Cover Image for Apne Fan Ka Ustad (अपने फ़न का उस्ताद) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1916•35 मिनट

अपने फ़न का उस्ताद

Apne Fan Ka Ustad

प्रेमचंद की कहानी 'अपने फ़न का उस्ताद' एक संघर्षरत अभिनेता की है जो अपनी कला और चालाकी से थिएटर मैनेजर को प्रभावित कर नौकरी हासिल करता है।

पात्र:देवेन्द्र, हेम बाबू, प्रानपदपान
स्थान:रामनगर गाँव

अपने फ़न का उस्ताद का मूल पाठ

जिस जमाने का वाकिआ (किस्सा) मैं लिखना चाहता हूँ, उसके छः माह कब्ल (पहले) कलकत्ता के मशहूर अलायंस बैंक में चोरी हो गयी थी। इसमें कोई शक नहीं ' यह चोरी उसी बैंक के खजांची हरेन्द्र और उसके मआविन (सहायक) भवनचन्द्र की करतूत थी। चोरी होने के बाद ही से वे दोनों लापता थे। पुलिस ने बहुतेश सर मारा, मगर अभी तक उनका सुराग नहीं मिला।

में यूनियन थियेटर का मालिक हूँ। उस जमाने में हमारे डिरामानवीस (नाटककार) हेम बाबू ने एक नाटक 'अजमत-ए-कश्मीर' के नाम से लिखा था। हालाँकि यह उनकी पहली ही तसनीफ (कृति) थी, मगर मैं उसे खेलने पर राजी हो गया। उस वक्त मुझे यह फिक्र दामनगीर थी कि ऐसी क्‍या तरकीब करूँ कि खेल वाले दिन खूब हुजूम हो।

कई दिन सोचते-सोचते मुझे एक तरकीब सूझी, जिसे अमली सूरत में लाने के लिए में हेम बाबू से मुलाकात करने गया।

सात बजे का वक्‍त था। हेम बाबू बिस्तर से उतरकर चाय पीने बैठे थे। मुझे देखते ही आग हो गये। बड़ी रुखाई से बोले, “अब क्‍या ? फिर कही रहो-बदल करान यले हो क्या ? अगर ऐसा है तो आप सीधे रास्ते वापस जाइए। अब मैं एक लफ॒ज क्या, एक हु (अक्षर तक न बदलूँगा । आपको सौ दफा गरज हो तो मेरा नाटक खेलिए। आपको नाटक क्या दिया, अपने सर जहमत ले ली। सब कामों की एक हद होती है, मगर आपने तो हमारी नाक में दम कर दिया। हमेशा यही लगाये रहते हो कि यहाँ यूँ बना दीजिए, वहाँ से यह निकाल दीजिए। आखिर कोई कहाँ तक बरदाश्त करे। इससे तो यही बेहतर है कि आप बराहे-करम (कृपा करके) मेरी किताब वापस कर दीजिए। मैं इस खेल से बाज आया 7!

मेरी हँसी रोके न रुकती थी। मुझे हँसते देखकर हेम बाबू और भी ज़्यादा बिगरे, “जी हाँ, खूब हँसिए। हँसने में कुछ खर्च'तो होता नहीं। अ,. आपको मालूम होता कि ऐसी बातों से मुसन्निफ (लेखक) के दिल को कितना सदमा होता है, कितनी रूहानी तकलीफ (आत्मिक पीड़ा) होती है.... ।''

अबकी बार मैंने जूँ-तूँ करके हँसी रोकी और उनकी बात काटकर बोला, ' 'जनाबे-मन (मेरे श्रीमान), ठहरिए, ठहरिए ! मैं जिस काम के लिए आपकी खिदमत में हाज़िर हुआ हूँ, वह और ही काम है।'

यह सुनकर उनका गुस्सा और भी बढ़ा। झुँझलाकर बोले, “तो फिर अब तक क्‍यों नहीं कहा ? वह काम कौन-सा है ?”

“बतलाता हूँ, सुनिए। मैं चाहता हूँ कि आपका नाटक बड़ी धूमधाम से खेज़ा जाय ।”

यह सुनकर हेम बाबू ठंडे पड़े। मुस्कराकर बोले, “देखिए देवेन्द्र बाबू, कल रात को खटमलों के मारे आँख तक नहीं लगी। तबीयत बदमजा है। झुँझललाहट में अगर आपको कुछ कह-सुन दिया तो माफ कीजियेगा। हाँ तो, इस बारे में आप क्‍या तजवीज (प्रस्ताव) करते हैं ?”

मैंने जवाब दिया, “मेरी तरकीब बिलकुल अछूती है। आइए, आप और मैं काश्मोर चलकर.... ।”'

हेम बाबू ने कृता कालाम करके (बात काटकर) कहा, “कशमीर चलकर ? आप क्या कहते हैं ? कश्मीर हिन्दुस्तान की शुमाली हद (उत्तरी सीमा) पर है। क्या हम लोग इतनी दूर जायेंगे ? यह ठीक नहीं। यह गैरमुमकिन-सा मालूम होता है। कोई दूसरी तरकीब हो तो बतलाइए |”

हेम बाबू जितने ही मोटे हैं, उतने ही काहिलुलवजूद (आलसी) हैं। एक जगह से दूसरी जगह जाना उनके नजदीक मलकुल-मौत (यमदूत) के यहाँ जाने से कम नहीं। काहिली (आलस्य) ही तक नहीं, एक मुश्किल और भी थी। वह हाल ही में दूसरी शादी करके लाये थे। बुढ़ापे में उस सोलह साला नाजनीन (सुन्दरी) के पीछे दीवाने हो रहे थे। उससे एक लम्हें की जुदाई शाक्‌ (दुखद) थी। हमेशा उसके आँचल के कोने में बँधे रहना चाहते थे। कन्द-ए-मुकर्रर (दुगुना मिठास) का लुत्फ कौन नहीं जानता था। इसलिए मुझे उनके कश्मीर न जाने पर ज़रा भी तआज़्जुब नहीं हुआ। मैं तो यह पहले ही सोच चुका था और इसके लिए तैयार था।

