचनाओं का समुचित आनन्द उठा सकते हैं, तो पुस्तक लेकर अपनी कोठरी में कई-कई दिनों तक पढ़ने का कष्ट क्यों उठाने लगे? माना कि सिनेमा में भाषा के सारस्य, उक्तियों की सुन्दरता, विचारों की नवीनता और मौलिकता, वाक्यों के मर्नोहर विन्यास, शब्दों
की मनोहारिणी सजावट, मीठी-मीठी चुटकियों, हृदय में चुभ जाने वाले व्यंग्यों का रसास्वादन हम नहीं कर सकते, लेकिन अधिकांश प्राणी मनोरंजन चाहते हैं और सिनेमा वाले रचना के मर्मस्पर्शी स्थलों को चित्रित करने में नहीं चूकते। सरस साहित्य का स्वाद, सरसरी तौर से पढ़ने से नहीं मिलता। हमारे सुलेखक-व॒न्द भावों को शब्दों में ऐसा छिपाते हैं कि जब तक एक वाक्य को बार-बार न पढ़िये उसका पूरा आनन्द नहीं मिलता। और यहां इतना अवकाश नहीं। दस घन्टे दफ्तर या कचहरी में सिर मारने के बाद अब मस्तिष्क में इतनी ताकत कहां कि साहित्य से सिर मारें।
ऐसी परिस्थिति में गल्प ही एक ऐसी वस्तु है जो उपयोगिता, मनोरंजकता ओर कम से कम समय लेने में सिनेमा से टक्कर ले सकता है। उपन्यास पढने को कई दिन चाहिए और वह भी एकान्त। यहां दो में एक भी प्राप्त नहीं। सिनेमा देखने के लिए भी तैयारी की जरूरत है। शाम ही को भोजन आदि से छुट्री कर लो, तीन घन्टों के लिए घर से गायब रहो, वहां से नौ बजे जाडे-पाले, बादल-बूंदी में घर लोटो, सिनेमा हाल में भी तीन घन्टे भीड- भाड में आसन जमाने तपस्या करते रहो। क्या इसमें कुछ कम कष्ट है? कहीं हमारी अनुपस्थिति में कोई आंखों का अंधा और गांठ का पूरा मुवक्किल आ पडा तो शिकार हाथ से निकल जाने की सम्भावना ही है। गल्प, इन सब झंझटों, बखेडों से पाक है। दफ्तर, कचहरी, विद्यालय, दूकान, वायुसेवन, सैर-सफर कहीं जाते हों, 'चांद' का गल्पांक उठा लीजिए और चल दीजिए। रेल में तो गल्प आपके लिए अनिवार्य है। उसके बिना आपका समय किसी तरह कट ही नहीं सकता। अगर आपको लम्बा सफर करना हे, बम्बई से दिल्ली या कलकत्ता जाना है, और वह भी कम से कम सेकन्ड क्लास में तब तो आप 'कायाकल्प', 'चन्द्रकान्ता' 'गृहदाह ', 'बलिदान' कोई भी उपन्यास लेकर पढ़ सकते हैं।
लेकिन अगर सफर छोटा है , बनारस से लखनऊ या प्रयाग जाना है और वह भी इन्टर या तीमरे दरजे में तब आपके लिए गल्पांक के सिवाय और कोई उपाय नहीं। उस विपत्ति में इसी के हाथों आपका निस्तार होगा, उस मौके पर आपका यही दुबला-पतला, छोटा मोटा मित्र ही काम आयेगा। तोप और मशीन-गन बडी लडाई के लिए हैं ओर दुर्भाग्यवश बड़ी लडाइयां मो दो सौ में कहीं एक बार होती हैं। पिस्तोल और तम॑चे की जरूरत तो आपको पहर रहती है। कम से कम हाथ में एक मजबूत छड़ी तो होनी ही चाहिए। और न मही, काई कत्ते साहब ही आपसे खामख्वाह उलझ पडे तो? गल्प आपकी छड़ी है, जिसे आप सफर में किसी तरह नहीं छोड सकते।
