Cover Image for Barat (बारात) by Munshi Premchand - Short Story
Cover Image for Barat (बारात) by Munshi Premchand - Short Story
कहानी•1934•19 मिनट

बारात

Barat

प्रेमचंद की कहानी 'बारात' दांपत्य जीवन के मनमुटाव, सामाजिक रूढ़ियों और अहम् के टकराव के कारण घटी एक भयानक त्रासदी की कहानी है।

पात्र:देवकीनाथ, फूलवती
स्थान:एक भारतीय नगर की सड़क

बारात का मूल पाठ

आज बाबू देवकीनाथ अपनी पंद्रह साल की ब्याहता बीवी को छोड़कर नयी शादी करने जा रहे हैं। अजीजों-अकरिबा (रिश्तेदार, निकट संबंधी) जमा हैं। मगर कोई यह पूछने की जहमत गवारा नहीं करता कि आखिर इस बेकस पर इतना इताब (को+५' क्‍यों है ? बाबू देवकीनाथ से क्‍यों बुरे बनें ? दरवाजे पर नौबत झड़ रही है। अंदर मस्तूरात (स्त्रियां) ब्याह के गीत गा रही हैं। नौकर-चाकर खुशरंग वर्दियां पहने इधर-उधर दौड़ रहे हैं। बराती असहाब (लोग) अपनी-अपनी ऐयाइश (साज-सज्जा) में मयरूफ़ (व्यस्त) हैं। मगर इस शादी के साथ एक अजीज जान का खून हो रहा है, इसकी किसी को परवाह नहीं।

आज पंद्रह साल हुए जब देवकीनाथ की शादी फूलवती से हुई थी। फूलवती हसीन थी। बातमीज (सुसंस्कृत, अच्छे स्वभाव वाली) थी। शीरींदहन (प्रिय मुखवाली, मधुभाषी) थी। तालीमयाफ़्ता थी। देवकीनाथ भी नेक अवतार (शिष्ट आचरण वाले), मुस्तकिल (स्थिर स्वभाव), रोशन ख़याल। मगर पहले ही दिन दुलहा-दुल्हन में कुछ ऐसी बदमजगी (मनमुटाव) पैदा हुई कि दोनों में एक ख़लीज हायल , गीषण खाड़ी हो गई) हो गई। और जमाने के साथ-साथ वह खलीज वसीअ (विस्तृत) होती चली गई। यहां तक कि आज देवकीनाथ नयी शादी करने पर आमदा हो गए।

और इस बदमजगी का बाअस क्या था ? मआशरती मामलात (सामाजिक) में इख्तेलाफ़ (विरोध)। देवकीनाथ पुरानी तहजीब के क्रायल थे। फूलवती नयी रोशनी की दिलदादा (अनुरक्‍्त)। पुरानी तहजीब परदा चाहती है। तहम्मुल (सहनशीलता) और सत्र चाहती है। नयी रोशनी आजादी चाहती है। ऐजाज (सम्मान) चाहती है। हुकूमत चाहती है। देवकीनाथ चाहते हैं फूलवती मेरी मां की खिदमत करे ! बगैर इजाजत घर से क़दम न निवाले। लंबा-सा घूंघट निकालकर चले। फूलवती को इन बातों में से एक भी पसंद न थी। दोनों में मुबाहिसे हुए। सख्त कलामियों (कु भाषण) की नौबत आई। शुक्र रंजी हुई। मियां ने बीवी के मैके वालों की तहकीर (अपमान) की। बीवी ने तुर्की-ब-तुर्की जवाब दिया। मियां ने डांट बताई | बीवी ने मैके की राह ली। मैका भी दूर न था। दस मिनट में घर जा पहुंची । महीनों तक दोनों खिंचे रहे। फिर फूलवती मनाई गई। ससुराल आई। मगर दो ही चार दिन में वही क़िस्से शुरू हो गये। न देवकीनाथ अपने अमल की इस्लाह (सुधार। कर सकते थे, » फूलवती अपने तर्जे-अमल की | अबके बरसों बोलचाल बंद रही । आखिर अहबाब के समझाने से देवकीनाथ तीसरी बार बीवी को मना लाए। मगर अबके मामलात ने कुछ ऐसा तूल खींचा कि दायमी मुफ़ारक़त (स्थायी पृथकता) हो गई। न उन्होंने बुलाया, न वह आई, और आज मियां शौहर नयी शादी रचाकार अपने दिल की आग बुझा रहे हैं। क्या फूलवती के लिए भी यही आजादी है ? क्या उसे यह आजादी होती, तो देवकीनाथ को नयी शादी ठानने का हौसला होता ?