मैंने हँसते हुए उन्हें समझाकर कहा, “अजी, आपने पूरी बात तो सुनी ही नहीं। मैं सचमुच कश्मीर चलने को थोड़े ही कहता हूँ। हम और आप किसी गाँव में चलकर तीन माह तक छुपे रहें। उधर मेरे गोयन्दे (कहने वाले) अख़बारों में ख़बर उड़ा देंगे कि यूनियन थिएटर के मालिक और 'अज़मत-ए-कशमीर' के मुसन्निफ (लेखक) दोनों कशमीर से तारीखी तसावीर (ऐतिहासिक चित्र) जमा करने के लिए साथ-साथ कशमीर गये हैं। वहाँ के रस्मो-रिवाज और मआशरत (समाज) के नज़ारे (दृश्य) फराहन (एकत्र) कर रहे हैं। इस धूमधाम से 'अजमत-ए-कशमीर' अबकी खेला जायेगा। आज तक कोई डिरामा इतनी तैयारियों से नहीं खेला गया और न अब शायद खेला जाय । नाटक क्या होगा, कशमीर की पुरफिजा (सुहानी) सैर होगी, वगैरा, वगैरा। इसके बाद वह कहेंगे कि आज दोनों सैयाह (पर्यटक) फलों पह।ड़ की चोटी पर पहुँचे, और उसका फोटो लिया। आज फल बात की तहकीक (खोज) की । आज फल ज्ञील की सैर की । आज फलों मजलिस-ए-रक्स-ओ-सरोद (नाच-गाने की सभा) में शरीक हुए और उसकी तस्वीर मय हसीनान-ए-कशमीर (कशमीर की सुन्दरियों के साथ) के उतारी। गरज रोजमर्रा अखबारों में इसी किस्म की ख़बरें शाया (प्रकाशित) की जायेंगी। तीन महीने में अच्छी हलचल हो जायेगी, और जब खेल होगा तो उस दिन सारा शहर उमड़ आयेगा। बैठने वालों को जगह न मिलेगी । नाकाम लौट जायेंगे ।”

मैंने जव नाटक के कामयावी की ऐसी शानदार तस्वीर खींची, तो हेम बाबू के चेहरे पर हल्का-हल्का तबस्सुम (मुस्कान) नज़र आया। वह तकिये के सहारे लेटे हुए मेरी बातों को बड़ी गौर से सुन रहे थे। शायद ख्याल में उन्हें शब-ए-अव्वल (पहली रात) की आमदनी के नोट और अर्र्फियों के ेर-के-ढेर नज़र आ रहे थे। बेचारे हँसी को रोकते थे, मगर वह रोके न रुकती- थी ।.जब मैं ख़ामोश हुआ तो वह खुशी से बोले,, “वाह ! बाबू साहब वाह! क्‍या तरकीब सोची है। वस अब इसमें देर न कीजिए। आपको भी परमात्मा ने क्या दकोकारस (सूक्ष्मदर्शी) अक्ल दी है। मुझे तो ख़्वाब में भी यह न सूझता।”

मैंने पूछा, “तो आप चलने को मुस्तैद हैं ?”

हेम बाबू तआज्जुब (अचम्भा) से बोले, “मैं ! वाह, आप भी क्या कहते हैं ! भला मैं कैसे चल सकता हूँ। देखिए, मुझे एक ख़ास बीमारी है। वक्तन-फुवकतन (कभी-कभी) उसका दौरा हो जाता है। आजकल तो उसने बहुत दिकु कर रखा है। मुझे कहाँ ले चलियेगा। आप अकेले ही जाइए न !”

मैंने कहा, “अकेले नहीं हो सकता। सारा खेल बिगड़ जायेगा। हम दोनों को साथ जाना चाहिए ।”

हम बाबू थांड़ी देर कुछ सोचकर बोले, “लेकिन इस काम में कोई आफृत आने का खौफ तो नहीं ? मान लो, किसी ने देख लिया तो फिर ? और यह तो बताइए, चलियेगा कहाँ ?”

मैंने जवाब दिया, “अभी इसका फैसला नहीं कर सकता। रात ही को तो यह तरकीब सूझी है, और इस वक्‍त आपसे सलाह लेने चला आया। चलना ऐसी जगह चाहिए, जहाँ कलकत्ता के बहुत थोड़े आदमी हों। छुपकर रहने के लिए जगह की कमी नहीं और न बहुत दूर ही जाना पड़ेगा। अभी उस दिन हरेन्द्र और भवन बैंक पर हाथ साफ करके गायब हुए और उनका पता नहीं । मुझे तो यकीन है कि वे करीब ही के किसी गाँव में रूपोश (छिपे हुए) हैं और इधर पुलिस सारे शहर की खाक छः रही है। हाँ, आपने रामनगर का नाम कभी सुना है ?”

“नहीं, क्‍यों ?”

“वह मुकाम जाड़े में ऐसा वीरान हो जाता है, जैसे अरब का रेगिस्तान। वहाँ नाम बदलकर रहने से किसी को हमारी ख़बर न होगी। रामनगर के पास ही एक नदी है। शाम-सवेरे आप इस नदी के किनारे टहलियेगा। इससे आपकी सेहत को भी नफा होगा ।”

“मैं बिल्कुल तन्दुरुस्त हूँ। देहात जाकर सेहत हासिल करने की ज़रूरत मुझे नहीं है, और फिर महीने-पन्द्रह दिन की बात होती तो खैर। तीन-तीन महीने ! ग़ज़ब रे गजब !”