दूकान पर बेठे ग्राहकों की बाट देखते-देखते जब आपकी आंखें दुखने लगें, चट गल्पांक उठा लीजिए, फिर चाहे ग्राहक आए या न आए, आपकी बला से, आपको ग्राहकों की परवा न रहेगी। आप संध्या समय बिना एक पैसे का माल बेचे प्रसन्न-चित्त घर लौट सकते हैं। किसी अफसर के इजलास में पैरवी करके लौटने के बाद , दूसरे इजलास में जाने के पहले, यदि दस-बीस मिनट का भी अवसर मिल गया तो गल्पांक आपके साथ है। यह प्मय बडे मजे से कट जायगा। आपको अर्दली की आवाज की ओर कान न लगाये रहना पडेगा। अर्दली की पुकार खुद-ब-खुद आपके कान में पहुंचेगी और इतनी जल्द पहुंचेगी कि आपको आएचर्य होगा। यदि आपने गल्प समाप्त कर लिया है तो 'चांद' को मेज पर रख दीजिए और तेजी से लपके हुए जाइए-इतनी तेजी से नहीं कि जल्दी के बदले और विलम्ब हो और चोट
घाते में मिले। यदि अभी गल्प समाप्त नहीं हुआ तो पत्रिका को हाथ में लिए, देखते जाइए, इजलास तक जाते-जाते उसके बचे हुए दो-एक पृष्ठ समाप्त हो जाएंगे। अध्यापक महोदयों को तो हम गल्प पढ़ने की सलाह न देंगे। उसके पास न समय की कमी है, न अवकाश की। वह चाहें तो 'तिलिस्मे होशरुबा' की अठाइस जिल्दें, 'बोस्तानें खयाल' के सात भाग, चन्द्रकान्ता सन््तति ' के चौबीस हिस्से या ' अलिफ लैला ' की हजारों रातें आनन्दपूर्वक समाप्त कर सकते हैं।
लेकिन विद्यार्थियों के गल्पाध्ययन के हम कट्टर पक्षपाती हैं। उपन्यास तो ये बेचारे पढ़ ही नहीं सकते, इतना अवकांश कहां, पोट की पोट पुस्तकें पढ़नी हैं और परीक्षा का भूत सिर पर सवार है। हां, परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाने के बाद वे चाहें तो उपन्यास पढ सकते हैं, क्योंकि तब बरसों सिवा उपन्यास पढ़ने के और कोई काम न रहेगा। हां, जीवन की मौलिक आवश्यकताओं से निश्चिन्त रहने की शर्त है। लेकिन अध्ययन-काल में तो गल्प ही उनका उद्धार कर सकता हे। जहां ईथिक्स से जी ऊबे चट गल्पांक उठाइए और पन्द्रह-बीस मिनट में आपका दिमाग ताजा हो जायगा, सिर का चक्कर खाना भाग खडा होगा और आप नयी स्फर्ति से भाषा-विज्ञान पर धावा करेंगे। जिस विद्यार्थी के पास यह अमृत॒धारा है उसे फिर किसी दूसरी मनोरंजनौषधि की जरूरत ही नहीं। एक बुंद जल या शक्कर में मिलाकर उतार लीजिए तबीयए ६९ हो जायगी, सारी विपत्ति-बाधा पलायन कर जाएगी। अजी हम तो कहते हैं, लेक्चर हॉल में भी में भी यदि आपको नींद आने लगे तो चुपक से गल्पांक निकाल लीजिए और बंधड॒क डेस्क पर रख लीजिए। आपकी निद्रा काफ्र हो जायगी। गिरफ्तार होने की जरा भी शंका नहीं, अध्यापक महोदय की सारी चेतना ओर उपचेतना-शक्ति तत्वविवेचना में संग्लन हो रही हे।
महिलाओं का तो गल्प के बिना जीवन ही दुस्तर समझिए। उनके लिए न सिनेमा हे, न उपन्यास, न चहलकदमी। इन स्वर्गीय पदार्थों से विधि-बाम ने उन्हें किसी पूर्व कुसंस्कार के प्रायश्चित रूप से वंचित कर दिया है। संध्या समय सिनेमा दखने जाय॑ तो बताइए भोजन कौन बनाए? अगर कोई मिस्त्रानी लगी हुई है तो भोजन की चिन्ता नहीं। जेकिन नन्हें-नन््हें बालकों की हठीली, चंचल कलह प्रिय सेना तो साथ न छाडंगी। एक दर्जन ने