Cover Image for Agar Tum Kshatriya Ho (अगर तुम क्षत्रिय हो) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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सम्पादकीय•1930•4 मिनट

अगर तुम क्षत्रिय हो

Agar Tum Kshatriya Ho

प्रेमचंद ने क्षत्रिय युवकों को ब्रिटिश अफसरों की चाटुकारिता त्यागकर दुर्बलों की रक्षा और सत्य के राष्ट्रीय संग्राम में वीरों की भांति कूदने का ओजस्वी आह्वान किया है।

Work Details

प्रकार: सम्पादकीय
वर्ष: 1930
पठन समय: 4 मिनट (533 शब्द)

तो अपने क्षत्रिय-धर्म को पालो। क्या हम तुम्हें बतावें कि क्षत्रिय-धर्म क्या है? यह तुम मुझसे कहीं ज़्यादा जानते हो। यह धर्म अपने संस्कारों के रूप में लेकर तुमने जन्म लिया है। बत्तख के बच्चे को कोई तैरना सिखाता है, या सिंह के बालक को शिकार करने की शिक्षा देनी होती है? क्या हम नौजवान क्षत्रियों से कहें, आज तुम्हारा धर्म क्या है? तुम्हारे बुजुर्गों ने किस तरह अपने धर्म का पालन किया था? क्या गरीबों को पीसकर, किसानों का गला दबाकर, छोटी-छोटी नौकरियों के लिए अफसरों की चौखट पर नाक रगड़-रगड़ कर, ज़रा-सी रियायत के लिए नीच से नीच खुशामद करके, उपाधि और पदवी के लिए अधिकारियों के सामने मत्था टेक कर ही उन्होंने धर्म का पालन किया था? कभी नहीं। वे सत्य की रक्षा में जानें लड़ा देते थे। मजाल न थी कि उनके देखते कोई बलवान किसी दुर्बल को दबा ले। उसका खून पी जाते। दीन की पुकार सुनकर उनके खून में जोश भर जाता था। हेकड़ की हेकड़ी देखकर आंखों में खून उतर आता था। उनकी वीरता अफसरों को शिकार खिलाने या उनको खुश करने के लिए, पोलो खेलने तक रिज़र्व न थी।

क्या तुम भी उसी नीति को पालोगे? जो अफसरों के स्वागत में गरीबों के पैसे उड़ाती है, जो दीनों के रक्त से अमीरों और विशेषतः अधिकारियों की दावतें करती है? नहीं, जो लोग बूढ़े हो गए हैं, जिनमें जोश नहीं, जान नहीं, मान नहीं, जिनकी नसों में अभी तक नवाबों के ज़माने की आराम-तलबी और ऐश-परस्ती भरी हुई है, उनको सलामियां करने दो, दावतें खिलाने दो, डालियां पेश करने दो, खानसामों और बेरों की नाज़बरदारियां करने दो; मगर तुम नौजवानों से हम यह आशा नहीं रखते; क्योंकि तुमने उस युग में जन्म लिया है, जब पृथ्वी के हरेक भाग में गुलामी की बेड़ियां टूट रही हैं। परम्परा के बन्धन ढीले हो रहे हैं। अन्याय एड़ियां रगड़ रहा है। सत्य और न्याय की विजय हो रही है। तुम्हारी आंखों के सामने संसार में क्या-क्या तबदीलियां हो गईं, तुम नहीं जानते? रूस की ज़ारशाही मिट गई, ईरान की कजकुलाही मिट गई, तुरकी की शाहनशाही मिट गई, चीन की ख़ाक़ानी मिट गई, जरमनी की कैसरशाही मिट गई, यहां तक कि स्पेन ने भी स्वाधीनता की सांस ली; मगर भारत कहां है? वहीं, जहां था। दीन, दुखी, दरिद्र। जानते हो क्यों? इसीलिए कि क्षत्रियों ने धर्म का पालन करना छोड़ दिया।

क्या तुम जवान होकर भी उसी बूढ़ी, खूसट, लज्जास्पद, कायरता से भरी हुई, खुशामद में डूबी हुई नीति का पालन करोगे? कभी नहीं, तुम नए युग के नाम-लेवा हो, तुम जवान हो, सजग हो, अभी नीच स्वार्थ ने तुम्हें अपने रंग में नहीं रंगा, अभी तुम्हारी कमर ने झुकना नहीं सीखा, तुम्हारे सिर ने सिजदे करना नहीं सीखा, तुममें जोश है। हमें तुमसे आशा है। तुम भारत के मुख से वह कलंक मिटा दोगे, जो आज उसे सिर नहीं उठाने देता। सत्य का संग्राम छिड़ गया है, उसमें वीरों की भांति अपने कर्तव्य का पालन करो। कौम के बनने-बिगड़ने की ज़िम्मेदारी नौजवानों के सिर होती है। यह जवान ही हैं, जो सत्य के संग्राम में पहले कदम उठाते हैं। तुम तो क्षत्रिय युवक हो, क्या हम तुम्हें बताएं कि इस समय तुम्हारा क्या धर्म है?


प्रकाशन इतिहास

[सम्पादकीय। 'हंस', नवम्बर, 1930 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-2 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "अगर तुम क्षत्रिय हो." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1930, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/agar-tum-kshatriya-ho. Accessed 22 Sep. 2026.