बहुत बहस-ओ तकरार के बाद हेम बाबू ने सोचकर जवाब देने का वायदा किया। मतलब यह था कि बीवी से सलाह ले लूँ।


2

मुस्तक्बिल (भविष्य) के सब्ज बाग दिखाकर आखिर मैंने हेम बाबू को बड़ी मुश्किल से अपने साथ चलने पर राजी किया।

एक हफ्ते के अन्दर ही तमाम तैयारियाँ मुकम्मिल हो गयीं। हम लोग स्टेशन पर पहुँचे। टिकट लेकर गाड़ी में बैठने के बाद हेम बाबू ने जो मुहरमी सूरत बनायी, वह मुझे कभी नहीं भूलेगी। इतना गम तो उन्हें पहली बीवी के मरने पर भी नहीं हुआ था। बेचारे की सूरत पर तरस आता था। स्टेशन से मैंने दो अंग्रेजी अख़बार खरीद लिये थे। उन दोनों में ही हम दोनों के कशमीर जाने की बड़ी लम्बी-चौड़ी ख़बर दर्ज थी। ऐसा मालूम होता था, गोया हम लोग सचमुच कशमीर जा रहे हैं।

सफर ख़त्म हुआ। हम लोग रामनगर पहुँचे । गाव बहुत छोटा था, और सब खाली पड़ा था। हम लोगों को मकान किराये पर आसानी से मिल गया। मैंने मकान-मालिक से कह दिया कि मेरे दोस्त की सेहत ख़राब है। यहाँ हम लोग आब-ओ-हवा तबदील करने आये हैं।

पाँच-सात दिन गुजरे पर बसनन्‍्ती हवा चलने लगी। एक दिन मैंने हेम बाबू से पूषठा, “कहिए, कैसी जगह है ?'"

हेम बावू मुँह बनाकर बोले, “अरे राम-राम ! ऐसी जगह भी आदमी आते हैं ! न कोई दिलचस्पी, न तफरीह (मनोरंजन) | गाँव क्‍या है, मरघट है। बठे-बैठे जी उकता जाता है। कोई काम न काज, शाम को निठल्ले बैठे रहते हैं।'

धोड़ी देर के बाद वह फिर बोले, “कहिए, कितने दिन गुजर गये ? मेरा तो नाक में दम आ गया इस गन्दे मकान में बैठे-बैठे। मैं तो सड़ गया। कहीं ज़रा घूमने-फिरने का मौका नहीं। मैं मोटा ऐसा- वेहिसाब हूँ कि रास्ते में निकलने से लड़को से पिण्ड छुड़ाना मुश्किल हो जाता है। खैरियत इतनी है कि इस गाँव में लड़के ज़्यादा नहीं हैं। नहीं तो अब तक मैं सचमुच पागल हो जाता ।'

ये बातें मेरे लिए कुछ नयी न थीं। रोज़ ही दुखड़ा रहता था। हँसी रोककर मैंने इतना ही कहा, “हम लोगों को यहाँ आये सिर्फ तीस दिन ही हुए हैं। अभी सत्तर दिन और बाकी हैं। फिर पौवारा है, नसीब का सितारा चमकेगा |”

हेम बाबू अफ्सुर्दगी (फीकेपन) से बोले, “जी हाँ, अगर मैं उस वक़्त तक जिन्दा रहा तो। यहाँ तो एक-एक दिन कटना मुश्किल है। अगर बीच में लुढ़क गया तो वह दौलत किसके काम आयेगी ? अभी सत्तर दिन हैं। यह कहिए पूरा एक जमाना पड़ा है। नहीं मैनेजर साहब ! इससे तो यही बेहतर है कलकत्ता नौट चलिए । सच कहता हूँ, यहाँ की हवा मेरे लिए नाकाबिले-बरदाश्त हो गयी है। सेहत भी खराब हो चली है। यह भी फिक्र लगी हुई है कि वहाँ कोई मेरी सुध करके कराह रहा होगा ।'

मुझे तो मालूम ही था कि नयी बीवी से अलग रहकर हेम बाबू कभी खुश और तन्दुरुस्त नहीं रह सकते। वात टालकर बोला, “लेकिन अब कलकत्ता जाने की कौन सूरत हो सकती है ? यह सत्तर दिन तो यहाँ काटने पड़ेंगे ।””

हेम वाबू ने एक ठण्डी साँस भरी और ख़ामोश हो गये ।


3

एक दिन मैं हेम बाबू को डेरे पर छोड़कर कुछ कागज खरीदने बाजार गया था। वहाँ देखा कि दुकान के अन्दर तख़्त पर बैठा हुआ एक आदमी जोर-जोर से इस दिन का अख़बार पढ़ रहा था, और कई बेकार आदमी बैठे सुन रहे थे। मजमून था, हमारे फजी सियासत (राजनीति) का।

मैं वहाँ खड़ा ही था कि एक दुबले-पतले आदमी ने एक पैसा फेंका और चाय माँगी। पैंने दिल में सोचा कि क्‍या ऐसे फटेहाल आदमी को भी चाय का शौक होता है ? उस आदमी को अपनी तरफ पूरते देखकर मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ। बहुत सोचा, मगर याद न आया कि उसे कहाँ देखा है। यह कहने की जरूरत नहीं कि मैं घबरा गया। उसका घूरना देखकर मुझे यकीन हो गया कि मैं उसे नहीं पहचानता तो क्या, मगर वह मुझे ज़रूर पहचानता है। मेरे ख़ोफ का सबब (कारण) जाहिर था। कहीं उसने अखबारों में मेरे सफुर का हाल पढ़ा हो और मुझे यहाँ इस तरह ब यक बीनी व दो गोश (एक आँख और दो कानों से) देखकर भांडा फोड़ दे तो साग खेल बिगड़ जाये। हम लोगों की सारी पोल खुल जावेगी और आए ही कल में इस धोकेवाजी का हाल सारे मुल्क में मशहूर हो जायेगा। फिर तो हम मुँह दिखाने के लायक न रहेंगे। मारे फिक्र के मैं बदहवास हो गया। दिल में अपने को कोसने लगा।