सही, मगर आधे दर्जन बच्चों को साथ ले जाना कया मुंह का कोर है या खाला जी का घर? अगर पुरुषों को एक दिन यह मुसीबत पड़ जाय तो छठी का दूध याद आ जाय। और तो क्या कहें, पचास सैकडे पुरुष तो उसी दिन वैराग्य धारण कर लें। अगर संसार-लोलुपता बहुत बढी हुई है तो कदाचित् इतनी जल्द बे वैराग्य न लेंगे लेकिन सन्तान-निग्रह की पुस्तकों के लिए तो ' चांद ' कार्यालय को तुरन्त ही कार्ड डाल दिया जायगा। खेर, जनाब, खुदा न करे कि पुरुषों क॑ सिर यह बला आवे नहीं तो सृष्टि का अन्त ही समझिए, अल्लाह मियां को अपने क्रीडा-कौशल के लिए दूसरे ही प्रकार की दुनिया रचनी पडेगी। औरों की बात तो नहीं चलाते, हम तो उसी दिन जहर खाकर सो रहेंगे। अब बताइए यह आधे दर्जन बछडे बांधे केसे जायं? सब-के-सब तो गोद में आ ही नहीं सकते। विवश होकर एक बग्घा करनी पड़ी। चलिए, दो रुपये की चपत पड गई। रास्ते में बच्चों की भूख का क्या ठिकाना? हलवाई की दूकान देखी या खोमचे वाले की आवाज सुनी और भूख लगी। पांच बजे के चले-चले कहीं सात बजे सिनेमा भवन के पास पहुंचे। मगर इसकी शायद ही कभी नौबत आती है। अधिकतर तो यही सुना है और
दो-एक बार देखने में भी आया है कि महिलाओं का अदम्य धेर्य भी हाथ से जाता रहता है और उन्हें आधे रास्ते से घर लौटना पड़ता है। अगर किसी तरह रोते-धोते सिनेमा पहुंच भी गई और हाल में भी जा पहुंचीं तो यह न समझिए कि मुसीबत का खात्मा हो गया। असली विपत्ति तो अब शुरू होती है। कोई कुरसी को उलटता है, कोई किसी के चुटकी काटता है, कोई रो- रोकर दुनिया सिर पर उठाता है, माता बेचारी किस-किस को समझाए। छोटे तो धमकाने से मान भी जाते हैं, बड़े जिन से आशा थी कि शान्ति से बैठेंगे, उन्हें भी आकर नटखटी सूझती है। उनके प्रश्नों का उत्तर देना स्वयं एक बला है। जनाब, वह चिल्ल-पों मचता है कि सारा हॉल घबड़ा उठता है। लोग दांत पीस-पीसकर मृद्रियां बांध-बांधकर रह जाते हैं। कम्पनी का जमाना है कहीं नवाबी होती तो खून ही कर डालते। उधर बच्चे हैं कि अपनी शरारत से बाज नहीं आते। अभागिनी माता को तमाशे का लेशमात्र भी आनन्द नहीं मिलता। सारा ध्यान और मनोयोग बच्चों के शासन की भेंट हो जाता है। और जब वह यहां से घर पहुंचती है तो मानो उसे निर्वाण प्राप्त हो जाता है। कान पकड़ती है कि अब कभी सिनेमा का नाम न लेंगे। दस रुपये दण्ड पड़ गए, मानो जुरमाना दे आए। यह तो सिनेमा का हाल हुआ। कहीं थियेटर हुआ तब तो मरण ही समझो। लड॒कों का कोलाहल आंखें नहीं बन्द कर सकता पर कान तो फाड सकता है। उधर स्टेज से सा रे गा मा की ध्वनि उठी इधर मुन्नू ने पंचम स्वर में अलापना शुरू कर दिया। फिर बताइए दर्शक लोग क्यों न दांत पीसें और क्यों न अपना माथा पीटें, छाती कूटें। भारतवर्ष में रुपये-दो रुपये सरकारी कर्मचारियों क॑ लिए विशेषत : पुलिस और रजिस्ट्री विभाग वालों के लिए तो कोई बडी बात नहीं, लेकिन हमा-शुमा के लिए तो जनाब एक रुपया एक लाख के