'हंस' का एक वर्ष समाप्त हो गया। हम इसके बारह अंक निकाल सके, इसकी बधाई हमें दूसरे दें, या न दें, हम स्वयं अपने आपको बधाई दिये लेते हैं। जिन उद्देश्यों के साथ यह क्षेत्र में उतरा था, उन्हें हमने कहाँ तक पूरा किया, इसका निर्णय पाठक करें। हम तो यही कह सकते हैं कि हमने अपनी ओर से कोई ढीलापन नहीं किया। हमें आर्थिक हानि हुई, राजनैतिक दंड भी भोगना पड़ा, पर हमने हिम्मत न हारी। हम अपनी त्रुटियों को जानते हैं और यथाशक्ति उनको दूर करने की चेष्टा कर रहे हैं।
कुछ सज्जनों की सलाह है कि 'हंस' में आदि से अंत तक कहानियों के सिवाय कुछ न हो। यह प्रधान रूप से कहानियों की पत्रिका न रहकर पूर्ण रूप से हो जाय। कुछ सज्जन मुक्ता-मंजूषा और इसकी टिप्पणियों को कायम रखना चाहते हैं और पत्रिका को एकांगी नहीं बनाना चाहते। हम खुद अभी तक कुछ निश्चय नहीं कर सके। हम अपने प्रेमी पाठकों से अनुरोध करते हैं कि वह इस विषय में अपनी सम्मति प्रदान करके हमारे पथ को निश्चित कर दें। हमें इसका खेद भी है कि हम मौलिक कहानियों की संख्या और अधिक न बढ़ा सके। हम अपने नौजवान दोस्तों से आशा करते हैं कि वह अपने नये रक्त और उत्साह से साहित्य के इस अंग की पूर्ति करेंगे। हम हर एक नये लेखक को प्रोत्साहित करने को तत्पर हैं। हाँ, यह अवश्य चाहते हैं कि जो सज्जन इस मैदान में आएँ, वह एक आदर्श लेकर आएँ और साहित्य-रचना को बच्चों का खेल न समझें। पश्चिम वालों के प्रभाव में आकर हम लोग भी श्रृंगार-प्रधान कहानियाँ लिखने ही में कला का विकास समझते हैं। कुछ लोग जीवन के नग्न चित्रों को खींचना ही साहित्य का ध्येय समझ बैठे हैं, किन्तु मानव-जीवन में ऐसे अनेक भाव हैं, जिनका पाठक पर इससे कहीं अच्छा असर पड़ सकता है। मोटी बात इतनी है कि जो कुछ लिखा जाय, आत्मा से और आत्मा के लिए लिखा जाय।
पाठकों से किसी प्रकार की सहायता माँगना, हम अपना अधिकार नहीं समझते। हम जब साहित्य-क्षेत्र में आए थे तो पाठकों से पूछकर न आए थे। हमें साहित्य में एक मिशन पूरा करना था, उसे पूरा करने का प्रयत्न कर रहे हैं। पाठकों को यदि हमारे उद्देश्यों से सहानुभूति है, तो वह स्वयं हमारी सहायता करेंगे। अगर नहीं, तो हमारा कहना व्यर्थ है। हमने अपने सामने जो आदर्श रक्खा है, वह हमारा उत्साह बढ़ाता रहने के लिए काफी है। हम घाटे-नफे के कायल नहीं, जिसे ईश्वर ने जिस योग्य बनाया हो, उस कर्त्तव्य का पालन करना उसका धर्म है और धर्म व्यवसाय की वस्तु नहीं।
प्रकाशन इतिहास
[सम्पादकीय। 'हंस', जून, 1931 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-3 में संकलित।]
