हम गोलमेज-कांफ्रेंस के निन्दकों में नहीं हैं। हम स्वीकार करते हैं कि हमारे कितने ही नेता केवल राष्ट्र-हित का विचार से उसमें शरीक हुए हैं और तरह-तरह की बाधाओं का सामना करके वे देश के उद्धार के लिए कोई मार्ग निकाल निकालने में जी-जान से लगे हुए हैं। वे अपनी जिम्मेदारियों को खूब समझते हैं और जो लोग उनकी निन्दा या उपेक्षा करते हैं, वे उनके साथ अन्याय करते हैं। यह समझना कि कांग्रेस के लीडरों ही ने अकलमन्दी का ठेका ले लिया है और जो लोग उसके बाहर हैं वे सब-के-सब देशद्रोही हैं, सरासर अन्याय है। गोलमेज में ऐसे-ऐसे अनुभवी नेता शरीक हैं, जिनकी हमने सदैव इज्जत की है और अब भी करते हैं। हमें विश्वास है कि वे लोग कोई ऐसा काम न करेंगे जिससे राष्ट्र को हानि पहुंचे, लेकिन एक रुख को देखने से ऐसा अनुमान होता है कि उन्हें अपने कार्य में विशेष सफलता की सम्भावना नहीं।
एक तरफ हमारे मुस्लिम नेता हैं जो मि. जिन्ना की चौदह शर्तों को देश की भाग्य-रेखा बना डालने पर तुले हुए हैं। दूसरी ओर हिन्दू नेता हैं जो इन शर्तों को उसी दशा में मंजूर करना चाहते हैं जब पहले यह तय हो जाय कि गवर्नमेण्ट डोमिनियन स्टेटस स्वीकार करने पर तैयार है। डोमिनियन स्टेटस के विषय में अब यह स्पष्ट हो गया है कि साम्राज्य का कोई भी अंग अपनी इच्छानुसार से पृथक हो सकता है। यह प्रत्येक डोमिनियन की इच्छा के अधीन है कि वह जब तक चाहे साम्राज्य में रहे और जब उसे साम्राज्य में रहना अपने लिए किसी कारण से अहितकर मालूम हो, तो अलग हो जाय। ऐसी दशा में डोमिनियन स्टेटस और पूर्ण स्वराज्य में बहुत थोड़ा या केवल नाम का अन्तर रह जाता है। हमारे विचार में भी डोमिनियन स्टेटस की स्वीकृति पर ही मुस्लिम शर्तों को मंजूर करना चाहिए। इसके बगैर मुस्लिम शर्तों को स्वीकार करने में बड़ी बाधाएं खड़ी होंगी। सरकार की जो नीति है, उसका तकाजा यही होगा कि मुस्लिम शर्तों को प्रधानता देकर थोड़ा-सा सुधार और कर दे। ऐसी दशा में आपस में वैमनस्य ही बढ़ेगा। हम यह स्पष्ट कह देना चाहते हैं कि भारत सुधार नहीं चाहता, वह अपने भाग्य-निर्णय का अधिकार चाहता है। गोलमेज वालों को समझ लेना चाहिए कि नुमाइशी सुधारों को स्वीकार करके वे भारत में शान्ति-स्थापन न कर सकेंगे।
हम उनसे अनुरोध करते हैं कि वे सबसे ज्यादा जोर इसी बात पर दें कि कांफ्रेंस की पहली शर्त डोमिनियन स्टेटस की स्वीकृति हो। जब सरकार इस शर्त को मान ले तब वे आगे बढ़ें, अन्यथा अपनी आबरू लेकर भारत लौट आवें और राष्ट्र-संग्राम में सम्मिलित हो जावें। हमारे लिबरल नेता डोमिनियन स्टेटस के साथ Safe guards की जो शर्त लगा दिया करते हैं, उसके विषय में हमें यही निवेदन करना है कि Safe guards की आड़ में बहुत कुछ किया जा सकता है। यहां तक कि डोमिनियन स्टेटस को केवल नाम का गोरखधंधा बनाया जा सकता है। अतएव Safe guards से बहुत सावधान रहने की जरूरत है। अगर रुपये की थैली और फौज पर सरकार का अधिकार रहा, तो डोमिनियन स्टेटस का कोई अर्थ न होगा। इसलिए इन दोनों विभागों पर हमारा अधिकार परमावश्यक है।
प्रकाशन इतिहास
[सम्पादकीय। 'हंस', नवम्बर, 1930 में प्रकाशित। 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य' खण्ड-2 में संकलित।]