बराबर हैं। दिन भर बेठे-बेठे कमर टूट गई, आंखें फूट गईं, भेजा फट गया, पसीने की नदी बह गई, तब जाके मुद्रा देवी के दर्शन प्राप्त हुए, तब यह केसे सम्भव हैं कि उसी महा-कष्ट प्राप्त मुद्रा से खरीदे हुए आनन्द में बाधा पड़ते देखकर हम मौन रह जाय? दूसरों की बात हम नहीं चलाते। सम्भव है ऐसे लोग भी हों जो खून का घूंट पीकर रह जाय॑। लेकिन मेरे लिए तो यह असहय है। यहां तो अपने ही बच्चों के शोरगुल से जामे से बाहर हो जाता हूं। जब तक घर पर रहता हूं सारा समय चपतबाजी में ही व्यतीत करता हूं। यहां तक इस काम में अभ्यस्त हो गया हूं कि यदि कभी देवी जी अपनी सेना लेकर गंगा-स्तान को चली जाती हैं तो बार-बार हाथों म॑ं खुजली होती है और कोई नहीं मिलता ता बूढ़े नौकर ही पर दा-चार हाथ साफ कर लता हूं
सिनेमा ओर थियेटर का तो यह हाल हुआ, उपन्यास कोई महिला केसे पढ़ सकती है यह तो उसके लिए वर्जित फल, आकाश-कुसुम है। प्रात: से लेकर आधी रात तक तो दम मारने का अवकाश नहीं मिलता। अगर सबेरे बच्चों को नाश्ता न मिले तो वह जीता ही नोच डालें, उनसे भी किसी तरह प्राण बच जाय॑ तो स्वामी जी चाय में एक मिनट की देर होने पर मेघवत् गरज उठते हैं। उनकी यह गगनभेदी ध्वनि सुनकर स्त्री के तो प्राण ही निकल जाते हैं, मालूम होता है घर की दावारें हिल रही हैं, धरती कांप रही है। ओर क्यों न गरजें। उन्हें इसका सोलहों आने अधिकार है। स्त्री ओर है ही किस मरज की दवा। खेर, नाइते से तो अभी फरसत मिलने नहीं पाई थी कि भोजन की बारी आ पहुंची। किसी तरह यह बला भी टली, स्वामी अपने काम पर गए ओर लड़क स्कूल सिधारे तो छोटे बच्चों के मुकदमे पेश होने लगे। मगर न्यायाधीश को अभियुक्त को दण्ड देकर जो फुरसत मिल जाती है, उसका यहां नाम भी नहीं।
दण्ड दिया तो कान के परदे फड़वाने के लिए भी तैयार रहना पड़ता है। दो-चार मुकदमे पेश होते-होते फिर तीन बजे और लड॒के स्कूल से आ पहुंचे। अधिकांश तो ऐसा होता है कि एक या दो बजने के पहले ही आ पहुंचते हैं और ऐसा तो शायद ही कभी होता है कि घर आने पर तीन न बजते हों। न जाने स्कूल वाले घड़ी तेज कर देते हैं, या लड़के छुट्टी होने से पहले ही भाग खडे होते हैं। आये दिन एक न एक त्योहार, व्यर्थ की छुट्री। आज क्या है? व्यास पूजा की छुट्टी है। आज क्या है? मौनी अमावस्या की छुट्टी है। आज कया है? निर्जला एकादशी हें। इन त्यौहारों में और तो कुछ नहीं होता, हां गृहिणी का उत्तरदायित्व भयंकर मात्रा में बढ़ जाता है। ओर दिन तो सिर में पीड़ा ही होकर रह जाती हे, छुट्टियों में तो मौत का सामना होता है। दिन तो खेर किसी भांति कट गया, पर रात को काली बता ही समझो, कभी किमी बच्चे को दस्त आ रहे हैं, कभी कोई ज्वर में पड़ा है, कभी दांत निकल रहे हैं कभी ठंड लग गयी है. शिशु-शुश्रुषा के कष्ट माता के सिवा और कौन झेल सकता है? रातें बैठे- बैठे कट जाती हैं पति महाशय पास ही पलंग पर पड़े, नाक की शहनाई बजा रह हैं। ऐसी डरावनी आवाज निकल रही है मानो कोई कत्ता गुर्र रहा हो। बेचारी अबला सुन-सुन मारे भय क॑ सूखी जा रही है, पर पति को जगाने की हिम्मत नहीं पड़ती। सम्भव है पति देवता की ।