Cover Image for Pariksha (परीक्षा) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1923•13 मिनट

परीक्षा

Pariksha

प्रेमचंद की 'परीक्षा' व्यक्ति के वास्तविक चरित्र को उसकी डिग्री, पद या बाहरी व्यवहार के बजाय उसके कर्मों से परखने वाली कहानी है। देवगढ़ रियासत के वृद्ध दीवान सरदार सुजानसिंह चालीस वर्ष की सेवा के बाद अवकाश लेना चाहते हैं। राजा उनसे नया दीवान चुनने को कहते हैं। सुजानसिंह ऐसी परीक्षा रखते हैं जिसमें उम्मीदवारों की डिग्री से अधिक उनके आचरण, कर्तव्य-बोध और चरित्र को देखा जाना है। उम्मीदवार एक महीने तक अपने व्यवहार को कृत्रिम रूप से अच्छा दिखाने का प्रयास करते हैं। वास्तविक परीक्षा तब होती है जब एक गरीब किसान की अनाज से भरी गाड़ी कीचड़ में फँस जाती है। अधिकांश उम्मीदवार उसकी सहायता किए बिना निकल जाते हैं, लेकिन हॉकी खेल में घायल होने के बावजूद पंडित जानकीनाथ किसान की सहायता करते हैं और गाड़ी को बाहर निकाल देते हैं। सुजानसिंह इस घटना को छिपकर देख रहे थे। वे जानकीनाथ को नया दीवान चुनते हैं क्योंकि उनके कार्य में दया, साहस, आत्मबल और उदारता का वास्तविक प्रमाण मिलता है। कहानी का संदेश है कि शिक्षा और बाहरी शिष्टाचार से अधिक महत्वपूर्ण मनुष्य का चरित्र और कठिन परिस्थिति में किया गया निःस्वार्थ कर्म है।

पात्र:सरदार सुजानसिंह, पंडित जानकीनाथ, देवगढ़ के राजा, किसान, दीवान के उम्मीदवार
स्थान:देवगढ़ रियासत, विशेष रूप से राज्य निवास, उसके मैदान और कीचड़ वाले खाई के पास की सड़क

परीक्षा का मूल पाठ

नादिरशाह की सेना ने दिल्ली में कत्लेआम कर रखा है। गलियों में खून की नदियाँ बह रही हैं। चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ है। बाजार बंद हैं। दिल्ली के लोग घरों के द्वार बंद किये जान की खैर मना रहे हैं। किसी की जान सलामत नहीं है। कहीं घरों में आग लगी हुई है, कहीं बाजार लुट रहा है; कोई किसी की फरियाद नहीं सुनता। रईसों की बेगमें महलों से निकाली जा रही हैं और उनकी बेहुरमती की जाती है। ईरानी सिपाहियों की रक्तपिपासा किसी तरह नहीं बुझती। मानव हृदय की क्रूरता, कठोरता और पैशाचिकता अपना विकरालतम रूप धारण किये हुए हैं। इसी समय नादिरशाह ने बादशाही महल में प्रवेश किया।

दिल्ली उन दिनों भोगविलास की केंद्र बनी हुई थी। सजावट और तकल्लुफ के सामानों से रईसों के भवन भरे रहते थे। स्त्रियों को बनाव-सिंगार के सिवा कोई काम न था। पुरुषों को सुख-भोग के सिवा और कोई चिंता न थी। राजनीति का स्थान शेरो-शायरी ने ले लिया था। समस्त प्रान्तों से धन खिंच-खिंचकर दिल्ली आता था और पानी की भाँति बहाया जाता था। वेश्याओं की चाँदी थी। कहीं तीतरों के जोड़ होते थे, कहीं बटेरों और बुलबुलों की पालियाँ ठनती थीं। सारा नगर विलास-निद्रा में मग्न था। नादिरशाह शाही महल में पहुँचा तो वहाँ का सामान देखकर उसकी आँखें खुल गयीं। उसका जन्म दरिद्र-घर में हुआ था। उसका समस्त जीवन रणभूमि में ही कटा था। भोगविलास का उसे चसका न लगा था। कहाँ रणक्षेत्र के कष्ट और कहाँ यह सुख-साम्राज्य। जिधर आँख उठती थी, उधर से हटने का नाम न लेती थी।