देवकीनाथ की मां संदूक में जेबरों को सजा रही हैं। नयी बहू की खुशी में मतवाली हो रही हैं। इस पर सुन लिया है कि बहू होशियार है। खिदमत-गुजार है। शर्मीली है फिर क्या पूछना ! उस लक्ष्मी के आते ही घर की रौनक ही कुछ और हो जाएगी। पड़ोसिनें उसे चिढ़ाने को कहती हैं, “नयी बहूजी पढ़ी-लिखी तो खूब होंगी?”

सासजी मुंह बनाकर कहती हैं, “मुझे मेमसाहब की जरूरत नहीं । मैं दरगुज़री ऐसी पढ़ी-लिखी से। मुझे अब गंवांरा बहू चाहिए।'

दरवाजे पर मुंशीजी आकर बोले, “भई, जल्दी करो। गाड़ी छूट जाएगी। फिर कोई दूसरी साइत नहीं है।”

सास- कहती है, “आप अपना काम देखिए। मुझे कोई देर नहीं है। दर्जी को बुलवा दीजिए। नौशा को कपड़े पहना दे।”

दर्जी ने आकर जोड़ा पहनाया। माली ने आकर सेहरा बांधा । चमार ने आकर जूती पहनाई। फूफाजी पगड़ी संवार गये । बुआजी ने आकर आंखों में क़ाजल लगाया । मामाजी ने आकर बंदनवार बांध दी। दूल्हा आदमी से बंदर वन गया। पैंतालीस साल की उम्र। कुछ-कुछ बालों में सफ़ेदी आ चली थी। दो-चार दांत भी जवाब दे चुके थे। चेहरे पर झुर्रियां पड़ी हुई मगर वजा (सज-धज) ऐसी गोया अभी उन्फुवाने-शबाब (जवानी) है।


2

इधर फूलवती के बाप को ख़बर मिली। दरिया-ए-तफ़क्कुर (चिंता-समुद्र) में डूब गये। पहले से ख़बर होती, तो हाथ-पांव मारते । मगर अब तो बारात जाने को तैयार है। इस तंग वक़्त में वह क्या कर सकते हैं ? सोच रहे थे-हम लोगों से तो नीची जातें ही अच्छी हैं। उनको कम-से-कम बिरादरी का तो खौफ़ है। हम लोगों ने तो बेगैरती पर कमर बांध ली है। हाय । फूलवती को मालूम होगा तो उसकी कया हालत होगी ! आज पंद्रह साल गुजर गये, उसे आराम मिला ? बेवाओं की जिंदगी बसर कर रही हैं। उस पर यह नया सदामा ! यह नयी चोट उससे क्योंकर बर्दाश्त होगी ?