नद्रा भंग हो जाती है, पर आंखें नहीं खोलते। उठना तो दूर रहा, शायद अपने दिल में सोचते हैं, में अपना काम पूरा कर चुका, मे शयों अपने आराम में खलल डालं। तुम्हारे सिर पर जो पड़े वह तुम आप भुगतो। इसी भय, चिन्ता ओर ग्लानि में बहुधा अबलाओं का जीवन व्यतीत हो जाता है। उच्च साहित्य ऐसे विपद्- ग्रस्त प्राणियों का साथ नहीं देता, वह चिन्ता से मुक्ति देने वाली वस्तु नहीं, चिन्ता को निमन्त्रण देने वाली वस्तु है। वह कहता है घर क॑ सारे काम-काज छोड़कर मेरी उपासना करो, तब में वरदान दूंगा, तब तुम्हें मुझसे सक्षात् होगा, इस शोर-गुल, चीख- पुकार, मार-धाड, हाय-तोबा में में नहीं आता, इधर आने का मुझे साहस ही नहीं होता। भोजन बनाना है, कोई चिन्ता नहीं। लडका राता है, रोने दो। स्वामी के आने का समय हुआ, आन दो। कछ परवा नहीं, घर क॑ काम धन्न्धे को तिलांजलि दे दो और मेरे हो जाओ। अतएव महिलाएं उपन्यासों से मन लगाते भयभीत हांती हैं। उनके दुख-दर्द का सप्थी तो बचारा गल्प ही है। चाय का पानी चूल्ह पर पर चढा हुआ है। इन दस मिनटों के सदुपयाग का सबसे उत्तम उपाय यही है कि गल्पांक खालकर बेठ जाइए। जब तक पानी गर्म हागा, आप किसी मानस- प्रदेश की सैर करक॑ लोट आएंगी। बच्चे को थपकियां देकर सुलात-सुलाते भी इस गल्पाद्यान में एक बार भ्रमण कर सकती हैं। यहां समय नष्ट होने का भय नहीं। यह साधु का आशीर्वाद है जो आप राह चलते प्राप्त कर सकती हैं, यह आपके समय का 85०-?०0घ८ (फालतू पैदावार) है।
यहां हम उस श्रेणी के सज्जनों का बिल्कुल भूल गये जिनका समय किसी तरह काटे नहीं कटता, मानो किसी रांड का चरखा हो। इस श्रेणी के तीन भेद हैं, वैद्य, हकीम और डाक्टर। यहां डाक्टर का आशय वह डाक्टर नही जो डाक्टर रवीन्द्रनाथ या डाक्टर सप्रू का है। सत्य मानिये ये सज्जन एक कांटा भी नहीं निकाल सक१। यहां डाक्टर का आशय वह मनुष्य है जो जीवन की रक्षा के लिए विष खिलाता है, जिसकी उत्तरोत्तर वृद्धि के साथ प्राणनाशक कीटों की भी वृद्धि हो रही है, जिसने मानव जीवन को कीटों का क्रीड़ास्थल बना दिया है। इसमें सन्देह नहीं कि कलियुग वास्तव में कलियुग है। मौत का बजार गर्म है। लेकिन फिर भी
अधिकांश डाक्टर मक्खी मारते ही देखे जाते हैं। बेचारे सारे दिन अपने कमरे में बैठे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पत्थर लुढ़काया करते हैं कि किसी भांति कोई शिकार फंसे। खुदा भेज, मौला भेज की रट लगाया करते हैं। कोई सिर-दर्द का रोगी भी आ फंसा तो समझ लो उस गरीब की जान की कुशल नहीं। कोई भयंकर रोग लेकर जायगा। तुरन्त उसके फंफडों की परीक्षा होने लगी और एक क्षण में डाक्टर साहब ने बडे विद्वत्तापूर्ण भाव से यह तत्व निकलकर रख दिया कि जनाब आपको 69॥