वियोग और मिलाप का मूल पाठ
बाबू दयानाथ के हृदय में देश और स्वार्थ का संग्राम उसी समय आरम्भ हुआ, जब उन्होंने बी. ए. पास किया। वे भारत सेवक-समिति में जाना चाहते थे, किन्तु स्वार्थ ने देश पर विजय पायी। उन्होंने कानून पढ़ना शुरू किया। देशानुराग कहता था, निर्बलों की सेवा करो । स्वार्थ कहता था, धन और कीर्ति पेदा करो। देश की फिर हार हुई। धन ने अपनी तरफ़ खींचा। सेवा-भाव धन की लालसा के नीचे दब गया, जैसे अग्नि राख के नीचे दब जाती है। किन्तु दवी हुई आग के सदृश यह भाव भी भीतर-ही-भीतर जागता रहा। यहाँ तक कि पाँच वर्ष बीत गए और उनके नैतिक ज्ञान ओर ग्राह्मता की ख्याति इतनी हुई कि उनका नाम गवर्नमेंट प्लीडरी के लिए लिया जाने लगा। इसी वीच होमरूल का आन्दोलन हुआ। दयानाथ के हृदय में फिर वहीं पुराना संग्राम होने लगा। वे परिश्रमशील थे, चतुर थे, कार्यकुशल थे, अच्छे वक्ता थे, अच्छे लेखक थे यदि अभाव था तो साहस का। यह उनके सहयोगियों और मित्रों के प्रोत्साहन ने दूर कर दिया। वे ठोमरूल लीग में सम्मिलित हो गये और पहले ही अधिवेशन में उन पर सर्वसम्मति ने मंत्री पद का भार रख दिया। दयानाथ काम तो करना चाहते थे, पर गुप्त-रीति से, इसलिए नहीं कि वे भीरु थे, केवल इसलिए कि वे अपने पूज्य पिताजी को अप्रसन्न नहीं करना चाहते थे। सभा समाप्त होने पर वह घर पहुँचे और अभी कपड़े उतार ही रहे थे कि शहर का कोतवाल दो थानेदारों और दस-बाहर कांस्टेबुलों के साथ उनके दरवाजे पर आ धमका। दयानाथ के पिता लाला जानकीनाथ घबराकर बाहर निकल आए। किसी अमंगल की आशंका हुई। चेहरा फीका पड़ गया। बोले, “आइये, सरदार साहब, मिजाज तो अच्छे हैं ? अरे, भगेलू पान ला।”
कोतवाल ने घोड़े से उतरकर छड़ी से बूट को खटखटाते हुए कहा-“इस समय मुझे ख़ातिर-मयारत से मुआफ़ कीजिए, मैं एक सरकारी काम से आया हूँ। आपसे मेरी पुरानी मुलाक़ात है, लेकिन जनाब, सरकारी फ़र्ज को क्या करूँ। बाबू दयानाथ हैं ?”
जानकीनाथ काँपते हुए बोले-““जी हाँ, होंगे तो, अभी कचहरी से आये हैं। (धीरे से) परमात्मा की मर्जी होगी तो चन्द महीनों में सरकारी वकील हुए जाते हैं, जज साहब ने मुझसे वादा फ़रमाया है ।” पर कोतवाल इस धमकी में नहीं आया। हाँ, मु. जानकीनाथ के आंतरिक भाव को ताड़ गया। बोला-“'तो जरा उनको बुला लीजिये, उनका बयान लिखना है।” यह कहकर उसने एक नोटबुक और फ़ाउन्टेनपेन निकाली। जानकीनाथ का रक्त एंडा हो गया। बोले-“कोई ख़ास काम है ?”
कोतवाल- ''जी हाँ, ख़ास काम है। आज लागों ने होमरूल का बड़े जोर-शोर के साथ जलसा किया है। गवर्नमेंट के खिलाफ खूब गलतबयानियाँ की गई हैं। बाबू दयानाथ उसके सेक्रेटरी मकर्रर हुए हैं। उनसे हाजिरीने-जलसा के नाम दरियाफ़्त करना है और यह भी दोस्ताना सलाह दनी है कि होशियार हो जायें, एंसा न हो कि हमको उनके साथ जाढ्तें का बतवि करना पड़े ।'
जानकीनाथ के पैरों तले से मिट्टी निकल गई। दौड़े हुए भीतर गए और दयानाथ से सरोष बोले-'“यह तुमने क्या आग लगा रखी है जी ? देखो तो, दरवाजे पर कोतवाल खड़े क्या कह रहे हैं ? तुम्हारी बदौलत जो कभी न हुआ था, वह आज हो गया |”
दयानाथ बाहर आये। कोतवाल ने उनकी तरफ़ तीव्र नेत्रों से देखा और बोला-“'आप आज होमरूल जलसे में थे ?''
“जी हाँ, था ।”
“आप उसके सेक्रेटरी हुए हैं ?”
“जी हॉ।
“जलसे में कौन-कौन आदमी मौजूद थे ?”
“मुझे याद नहीं।”
“ख़ास-ख़ास आदमियों के नाम बता सकते हैं ?”