फूलवती उन आन पर जान देने वाली औरतों में से थी, जो दिल में एक बात ठानकर फिर पीछे हटना नहीं जानतीं। अगर वह जरा-सा भी दब सकती तो उसकी जिंदगी आराम से कट जाती। लेकिन पंद्रह साल की बेएतनाई (उदासीनता) भी उसकी खुद्दारी पर फ़तह न पा सकी। उसे ज्यूं ही यह ख़बर मिली, उसने दिल में तय कर लिया कि यह शादी मेरे जीते-जी नहीं होगी। हर्गिज नहीं होगी ! वह नयी बहू के साथ जिंदगी की बहार नहीं उड़ा सकते । अगर मैं रो-रोकर जिंदगी के दिन पूरे कर रही हूं तो तुमको भी यूं ही जलते रहना पड़ेगा। तुम मेरी छाती पर मूंग नहीं दल सकते। उसने घर में किसी से कुछ न कहा। वालिद को भी ख़बर न दी। आहिस्ता से घर से निकली। एक तांगा किराये पर लिया और ससुराल चली। रास्ते में सोचती जाती थी, आज इस जिंदगी का आखिरी फैसला करूंगी। दिखला दूंगी कि आज भी हिन्दुस्तान में ऐसी औरतों हैं जो अपनी बात के लिए हंसते-हंसते जान दे देती हैं। वे ऐश-आराम के लिए जिंदा नहीं रहतीं, बल्कि अपने धरम को पालने के लिए। उसकी हालत बिल्कुल दीवानों की-सी हो गई थी। कभी आप ही आप हंसती, कभी आप ही आप रोती। न जाने क्या बकती जाती थी। इसी बेहोशी के आलम में शौहर के मकान से बहुत दूर निकल गई। जब होश आया, तो तांगे वाले से पूछो, “यह कौन-सा मुहल्ला है ?”

बोला-“यह कटरा है।”

“वाह ! तुम यहां कहां आ गये ! मुझे तो सब्जीमंडी जाना है।”

“तो आपने पहले क्‍यों न कहा ? उसी तरफ से तो आया हूं। क्या आपको घर मालूम नहीं ?!

“मुझे ख़याल न था।”

“क्या सो गई थीं ? मुझे इतना चक्कर पड़ा ।

“बक-बक मत करो। तांगा लौटा लो।”

आधे घंटे में तांगा देवकीनाथ के दरवाजे पर जा पहुंचा ।


3

बारात तैयार थी। दूल्हा फूलों से सजी हुई मोटर पर बैठ चुका था। वाजे बज रहे थे। यह तमाशा देखकर फूलवती की सीने पर सांप-सा लोटने लगा। जी में आया, काएं में कूद पड़ूँ ताकि जिंदगी का ख़ात्मा हो जाए। जब अपना कोई पुरसां ही नहीं, तो इस जिंदगी से मौत कहीं अच्छी । पहले यह ख़याल आया, कि क्‍यों न मैं भी उनकी छाती पर मूंग दलूं ? उन्हें दुखाकर किसी से शादी कर लूं। फिर देखूं, यह हजरत क्या कर लेते हैं मेरा ? मगर इस ख़याल को उसने दिल से निकाल दिया। नहीं, मैं ओरतों के नाम को दाग नहीं लगाऊंगी। अपने खानदान को बदनाम न करूंगी। मगर इन हज़रात को बरात लेकर जाने न दूंगी, चाहे मेरी जान ही क्‍यों न जाए !

मोटर ने हॉर्न बजाए। और चलना ही चाहती थी, कि फूलवती तांगे से उतर पड़ी।

और आकर मोटर के सामने खड़ी हो गई।

देवकीनाथ उसे देखते ही जल-भुनकर ख़ाक हो गये। बोले, “तुम यहां क्यूं आई ? तुम्हें यहां किसने बुलाया ?”

फूलवती ने मुंह फेरते हुए कहा, “मुझे न्‍्योते की जरूरत न थी।”

देवकीनाथ-“हट जाओ मेरे सामने से। मैं तुम्हारी सूरत देखना नहीं चाहता।

फूलवती-“तुम शादी करने नहीं जा सकते ॥”

देवकीनाथ-*“'मुझे तुम रोक लोगी ?”