0०7॥९ 90॥58 (गैलपिंग थाइसिस) हो रहा है। इतना सुनते ही बेचारे रोगी के प्राण पखेरू उड़ जाते हैं, फिर इस शंका को वह हृदय से नहीं निकाल सकता। सोते-जागते यही शंका उसके सिर पर सवार रहती है, यहां तक कि अन्त को 09॥0 0॥॥8 [055 के लक्षण दृष्टिकोण होने लगते हैं और डाक्टर साहब की भविष्यवाणी पूरी हो जाती है। अब रोगी आपकी शरण आ गया, आपके चरणों पर अपने आपको समर्पण कर दिया। अब बढ-बढ़कर हाथ मरिये, आपकी बहार है। औषधियों के बिल न चुका सके तो उसका घर-बार कुर्क करा लीजिए, मगर जाने न दीजिए, क्योंकि ऐसे शुभ अवसर रोज नहीं मिलते, जैसा आपको स्वयं अनुभव है। इन महानुभावों से हमारा निवेदन है कि इस आशामय प्रतीक्षा के समय का आप भलीभांति सदुपयोग कर सकते हें। क्या उपन्यास पढ़कर? कदापि नहीं। उसका आनन्द उठाने के लिए जिस एकाग्रता की जरूरत है वह आपको कहां नसीब? आपकी आंखें तो सड़क पर आने-जाने वालों की ओर लगी हुई हैं? इस मानसिक व्यग्रता की दशा में गल्प ही वह मन्त्र है जो आपको शान्ति प्रदान कर सकता है। उठा लीजिए गल्पांक। इसमें आपका दोहरा फायदा है। अभी पथिक आपको हाथ पर हाथ धरे बेठा देखता है, तो समझता है आप गरजमन्द हैं। आपको पढते देखेगा तो समझेगा आप बडे अध्ययनशील हैं, नित्य शास्त्र-सम्बन्धी पुस्तक पढ़ा करते हैं। इससे आपकी कीर्ति बढ़ेगी ओर कहीं किसी राजा-रईस की निगाह पड़ गयी तो आपका बेड़ा पार है। आप उसके पारिवारिक चिकित्सक नियुक्त हो जाय॑ंगे, पांचों की घी में होंगी। यह भी याद रखिए कि यदि आपकी स्मृति में मनोरंजक गलपों का काफों खजाना हो तो आप अपने रोगियों का उससे कहीं अधिक उपकार कर सकते हैं जितना अपनी कड॒वी, जहरीली दवाएं पिलाकर। हां, यह ध्यान रहे कि कहानियां जरा हास्यपूर्ण हों।
इस जीवन-संग्राम में साहित्य पर जो सबसे बुरा असर पड़ा हैं वह यह है कि वह मर्सिया बना जाता है। कोई पत्र-पत्रिका या पुस्तक उठा लीजिए, आदि से अन्त तक रुलाने वाली बातों से भरा पाइएगा। यहां तक कि हमारी लेखन-शैली भी इतनी गंभीर हो गयी हे कि उसे शोक-शेली कह सकते हैं। यह हम न मानेंगे कि वर्तमान परिस्थितियों ने हमें शोकवादी बना दिया है। आखिर हम आपस में बैठकर हंसते-बोलते तो हैं ही, हंसना भूल तो नहीं गये। हां, अगर कुछ दिन यही हाल रहा तो सम्भव है कि अनुपयोग के कारण यह शक्ति हमसे छीन ली जाय, विकास न पाने के कारण उम्का लोप हो जाय। रोने का ठेका साहित्य-सेवा ही क्यों लें? मजा यह है कि हमारे नवयुबक लेखक जब कलम हाथ में लेते हैं तो तुरन्त पच्चपन-साला गाम्भीर्य धारण कर लेते हैं। कदाचित् वह समझते हैं कि विनोद हमारी शान के खिलाफ है, छिछोरापन हे। अगर वह ऐसा समझते हैं तो यह उनकी बड़ी भारी-महात्मा गांधी के शब्दों में हिमालियन- भूल है। हास्य साहित्य-रसों में अगर प्रधान नहीं तो एक प्रधान रस अवष्य है। हम तो यही कहेंगे कि यह प्रधान रस, बल्कि उससे भी चार अंगुल ऊंचा है। न जाने श्रृंगार