खैर, दुकानदार को पैसे देकर मैं जल्द-जल्द कृदम बढ़ाता हुआ घर की तरफ चला। पर दो ही चार कदम चला था कि पीछे से किसी ने पुकारा, “अजी साहब ! अजी देवेन्द्र बाबू !'

मैंने पीछे फिरकर कहा, “आप भूलते हैं साहब ! मेरा नाम देवेन्द्र बाबू नहीं है।'

उसने जवाब दिया, “क्यों साहब, आप झूठ क्यों बोलते हैं ? मैं आपको खूब पहचानता हूँ। मगर उसे जाने दीजिए । बराहे करम पाँच मिनट 7*र्कर मेरी दो बातें सुन लीजिए। थिएटर में जाकर तो आपसे मुलाकात होने की नहीं।”

अब मुझे कोई शक न रहा कि यह शख्स मुझे पहचानता है। लाचार खड़ा होकर बोला, “आप मुझसे क्‍या चाहते हैं ”' े

वह कहने लगा, “मैं एक एक्टर हूँ। बचपन ही से मुझे नकल करने का शौक है। इतनी उम्र में में सभी किस्म के नाटक खेल चुका हूँ। मुझमें एक्ट करने की ख़ास लियाकृत है, मगर कोई जामिन (जमानती) न मिलने के बाइस (कारण) मुझे कलकत्ता में नौकरी न मिली । जब तक कोई मेरी सिफारिश न करे, किसी को क्यों मेरे ऊपर यकीन आयेगा! मैंने आपको इतना वक्‍त जाया (नष्ट) किया। माफ कीजिए। मेरी दरख्वास्त है कि एक बार मुझे काम देकर देखिए कि फिलवाके (यथार्थ में) मुझे खेलना आता है य; नहीं !”

उसकी बातें सुनने से यह मालूम हो गया ।क उसे अभी तक हम लोगों के कशमीर जाने की ख़बर नहीं है, मगर कौन जाने कि आधा ही घण्टे बाद यह ख़बर उससे छुपी रहेगी। समझ में न आया कि क्‍या करूँ ? अगर उसे नौकरी न दूँ तो यह जरूर लोगों से इस मुलाकात का तज़करा (चर्चा) करेगा। फिर तो मेरे लिए इस मरने का मुकाम होगा। मैंने पूछा, “'तो आप त्गौन पार्ट अच्दी तरह खेल सकते हैं ?”

शायद मारे खुशी के उसने मेरी बातों को नहीं सुना। बोला, “अजी, मैं बहुत थोड़ी तनख़्वाह पर राजी हो जाऊँगा ।”

मैंने कहा, “चलिए थोड़ी दूरी तक बातें करते चलें। अच्छा, आपको काम देने के कब्ल (पहले) एक बार आपका इम्तहान जरूरी है कि आया (क्या) आप में इस काम का माद्द भी है या नहीं। आप जानते हैं कि यूनियन थिएटर के मामूली मुलाजिम भी जरूरत पड़ने पर एक्ट कर सकते हैं, तो आपके गाँव में कोई अमेच्योर थिएटर भी नहीं है ? क्‍या कोई ठेके का काम भी नहीं मिलता ?”'

उसने ठण्डी साँस लेकर कहा, “जी नहीं। यहाँ कोई काम नहीं मिलाता, इस वजड़ से ही घर बैठा हूँ।”

“मगर आप तो नाटकों की दुनिया से इतनी दूर पड़े हुए हैं।''

“जी हाँ, इसका सबब है कि मैं तनहा नहीं हूँ। मेरी एक छोटी लड़की भी है।

“कलकत्ता में भी तो कितने ही ऐक्टर बाल-बच्चों के साथ रहते हैं।'

“जी हाँ, उनकी वैसी ही चलती भी तो है। फिर मेरे जैसा बेकार आदमी किस बूते पर जाकर कलकत्ता में रहे ? गरीब आदमी की लड़की जो देखेगा, दुत्कारेगा। मुझे सारी उम्र इस गाँव में काटनी मंजूर है, मगर अपनी लड़की को मौत के मुँह में न डालूँगा। वही मेरी सारी उम्र की कमाई है।'

“हाँ, आपका नाम क्या है ?”

“जी, मेरा नाम प्रान पदयान है।”

“तो प्रान बाबू, आपका खेल देखे बगैर तो मैं आपको काम नहीं दे सकता । आप ही सोचिए, इसमें कोई बेजा बात तो नहीं है ?”