फूलवती-“या तो रोक लूंगी या अपनी जान दे दूंगी।”

देवकीनाथ-““अगर जान देना चाहती हो, तो कुएं पें कूद पड़ो। या जहर खा लो। उस पर भी सबर न आए, तो दूसरी शादी कर लो। या किसी को लेकर निकल जाओ। मैं तुम्हें नहीं रोकता | मैं क्रम खाता हूं कि मैं ज़बान तक न हिलाऊंगा।। मेरे पीछे पड़ती हो ? मैंने तुम्हारे लिए आधी जिंदगी तल्‍्ख कर दी। अब मुझमें जब्त की ताक़त नहीं है। मेरा कहना मानो, रास्ते से हट जाओ, वरना मैं मोटर चलाऊंगा ।”

फूलवती-“मैं भी यही चाहती हूं। मुझे पैरों तले रौंदकर तुम जा सकते हो ।'

देवकीनाथ-- तुम क्या चाहती हो ? में सारी जिंदगी तुम्हारे नाम को रोता रहूं। जो औरत अपने शौहर से दुश्मनी करे उसकी सूरत देखना गुनाह है।”

फूलवती--“ मैं तुम्हें अपनी सूरत दिखाने नहीं आई हूं।”

देवकीनाथ-“तो फिर तिरिया-चरित्तर क्‍यों करती हो ? क्‍यों नहीं किसी तरफ़ अपना मुंह काला कर लेती ? मैं ऐसी औरतों के चरित्तर खूब जानता हूं।

फूलवती ने खून-आब (खून भरी) आंखों से देखकर कहा, “जरा जबान संभालकर बातें करो, वरना मेरी आह पड़ जाएगी। मैं और सब कुछ बर्दाश्त कर सकती हूं तहकीर (अपमान) बर्दाश्त नहीं कर सकती। ह

देवकीनाथ ने गर्दन हिलाकर कहा, “ऐसी ही तू बड़ी इस्मत मआवब (परम सती) हो ।

फूलवती-*“जो खुद बेवफा है, उन्हें दूसरों से वफ़ा की उम्मीद रखने का कोई हक़ नहीं

देवकीनाथ फ़ौरन मोटर पर से उतर आए। बोले-““सामने से हटेगी या नहीं ?

फूलवती ने मुस्तकिल अंदाज से कहा-“'नहीं ।'”

देवकीनाथ दांत पीसकर बोले-““हट जा, नहीं तो मैं कुचल दूंगा। और सारी शेखी धरी रह जाएगी।”

फूलवती-'“तुम्हें अख़्तियार है, जो चाहो करो। मैंने एक बार कह दिया। मैं सब कुछ बर्दाश्त कर सकती हूं, तहक़ीर नहीं बर्दाश्त कर सकती ।”

देवकीनाथ-“मैं फिर समझाये देता हूं कि हट जा, नहीं तो मैं कुचल दूंगा। गधी कहीं की !””

फूलवती-““तो निकाल लो दिन का अरमान ना ! जबान क्‍यों ख़राब करते हो? मैं दिल में ठानकर आई हूं, कि मेरे जीते-जी तुम चैन न करने पाओगे ।”

देवकीनाथ-“मैंने कह तो दिया, जाकर किसी से अपनी शादी कर ले। मुझसे दस्तबरदारी (अधिकार मुक्ति) लिखा ले। मैं नहीं चाहता कि तू मेरे नाम को रोये।”

फूलवती-“मेरी शादी तो अब भगवान्‌ के घर होगी। लेकिन जीते-जी यह सितम बर्दाश्त नहीं कर सकती ।”

देवकीनाथ अब जब्त न कर सके । ड्राइवर से बोले-““चला दो मोटर | जो कुछ होगा, देखा जाएगा। मुझ पर धौंस जमाने चली ।”

ड्राइवर ने मोटर चलाने से इन्कार किया। वह एक औरत पर दीदओ दानिस्ता (जान-बूझकर) मोटर चलाकर अपनी जिंदगी खतरे में नहीं डालना चाहता था। जिंदा रहेगा तो भीख मांग खायेगा। ऐसी नौकरी उसे मंजूर नहीं। वह मोटर से उतरकर चल दिया।

फूलवती ने ताजियान (चाबुक) जमाया, “तुम मुझे मौत से क्या धमकाते हो ! मौत से वह डरे जिसे ऐशो-आराम की आरजू हो। यहां तो मरने के लिए तैयार होकर आई हूं। जिंदा रहकर मुझे करना ही क्‍या है ? रोने से जी भर गया । अव उसकी ख्वाहिश नहीं है ।”

