Cover Image for Thakur Ka Kuan (ठाकुर का कुआं) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1932•12 मिनट

ठाकुर का कुआं

Thakur Ka Kuan

प्रेमचंद की कहानी 'ठाकुर का कुआँ' गंगी की कहानी है जो अपने बीमार पति के लिए ठाकुर के कुएँ से पानी चुराने जाती है।

पात्र:गंगी, जोखू, ठाकुर
स्थान:उत्तर भारत के जातिविभाजित गाँव

ठाकुर का कुआं का मूल पाठ

जोखू ने लोटा मुँह से लगाया तो पानी में सख्त बदबू आयी । गंगी से बोला- यह कैसा पानी है ? मारे बास के पिया नहीं जाता । गला सूखा जा रहा है और तू सड़ा पानी पिलाये देती है !

गंगी प्रतिदिन शाम पानी भर लिया करती थी । कुआँ दूर था, बार-बार जाना मुश्किल था । कल वह पानी लायी, तो उसमें बू बिलकुल न थी, आज पानी में बदबू कैसी ! लोटा नाक से लगाया, तो सचमुच बदबू थी । जरुर कोई जानवर कुएँ में गिरकर मर गया होगा, मगर दूसरा पानी आवे कहाँ से?

ठाकुर के कुएँ पर कौन चढ़ने देगा ? दूर से लोग डाँट बतायेंगे । साहू का कुआँ गाँव के उस सिरे पर है, परंतु वहाँ भी कौन पानी भरने देगा ? कोई तीसरा कुआँ गाँव में है नहीं।

जोखू कई दिन से बीमार है। कुछ देर तक तो प्यास रोके चुप पड़ा रहा, फिर बोला- अब तो मारे प्यास के रहा नहीं जाता । ला, थोड़ा पानी नाक बंद करके पी लूँ ।

गंगी ने पानी न दिया । खराब पानी से बीमारी बढ़ जायगी इतना जानती थी, परंतु यह न जानती थी कि पानी को उबाल देने से उसकी खराबी जाती रहती हैं । बोली- यह पानी कैसे पियोगे ? न जाने कौन जानवर मरा है। कुएँ से मैं दूसरा पानी लाये देती हूँ।

जोखू ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा- पानी कहाँ से लायेगी ?

ठाकुर और साहू के दो कुएँ तो हैं। क्या एक लोटा पानी न भरने देंगे?

'हाथ-पाँव तुड़वा आयेगी और कुछ न होगा । बैठ चुपके से । ब्रह्म-देवता आशीर्वाद देंगे, ठाकुर लाठी मारेगें, साहूजी एक के पाँच लेंगे । गरीबों का दर्द कौन समझता है ! हम तो मर भी जाते है, तो कोई दुआर पर झाँकने नहीं आता, कंधा देना तो बड़ी बात है। ऐसे लोग कुएँ से पानी भरने देंगे ?'

इन शब्दों में कड़वा सत्य था । गंगी क्या जवाब देती, किन्तु उसने वह बदबूदार पानी पीने को न दिया ।


रात के नौ बजे थे । थके-माँदे मजदूर तो सो चुके थे, ठाकुर के दरवाजे पर दस-पाँच बेफिक्रे जमा थे। मैदानी बहादुरी का तो अब न जमाना रहा है, न मौका। कानूनी बहादुरी की बातें हो रही थीं । कितनी होशियारी से ठाकुर ने थानेदार को एक खास मुकदमे में रिश्वत दी और साफ निकल गये।कितनी अक्लमंदी से एक मार्के के मुकदमे की नकल ले आये । नाजिर और मोहतमिम, सभी कहते थे, नकल नहीं मिल सकती । कोई पचास माँगता, कोई सौ। यहाँ बेपैसे- कौड़ी नकल उड़ा दी । काम करने ढंग चाहिए ।

इसी समय गंगी कुएँ से पानी लेने पहुँची ।

कुप्पी की धुँधली रोशनी कुएँ पर आ रही थी । गंगी जगत की आड़ में बैठी मौके का इंतजार करने लगी । इस कुएँ का पानी सारा गाँव पीता है । किसी के लिए रोका नहीं, सिर्फ ये बदनसीब नहीं भर सकते ।

