Cover Image for Judwan Bhai (जुड़वाँ भाई) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1936•10 मिनट

जुड़वाँ भाई

Judwan Bhai

प्रेमचंद की बाल-कहानी ‘जुड़वाँ भाई’ दो जुड़वाँ भाइयों की रोमांचक कथा है, जो बचपन में एक-दूसरे से बिछड़ जाते हैं और बिल्कुल अलग परिस्थितियों में पलते-बढ़ते हैं। एक भाई राजा के संरक्षण में शिक्षित और वीर शासक बनता है, जबकि दूसरा भालू द्वारा उठा लिए जाने के बाद जंगल में भालू के बच्चों के साथ बड़ा होता है। वर्षों बाद दोनों का मिलना पारिवारिक संबंध, परिवेश के प्रभाव और मनुष्य के स्वभाव की अद्भुत कथा प्रस्तुत करता है।

पात्र:जुड़वाँ भाई, माँ, किसान, राजा, भालू
स्थान:एक ग्रामीण गाँव, समीप का जंगल और राजा का महल

जुड़वाँ भाई का मूल पाठ

कभी-कभी मू्र्ख मर्द ज़रा-ज़रा-सी बात पर औरतों को पीटा करते हैं। एक गाँव में ऐसा ही एक किसान था। उसकी औरत से कोई छोटा- सा नुकसान भी हो जाता तो वह उसे बग़ैर मारे न छोड़ता । एक दिन बछड़ा गाय का दूध पी गया। इस पर किसान इतना झल्लाया कि औरत को कई लातें जमाईं । बेचारी रोती हुई घर से भागी। उसे यह न मालूम था कि मैं कहाँ जा रही हूँ। वह किसी ऐसी जगह भाग जाना चाहती थी, जहां उसका शौहर उसे फिर न पा सके।

चलते-चलते वह जंगल में पहुँच गई। पहले तो वह बहुत डरी कि कोई जानवर न उठा जे जाय, मगर फिर सोचा, मुझे क्या डर जब दुनिया में मेरा कोई अपना नहीं है, तो मुझे जीकर क्या करना है। मरकर मुसीबत से तो छूट जाऊंगी। मगर उसे कोई जानवर न मिला और वह रात को एक पेड़ के नीचे सो गई। दूसरे दिन उसने उसी जंगल में एक छोटी-सी झोपड़ी बना ली और उसमें रहने लगी । लकड़ी और फूस की कोई कमी थी ही नहीं, मूंज भी इफ़रात से थी। दिन-भर में झोपड़ी तैयार हो गयी । अब वह जंगल में लकड़ियाँ बटोरती और उन्हें आस-पास के गाँवों में बेचकर खाने-पीने का सामान खरीद लाती । इसी तरह उसके दिन कटने लगे ।

कुछ दिनों के बाद उस औरत के जुड़वाँ लड़के पैदा हुए। बच्चों को पालने-पोसने में उसका बहुत-सा वक्त निकल जाता और वह मुश्किल से लकड़ियाँ बटोर पाती। उसे अब रात को भी काम करना पड़ता । मगर इतनी मुसीबत झेलने पर भी वह अपने शौहर के घर न जाती थी । एक-दिन वह दोनों बच्चों को लिये सो रही थी। गरमी की रात थी। उसने हवा के लिए झोपड़ी का दरवाजा खुला छोड़ दिया था। अचानक रोने की आवाज़ सुनकर उसकी नींद टूट गई तो देखा कि एक बड़ा भारी भालू उसके एक बच्चे को उठाये लिये जा रहा है। उसके पीछे-पीछे दौड़ी मगर भालू जंगल में न जाने कहाँ घुस गया । बेचारी छाती पीट-पीटकर रोने लगी। थोड़ी देर में उसे दूसरे लड़के की याद आई । भागती हुई झोपड़ी में आई मगर देखा कि दूसरे लड़के का भी पता नहीं । फिर छाती पीटने लगी । ज़िन्दगी का यही एक सहारा था, वह भी जाता रहा। वह दुःख की मारी दूसरे ही दिन मर गई।