“नहीं, बेजा क्या है ? तो आप मुझे इत्तला देंगे 2”

“हाँ, तो मैं क्या कह रहा था ? मेरे पास से आपको ख़बर मिलने में जरा देर लगेगी | 'अज़मत-ए-कशमीर' नाटक जब शुरू हो जाय तो आप एक ख़त लिखकर मुझे याद दिला दीजियेगा। मैं यहाँ कुछ अर्से तक न रहूँगा। कल सबेरे की गाड़ी से कशमीर जाऊँगा। अख़बारों में आज हम लोगों के कशमीर जाने की ख़बर निकल चुकी है। यह किसी पर जाहिर नहीं होना चाहिए कि आप आज मुझे मिले। आपकी बात मुझे याद रहेगी ।'

उसे शायद मेरी वातों का यकीन न आया वह चुपचाप खड़ा रहा, तब अफूसोसनाक लहजे में बोला, “बाबू साहब, आपने मेरे साथ जिस भलमंसी का इजहार (व्यक्त) किया है, उसका मैं मशकूर (कृतज्ञ) रहूँगा। मगर आपने मेरे साथ सुलूक क्‍या किया है ? मैं तो जूँ का तूँ फाकामस्त बना रहा ।”

“नहीं-नहीं, आप मायूस न हों। मैं बहुत जल्द आपको इत्तला दूँगा ।” मुझे नहीं मालूम था कि तकदीर की नौरंगियाँ (भाग्य की विचित्रताएँ) उस दिन उसी से दो-चार करेंगी।


4

मैंने डेरे पर आकर देखा कि हेमवाबू ख़्वाव-ए-खरगोश (गहरी नींद) में मुब्तला हैं। नाक नग्मा-सराई (गीत गाना) कर रही थी। मैंने उन्हें फौरन जगाकर कहा, “कपड़े वगैरा जल्द समेटकर तैयार हो जाएं। आज ही यहां से भागना पड़ेगा ।”

हेम बाबू ने मुतहैयर (अचम्भे में) होकर पूछा, “क्यूँ, क्या वात है ?”

“बात है मेरा सर। यहाँ एक कमबख्त छोकरा है जो मुझे पहचानता है। मैं उससे कह आया हूँ कि हम लोग आज ही कशमीर चले जायेंगे। इसी से कहता हूँ, आज चल दें कि कल वह हमें यहाँ न देख पाये ।”

हेम बाबू लेटे थे। उठ बैठे और बोले. “तो हम लोगों को कलकत्ता चलना होगा न?”

“अरे, नहीं-नहीं | यह क्यूँ मुमकिन है ? कहीं और चलेंगे।”

“क्यूँ ? हम लोग क्या चोर हैं ? अच्छा देवेन्द्र बाबू, इस तरह इधर-उधर मारे-मारे फिरने से क्या यह अच्छा न होगा कि मैं कलकत्ता लौट जाऊँ ? वहाँ मैं खूब ख़बरदारी से घर के दरवाजे बन्द करके बैठा रहूँगा। कोई पता न पा सकेगा। यह सबसे अच्छा होगा ।”

मैंने हेम बाबू की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया। इस वम्न शाम हो रही थी। घर में चारों तरफ अंधेरा छाया हुआ था। हम लोग रोशनी के इंतजार में बैठे हुए थे। थोड़ी देर के वाद एक अजनबी आदमी रोशनी लिये हुए दाखिल हुआ। उसे देखकर मैं जितना नहीं चौंका था, उसका बातें सुनकर चौंक पड़ा। हजरत कहते क्‍या हैं कि तुम लोग अलाइंस बैंक से रुपया चुराकर भागे हो। वह हजरत पुलिस के इन्स्पेक्टर थे, और हमीं लोगों के सुराग में कलकत्ता से आये थे।

हम दोनों बाहम (आपस में) एक-दूसरे की तरफ देख रहे थे। समझ लिया कि अब एक ऐसा मौका आ पड़ा है कि नाम छुपाने से काम नहीं चलेगा। मैंने हिम्मत करके इन्स्पेक्टर से कहा, “जनाब, आप भूलते हैं। मेरा नाम देवेन्द्रनाथ है। मैं यूनियन थिएटर का मालिक हूँ और आपका नाम हेमेन्द्रनाथ है। घर भी कलकत्ते में हैं। नाहक्‌ हम लोगों को दिक न कीजिए |”

उस पर हमारी बातों बातों का जरा भी असर न हुआ। मेरी स० में मेरे नाम के कार्ड थे। मैंने एक कार्ड निकालकर कहा, “पता देखिए, मेरे नाम का काड्ड है।”

इन्स्पेक्टर ने सर हिलाकर कहा, “इसमें क्या रखा है ? इसपें तो कोई खास बात नहीं जो आपको बेख़ता साबित कर दे। फिर यह कौन कह सकता है कि आपने देवेन्द्र नाम के कार्ड चुराकर नहीं लिये ? मैं यह सब बातें नहीं सुनना चाहता। आप लोग मेरे साथ आयें। मेरे सिपाही बाहर खड़े हैं। थाने में चलकर कहिए। चलिए-चलिए, उठिए ।”

यह कहकर वह मेरी तरफ बढ़ा। मैंने गुस्से से कहा, “ख़बरदार, मेरे बदन से हाथ न लगाना वरना जहन्नुम-रसोद कर दूँगा (नरक में पहुँचा दूँगा)। मैं कोई ऐसा-वैसा आदमी नहीं हूँ। मैं यूनियन थिएटर का मालिक हूँ। मुझे मामूली आदमी मत समझना। ख़ाक में मिला दूँगा। फिर पैरों पर गिरकर नाक रगड़ने “ भी चटनी किये बगैर न छोड़ूँगा।”

फिर भी वह अटल रहा। मेरी तरफ देखकर बोला, “हरिन्द्र का हुलिया बिल्कुल आपसे मिलता है। ऊँचा कद, मूँछें मुँडी हुई, पेशानी ऊँची। फिर भुवन के हुलिये में सर के बाल बढ़े हुए, उम्र पचास साल, जिस्म निहायत फरबा (मोटा), जो अलामतें (लक्षण) मुझे बतायी गयी हैं, वह सब आपके साथी साहब से मिलती हैं। फिजूल का बखेड़ा न कीजिए, चुपचाप मेरे साथ चले आइए |”

हेम बाबू गरजकर बोले, “निरा गधा है। क्यूँ रे अहमकु (मूर्ख), क्या सारे कलकत्ता में भुवन के सिवा और कोई मोटा आदमी है ही नहीं ?”