“होमरूल के दफ़्तर से मेम्बरों की फ़हरिस्त आपको मिल सकती है।”
2
लाला जानकीनाथ शहर के बड़े आदमियों में थे। आज कई साल से उन्होंने वक़ालत छोड़ दी थी परन्तु धन खूब संग्रह कर लिया था। कई ग,.-ं के जमींदार भी थे और सबसे बड़ी बात यह थी कि अफ़सरों के कृपा-पात्र थे। उनकी जितनी जान-मान थी, उतनी उनसे बड़े आदमियों की भी न थी और यह तो खुला हुआ भेद था कि सरकारी वकालत के सम्बन्ध में दयानाथ की योग्यता से अधिक जानकीनाथ की विनयशीलता का श्रेय था। वे अपने युवाकाल में स्वयं राजनैतिक कामों में भाग लेते रहे थे, लेकिन पं. अयोध्यानाथ की मृत्यु के बाद से उन्होंने इन कामों से मुँह मोड़ लिया था। अब उनका समय अधिकांश स्वार्थ-साधन में व्यतीत होता था। दयानाथ उनके इकलौते बेटे थे। उन्हीं की शुभाकांक्षाओं में मग्न रहते थे। अधिकारी-वर्ग की विदाई और बधाई के जलसों में वे खूब योग देते थे। ऐसे अवसरों पर उनकी वकक््तृताएँ बड़े मार्के की होती थीं। भाव और भाषा, दोनों ही सुन्दर ।
यद्यपि उनकी अवस्था पचास से कम न थी तथापि उनका स्वास्थ्य बहुत ही अच्छा था। वे दयानाथ को उनके मिताहारी होने पर कभी-कभी लज्जित भी किया करते थे। बल-विक्रम की उनमें न््यूनता न थी। वे रोजाना चार-पाँच मील सैर करने जाया करते थे, परलोक बनाने की भी फ़िक्र में रहते थे, किन्तु ऐसे काम से सहानुभूति रखना भी उनके लिए असम्भव था, जिससे अधिकारियों की अप्रसन्नता का भय हो।
कोतवाल के चले जाने के बाद दयानाथ से बोले-“ तुम्हें क्या सूझी है ? तुम अपने को मुझसे अधिक बुद्धिमान समझते होगे, लेकिन में तुमसे स्पष्ट कहता हूँ कि धोखा खाओगे। समय पड़ने पर कोई काम न आएगा। मैंने ऐसे कितने ही आदमी देखे हैं जिन्होंने देश के पीछे अपना सर्वस्व त्याग दिया, लेकिन जब मुक़दमे में फैसे तो उनकी ओर से पैरवी करने वाला भी न मिला। मैंन तुम्हें पहले भी समझाया है और फिर समझाता हूँ कि इन कार्यो में हाथ न डालो। मैं मर जाऊँगा तो जो जी चाहे करना। मैं मना करने न आऊँगा, लेकिन जब तक जीता हूँ, मेरे ऊपर इतनी दया करो |"
दयानाथ ने नम्रता से कहा-“'मुझे लोग जबरदस्ती खींच ले गये और वहाँ सेक्रेटरी बना दिया। उस वक्त क्या करता ? इन्कार करना सबकी दृष्टि में कापुरुषता का परिचय हे था। मेरी समझ में तो भय की बात भी कोई नहीं। देश-भर इस मामले में एक जबान स्!”
जानकी-'“'खेर, कुछ भी हो, तुम एक पत्र लिखकर सेक्रेटरी के पद से तुरन्त इस्तीफ़ा दे दो।'
दया-“यह तो मुझसे न होगा ।”
जानकी-“पिता का पुत्र पर अधिकार मानते हो या नहीं »”
दया-“मानता हूँ और यही कारण है कि अब तक मैं राजनीतिक कामों से दूर भागता रहा हूँ, किन्तु अब देश में जागृति फैल रही है, अकर्मण्यता का समय नहीं है। इस समय तटस्थ बैठे रहना अपने देशवासियों पर घोर अत्याचार होगा ।'
जानकी-“अच्छी बात है, तुम्हारा जो जी चाहे करो। तुम्हारे कहने से मुझे ज्ञान हुआ कि अब मुझे तुम्हारी बातों में बोलने का अधिकार नहीं है, लेकिन अपने दरवाजे पर पुलिस को रोज खड़े देखना मेरी सहन-शक्ति से बाहर है। तुम्हें राजनीतिक फुलझड़ियाँ छोड़नी हैं तो मेरे घर से दूर छोड़ो, इसमें आग न लगाओ |”
दयानाथ ने अपने पिता से ऐसी निठुर बातें कभी न सुनी थीं। ये कठोर शब्द उनके हृदय में चुभ गये। बोले-'“जैसी आपकी इच्छा !” यह कहकर दयानाथ घर में गये और अपनी पली श्यामा से बोले-“दादाजी ने आज मुझे घर से निकल जाने की आज्ञा दी है। अब अपना बोरिया-बँधना सम्भालो। मैं दूसरा मकान दूँढ़ने जा रहा हूँ ।” श्यामा ने विस्मित होकर पूछा-“यह किस बात पर ?” दया-“कुछ नहीं, मैं आज स्वराज्य सभा में चला गया था। उसी के सम्बन्ध में पूछताछ करने के लिए शहर कोतवाल यहाँ आये थे।
3
दादा साहब इसमें अपनी मानहानि समझते हैं। वे कहते हैं, या तो होमरूल की त्यागो या मेरे घर से निकलो। मुझे होमरूल इस घर से कहीं प्रिय है। मेरी रात आज किसी दूसरे घर में कटेगी। कदाचित् अब मेरा बोझ उन्हें अखरने लगा है। नहीं तो वे इस तरह मुझे घर से निकलने का हुक्म न देते। मैं जव तक लौटकर आता हूँ तुम असबाव टीक कर रखना ।!
श्यामा ने कहा-“तुम्हारा सामान तो वाहर ही है।”
दया-“और तुम्हारा ९”
श्यामा-(कुछ सोचकर) “मैं न जाऊंँगी ।”
दयानाथ ने स्तमित होकर पूछा-''्या तुम मेरे साथ न चलोगी ?”
श्यामा- “नहीं!"
दयानाथ और कुछ न बोले क्रोध में भरे हुए घर से चल दिये। श्यामा ने रोका भी पर उसकी उन्होंने एक न सुनी। दूसरे घर की खोज में निकल खड़े हुए, लेकिन श्यामा की निठुरता हृदय में कौटे के समान खटक रही थी। “मं इस पर कितना भरोसा करता था। मैं समझता था कि इसका मन किसी संकट से विचलित न होगा, किन्तु हाँ ! आज पहली परीक्षा में उसने मेरा गर्व चूर कर दिया ।"!
