अभी तक तो सरकार के लिए यह कहने को गुंजाइश बाकी थी ,क इस आन्दोलन में केवल कांग्रेस के गरम दल वाले ही शामिल हैं; लेकिन दिन-दिन उस पर यह हकीकत खुलती जाती है, कि आज़ादी की लडाई में देश के सभी दल मिले हुए हैं और अगर उनके मिलने में कुछ कसर थो, तो वह सरकार की हिमाकत और पागलपन की बदोलत पूरी हुई जाती है। पुरानी कहावत है-बुरे दिन आते हैं, तो बुद्धि भी भ्रष्ट हो जाती है। इस वक्त ऐसा जान पड़ता है, कि
अंग्रेजों के बुरे दिन आ गये हैं, नहीं तो अंग्रेजी कपड़े को अन्द देशों के कपड़ों से कम महसूल पर लाने का प्रस्ताव पास करने की जरूरत ही कया थी? गैर-सरकारी बहुमत इस प्रस्ताव के विरुद्ध था; पर सरकार ने अपनी ज़िद से उसे पास करके ही छोड़ा। नतीजा क्या हुआ ! आज पं० मदनमोहन मालवीय मि० केलकर, मि० अणे, मि० हसनइमाम हमारे साथ हैं ओर व्यापारी-दल तो बिल्कुल अलग ही हो गया। अब सरकार को माडरेटों में नाम लेने के लिए दो-चार लिबरल और रह गये हैं। हमें आशा है कि उसकी कोई नई हिमाकत यह कमाल कर दिखायेगी। हालांकि लिबरलों के विषय में हमें सन्देह है कि कोई अनीति, अत्याचार इन्हें जगा सकता है। इनकी आशा अपार है, ओर धेर्य अनन्त। वायसराय सेक्रेटरी, अण्डरसेक्रेटरी , और भी जिसकी वाणी की कुछ इज़्ज़त है, कह चुके कि डोमीनियन स्टेट्स अभी बहुत दूर है; लेकिन हमारे लिबरल भाई हैं, कि उस “बहुत दूर' को ' बहुत नज़दीक ' समझने के लिए बेकरार हैं। लिबरलों की राजनीति डिनर-पार्टी और ड्राइंग-रूम तक महदूद है; इसलिए सरकार के अन्तिम आधार अगर लिबरल हों, तो यह सरकार ओर लिबरल दोनों ही क॑ लिए आपस में हाथ मिलाने और बधाइयां देने का अवसर हो सकता है। अगर इस तिनके का सहारा सरकार लेना चाहती है, तो शौक से ले, मगर सरकार ने शुरू से जिस हिन्दू-मुसलिम वैमनस्य की उपासना की है, उसे इस संकट क॑ अवसर पर केसे भूल जाती ! कहा जा रहा है, और लिखा जा रहा है कि मुसलमान इस आन्दोलन में कांग्रेस क॑ साथ नहीं हैं। मुसलमान नेता जत्थेदार बन-बनकर केद हों, मार खायें, कितनी ही कांग्रेस कमिटियों के प्रधान और मन्त्री हों, लंकिन फिर भी यही कहा जाता है कि मुसलमान कांग्रेस के साथ नहीं है। जमैयतुल-उलमा जैसा सर्वमान्य मण्डल पुकार-पुकारकर कह रहा है कि नमक का महसूल स्लापी शरीयत के खिलाफ है, पर कहने वाले कह जाते हँँ--मुसलमान इस आन्दोलन के साथ नहीं। मालूम नहीं, वह यह कह-कहकर किसे धोखा देना चाहते हैं। हां, हम यह मानने को तैयार हैं कि हमारे ख़ानबहादुर साहबान, जिनकी संख्या ईएवर की दया स, अंग्रेजों की असीम कृपा होने पर भी, बहुत ज़्यादा नहीं, बेशक हमारे साथ नहीं हैं, मगर खां साहब नहों हैं ता राय साहब भी तो नहीं हैं। यों कहिए कि यह उन लोगों का आन्दालन है, जा अपन मारे मकटो का मोचन एकमात्र स्वराज्य ही को समझत हैं। जा गरीब हैं, भखे हैं, दलित हैं, या जो गेरत से भरा हुआ, देशाभिमान से चमकता हुआ हृदय रखते है और यह देखकर जिनका खुन खोलने लगता