गंगी का विद्रोही दिल रिवाजी पाबंदियों और मजबूरियों पर चोटें करने लगा- हम क्यों नीच हैं और ये लोग क्यों ऊँच हैं ? इसलिए कि ये लोग गले में तागा डाल लेते हैं ? यहाँ तो जितने है, एक- से-एक छँटे हैं । चोरी ये करें, जाल-फरेब ये करें, झूठे मुकदमे ये करें । अभी इस ठाकुर ने तो उस दिन बेचारे गड़रिये की भेड़ चुरा ली थी और बाद मे मारकर खा गया । इन्हीं पंडित के घर में तो बारहों मास जुआ होता है। यही साहू जी तो घी में तेल मिलाकर बेचते है । काम करा लेते हैं, मजूरी देते नानी मरती है । किस-किस बात में हमसे ऊँचे हैं, हम गली-गली चिल्लाते नहीं कि हम ऊँचे है, हम ऊँचे । कभी गाँव में आ जाती हूँ, तो रस-भरी आँख से देखने लगते हैं। जैसे सबकी छाती पर साँप लोटने लगता है, परंतु घमंड यह कि हम ऊँचे हैं!

कुएँ पर किसी के आने की आहट हुई । गंगी की छाती धक-धक करने लगी । कहीं देख लें तो गजब हो जाय । एक लात भी तो नीचे न पड़े । उसने घड़ा और रस्सी उठा ली और झुककर चलती हुई एक वृक्ष के अंधेरे साये मे जा खड़ी हुई । कब इन लोगों को दया आती है किसी पर ! बेचारे महँगू को इतना मारा कि महीनो लहू थूकता रहा। इसीलिए तो कि उसने बेगार न दी थी । इस पर ये लोग ऊँचे बनते हैं ?

कुएँ पर स्त्रियाँ पानी भरने आयी थी । इनमें बात हो रही थी ।

'खाना खाने चले और हुक्म हुआ कि ताजा पानी भर लाओ । घड़े के लिए पैसे नहीं हैं।'

'हम लोगों को आराम से बैठे देखकर जैसे मरदों को जलन होती है ।'

'हाँ, यह तो न हुआ कि कलसिया उठाकर भर लाते। बस, हुकुम चला दिया कि ताजा पानी लाओ, जैसे हम लौंडियाँ ही तो हैं।'

'लौडिंयाँ नहीं तो और क्या हो तुम? रोटी-कपड़ा नहीं पातीं ? दस-पाँच रुपये भी छीन- झपटकर ले ही लेती हो। और लौडियाँ कैसी होती हैं!'

'मत लजाओ, दीदी! छिन-भर आराम करने को जी तरसकर रह जाता है। इतना काम किसी दूसरे के घर कर देती, तो इससे कहीं आराम से रहती। ऊपर से वह एहसान मानता ! यहाँ काम करते- करते मर जाओ; पर किसी का मुँह ही सीधा नहीं होता ।'

दोनों पानी भरकर चली गयीं, तो गंगी वृक्ष की छाया से निकली और कुएँ की जगत के पास आयी। बेफिक्रे चले गऐ थे । ठाकुर भी दरवाजा बंद कर अंदर आँगन में सोने जा रहे थे। गंगी ने क्षणिक सुख की साँस ली। किसी तरह मैदान तो साफ हुआ। अमृत चुरा लाने के लिए जो राजकुमार किसी जमाने में गया था, वह भी शायद इतनी सावधानी के साथ और समझ-बूझकर न गया हो । गंगी दबे पाँव कुएँ की जगत पर चढ़ी, विजय का ऐसा अनुभव उसे पहले कभी न हुआ था।

उसने रस्सी का फंदा घड़े में डाला । दायें-बायें चौकन्नी दृष्टि से देखा जैसे कोई सिपाही रात को शत्रु के किले में सुराख कर रहा हो । अगर इस समय वह पकड़ ली गयी, तो फिर उसके लिए माफी या रियायत की रत्ती-भर उम्मीद नहीं । अंत मे देवताओं को याद करके उसने कलेजा मजबूत किया और घड़ा कुएँ में डाल दिया ।

घड़े ने पानी में गोता लगाया, बहुत ही आहिस्ता । जरा भी आवाज न हुई । गंगी ने दो- चार हाथ जल्दी-जल्दी मारे ।घड़ा कुएँ के मुँह तक आ पहुँचा । कोई बड़ा शहजोर पहलवान भी इतनी तेजी से न खींच सकता था।

गंगी झुकी कि घड़े को पकड़कर जगत पर रखे कि एकाएक ठाकुर साहब का दरवाजा खुल गया । शेर का मुँह इससे अधिक भयानक न होगा।

गंगी के हाथ से रस्सी छूट गयी । रस्सी के साथ घड़ा धड़ाम से पानी में गिरा और कई क्षण तक पानी में हिलकोरे की आवाजें सुनाई देती रहीं ।

ठाकुर कौन है, कौन है ? पुकारते हुए कुएँ की तरफ आ रहे थे और गंगी जगत से कूदकर भागी जा रही थी ।