3
दयानाथ अब एक अलग मकान में रहते हैं। उनकी आय तीन सौ रुपये मासिक से कम न थी। यह नयी गृहस्थी उत्तम रीति से चल रही थी। नौकर-चाकर, रसोइया, सव मौजूद थे। हाँ, अभी तक घोड़ागाड़ी लेने की नावत न आयी धी। पर गाड़ी पर कचहरी जाते थे । उस दिन से फिर वे अपने पिता के घर कभी नहीं गए और न जानकीनाथ ही ने कुछ सुधि ली। आश्चर्य तो यह है कि श्यामा भी उनकी ओर से निश्चित बैठी हुई थी। कोई संदशा भी नहीं भेजा, मानों उनसे कोई नाता ही नहीं है। कुछ दिनों तक वे पिता के व्यवहार पर बहुत भरे रहे। इस गेपष में उन्होंने होमरूल लीग का काम ऐसे उत्साह से किया कि नगर-भर में स्वराज्य की चर्चा फैल गई। थोड़े ही दिनों में नगर की काया-पल्नट हो गई। स्वराज्य पर व्याख्यानों का ताँता बँध गया | होमरूल पेम्फलेट छपते और बांटे जाते। मोहल्ले-मोहल्ले में छोटी-छोटी सभाएं कराई जातीं। होमरूल के अर्थ समझाये जाते और लोगों को स्वराज्य सम्वन्धी बातों को जानने के लिए उत्साहित किया जाता। दयानाथ के इन उद्योगों का फल यह हुआ कि नगर की नयी जागृति का जिक्र जहाँ छिड़ता, उनका नाम पहले वहाँ आता और पिता-पुत्र के झगड़े का जिक्र करते हुए मित्र लोग उनके आत्मिक बल को खूब सराहते, परन्तु ज्यों-ज्यों दिन बीतते थे त्यों-त्यों दयानाथ की मन की अवस्था में अन्तर पड़ता जाता था। स्वच्छंद होकर जितने उत्साह से दयानाथ ने देश-सेवा का विच;< किया था, उतना उत्साह अपने में अब नहीं पाते थे। इस अवस्था में जिन हृदय-तरंगों के उठने का स्वप्न उन्होंने आरम्भ में देखा था, वह केवल स्वप्न ही सिद्ध हुआ। दिनभर की वकालत और स्वराज्य सम्बन्धी कामों के वाद छुट्टी पाने पर जब रात को बिछोने पर पड़ते, तब निद्रा आने के पहले घंटों उनका हृदय विचार-तरंगों से टकराया करता। अपनी वर्तमान अवस्था पर सोचते, और सोचते उस गए जमाने पर, जब वे अपने पिता की नजरों के नीचे रहते थे। “अहा, क्या ही सुखभय समय था वह, जब वे अपने पिता की गोद में खेला करते थे ! एक दिन के लिए भी पिता से बिछोह नहीं हुआ। साथ खाते और साथ घूमते | साथ बैठते और साथ यात्रा करते । पिता बचपन के सखा थे। साथ खेलते और साथी बनकर स्कूल पहुँचाने जांते। पिता युवावस्था के सहारे थे। अपने हाथ-पैर हो जाने पर भी, जिधर देखते उनके आश्रय का हाथ पाते। उस समय न चिन्ता थी, और न भय । पिता की गोद क्या थी, जननी के मृदुल स्नेह का पालना और दैविक सुख और शान्ति की छाया थी। उसने जननी की याद भी भुला दी, उस दयामती देवी की, जिसने मृत्यु-शय्या पर पड़े हुए उनको अपने पति की गोद में रखकर कहा था कि अपने इस लाल को तुम्हारी शरण में छोड़े जाती हूँ, इस पर सदैव दया रखना।
आज विधि की विचित्र गति से उस सारे सुख-संसार पर पानी फिर गया। दयानाथ का हृदय इन विचारों से टूक-टूक हो जाता था। सोचते कि मुझे नम्रता से काम लेना था, पिता अप्रसन्न हुए थे तो क्या हुआ, उनको मना लेना था, बड़ी भूल हुई तब न सही, अब सही। परन्तु विचारों की गाड़ी यहीं आकर रुक जाती। अब यह कैसे हो सकता है ? मेरे और उनके विचारों में अन्तर है। यह उस समय भी था, परन्तु उस समय उनका और मेरा मार्ग अलग-अलग नहीं हुआ था। अब पीछे फिरूँगा, दुनिया हँसेगी और फिर मैं उसी चंचलता का शिकार बनूँगा जिसका आरम्भ और बीच में बन चुका हूँ।
इधर लाला जानकीनाथ का हृदय भी विचारों के वेग से उथल-पुथल हो रहा था। दयानाथ का इस प्रकार चले जाना उन्हें बहुत अखरा। वे समझते थे कि दयानाथ उनकी अप्रसन्नता से बहुत क्षुब्ध होगा, आकर चरणों पर गिरेगा, और जैसा वे कहेंगे वैसा वह करेगा, जैसा कि अभी तक करता रहा है परन्तु उसी दिन जानकीनाथ का भ्रम दूर हो गया। यह जानकार कि पुत्र दूसरे मकान में चला गया, पिता के रोष की अग्नि और भी भड़क उठी। “ऐ, दयानाथ और उसका दिमाग इतना फिर जाय! वह पिता का इतना निरादर करे! उस पिता का, जिसने उसके लिए दिन को दिन और रात को रात नहीं समझा ! जिसने अपने जीवन का आधार उसी को माना, और अपनी आशाओं और आबकाक्षाओं का केन्द्र उसी को समझा !!”