“अजी साहब, यह किसी और से जाकर पूछिए। यह न मैं जानता हूँ और न जानना चाहता हूँ।'

हेम बाबू दाँत पीसकर बोले, “में तुम्हें जताये देता हूँ, अब भी समझ जाओ। अभी कुछ नहीं बिगड़ा है। अपनी खैरियत चाहते हो तो ठण्डे-ठण्डे घर की राह लो, वरना मेरा मारा पानी भी नहीं माँगता। भुवन ही सारी दुनिया में मोटा आदमी है, यह कहाँ की मन्तिक (तर्क) है ? भुवन भी मोटा था और मैं भी जरा मोटा आदमी हूँ। बस, इसके यही मानी हैं कि मैं भुवन हूँ ?”

उसने मज़ाक में हँसकर कहा, “और इसी का क्‍या सबूत है कि आप भुवन नहीं है? अपनी बरीयत (बचाव) के सबूत में तो आपके पास बस यही एक कार्ड है न ? मगर इसका गवाह कौन है कि आप में से एक साहब देवेन्द्र बाबू हैं ? जाने दीजिए, बहुत हो गया। अब मेरे साथ चलिए। मेरे पास जाया (नष्ट) करने के लिए जरा भी वक्‍त नहीं है। आप जैसे हज़रात की वदौलत मरने की भी फुरसत नहीं ।”

मैंने कहा, “अच्छा, मैं यहाँ के किसी आदमी से साबित करा दूँ कि मै हरेन्द्र नहीं हू, तब तो फिर हम लोगों से कोई मतलब न रहेगा ?”

हेम बाबू ने अथाह नदी में सहारा पाकर पूछा, “उसी आदमी की बात है न, जिससे आज आपकी मुलाकात हुई थी ?”

इन्स्पेक्टर साहब ने कहा, “मैंने अपनी दानिस्त (जानकारी) में तो किसी आदमी को नहीं छोड़ा जिससे आप लोगों की निस्बत (सम्बन्ध में) दरयाफ़्त न किया हो ।”

मैंने जोर देकर कहा, “मगर यहाँ कम-से-कम एक आदमी ऐसा जरूर है, जो मुझसे वाकिफ है और वह भी यहाँ का नया नहीं, पुराना बाशिन्दा है।”

“खैर, उसका नाम बताइए |

मैंने कहा, “उसका नाम ? बात यह है कि मुझे उसका नाम नहीं आता है।” इस वक्‍त महज उससे गला छुड़ाने के लिए कह दिया था कि आपकी बात मुझे याद रहेगी । बहुत देर सोचने पर भी मुझे उसका नाम याद न आया तो मैंने जवाब दिया, “जनाब, उसका तो नाम याद नहीं पड़ता /'

इन्स्पेक्टर बोला, “वह तो मैं पहले ही समझ गया था कि यह सब हीलेबाजी है। अच्छा तो देर न कीजिए। फौरन मेरे साथ चलिए |!

मैंने कृता कलाम करके (बात काटकर) कहा, “नहीं-नहीं, उससे आज ही मेरी मुलाकात हुई है। नाम टोंठों पर ही है, जरा ठहरो, मैं बताता हूँ।'”

हेम बाबू मायूस होकर बैठ गये। पुलिस इन्स्पेक्टर ने कहा, “बहुत देर देख लिया, अब नहीं ठहर सकता। चलिए-चलिए, उठिए ॥”

मैंने अपने हाफजे (म्मरण-शक्ति) पर इन्तहा का जोर सर्फ किया। आखिर नाम याद आ गया। मैं उछलकर बोला, “लीजिए, लीजिए, याद आ गया। उसका नाम है प्रान पदपान।"

उसने अपने पॉकेट-बुक में यह नाम दर्ज़ कर लिया। फिर बोला, “इससे कहाँ मुलाकात होगी ?”

मैंने जवाब दिया, “मैं क्यूँकर बता सकता हूँ ? इस गाँव के किसी आदमी से जाकर पूछो और खूब समझ लो। इस गाँव के एक ऐसे आदमी का नाम बता दिया है जो मुझे पहचानता है। अब भी अपनी खैरियत चाहते हो तो उसे बुलाकर तहकीक कर लो। तुम्हारे लिए एक आफत से निजात (छुटकारा) पाने का आखिरी मौका है।”

इन्स्पेक्टर ने कहा, “अच्छा तो मैं भी आपसे कहे देता हूँ कि अगर वह' आदमी हढूँढ़ने से भी न मिला तो आपकी खैरियत नहीं है।”

उसने जँगले के पास जाकर एक छोटी-सी सीटी बजायी | उसके बाद दबी जुबान से किसी से कहा, “जाओ, यहाँ प्रानपदपान नाम का कोई आदमी है। उसे बुला लाओ और उससे पूछना कि क्या आज यूनियन थिएटर के मालिक देवेन्द्र बाबू से उसकी मुलाकात हई थी ?”