को क्यों प्रधान रस माना जाता है। जिस रस का आरम्भ सत्रह वर्ष से पहले नहीं होता और कदाचित् चालीस वर्ष के पहले ही समाप्त हो जाता हे, उसे प्रधान क्यों माना जाय? हास्य क्यों न प्रधान रस माना जाय, जिसका विकास शिशु के छठवें मास से ही होने लगता है और जीवन-पर्यन्त रहता है, यहां तक कि मरण-शेैय्या पर पड़ा हुआ रोगी भी मृत्यु से दो-चार मिनट पहले तक हंसता देखा गया है। आप कहेंगे, साहब, विपत्ति में हंसी नहीं आती। आंतें तो कायं-कय॑ कर रही हैं, आप कहते हैं हँसिए। भला इस दशा में कहीं हंसी आती है? हंसी तो पेट भरने पर ही आती है। में इसे नहीं मानता। गांवों की दशा कितनी दयनींय है, इसके लिखने की जरूरत नहीं। बेचारे किसान पहर रात रहे से काम करने लगते हैं और पहर रात तक बराबर काम करते रहते हैं। इस बीच में कदाचित् एक बार भी उन्हें पेट भर भोजन नहीं मिलता। न बदन पर कपड़ा है, न पेट में अन्न, न देह पर मांस, जमींदार की धाँस अलग, लगान की चिन्ता ऊपर से। एक लगान ही क्यों, यों कहिए कि बेचारे चिन्ता के एटलाण्टिक सागर में डुबकियां खा रहे हैं। लेकिन वहां भी हंसी का अभाव नहीं। वे भी हंसते देखे जाते हैं, वे भी कभी-कभी चुहल और विनोद में मग्न हो जाते हैं। पर, हमारे साहित्य-समाज पर ग्लानि ओर दु:ख का ऐसा भारी बोझ लदा हुआ है कि उनकी कलम क नोंकों पर हंसी आने का नाम नहीं लेती। क्या वे कसम खा सकते हैं कि मित्र-समाज में वे कभी हंसते ही नहीं? अदालती कसम नहीं। सच्ची गंगाजली उठा सकते हैं? हम कह सकते हैं हंसना मनुष्य-मात्र के लिए अनिवार्य है। आप हसत हैं और खूब खिलखिलाकर। आपक कहकहे दीवारों को हिला दते हैं। मगर न जाने क्यों कलम हाथ में लेते ही आप गम्भीरता के सागर में डूबने-उतराने लगते हैं। कम-से-कम नवयुवकों के लेख में तो विनोद की प्रधानता होनी चाहिए। गम्भीरता उनके लिए अस्वाभाविक है। हम बूढे खूसट रोने के लिए कया थोडे हैं जो हमारे नवयुवक भी इस काम में हमारा हाथ बटायें। नहीं साहब, हमें आपकी सहायता की आवश्यकता नहीं। हम अकले इतना रा सकते हैं कि कहिए आंखों से गंगा बहा दें, कहिए महासागर तरंगित कर दें। हमारी आंखें महर्षि अगस्त्य के चिल्लू से जो भर भी कम नहीं हैं। आप हमारे क्षेत्र में आकर हमारे साथ जबर्दस्ती करते हैं। हम इस क्षत्र को उतना ही स्वरक्षित रखना चाहत हैं जितना हमारे यारोपीय साप्राज्यवादी भूमण्डल को । जिस तरह उन्हें यह असहा ४ कि काई अन्य जाति एक अंगुल जमीन पर अपना कब्जा जमा ले, उसी तरह हमें भी असह्य है कि नवयुवक महाशय आकर हमारे क्षेत्र में हस्तक्षेप करें। हम आपको समझाये देते हैं, अगर आप मान गये तो खैर, नहीं तो जनाब हमने भी पुलीस का दरवाजा देखा है। जान पर खेलकर एक रौण्य- मुद्रा निकालेंगे और दारोगा जी को नजर देकर चटपट रपट कर देंगे, तब आपको आटे-दाल का भाव मालूम होगा। बूढ़े अपनी जायदाद के कितने लोभी होते हैं यह शायद आपको मालूम नहीं, हम आपको इसका