क्रोध का पारा बढ़ता ही गया। पिता ने स्नेह में अस्थिरता नहीं आयी, पिता के अधिकार में धक्का लगा था। सत्ता का विरोध किसी से भी सहा नहीं जाता। लोगों ने बीच में पड़कर मनाना चाहा। बड़ी-बड़ी मिन्नतें भी कीं, पर जानकीनाथ ने किसी की एक न सुनी। वे यही कहते-अभी तक दयानाथ ने पिता की गोद का सुख उठाया है, अच्छा है, अब वह जरा इस ज़िन्दगी का मज़ा भी उठा ले। ज्यों-ज्यों दिन बीतते गए, त्यों-त्यों बूढ़े के क्रोध में भी कमी होती गई। अन्त में गरम लोहे की गरमी दूर हुई और उसके दूर होने के पश्चात् उसमें ठंडक आयी। जानकीनाथ के हृदय में पश्चात्ताप का भाव उदय हुआ। वे अपने उस क्रोध पर बहुत पछताते। उस घड़ी को कोसते जब उनके मुँह से वे शब्द निकले थे। वे सोचते, मैंने बहुत बुरा किया, क्या मैं नरमी से काम नहीं ले सकता था ? जिस बच्चे पर मैं सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार था, तब कया उस प्यारे के लिए मैं अपनी जबान क़ाबू में नहीं रख सकता था ? दिन-प्रतिदिन पश्चात्ताप की यह ज्वाला जोर पकड़ती गई।
वे अपना खाना-पीना भूल गए। नींद कोसों दूर थी। घर काटने को दौड़ता था। अब पुत्र की एक-एक चीज को घंटों देखा करते। उसके चित्र को आँखों के सामने से अलग न करते और घंटों चुपचाप आँसू बहाते। इस दुःख और चिन्ता ने जानकीनाथ को बिल्कुल घुला दिया। वे सोचते, मैं कैसा पिशाच हूँ, क्या यह मेरा घर है ? कितने दिन के लिए ? मुझे घर लेकर क्या करना है ? धन लेकर क्या करना है ? सम्मान, ऐश्वर्य और अधिकारियों की प्रसन्नता मेरे किस काम आयेगी ? मैं मायाजाल में किसके लिए पड़ा था ?
जब उसी को इससे कोई लाभ नहीं पहुँच सकता तो मेरी तृष्णा व्यर्थ है। श्यामा को देखकर उन्हें कुछ धैर्य होता। वे सोचते, मेरे ही कारण दयानाथ पत्नी-वियोग का दुःख उठा रहा है। मेरा ही मन रखने के लिए वह श्यामा को यहाँ छोड़ गया है, परन्तु कभी-कभी पति और पत्नी के इस वियोग पर उन्हें दुःख भी बहुत होता । तब वे विचलित हो जाते। सोचते, उस समय यदि नम्रता सुशील लड़के को हाथ से न निकल जाने देती, तो क्या इस समय रूठा बच्चा मनाया भी नहीं जा सकता। विनय और स्नेह की धारा जोर मारतीं, परन्तु आगे बढ़कर वे मान की चट्टान से टकराकर पीछे हट जातीं। जानकीनाथ सोचते-““पिता होकर मैं अपना हाथ कैसे झुकाऊँ !”
दिन बीतते गए। जानकीनाथ की अशान्ति बढ़ती गई। एक दिन कलेक्टर साहब का एक पत्र आया। उन्होंने जानकीनाथ को इस राजभक्ति पर बधाई दी थी। जानकीनाथ ने उस पत्र को फाड़कर फेंक दिया। उसका कुछ उत्तर नहीं दिया। एक दिन पुलिस सपरिंटेंबंट उनसे मिलने आये। जानकीनाथ ने दहला भेजा-मैं बीमार हूँ।
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कुछ दिन और बीत गए। जानकीनाथ का अब एक-एक पल युग के समान कटता था। अपना अन्याय तीव्र शर के समान उनके हृदय में चुभा करता। स्वार्थपरता का मोटा परदा जो नेत्रों पर पड़ा हुआ था, अब वह हटने लगा। दयानाथ के उच्च भाव अब उनकी समझ में आने लगे। अब उनके आत्मा की वेदना और भी बढ़ने लगी। मैंने पुत्र को इसीलिए न घर से निकाला है कि वह अपने देश का कल्याण करना चाहता है, अपने जीवन को देश पर अर्पण करना चाहता है, मेरी तरह अधम स्वार्थ-सेवी नहीं बना रहना चाहता। मुझे इसके लिए अपने भाग्य को सराहना चाहिए था, किन्तु, हा अज्ञान ! हा तृष्णा ! मैंने इसके बदले में उसके साथ यह अत्याचार किया। वह मुझे अपने मन में क्या समझता होगा ! देश का द्रोही ! देश-बंधुओं का शत्रु, लंका का विभीषण ! हाँ, वह देवता है। मैं राक्षस हूँ। मैं इस योग्य नहीं कि वह मुझे अपना पिता समझे। मैंने उसके साथ अन्याय किया। घोर अन्याय! मानापमान के भाव को अलग रखकर मैं अब :ऐ मना लाऊँगा। जाकर उसके पैरों पर गिर पड़ूँगा और कहूँगा-““भगवन्, मेरा अपराध क्षमा करो, तुम्हारे वियोग में तड़प रहा हूँ, रो रहा हूँ, मेरे आँसू पोंछो, मुझे समझाओ, मेरे दिल को ढाढ़स दो ।'
संध्या का समय धा। आकाश-भवन से रूठकर जाने वाले सूर्य को मनाने के लिए तारे निकल आये थे। जानकीनाथ भी पुत्र को मनाने चले। उनका हृदय इस समय अगाध प्रेम से उमड़ा हुआ था, किन्तु ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते, लज्जा मन को पीछे खींचती | यहाँ तक कि उन्हें दयानाथ का मकान दिखाई देने लगा। दयानाथ दरवाजे पर बैठे कोई पत्र पढ़ रहे थे। जानकीनाथ के पैर बँध गये। उनके मन ने कहा-“'इस भॉति मनाकर ले जाने में तुम्हारी क्या बड़ाई है, क्या गौरव है ? इसमें सन्देह नहीं कि वह तुम्हारी बात नहीं टालेगा, किन्तु वह श्रद्धा, वह भक्ति, जो पिता के प्रति पुत्र में होनी चाहिए, फिर वह कहाँ ? नहीं, मुझे ऐसा काम करना चाहिए कि फिर वह श्रद्धा और अभिमान के वशीभूत होकर आप मेरे पास आये। अपने को मेरा पुत्र कहते हुए उसका मस्तक ऊँचा हो जाये, आँखें गौरवोन्नत्त हो जायें। यही अब मेरा कर्त्तव्य है। ईश्वर, मुझे बल दो, मेरी आत्मा को जागृति प्रदान करो ।
पिता पर पुत्र की जीत नहीं, पुत्र के भावों की जीत हुई।
एक दिन प्रातःकाल बूढ़े कहार ने आकर श्यामा से कहा-“लालाजी अपने कमरे में नहीं हैं, उनके कपड़े-जूते भी नहीं हैं। तुमको कुछ मालूम है कहाँ गये हैं ?'