है कि कोई दूसरा हमारे ऊपर शासन करे | इसमें न हिन्द को कैद है, न मुसलमान की। दोनों ही समान रूप से यह संकट झल रह हैं, तो दोनां समान रूप से शरीक हैं। मुसलमान आज्ञादी के प्रेम में हिन्दुओं से पीछे रह जायें, सह असम्भव है। मिस्र, ईरान अफगानिस्तान और तुर्की यह सब मुसलमानों ही के देश हैं। देखिये, अपनी आज़ादी के लिए उन्होंने क्या-क्या किया और कर रहे हैं वह कौम कभी आज़ादी के ग्विलाफ नहीं जा झ्कती। दो-चार मौलवी , दी-चार 'सर', दस- पांच ' आनरेबुल' यह हांक लगाये जायेंगे, शौक से लगावें। हिन्दू हों या मुसलमान जो अंग्रेजी राज्य में धन और अधिकार के सुख लट रहे हैं, वे अंग्रेजी सरकार के परम भक्त हैं और रहेंगे और रहना चाहिए। वे किसी के तो नामकहलप्हल बने रहें। जिसे अपने जीवन-निर्वाह के लिए अपने बाहुबल पर भरोसा नहीं है, जो अंग्रेजों की शरण आकर कोई ओहदा पा जाना अपनी जिन्दगी का निर्वाण समझता है, वह हमेशा उस पक्ष की तरफ रहेगा, जहां उसे सफलता- प्राप्ति का पूरा भरोसा है। ऐसे लोग खतरे की तरफ
भूलकर भी न आवेंगे। अमेरिका के गुलाम भी तो 'गुलामों की आज़ादी” की लड़ाई में मालिकों के पक्ष में लडे थे। ऐसी गुलाम प्रकृति के लोग हमेशा रहेंगे और उनके रहने से किसी आन्दोलन का नाश नहीं होता। मगर हमें यह कोशिश करते रहना चाहिए कि हमारी इस मुसाहल की हालत में हवा का झोंका न लगने पाये; नहीं तो वह घातक हो जायेगा। कहीं अछतों को हमसे भड़काने की कोशिश की जायेगी और की जा रही है, कहीं हिन्दु- मुसलमानों को लडा देने के मंसूबे सोचे जायेंगे। हमें इन सब चालों को तीक्र दृष्टि से देखते रहना चाहिए। क्या ज़माने की खूबी है कि जिन लोगों ने अछ॒तों को उससे कहीं ज़्यादा दलित किया है जितना कदड्रर-से-कट्टर हिन्दु-समाज कर सकता था, वह आज अछुतों के शुभचिन्तक बने हुए हैं | बेगार की सख्तियों का दोष किस पर है-हिन्दू समाज पर या सरकार पर? उन्हें अपढ रखने का दोष किस पर है-हिन्दू-समाज पर या सरकर पर? उन्हें ताडी, शराब, गांजा, चरस पिला-पिलाकर कौन रुपये कमाता है-सरकार या हिन्दु-समाज? प्रारम्भिक शिक्षा का बिल सरकार न पेश किया था, स्वर्गीय मि० गोखल ने? उसे किसने धनाभात्र का बहाना करक नामंजूर कर दिया-हिन्दू-समाज ने या सरकार ने? हमें पूरा विश्वास है कि जिस सरकार ने कितनी ही अछत जातों को जरामय- पेशा बना दिया, उसी शुभ-चिन्तना पर हमारें दलित-समाज क नेता लोग भरोसा न करेंगे। हिन्दु- समाज अपने दलित भाईयों के पर ना कर्त्तव्य समझने लगा है और वह भी दिन दूर नहीं है जब आर्य और अनार्य, ऊंच और नीच की कंद नाम को भी बाकी न रहेगी। सम्भव हे, देहातों के कट्टर हिन्दू कहीं- कहों अब भी उनक साथ वही पुराना बर्ताव करते हों, लेकिन विचारशील हिन्दू-समाज अब उस अन्याय को कायम न रहने दगा।
प्रकाशन इतिहास
[सम्पादकीय। 'हंस', अप्रैल, 1930 में प्रकाशित। 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य' खण्ड-2 में संकलित।]