संध्या हो गयी थी। नादिरशाह अपने सरदारों के साथ महल की सैर करता और अपनी पसंद की चीजों को बटोरता हुआ दीवाने-खास में आकर कारचोबी मसनद पर बैठ गया, सरदारों को वहाँ से चले जाने का हुक्म दे दिया, अपने सब हथियार खोलकर रख दिये और महल में द़रोगा को बुलाकर हुक्म दिया- मैं शाही बेगमों का नाच देखना चाहता हूँ। तुम इसी वक्त उनको सुंदर वस्त्रभूषणों से सजाकर मेरे सामने लाओ। खबरदार, जरा भी देर न हो ! मैं कोई उज्र या इनकार नहीं सुन सकता।

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दारोगा ने यह नादिरशाही हुक्म सुना तो होश उड़ गये। वह महिलाएँ जिन पर कभी सूर्य की दृष्टि भी नहीं पड़ी कैसे इस मजलिस में आयेंगी ! नाचने का तो कहना ही क्या ! शाही बेगमों का इतना अपमान कभी न हुआ था। हा नरपिशाच ! दिल्ली को खून से रँगकर भी तेरा चित्त शांत नहीं हुआ ! मगर नादिरशाह के सम्मुख एक शब्द भी जबान से निकालना अग्नि के मुख में कूदना था। सिर झुकाकर आदाब बजा लाया और आकर रनिवास में सब बेगमों को नादिरशाही हुक्म सुना दिया; उसके साथ ही यह इत्तला भी दे दी कि जरा भी ताम्मुल न हो, नादिरशाह कोई उज्र या हीला न सुनेगा ! शाही खानदान पर इतनी बड़ी विपत्ति कभी नहीं पड़ी; पर इस समय विजयी बादशाह की आज्ञा को शिरोधार्य करने के सिवा प्राण-रक्षा का अन्य कोई उपाय नहीं था।

बेगमों ने यह आज्ञा सुनी तो हतबुद्धि-सी हो गयीं। सारे रनिवास में मातम-सा छा गया। वह चहल-पहल गायब हो गयी। सैकड़ों हृदयों से इस अत्याचारी के प्रति एक शाप निकल गया। किसी ने आकाश की ओर सहायतायाचक लोचनों से देखा, किसी ने खुदा और रसूल को सुमिरन किया; पर ऐसी एक महिला भी न थी जिसकी निगाह कटार या तलवार की तरफ गयी हो। यद्यपि इनमें कितनी ही बेगमों के नसों में राजपूतानियों का रक्त प्रवाहित हो रहा था; पर इंद्रियलिप्सा ने ‘जौहर’ की पुरानी आग ठंडी कर दी थी। सुखभोग की लालसा आत्म-सम्मान का सर्वनाश कर देती है। आपस में सलाह करके मर्यादा की रक्षा का कोई उपाय सोचने की मुहलत न थी। एक-एक पल भाग्य का निर्णय कर रहा था। हताश होकर सभी ललनाओं ने पापी के सम्मुख जाने का निश्चय किया। आँखों से आँसू जारी थे, दिलों से आहें निकल रही थीं; पर रत्न-जटित आभूषण पहने जा रहे थे, अश्रु-सिंचित नेत्रों में सुरमा लगाया जा रहा था और शोक-व्यथित हृदयों पर सुगंध का लेप किया जा रहा था। कोई केश गूँथती थी, कोई माँगों में मोतियाँ पिरोती थी। एक भी ऐसे पक्के इरादे की स्त्री न थी, जो ईश्वर पर अथवा अपनी टेक पर, इस आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस कर सके।

एक घंटा भी न गुजरने पाया था कि बेगमात पूरे-के-पूरे आभूषणों से जगमगाती, अपने मुख की कांति से बेले और गुलाब की कलियों को लजाती, सुगंध की लपटें उड़ाती, छमछम करती हुई दीवाने-खास में आकर नादिरशाह के सामने खड़ी हो गयीं।

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नादिरशाह ने एक बार कनखियों से परियों के इस दल को देखा और तब मसनद की टेक लगाकर लेट गया। अपनी तलवार और कटार सामने रख दीं। एक क्षण में उसकी आँखें झपकने लगीं। उसने एक अँगड़ाई ली और करवट बदल ली। जरा देर में उसके खर्राटों की आवाजें सुनायी देने लगीं। ऐसा जान पड़ा कि वह गहरी निद्रा में मग्न हो गया है। आध घंटे तक वह पड़ा सोता रहा और बेगमें ज्यों-की-त्यों सिर नीचा किये दीवार के चित्रों की भाँति खड़ी रहीं। उनमें दो-एक महिलाएँ जो ढीठ थीं, घूँघट की ओट से नादिरशाह को देख भी रही थीं और आपस में दबी जबान में कानाफूसी कर रही थीं- कैसा भयंकर स्वरूप है ! कितनी रणोन्मत्त आँखें हैं ! कितना भारी शरीर है ! आदमी काहे को है, देव है !