घर पहुँचकर देखा कि जोखू लोटा मुँह से लगाये वही मैला-गंदा पानी पी रहा है।


ठाकुर का कुआं का सारांश

जोखू कई दिनों से बीमार है और उसके घर के पानी में सख्त बदबू आ रही है। संभवतः उसके कुएँ में कोई जानवर गिरकर मर गया है। गंगी रोज शाम पानी भरती थी, लेकिन उस दिन पानी सड़ चुका था। बीमार और प्यासा जोखू गंदे पानी को ही नाक बंद करके पीने की कोशिश करता है, परंतु गंगी उसे रोक देती है, क्योंकि वह जानती है कि खराब पानी से उसकी बीमारी बढ़ जाएगी (हालाँकि उसे पानी उबालने का वैज्ञानिक उपाय नहीं मालूम)।

गाँव में केवल दो ही अच्छे कुएँ हैं—एक ठाकुर का और दूसरा साहू का। परंतु दलित होने के कारण जोखू और गंगी को इन कुओं से पानी लेने का अधिकार नहीं है। जोखू गंगी को चेतावनी देता है कि ठाकुर लाठी मारेंगे और साहू पाँच गुना वसूल करेगा; गरीबों का दर्द कोई नहीं समझता। लेकिन गंगी अपने बीमार पति को बदबूदार पानी पीने नहीं देना चाहती और आधी रात को ठाकुर के कुएँ से पानी चुराने निकल पड़ती है।

ठाकुर के दरवाजे पर कुछ लोग जमा होकर अपनी कानूनी चालाकियाँ और घूसखोरी की बातें कर रहे हैं। गंगी कुएँ की जगत की आड़ में छिप जाती है। उसके मन में सामाजिक विषमता और उच्च जातियों के ढोंग के प्रति विद्रोही विचार उठते हैं—कि जो लोग चोरी, जुआ, मिलावट और शोषण करते हैं, वे केवल गले में तागा धारण करने से ऊँचे कैसे हो गए?

जब ठाकुर का दरवाजा बंद होता है और सन्नाटा छा जाता है, तो गंगी अत्यंत सावधानी और भय के साथ कुएँ पर चढ़ती है। वह रस्सी से घड़ा कुएँ में डालती है और बड़ी फुर्ती से उसे ऊपर खींच लेती है। जैसे ही वह घड़े को जगत पर रखने ही वाली होती है, अचानक ठाकुर का दरवाजा जोर से खुलता है और ठाकुर "कौन है, कौन है?" पुकारते हुए बाहर आते हैं।

भयभीत होकर गंगी के हाथ से रस्सी छूट जाती है। घड़ा धड़ाम से कुएँ में गिर जाता है। गंगी जान बचाकर वहाँ से भाग खड़ी होती है। जब वह घर पहुँचती है, तो देखती है कि प्यास से व्याकुल जोखू वही गंदा और बदबूदार पानी मुँह से लगाकर पी रहा है।


प्रकाशन इतिहास

प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • जातिगत उत्पीड़न और अमानवीय छुआछूत: कहानी दर्शाती है कि कैसे जाति-व्यवस्था मनुष्य की सबसे बुनियादी ज़रूरत—पीने के पानी—तक पहुँच को रोककर दलित वर्ग का अमानवीय शोषण करती है।
  • उच्च वर्ग का नैतिक खोखलापन: गंगी के विचारों के माध्यम से प्रेमचंद ठाकुरों और साहूकारों के जुआ, चोरी, घूसखोरी और मिलावटखोरी का पर्दाफाश करते हैं, जो खुद को उच्च मानते हैं किंतु नैतिक रूप से पतित हैं।
  • दलित महिला का साहस और संघर्ष: गंगी का अपने बीमार पति के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर ठाकुर के कुएँ पर जाना और पानी चुराने का प्रयास करना उसके अदम्य साहस और समर्पण को रेखांकित करता है।
  • सामाजिक विडंबना और त्रासदी: कहानी का अंत अत्यंत मार्मिक है, जहाँ गंगी का साहस निष्फल हो जाता है और बीमार जोखू विवश होकर वही दूषित पानी पीने पर मजबूर होता है, जो सामाजिक व्यवस्था की निर्दयता को उजागर करता है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'ठाकुर का कुआं' भारतीय समाज में व्याप्त जातिवाद और मानवाधिकारों के हनन पर एक तीखा और कालजयी प्रहार है। प्रेमचंद बिना किसी उपदेश के केवल घटनाप्रवाह से पाठक के विवेक को झकझोर देते हैं।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "ठाकुर का कुआं." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1932, https://munshipremchand.com/works/short-stories/thakur-ka-kuan. Accessed 22 Sep. 2026.