प्रमाण दे दंगे। आप में नया जोश है, नया रक्त है, नया जीवन हे, नयी स्फर्ति है, आप अगर रोने पर उतारू होंगे तो प्रलय ही कर डालेंगे। फिर हम गरीबों के लिए कहां जगह रह जायगी, सिवाय परलोक के। इसलिए हम पर दया कीजिए और वेराग्य, नैराश्य, विषाद के विषय हमारे लिए रिजर्व रखकर ३) लिए, विनोद, परिहास और शौर्य रख लीजिए। इस तरह हमारे और आपके बीच में समझोता हो जाने से कलह का मार्ग बन्द हो जायगा।
हम यह मानते हैं कि, वर्तमान जलवायु हास्य के विकास के अनुकूल नहीं। लेकिन
हमें अपनी प्रबल आशावादिता से इस नैराशय-तिमिर को हटाना होगा। रोने के लिए हमारा घर ही क्या थोड़ा है कि हम अपने साहित्य-कुंज में आकर भी वही रोना-धोना शुरू करें। साहित्यकारों को जिन्दादिल होने की बड़ी जरूरत है। हमसे कई बूढे आदमियों ने कहा है कि ऐसी कोई चीज लिखिये जिसमें हंसी आवे। आप लोग तो ऐसी ही चीजें लिखते हैं जिसे पढ़कर रोना ही आता है ओर मन ओर भी दु:खी हो जाता है। दु:खी हृदय जिस चीज का अपने आप-पास अभाव पाता है उसे वह साहित्य में खोजता है। लेकिन उसे जब यहां भी निराशा होती हैं तो वह साहित्य से भी उदासीन हो जाता है। आज हमारी जनता चार्ली चैपलिन की नकलें देखकर क्यों लोट-पोट हो जाती है? जिस दिन उसका तमाशा होता है उस दिन क्यों हाल ठसाठस भर जाता है? इसीलिए कि वहां हमें थोड़ी देर के लिए अपनी दुखमय परिस्थितियों को विस्मृत कर देने की आशा होती है। किसी भाषा को लीजिए, उसके हास्य- चरित्र ही उसकी जान होते हैं। हां, हास्य सौजन्यपूर्ण होना चाहिए, यह नहीं कि वहां भी अपने दिल के फफोल फोडे जायं। हम इस समय विपत्ति क रोग में ग्रसित हैं, हमें ऐसी ओषधि की जरूरत है जो यह दु:ख हरे, हमारे सन््ताप को मिटावे, हमें संभाले। और ऐसे साहित्य का उत्थान नवयुवकों द्वारा ही हो सकता है। विपत्ति रोने से नहीं कटती। रोने से तो बह और भी प्राणघातक हो जाती है। उसे हम हंसकर ही काट सकते हैं। कम से कम विर्पत्ति का भार कुछ तो हलका हो जाता है। रात को बन में भटका हुआ पथिक दीपक की ज्योति देखकर जिस भांति उसकी ओर लपकता है, उसी तरह हम चाहते हैं कि विपत्ति क मारे हुए प्रेमी पाठक साहित्य की ओर लपकें। उन्हें विश्वास हो कि यहां हमारे दु:ख का बोझ कुछ हलका होगा, हमें सुख का अनुभव होगा, हमारा गम गलत होगा। हास्यमय गल्पों द्वारा यह उद्देश्य कुछ न कुछ अवष्य पूरा हो सकता है। हां, हास्य अश्लीलतारहित, निर्मल, उदार होना चाहिए। साहित्यिक हास्य और सामाजिक हास्य में बडा अन्तर होता है। वही बात जिसम्रे मित्र-गोप्टी में पेटों में बल पड जाते हैं, साहित्य में निन्द्य हो जाती है। खुसरों और बीरबल की कथाए यों बहुत हो हास्यपूर्ण हैं लेकिन उनमें- अधिकांश ऐसी हैं, जिन्हें साहित्य में लाना साहित्य का अपमान करना हांगा।
प्रकाशन इतिहास
[सम्पादकीय। 'चांद', दिसंबर, 1926 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-3 में संकलित।]