सहसा नादिरशाह की आँखें खुल गयीं। परियों का दल पूर्ववत् खड़ा था। उसे जागते देखकर बेगमों ने सिर नीचे कर लिये और अंग समेटकर भेंड़ों की भाँति एक-दूसरे से मिल गयीं। सबके दिल धड़क रहे थे कि अब यह जालिम नाचने-गाने को कहेगा, तब कैसे क्या होगा ! खुदा इस जालिम से समझे ! मगर नाचा तो न जायगा। चाहे जान ही क्यों न जाय। इससे ज्यादा जिल्लत अब न सही जायगी।

सहसा नादिरशाह कठोर शब्दों में बोला- ऐ खुदा की बंदियो, मैंने तुम्हारा इम्तहान लेने के लिए बुलाया था और अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि तुम्हारी निसबत मेरा जो गुमान था, वह हर्फ-ब-हर्फ सच निकला। जब किसी कौम की औरतों में ग़ैरत नहीं रहती तो वह कौम मुरदा हो जाती है।

देखना चाहता था कि तुम लोगों में अभी कुछ ग़ैरत बाकी है या नहीं। इसलिए मैंने तुम्हें यहाँ बुलाया था। मैं तुम्हारी बेहुरमती नहीं करना चाहता था। मैं इतना ऐश का बंदा नहीं हूँ, वरना आज भेड़ों के गल्ले चराता होता। न इतना हवसपरस्त हूँ, वरना आज फारस में सरोद और सितार की ताने सुनता होता, जिसका मजा मैं हिंदुस्तानी गाने से कहीं ज्यादा उठा सकता हूँ। मुझे सिर्फ तुम्हारा इम्तहान लेना था। मुझे यह देखकर सच्चा मलाल हो रहा है कि तुममें ग़ैरत का जौहर बाकी न रहा। क्या यह मुमकिन न था कि तुम मेरे हुक्म को पैरों तले कुचल देतीं ? जब तुम यहाँ आ गयीं तो मैंने तुम्हें एक और मौका दिया। मैंने नींद का बहाना किया। क्या यह मुमकिन न था कि तुममें से कोई खुदा की बंदी इस कटार को उठाकर मेरे जिगर में चुभा देती। मैं कलामेपाक की कसम खाकर कहता हूँ कि तुम में से किसी को कटार पर हाथ रखते देखकर मुझे बेहद खुशी होती, मैं उन नाजुक हाथों के सामने गरदन झुका देता ! पर अफसोस है कि आज तैमूरी खानदान की एक बेटी भी यहाँ ऐसी नहीं निकली जो अपनी हुरमत बिगाड़ने पर हाथ उठाती ! अब यह सल्तनत जिंदा नहीं रह सकती। इसकी हस्ती के दिन गिने हुए हैं। इसका निशान बहुत जल्द दुनिया से मिट जाएगा। तुम लोग जाओ और हो सके तो अब भी सल्तनत को बचाओ वरना इसी तरह हवस की गुलामी करते हुए दुनिया से रुखसत हो जाओगी।


परीक्षा का सारांश

यह कहानी नादिरशाह के दिल्ली पर आक्रमण और मुग़ल साम्राज्य के पतन की पृष्ठभूमि पर आधारित है। नादिरशाह की सेना दिल्ली में कत्लेआम और लूटपाट मचा रही है। तात्कालिक दिल्ली भोग-विलास, शेरो-शायरी और आडंबर में डूबी हुई थी, जहाँ वीरता और आत्म-सम्मान का लोप हो चुका था। नादिरशाह शाही महल के ऐश्वर्य को देखकर चकित रह जाता है। शाम के समय दीवाने-खास में बैठकर वह दरोगा को आदेश देता है कि शाही बेगमों को सुंदर वस्त्रों और आभूषणों से सजाकर उसके सामने नाचने के लिए प्रस्तुत किया जाए।