भालू उस बच्चे को ले जाकर अपनी माँद में घुस गया और उसे बच्चों के पास छोड़ दिया । बच्चे को हँसते-खेलते देखकर भालू के बच्चों को न मालूम कैसे उस पर तरस आ गया । पशु भी कभी-कभी बालकों पर दया करते हैं। यह लड़का भालू के बच्चों के साथ रहने लगा । उन्हीं के साथ खेलता, उन्हीं के साथ खाता और उन्हीं के साथ रहता । धीरे-धीरे वह उन्हीं की तरह चलने-फिरने लगा । उसकी सारी आदतें जानवरों की-सी हो गईं । वह सूरत से आदमी, मगर आदतों से भालू था और उन्हीं की बोली बोलता भी था।

अब दूसरे लड़के का हाल सुनो । जब उसकी मां उसके भाई की खोज में चली गई थी, तो झोपड़ी में एक नई बात हो गई । एक राजा शिकार खेलने के लिए जंगल में आया था और अपने साथियों से अलग होकर भूखा-प्यासा इधर-उधर भटक रहा था। अचानक यह झोपड़ी देखी, तो दरवाज़े पर आकर पुकारने लगा कि जो कोई अन्दर हो, मुझे थोड़ा-सा पानी पिला दो, मैं बहुत प्यासा हूं। मगर जब बच्चे के रोने के सिवा उसे कोई जवाब न मिला तो वह झोपड़ी में घुस आया। देखा कि एक बच्चा पड़ा रो रहा है, और यहाँ कोई नहीं है। वह बाहर निकलकर चिल्लाने लगा कि यहाँ कौन रहता है । जल्दी अओ, तुम्हारा बच्चा अकेला रो रहा है। अब कई बार पुकारने पर भी कोई नहीं आया, तो उसने समझा कि इस बच्चे की मां को कोई जानवर उठा ले गया है। राजा के कोई लड़का न था। उसने बच्चे को गोद में उठा लिया और घर चला आया। बीस वर्ष बीत गये। किसान का अनाथ बच्चा राजा हो गया। वह बड़ा विद्वान और चतुर निकला । बहादुर भी ऐसा था कि इतनी ही उम्र में उसने अपने बहुत से दुश्मनों को हरा दिया।

एक दिन नये राजा साहब शिकार खेलने गये । मगर कुछ हाथ न लगा । निराश होकर घर की ओर लौटे आ रहे थे कि इतने में उन्होंने देखा कि एक अद्भुत जानवर एक बड़े हिरन को कंधे पर लादे भागा जा रहा है ! उसकी शक्ल बिल्कुल आदमी की-सी थी । सिर, दाढ़ी, मुँछ के बाल इतने बढ़ गये थे कि उसका मुंह क़रीब क़रीब बालों से ढक गया था, उसे देखकर राजा ने फ़ौरन घोड़ा रोक लिया और उसे ज़िन्दा पकड़ने की कोशिश करने लगे। वह जानवर हिरन को ज़मीन पर रखकर राजा की ओर दौड़ा । राजा साहब शिकार खेलने में चतुर थे, उन्होंने तलवार निकाली और दोनों में लड़ाई होने लगी । आखिर वह जानवर ज़ख्मी हो गया। राजा साहब ने उसे अपने घोड़े पर लाद लिया और अपने घर लाये। कुछ दिनों तक तो वह पिंजड़े में बन्द रखा गया, फिर कभी-कभी बाहर निकाला जाने लगा। धीरे-धीरे उसकी आदतें बदलने लगी। वह आदमियों की तरह चलने लगा और आदमियों की तरह बोलने भी लगा। उसके बाल काट दिये गये और कपड़े पहिना दिये गये। देखनेवालों को अचम्भा होता था कि इस जंगली आदमी की सूरत राजा साहब से इतनी मिलती है, मगर यह किसे मालूम था कि वह राजा साहब का जुड़वां भाई है, जिसे भालू उठा ले गया था ।


जुड़वाँ भाई का सारांश

'जुड़वाँ भाई' दो बिछड़े हुए भाइयों के भिन्न-भिन्न परिवेशों में पलने-बढ़ने की मनोरंजक और संदेशप्रद बाल-कहानी है। कहानी की शुरुआत एक शोषक किसान से होती है जो छोटी-सी बात (बछड़े द्वारा गाय का दूध पी जाने) पर अपनी पत्नी को बुरी तरह पीटता है। पीड़ित पत्नी रोती हुई घर छोड़कर जंगल में चली जाती है और वहाँ लकड़ियों व फूस की झोपड़ी बनाकर रहने लगती है। वह जंगल से लकड़ियाँ बीनकर पास के गाँवों में बेचती है और अपना गुजारा करती है।

