Cover Image for Jail Sudhar (जेल सुधार) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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सम्पादकीय•1930•2 मिनट

जेल सुधार

Jail Sudhar

प्रेमचंद का सम्पादकीय 'जेल सुधार' औपनिवेशिक जेल व्यवस्था के वर्गीकरण पर प्रहार करते हुए जेलों को दंडालय के बजाय चरित्र-सुधार केंद्र बनाने की वकालत करता है।

Work Details

प्रकार: सम्पादकीय
वर्ष: 1930
पठन समय: 2 मिनट (217 शब्द)

जिस तरह किसी व्यक्ति के चरित्र का अन्दाजा उसके मित्रों को देखकर किया जा सकता है, उसी तरह किसी राज्य की सुव्यवस्था का अन्दाजा, उसके जेलों की दशा से हो सकता है। रूस के जेल भारत के जेलों को देखते स्वर्ग हैं। यहां तक की ईरान-जैसे देश के जेल भी बहुत कुछ सुधर चुके हैं। हमारे जेलों की दशा जितनी खराब है, शायद संसार में इस बात में कोई उसका सानी न मिलेगा। जतीन्द्रनाथ दास के उत्सर्ग का कुछ फल उस सुधार के रूप में निकला है, जो अभी किये गए हें; मगर केदियों का कई दरजों में विभाजित किया जाना और हरेक कक्षा के साथ अलग-अलग व्यवहार करना, उन बुराइयों की दवा नहीं है। जेल ऐसे होने चाहिए कि कैदी उसमें से मन और विचार में कुछ सुधरकर निकले, यह नहीं कि उसके पतन की क्रिया वहां जाकर और भी पूरी हो जाय। इस सुधार से यह फल न होगा, हां जो धनी है, उन्हें वहां कुछ आराम हो जायगा। गरीब की सब जगह मौत है, जेल में भी। मालूम नहीं, ईश्वर के घर भी यही भेद-भाव है या इससे कुछ अच्छी दशा है।


प्रकाशन इतिहास

[सम्पादकीय। 'हंस', मार्च, 1930 में प्रकाशित। 'साहित्य का उद्देश्य' (प्रथम संस्करण) में संकलित। परन्तु बाद के संस्करणों में इसे हटा दिया गया। 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य' खण्ड-3 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "जेल सुधार." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1930, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/jail-sudhar. Accessed 22 Sep. 2026.