दारोगा से यह हुक्म पाकर रनिवास में हड़कंप मच जाता है। यद्यपि कई बेगमों की नसों में राजपूतानियों का रक्त प्रवाहित हो रहा था, किंतु विलासिता ने उनके आत्म-सम्मान और 'जौहर' की भावना को समाप्त कर दिया था। कोई भी स्त्री इस अत्याचारी की आज्ञा का उल्लंघन करने या प्रतिकार करने का साहस नहीं जुटा पाती। एक घंटे के भीतर बेगम आभूषणों और इत्र की सुगंध से जगमगाती हुई नादिरशाह के सामने उपस्थित हो जाती हैं।

नादिरशाह मसनद पर लेट जाता है और अपनी तलवार तथा कटार सामने रखकर गहरी नींद में सोने का नाटक करता है। आधे घंटे तक बेगम सिर नीचा किए चुपचाप खड़ी रहती हैं। सहसा नादिरशाह उठ बैठता है और प्रकट करता है कि उसने बेगमों का नाच देखने के लिए नहीं, बल्कि उनके आत्म-सम्मान (ग़ैरत) की परीक्षा लेने के लिए उन्हें बुलाया था। वह दुख व्यक्त करता है कि जब किसी कौम की स्त्रियों में स्वाभिमान नहीं बचता, तो वह कौम मृतप्राय हो जाती है।

नादिरशाह बताता है कि उसने सोने का ढोंग इसलिए किया था कि यदि उनमें ज़रा भी ग़ैरत बाकी होती, तो कोई भी बेगम कटार उठाकर उसके सीने में घोंप देती और अपने आत्म-सम्मान की रक्षा करती। यदि कोई ऐसा करती, तो वह खुशी से अपना सिर झुका देता। किंतु तैमूरी घराने की एक भी स्त्री ने अपनी मर्यादा के लिए हाथ नहीं उठाया। नादिरशाह चेतावनी देता है कि विलासिता की गुलाम बन चुकी इस सल्तनत के दिन अब गिने-चुने रह गए हैं और इसका पतन निश्चित है।


प्रकाशन इतिहास

प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • आत्म-सम्मान और राष्ट्रीय चेतना की परीक्षा: कहानी में नादिरशाह का व्यवहार यह परखने के लिए था कि पराजित कौम में स्वाभिमान और प्रतिरोध की चेतना शेष है या नहीं। बेगमों का मौन समर्पण यह सिद्ध करता है कि कौम का स्वाभिमान समाप्त हो चुका है।
  • भोग-विलास का विनाशकारी प्रभाव: विलासिता और सुख-भोग की अत्यधिक लालसा मनुष्य तथा समाज के आत्म-सम्मान और साहस को नष्ट कर देती है। दिल्ली का समाज कला और विलास में डूबा था, जिसके कारण संकट के समय उनमें वीरता का अभाव दिखा।
  • नारीत्व की गरिमा और प्रतिकार की अपेक्षा: नादिरशाह स्वयं यह अपेक्षा करता है कि अपनी मर्यादा पर आँच आने पर नारियों को अत्याचारी का प्रतिकार (कटार से प्रहार) करना चाहिए था। प्रतिकार न करना पराधीनता की चरम सीमा को दर्शाता है।
  • साम्राज्य के पतन का नैतिक कारण: मुग़ल साम्राज्य का पतन केवल सैन्य कमजोरी के कारण नहीं, बल्कि नैतिक पतन, चरित्रहीनता और आत्म-सम्मान के लोप के कारण हुआ। नादिरशाह का यह निष्कर्ष ऐतिहासिक और नैतिक सत्य को रेखांकित करता है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'परीक्षा' स्वाभिमान, राष्ट्रीय चेतना और नैतिक पतन के परिणामों पर प्रकाश डालने वाली एक विचारोत्तेजक कहानी है। प्रेमचंद नादिरशाह के माध्यम से यह शाश्वत संदेश देते हैं कि जिस समाज या राष्ट्र में अपनी मर्यादा और स्वाभिमान की रक्षा के लिए संघर्ष करने का साहस नहीं बचता, उसका विनाश अवश्यंभावी है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "परीक्षा." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1923, https://munshipremchand.com/works/short-stories/pariksha. Accessed 22 Sep. 2026.