श्यामा ने कहा-“मैं नहीं जानती, कहीं घूमने गये होंगे ।''
नी बजे गये और जानकीनाथ न लौटे। श्यामा ने समझा किसी अफ़सर की मुलाकात को गये होंगे। लेकिन जब दोपहर हो गयी और वे घर न आए, तो श्यामा को चिन्ता हुई। वह उनके कमरे में आयी कि देखूँ, कौन-कौन-सा सामान लेकर गये हैं। पहली चीज जिस पर उसकी दृष्टि पड़ी वह मेज पर एक पत्र था। श्यामा ने लपककर पत्र को उठा लिया और पढ़ते ही मूर्च्छित-सी हो गई। लिखा धा-“बहूजी, अब संसार से मन विरक्त हो गया है, संन्यास लेता हूँ। दयानाथ को यह सूचना दे देना और यदि वे घर न आयें तो उन्हीं के पास जाकर रहना, मैं अब घर न आऊँगा। कौन जाने, यह हमारी अंतिम मुलाक़ात हो | दयानाथ से कह देना, अपराध को क्षमा करें |”
श्यामा ने बड़ी ही ठंडी साँस खींची | उसने पति के विद्रोह को इस आशा पर सहा कि उसके ऐसा करने से समुर के हृदय में संताप की कमी होगी, और पिता-पुत्रों के फटे हुए हृदय आसानी से जुड़ जायेंगे। इस चिट्ठी ने उसकी इस आशा पर बिजली गिरा दी।
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इस घटना से दयानाथ के हृदय पर जबर्दस्त ठेस लगी। पिता के इस वैराग्य का कारण वे अपने ही को समझने लगे। वे मन-ही-मन अपना बहुत तिरस्कार करते। जानकीनाथ की खोज करने और कराने में दयानाथ और श्यामा ने कोई कमी नहीं की, परन्तु उनका कहीं भी पता नहीं लगा। खोज की असफलता से दयानाथ के मन की ग्लानि और बढ़ गई। वे बारम्बार सोचते कि यह सब कुछ मेरी अधमता का फल है। अब स्वराज्य-सभा के कामों में उनका मन न लगता। जव से उन्होंने इस मैदान में क़दम रखा था तब से उनके मन की शान्ति नष्ट हो गई थी। इसलिए इस काम से अब उनका नेह कैसे रहता ! तो भी स्वराज्य-सभा का काम पहले से कहीं उत्तम रीति से चल रहा था। पहले घन की किल्लत थी। चन्दे से जो आता था उससे बहुत से आवश्यक काम नहीं हो पाते थे। नगर के बड़े और धनवान आदमी सभा के पास फटकते तक न थे, परन्तु अब पैसे की कमी नहीं थी। हर मास पहली तारीख को सभा के मंत्री के नाम पर एक रजिस्ट्री आ जाती थी, जिसमें दो सौ रुपये के नोट होते थे। भेजने वाले के नाम के स्थान पर 'भारतदास” लिखा होता था। भेजने का स्थान कभी कोई होता और कभी कोई, किन्तु अधिकांश अवसरों में किसी तीर्थ-स्थान की मुहर होती। नोटों के साथ एक पत्र रहता था, जिसमे लिखा रहता था कि रुपया किस प्रकार खर्च किया जाये। पहले पत्र में लिखा था-कि इस रुपये से स्वराज्य की व्यवस्था पर छोटे-छोटे ट्रैक्ट निकाले जायें और उन्हें सभा में लागत भाव पर बेचें और गरीबों को मुफ्त बॉटे। दूसरे मास के पत्र में लिखा था कि इस रुपये से जिले के गाँवों में स्वराज्य के भाव का प्रचार किया जाय।
तीसरे में लिखा था कि गाँव में स्वराज्य वाचनालय स्थापित किया जाय और उनमें इस रुपये से पत्र मँगाये जायें। इसी प्रकार हर मास दो सी रुपये की रक़म आती। इन रक़मों से सभा का काम खूब बढ़ा। देश की अन्य सभाओं में इस स्वराज्य-सभा का काम अनुकरणीय माना जाने लगा। इस गुप्त सहायता से सभा के कार्यकर्ता बहुत प्रसन्न थे, परन्तु वे दाता का ठीक नाम और पता जानने के लिए बहुत उत्सुक थे। उन्होंने बहुत कोशिश की कि कुछ पता लगे, परन्तु वे विफल हुए।
कलकत्ता के एक दैनिक पत्र में गरीब देशवासियों की दशा और उनकी उन्नति के विपय में एक बड़ी ही मार्मिक लेखमाला निकल रही थी। उसके भाव इतने सरल और सरस थे, उसदी »,,4 इननी सजीव और हृदयग्राहिणी थी, गगीब देशवासियों का ऐसा सजीव और करुणाजनक चित्र खींचा गया था, और उनकी उन्नति का संदेश पहुँचाने का ऐसा साधु और मधुर ढंग बतलाया गया था कि पढ़ने वाले क॑ हृदय पर लेखक और उसके भावों के विजय की छाप लग जाती थी।
लेखक के नाम के स्थान पर लिखा रहता थ। 'भारतदास”। नगर की स्वराज्य-सभा वालों ने इस लेखमाला को पढ़ते हुए उस पत्र में एक निवेदन छपने के लिए भेज दिया कि कृपा करके 'भारतदास” महाशय अपना ठिकाना प्रकट कर दें। एक सप्ताह के पश्चात् सभा के मंत्री को पाँच सी रुपये का नोट मिला। साथ ही चिट्ठी भी थी। लिखा था-““मेरा ठिकाना बहुत बड़ा है, देश के झोंपड़े-झोंपड़े में मेरी आत्मा वास करती है। इस धन से देश के झोंपड़ों में जाकर कुछ स्वराज्य का संदेश पहुँचाओ और समझो कि मुझसे मिल रहे हो ।”