फिर वह वापिस आकर हम लोगों के पास बैठ गया। जो आदमी प्रानपद को बुलाने गया था, हम लोग उसका बड़े इज़तराब (बेचैनी) से इन्तजार कर रहे थे। उफ ! इतना वक्‍त कितनी मुश्किल से कटा। इन्स्पेक्टर बैठे-बैठे उक्‍्ताकर वाहर चला गया।

जर। देर क याद हेम बाबू बोले, “सुनते हैं कुछ ” मालूम होता है कि वह आदमी लौट आया है। यह सुनिए, वह बातें कर रहे हैं।””

कुछ मिनट और गुजर गये। इन्स्पेक्टर ने तनहा घर में आकर कहा, “प्रानपद बाबू से मेरे आदमी की मुलाकात हुई और उन्होंने भी कहा कि आज सवेरे देवेन्द्र बाबू से वह मिले थे। लेकिन इससे क्‍या हो सकता है ? आप दोनों में से कौन देवेन्द्र बाबू हैं ? यह मुझे कैसे मालूम हो ? प्रानपद बाबू बैठे अपनी लड़की को कहानी सुना रहे हैं। इस वक्‍त न आ सकेंगे। अब फिजूल देर क्यूँ की जाय। चलिए फौरन थाने में।'

आलम-ए-यास (निराश होकर) में मेरे मुँह से निकला, “या परमात्मा !” सच कहने में हर्ज ही क्या है। मुझे अब छूटने की कोई उम्मीद 4 थी। आखिरा :डारा टूट गया। मैं सरासीना (भयभीत) होकर घर में टहलने लगा। प्रानपद पर गुस्सा आता था। कमबख्त इस हालत में हम लोगों के लिये यहाँ तक आने की तकलीफ नहीं उठ” सकता। इन्स्पेक्टर ने पूछा, “उस बदमाश ने क्या कहा ?'

इन्स्पेक्टर बोला, “मेरे आदमी की जुबानी सिर्फ़ इतना ही मालूम हुआ कि वह कहता है कि जब देवेन्द्र बाबू को मेरा नाम तक याद नहीं है और वह मेरे साथ कोई भलाई नहीं कर सकते तो मैं भी क्यूँ उनकी बेगार करने जाऊँ २"

मैं बैठ गया। दुनिया तारीक (अँघेरी) नजर आने लगी। बदन में राशा-सा (कम्पन) हो रहा था। कलेजा सन-सन करता था। मेरी यह हालत देखकर इन्स्पेक्टर को भी कुछ तरस आ गया। बोला, “शायद उसके नाम एक ख्. लिखने से काम निकल जाये। आप लिखना चाहें तो मैं थोड़ी देर ठहर सकता हूँ।''

मैं मेज पर से कागज-कुलम उठाकर चिट्ठी लिखने बैठा। इन्स्पेक्टर ने रोककर कहा, “ऐसे नहीं। आप उसे कुछ सिखा दें तो मैं क्या करूँगा ? मैं बोलता हूँ, आप लिखिए। यह बेहतर होगा ।”'

मैंने लाचार होकर कहा, “अच्छा, आप ही बोलिए। क्या लिखूँ ?”

उसने कहा, “हाँ, लिखिए। जनाब मुकर्रम बन्दा तसलीम |”

“जी हाँ, लिख चुका। आगे बोलिए, आगे।”

वह बोलने लगा, “मैंने इतनी देर में अच्छी तरह समझ लिया कि आपमें एक्ट करने की बेनजीर (अद्भुत) काबलियत मौजूद है। यह जानकर आज से अपने थिएटर में एक सौ रुपये माहवार तनख़्वाह पर आपको मुलाजिम रखता हूँ। मैं जब तक थिएटर में रहूँगा, आपको मुलाजमत से बरतरफ (अलग) न करूँगा |”

में खैरियत से ख़ामोश उसकी तरफ देखने लगा। जरा देर बाद जब नातका (बोलने की शक्ति) काबू में हुआ तो मैंने उससे पूछा, “जनाब, आप कौन हैं ?”

उसने मुस्कुराकर कहा, “क्यूँ ! आपका गुलाम प्रानपदपान। वह जिसे अभी आपने सौ रुपया माहवार पर नौकर रखा है। अब इस पर दस्तख़त कर दीजिए।'

अब प्रानपद बाबू की मश्शाकी (कुशलता) पर जरा भी शुबहा न रहा। मैंने खुशी से उस पर दस्तख़त कर दिये और बोला, “बेशक आप अपने फन के उस्ताद हैं।'

प्रानपद मुस्कुराकर बोला, “अच्छा, तो आदाब-अर्ज करता हूँ। गुलाम पर नजर- ए-इनाय (कृपा-दृष्टि) रखिएगा।”

[प्रथम प्रकाशन उर्दू में। उर्दू पत्रिका “जमाना”, सितम्बर, 1916 में प्रकाशित | हिन्दी रूप इसी नाम से 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य” खण्ड-1 में संकलित ।]


अपने फ़न का उस्ताद का सारांश

कलकत्ता के 'यूनियन थिएटर' के मालिक देवेन्द्र बाबू अपने नाटककार हेम बाबू के नए नाटक 'अजमत-ए-कश्मीर' को सफल बनाने और दर्शकों में जबरदस्त उत्सुकता जगाने के लिए एक अजीब तरकीब निकालते हैं। वे हेम बाबू को समझा-बुझाकर राजी करते हैं कि दोनों किसी शांत, अनजान गाँव में तीन महीने तक छिपकर रहेंगे, जबकि कलकत्ता के समाचार पत्रों में यह झूठी खबर छपवा दी जाएगी कि नाटककार और थिएटर मालिक नाटक की ऐतिहासिक सामग्री, चित्र और शोध जुटाने के लिए कश्मीर की दुर्गम वादियों के दौरे पर गए हुए हैं। हेम बाबू स्वभाव से आलसी, मोटे और नवविवाहित होने के कारण पहले तो हिचकिचाते हैं, परंतु धन और प्रसिद्धि के लोभ में देवेन्द्र बाबू के साथ 'रामनगर' गाँव में आकर एक किराए के मकान में छिप जाते हैं।