कुछ समय बाद उसके जुड़वाँ पुत्र पैदा होते हैं। बच्चों के पालन-पोषण के कारण लकड़ियाँ इकट्ठा करना कठिन हो जाता है। एक गर्मी की रात, जब झोपड़ी का किवाड़ खुला था, एक भालू उसके एक बच्चे को उठाकर ले जाता है। माँ भालू के पीछे दौड़ती है परंतु भालू जंगल में ओझल हो जाता है। जब वह रोती हुई झोपड़ी में लौटती है, तो देखती है कि दूसरा बच्चा भी गायब है। अपने जीवन के अंतिम सहारे को खोकर दुखी माँ अगले ही दिन दम तोड़ देती है।

भालू उस बच्चे को अपनी माँद में भालू के बच्चों के पास छोड़ देता है। पशु-सुलभ दया के कारण भालू के बच्चों को उस पर तरस आ जाता है और वे उसे अपना साथी बना लेते हैं। बच्चा भालुओं के साथ ही खाता, खेलता और रहता है। सूरत से मनुष्य होते हुए भी उसकी चाल-ढाल, बोली और आदतें भालुओं जैसी हो जाती हैं।

दूसरी ओर, जब माँ पहले बच्चे की खोज में गई थी, उसी समय शिकार के लिए आया एक राजा, जो प्यास के कारण झोपड़ी के पास पहुँचा था, रोते हुए दूसरे बच्चे को पाता है। कोई वारिस न होने के कारण राजा उस अनाथ बच्चे को अपने महल ले जाता है और पुत्रवत पालता है। बीस वर्षों में वह बच्चा विद्वान, चतुर और वीर राजा बन जाता है।

एक दिन शिकार पर गया युवा राजा जंगल में एक अद्भुत जंगली प्राणी को देखता है जो एक भारी हिरन को कंधे पर लादे भाग रहा है। दोनों में भिड़ंत होती है और राजा उस जंगली मनुष्य को घायल करके महल ले आता है। प्रारंभ में उसे पिंजरे में रखा जाता है, फिर धीरे-धीरे उसके बाल काटे जाते हैं, कपड़े पहनाए जाते हैं और वह मनुष्यों की तरह चलना-बोलना सीख जाता है। उसकी सूरत राजा से हूबहू मिलती है। अंततः रहस्य खुलता है कि वह राजा का ही जुड़वाँ भाई है जिसे बचपन में भालू उठा ले गया था।


प्रकाशन इतिहास

प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • पारिवारिक हिंसा और विस्थापन: घरेलू हिंसा के कारण स्त्री का घर छोड़कर जंगल जाने पर विवश होना यह दर्शाता है कि पुरुष-सत्तात्मक उत्पीड़न परिवार को छिन्न-भिन्न कर देता है।
  • परिवेश और पालन-पोषण का प्रभाव: जन्म से समान दो जुड़वाँ भाइयों में से एक को राजसी शिक्षा व सुसंस्कार मिलने पर वह योग्य शासक बनता है, जबकि दूसरा पशुओं के बीच रहकर पशुवत व्यवहार सीखता है। यह मनुष्य के विकास में सामाजिक वातावरण की केंद्रीय भूमिका को सिद्ध करता है।
  • पशु-सुलभ दया और मानवीय संवेदना: कहानी में भालू के बच्चों द्वारा मानवेतर शिशु को मार डालने के बजाय अपना साथी स्वीकार कर लेना पशुओं के भीतर भी वात्सल्य और दया के भाव को दिखाता है।
  • रोमांच और पुनर्मिलन की बाल-सुलभ रोचकता: बीस वर्षों के अंतराल के बाद जंगल में मुकाबला होना और फिर जुड़वाँ भाइयों की पहचान उजागर होना बाल-मन को रोमांचित करने वाला सुंदर कथानक रचता है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'जुड़वाँ भाई' बाल-साहित्य के माध्यम से यह महान सीख देती है कि मनुष्य का स्वभाव, ज्ञान और व्यवहार उसके वंश से अधिक उसके पालन-पोषण और वातावरण से निर्मित होता है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "जुड़वाँ भाई." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1936, https://munshipremchand.com/works/short-stories/judwan-bhai. Accessed 22 Sep. 2026.