नगर की स्वराज्य-सभा के सामने आज एक बड़ी ही कठिन समस्या उपस्थित है लोकमान्य तिलक लखनऊ की कांग्रेस से लौटते समय नगर के स्टेशन से गुजरने वाले थे। कांग्रेस के अवसर पर नगर की स्वराज्य-सभा के कुछ लोगों ने मिलकर उन्हें अपने यहाँ निमंत्रित किया। उन्होंने निमंत्रण स्वीकार भी कर लिया। कल वे दोपहर को आने वाले हैं। उसी संध्या को उनका एक व्याख्यान हो जाना चाहिए क्योंकि रात को वे पूना के लिए रवाना हो जायेंगे।
लोग तिलक महाराजा ऊको निमंत्रण देने को तो दे आए थे, परन्तु उन्हें मालूम नहीं था कि आगे चलकर क्या-क्या दिककतें पड़ेंगी। इस समय तिलक महाराज के ठहरने के लिए स्थान की चिन्ता थी। लोग उनको अपने यहाँ ठहरात डरते थे। बेचारे दयानाथ नगर भर के बड़े-बड़े आदगियों से मिलते फिरे।
सभी के हाथ-पैर जोड़े, परन्तु कोई भी लोकमान्य तिलक को ठहराने के लिए तैयार न हुआ। साफ़-साफ़ इनकार किसी ने भी न किया। देशभक्ति का और देशभक्त होने का दावा किसी ने भी नहीं छोटा | हाँ, घर ख़ाली नहीं थे। कुछ मेहमान आ गये थे या भावज या साली बीमार थीं। खैर, बड़ी दौड़-धूप के बाद लोकमान्य तिलक के ठहराने के लिए तो स्थान मिल गया, परन्तु अब व्याख्यान के लिए स्थान की फ़िक्र थी। छोटे-मोटे स्थान से काम न चलता। बड़े स्थान कोई देवता न था। श्रीराम मंदिर के ट्रस्टी अपना अहाता देने के लिए राजी नहीं हुए। बड़ी मस्जिद की जमीन नहीं मिली। वनमाली बाबू का अहाता बहुत लम्बा-चौड़ा था। नगर की कुछ बड़ी सभायें उसमें हुई थीं। वनमाली बाबू पुराने ढंग के रईस थे। उन्हें इन नयी बातें से कोई सरोकार नहीं था, तो भी वे थे भले आदमी। उनकी भलमनसाहत से ही कुछ आशा थी। दयानाथ और उनके साथी दौड़े हुए उनके पास गये। पता लगा कि वनमाली बाबू शहर से बाहर गये हुए हैं।
ये लोग तो भी निराश न हुए, इन्होंने बाबू के कारिन्दों को बाबू का स्थान दिया। बोले-''हमारे लिए तो जैसे बाबू साहब, वैसे ही आप हैं। आप ही अहाते में सभा करने की आज्ञा दे दीजिये।'
कारिन्दे साहब ने निहायत संजीदगी से कहा कि जनाब, बाबू साहब होते तो क्या, नहीं होते तो क्या, आज पन्न्द्रह दिन हुए अहाता बेच दिया गया। अब भी तिनके का सहारा था। एकदम कितनी ही जबानों से निकला-'“'किसने खरीदा है ?” जवाब मिला, “ठीक-ठीक नाम तो बाबू साहब ही जानें, परन्तु मैं इतना जानता हूँ कि खरीदने वाले सज्जन यहाँ के नहीं हैं। प्रयाग से उनका पत्र-व्यवहार हुआ था।” इस बात से इन लोगों की सारी आशाओं पर पानी फिर गया।
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सभा के कार्यकर्ता बहुत चिन्तित थे। उनकी अक्ल काम नहीं करती धी कि क्या करें और क्या न करें। दयानाथ का सबसे बुरा हाल था। वे इस उलझन से और भी घबरा उठे। उन्हें आज सभा का काम असह्य हो उठा। वे आज मन-ही-मन उस घड़ी को कोसते थे, जिसमें उन्होंने इस मार्ग में पप रखा था। आज उन्हें रह-रहकर पिता की याद आती थी।
उनका मन उस व्यवहार और उसके परिणाम पर मसोस-मसोस उठता था जो उन्होंने पिता के साथ किया था। पिता की स्मृति, ग्लानि और पश्चात्ताप उनके मन को उथल-पुथल कर रही थी। वे सोचते थे, किसी तरह ये दो दिन कट जायें और मैं इस काम को अपने सिर से उतार फेंकूँ।
संध्या हो गयी, व्याख्यान के लिए स्थान नहीं मिला। दिन भर की दौड़-धूप के पश्चात् दयानाथ बड़े ही उदास मन से घर लौटे। बैठक की मेज पर लैम्प टिमटिमा रहा था। थक हुए दयानाथ लैम्प के निकट कुर्सी खिसकाकर बैठ गये। उनकी क॒हनियाँ मेज पर थीं और उनकी अधखुली उदास आँखें मन्द-मन्द टिमटिमाने वाले लैम्प पर। शरीर निश्चल था, परन्तु मन में संकल्प-विकल्पों का ताँता लगा हुआ था। सोचते- सोचते देश के लोगों की मानसिक दशा उनके सामने आ गयी। लोग कितने भीरू हैं। वे देशभक्त और देशभक्ति को अच्छा समझते हैं, परन्तु खुलकर उन्हें अच्छा कहने के लिए तैयार नहीं हैं। बड़े आदमियों का कपटाचरण और भी भयंकर है। जहाँ लाभ है, वहाँ वे देशभक्त बन जाते हैं, और जहाँ तनिक भी जोखिम है वहाँ कावा काट जाते हैं। देश की इस अधःपतित अवस्था में काम करना ही ठीक नहीं , बस, अब पिण्ड छुड़ाकर इन झगड़ों से उदासीन हो जाना ही अच्छा है। इतने में किसी आदमी की आहट पर उनका ध्यान टूटा। उन्होंने सिर उठाकर देखा तो होमरूल-लीग का चपरासी उनके सामने खड़ा था। उसने बन्दगी करके एक चिट्ठी दी। चिट्ठी सभापति की थी। लिखा था-“तुरन्त आइये, एक सुसम्बाद है और मित्र भी बैठे हैं।