गाँव के एकांत और नीरस जीवन से हेम बाबू बुरी तरह ऊब जाते हैं और रोज कलकत्ता लौटने की जिद करते हैं। इसी बीच एक दिन बाजार में देवेन्द्र बाबू की भेंट प्रानपदपान नामक एक स्थानीय, फटेहाल और बेरोजगार अभिनेता से हो जाती है। प्रानपद उन्हें पहचान लेता है और बताता है कि वह अभिनय में माहिर है, परंतु किसी जामिन या सिफारिश के अभाव में उसे कलकत्ता के रंगमंच पर कोई काम नहीं मिला। देवेन्द्र बाबू अपनी झूठी पोल खुलने के डर से उसे टालने की कोशिश करते हैं और जल्द नौकरी देने का झूठा आश्वासन देकर पिंड छुड़ाते हैं। इसके बाद वे पोल खुल जाने के भय से रामनगर से भी भागने की तैयारी करने लगते हैं।

उसी शाम अचानक एक रौबदार पुलिस इंस्पेक्टर उनके डेरे पर आ धमकता है। वह दावा करता है कि वे दोनों कलकत्ता के अलायंस बैंक से भारी रकम चुराकर भागे खजांची हरेन्द्र और उसके सहायक भुवन हैं, जिनका हुलिया उनसे पूरी तरह मेल खाता है। देवेन्द्र बाबू और हेम बाबू अपनी वास्तविक पहचान बताते हैं, कार्ड दिखाते हैं और चीखते-चिल्लाते हैं, लेकिन इंस्पेक्टर उन्हें गिरफ्तार कर थाने ले जाने पर अड़ जाता है। विवश होकर देवेन्द्र बाबू प्रानपदपान की गवाही का सहारा लेते हैं। इंस्पेक्टर अपने आदमी को भेजकर कहलवाता है कि प्रानपद ने आने से इनकार कर दिया है क्योंकि देवेन्द्र बाबू उसका नाम तक भूल चुके थे और उन्होंने उसकी कोई मदद नहीं की थी।

गिरफ्तारी और बदनामी के खौफ से काँपते हुए देवेन्द्र बाबू इंस्पेक्टर के कहने पर प्रानपद के नाम एक नियुक्ति-पत्र लिखने को तैयार हो जाते हैं। इंस्पेक्टर स्वयं पत्र का मजमून बोलता है, जिसमें लिखाया जाता है कि देवेन्द्र बाबू प्रानपद की अद्वितीय अभिनय कला से प्रभावित होकर उसे सौ रुपये मासिक वेतन पर थिएटर में स्थायी नौकरी देते हैं। जैसे ही देवेन्द्र बाबू उस पर हस्ताक्षर करते हैं, इंस्पेक्टर मुस्कुराता है और अपनी असली पहचान उजागर करता है—वह कोई पुलिस इंस्पेक्टर नहीं, बल्कि स्वयं प्रानपदपान ही था। देवेन्द्र बाबू उसकी स्वाभाविक और बेजोड़ अभिनय प्रतिभा के कायल हो जाते हैं और हँसते हुए स्वीकार करते हैं कि वह सचमुच 'अपने फ़न का उस्ताद' है।


प्रकाशन इतिहास

यह कहानी सर्वप्रथम उर्दू में उर्दू पत्रिका ज़माना के सितम्बर, 1916 के अंक में प्रकाशित हुई थी। बाद में इसका हिन्दी रूपांतर इसी शीर्षक से प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य (खण्ड-1) में संकलित किया गया।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • अभिनय कला की सजीवता और व्यावहारिकता: कहानी यह दर्शाती है कि सच्चा अभिनय केवल रंगमंच के मंच तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह जीवन की वास्तविक परिस्थितियों में भी सत्य का भ्रम पैदा करने की शक्ति रखता है। प्रानपदपान का रूप बदलकर पुलिस इंस्पेक्टर का सजीव अभिनय करना इसकी मिसाल है।
  • व्यावसायिक प्रचार और पाखंड पर व्यंग्य: यूनियन थिएटर के मालिक द्वारा नाटक की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए कश्मीर भ्रमण का झूठा स्वांग रचना और समाचार पत्रों में मिथ्या प्रचार करवाना कला-जगत में व्याप्त सनसनीखेज हथकंडों पर तीखा व्यंग्य है।
  • प्रतिभाशाली कलाकारों की उपेक्षा और संघर्ष: कहानी उस सामाजिक विडंबना को उजागर करती है जहाँ सिफारिश और जान-पहचान के बिना योग्य कलाकारों को अवसर नहीं मिलते। प्रानपद को अपनी योग्यता सिद्ध करने और आजीविका पाने के लिए ऐसा दुस्साहसिक स्वांग रचना पड़ता है।
  • मनोवैज्ञानिक भय और अपराध-बोध: देवेन्द्र बाबू और हेम बाबू अपने झूठ और धोखे के कारण भीतर से इतने भयभीत थे कि वे एक साधारण से वेशभूषा और अभिनय से आसानी से आतंकित हो गए। अपराध-बोध मनुष्य को तार्किक रूप से सोचने की क्षमता से वंचित कर देता है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'अपने फ़न का उस्ताद' हास्य और कौतूहल से भरपूर एक मनोरंजक कथा है, जो कला की शक्ति और कलाकार के स्वाभिमान को स्थापित करती है। यह कहानी दिखाती है कि साधनहीन और उपेक्षित कलाकार भी अपनी बुद्धिमत्ता और प्रतिभा से साधन-संपन्न धूर्तों को मात दे सकता है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "अपने फ़न का उस्ताद." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1916, https://munshipremchand.com/works/short-stories/apne-fan-ka-ustad. Accessed 22 Sep. 2026.