दयानाथ जी सभा-भवन में पहुँचे। सभापति जी ने बड़े उत्साह से कहा-“लो भाई, स्वराज्य की जय, ईश्वर ने बेड़ा पार लगा दिया। हमें स्थान मिल जाएगा और नगर में एक बड़ा भारी काम हो जाएगा।” यह कहकर उन्होंने दयानाथजी को एक पत्र दिया। उसमें लिखा था कि “कल से मैं इसी नगर में हूँ। मुझे मालूम हुआ है, आपके इस समय लोकमान्य तिलक के व्याख्यान के लिए स्थान नहीं मिलता। अब आप स्थान की चिन्ता न कीजिए। आप वनमाली बावू के अहाते में व्याख्यान करावें। उस अहाते को पन्द्रह हजार रुपये पर मैंने नगर में एक बड़े शिल्प विद्यालय की स्थापना के लिए खरीद लिया है। आज शाम के आठ बजे सभा-भवन में, मैं आप लोगों के दर्शन भी करूँगा ।-भारतदास ।”
इस पत्र से दयानाथ को भी प्रसन्नता हुई। सभा के मभी कार्यकर्ता 'भारतदास' महाशय की प्रशंसा कर रहे थे। वे उनको देखने के लिए बेहद उत्सुक थे, इसलिए उन सभी की दृष्टि बार-बार घड़ी पर जाती थी। ठीक आठ बजे एक सज्जन ढीला-ढाला गेरुआ कुरता पहने, नंगे सिर और नंगे पाँव उस कमरे में आये। लोग खड़े हो गये। सभी की दृष्टि उनके मुखमंडल पर पड़ी। लोग चकित थे। “ऐं, ये तो लाला जानकीनाथ हैं।” क्षण भर के आश्चर्य के पश्चात् उन्होंने दुगुने प्रेम और स्वाभिमान से जानकीनाथ का “वन्देमातरम्” की ध्वनि के साथ अभिवादन किया।
दयानाथ पितृ-भक्ति और देशानुराग के मद से उन्मत्त होकर आँखों से प्रेम और सम्मान के आँसू भरे हुए बढ़े और जानकीनाथ के पैरों पर गिर पड़े। जानकीनाथ ने उन्हें उठाकर छाती से लगा लिया।
वियोग और मिलाप का सारांश
‘वियोग और मिलाप’ देशभक्ति, पारिवारिक कर्तव्य और पिता-पुत्र के वैचारिक संघर्ष व पुनर्मिलन की एक भावपूर्ण कहानी है। बाबू दयानाथ एक प्रतिभाशाली और सदाचारी युवा वकील हैं। उनके पिता लाला जानकीनाथ नगर के प्रतिष्ठित रईस, पूर्व वकील और सरकारी अधिकारियों के अत्यंत कृपापात्र हैं। जानकीनाथ अपने इकलौते पुत्र को सरकारी वकील (गवर्नमेंट प्लीडर) बनवाना चाहते हैं और इसके लिए अधिकारियों से आश्वासन भी ले चुके हैं। इसी बीच देश में होमरूल आंदोलन की लहर उठती है और दयानाथ अपने साथियों के प्रोत्साहन पर होमरूल लीग में शामिल होकर नगर के सेक्रेटरी चुन लिए जाते हैं। सभा समाप्त होते ही शहर का कोतवाल भारी पुलिस बल के साथ जानकीनाथ के दरवाजे पर आ धमकता है और पूछताछ करता है।
सरकारी अधिकारियों के कोप और पुलिस के भय से घबराकर लाला जानकीनाथ दयानाथ पर सेक्रेटरी पद से तुरंत त्यागपत्र देने का दबाव बनाते हैं। दयानाथ देश-सेवा के अपने कर्तव्य से पीछे हटने से इनकार कर देते हैं। इस पर क्रुद्ध होकर जानकीनाथ उन्हें घर से निकल जाने का आदेश दे देते हैं। दयानाथ अपनी पत्नी श्यामा से साथ चलने को कहते हैं, किंतु श्यामा अपने वृद्ध ससुर की सेवा करने और दोनों के बीच सुलह की आशा में घर में ही रुकने का निर्णय लेती है। दयानाथ अलग मकान लेकर रहने लगते हैं और पूरे उत्साह से होमरूल आंदोलन का प्रचार-प्रसार करते हैं। किंतु कुछ ही दिनों बाद पिता के अगाध स्नेह और बचपन की स्मृतियों के कारण उनका मन तीव्र वियोग और उदासी से घिर जाता है।
उधर लाला जानकीनाथ का क्रोध भी शांत होता है और वे पुत्र-वियोग की असह्य पीड़ा में जलने लगते हैं। उन्हें अपनी स्वार्थपरता, सत्ता-लोलुपता और अधिकारियों की चापलूसी पर गहरा पश्चाताप होता है। वे पुत्र को मनाने उसके घर की ओर बढ़ते हैं, किंतु मन में विचार आता है कि केवल अधिकार जताकर पुत्र को वापस लाना उचित नहीं होगा; उन्हें ऐसा आचरण करना चाहिए जिससे दयानाथ गर्व से उनका पुत्र कहलाए। इसके बाद जानकीनाथ घर पर संन्यास लेने का पत्र छोड़कर चुपचाप अंतर्धान हो जाते हैं। दयानाथ और श्यामा उनकी बहुत खोजबीन करते हैं, पर कोई सुराग नहीं मिलता। पिता के वियोग और ग्लानि से दयानाथ की अंतरात्मा विचलित हो उठती है।
इसी दौरान नगर की स्वराज्य-सभा को हर महीने पहली तारीख को ‘भारतदास’ नाम से दो सौ रुपये की गुप्त सहायता मिलने लगती है, जिससे आंदोलन का विस्तार गाँवों, पुस्तकालयों और जन-जागरण तक तेजी से होता है। साथ ही कलकत्ता के एक प्रमुख दैनिक में ‘भारतदास’ के नाम से दीन देशवासियों की दशा पर अत्यंत मार्मिक लेखमाला प्रकाशित होती है। इसके कुछ समय बाद लोकमान्य बालगंगाधर तिलक लखनऊ कांग्रेस से लौटते हुए उस नगर में अल्प प्रवास के लिए आने वाले होते हैं। किंतु पुलिस और सरकार के खौफ के कारण नगर का कोई भी धनी व्यक्ति उनके ठहरने या व्याख्यान के लिए स्थान देने को तैयार नहीं होता। दयानाथ दिन भर भटककर पूरी तरह निराश हो जाते हैं।
तभी ‘भारतदास’ का एक पत्र प्राप्त होता है कि उन्होंने लोकमान्य तिलक के व्याख्यान और एक बड़े शिल्प विद्यालय की स्थापना हेतु पंद्रह हजार रुपये में वनमाली बाबू का विशाल अहाता खरीद लिया है। शाम ठीक आठ बजे जब सभा-भवन में ढीला गेरुआ कुर्ता पहने, नंगे सिर और नंगे पाँव ‘भारतदास’ प्रवेश करते हैं, तो सब स्तब्ध रह जाते हैं—वे कोई और नहीं, बल्कि लाला जानकीनाथ ही होते हैं। पिता के इस महान राष्ट्रीय त्याग, विरक्ति और देश-समर्पण को देखकर दयानाथ पितृ-भक्ति और देशानुराग से अभिभूत होकर उनके चरणों में गिर पड़ते हैं और पिता-पुत्र का अश्रुपूर्ण पावन मिलन होता है।
प्रकाशन इतिहास
इस कहानी का प्रथम प्रकाशन हिन्दी साप्ताहिक पत्रिका प्रताप (वर्ष 4, संख्या 49, विजयदशमी अंक, सितम्बर 1917) में हुआ था। इसके पश्चात यह दैनिक हिन्दुस्तान (7 अक्टूबर 1979) में पुनर्प्रकाशित हुई। बाद में इसे सोलह अप्राप्य कहानियाँ तथा प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य (खण्ड-1) में संकलित किया गया।
महत्त्व और विषय-विमर्श
- देशप्रेम बनाम पारिवारिक निष्ठा का अंतर्द्वंद्व: दयानाथ के चरित्र के माध्यम से प्रेमचंद ने स्वतंत्रता संग्राम के दौर के शिक्षित युवाओं के आंतरिक द्वंद्व को चित्रित किया है। एक ओर पिता की आज्ञा और सरकारी वकालत का उज्ज्वल भविष्य था, तो दूसरी ओर देश-सेवा का आह्वान। दयानाथ का चयन दिखाता है कि नैतिक कर्तव्य व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर होता है।
- रूढ़िवादी राजभक्ति से उदात्त राष्ट्रीय चेतना की ओर रूपांतरण: लाला जानकीनाथ का चरित्र-विकास कहानी की मुख्य धुरी है। औपनिवेशिक अफसरों की कृपा और भौतिक संपत्ति को जीवन का चरम मानने वाला एक वृद्ध पिता, पुत्र-वियोग के पश्चाताप से गुजरकर 'भारतदास' के रूप में अपनी संपूर्ण संपत्ति और सत्ता का मोह देश-सेवा में विसर्जित कर देता है।
- औपनिवेशिक आतंक और संभ्रांत वर्ग का दोहरा चरित्र: लोकमान्य तिलक के आगमन पर नगर के बड़े-बड़े रईसों, जमींदारों और तथाकथित राष्ट्रभक्तों का पुलिस के भय से मुँह छिपाना और झूठे बहाने बनाना तत्कालीन समाज के संभ्रांत वर्ग की कायरता और छद्म देशभक्ति पर तीखा व्यंग्य करता है।
- श्यामा का विवेकशील और त्यागमय दृष्टिकोण: दयानाथ की पत्नी श्यामा का पति के साथ न जाकर अकेले वृद्ध ससुर के पास रुकने का निर्णय उसकी पारिवारिक परिपक्वता को दर्शाता है। वह समझती है कि ससुर को इस संकट में अकेला छोड़ना पारिवारिक बिखराव को स्थायी बना देगा। उसका त्याग अंततः सुलह का माध्यम बनता है।
- कहानी का व्यापक महत्त्व: 'वियोग और मिलाप' स्वतंत्रता आंदोलन (विशेष रूप से होमरूल लीग और लोकमान्य तिलक के प्रभाव) के ऐतिहासिक संदर्भ में पारिवारिक संबंधों और राष्ट्रीय चेतना के समन्वय का अनुपम दस्तावेज है। प्रेमचंद यह प्रतिपादित करते हैं कि सच्ची स्वतंत्रता और आत्म-सम्मान केवल पीढ़ीगत टकराव में नहीं, बल्कि बुजुर्गों और युवाओं के साझा राष्ट्रीय संकल्प और त्याग में ही पूर्णता पाते हैं।