देवकीनाथ का गुस्सा तैश की हद तक जा पहुंचा। जब इन्सान की क॒ब्वते-तमीज सल्ब (विवेकशक्ति नष्ट) हो जाती है तो वह अंधा हो जाता है। इतने आदमियों के रूबरू एक औरत के हाथों वह खफ़ीफ़ (लज्जित) न होना चाहता था। सफ्फाकाना अज्म (हिंसक दृढ़-निश्चय) के साथ हॉर्न बजाण।

फूलवती एक बार चौंक पड़ी। और फिकत्री हिफ्जे-बक़ा (प्राकृतिक अस्तित्व-रक्षा) के जेरे असर एक क़दम हट गई। मगर फ़ौरन संभलकर फिर मोटर के सामने आई और लेट गई। उसके तरकश का आखिरी तीर था।

दोबरा हॉर्न बजा।

फूलवती ने जुम्बिश (हरकत, हिलना) न की। उसकी आंखें बंद थीं। और ऐसा मालूम होता था, गोया दिल बैठा जाता है।

मोटर ने तीसरी बार हॉर्न बजाण। और एक शाने-फरऊनियत (जालिम फरऊन की तरह) के साथ चल पड़ा । एक चीख की आवाज सुन पड़ी। और मोटर आगे निकल गई।

फूलवती का तन नाजुक जमीन पर पड़ा हुआ सितार के चोट खाये हुए तारों की तरह कांप रहा था। जिसने शौहर का एक कल्मा सख्त (कठोर) नह! त्रदश्ति किया, वह आज क्‍या यह तहक़ीर (अपमान) बर्दश्ति कर सकती थी ”


4

नजारा इतना दर्दनाक था, इतना नफतअंगेज, इतना वहशियाना कि हज़ारों तमाशाइयों की आंखों में खून उतर आया। इज्तिमाई जहानियत (सामूहिक वृत्ति) हमेशा इंतिहा की तरफ़ मायल (प्रवृत्त) होनी है। वह सब कुछ कर गुजरती है, जो अफ़राद (व्यक्तियों) के लिए नाक़ाबिले खयाल है। सैलाब अगर आबादियों को गर्क़ाव (डुबना) करता है तो जमीन की भी जरखेज (उपजाऊ) करता है। दरिया-ए-तहनशीं (खून का बदला, खुनी अनीति) के सकून में कुव्वते-अमल (क्रिया-शक्ति) कहां ?

इस मज्में में सितमे-ननाखा (अनुचित अत्याचार) के ख़िलाफ़ एहतिजाज (क्रोधपूर्ण रोष) का एक सैलाब-वा आ गया। खूने बेदाद (खून का बदला, खूनी) के लिए मुश्तइल (उत्तेजित) हो गया। कानून पर तसर्खूफ (अधिकार) इस ज॒हनियत की ख़सूसियत है।

सदहा (सैकड़ों) आदमी एक अन्धे जुनून के आलम में मोटर की तरफ़ दीौड़े। देवकीनाथ का हाथ पकड़कर मोटर से खींच लिया और ख़ूंख्वार दरिंदों की तरह उस पर चारों तरफ़ से टूट पड़े। और आने-वाहिदउ (एक क्षण में) में नोशा अपनी सारी तमन्नाएं ले एक तोदा-ए-उस्तुख्यां (हड्डियों का ढेर) बना खूनी सेहता सिर पर रख के जमीन पर एड़ियां रगड़ रहा था।

दोनों लाशें आमने-सामने पड़ी थीं। दोनों पर हसरत बरस रही थी। कौन क़ातिल था? कीौन-मक्तूल (मरने वाला, हत) ?

पहर रात गये दोनों जनाज़े चले। ढोल-मजीरे की जगह आहो-बुका (विलाप) की गरमबाजारी थी।

यह नयी बरात थी !

[प्रथम प्रकाशन उर्दू। उर्दू कहानी संग्रह “आखिरी तोहफा” (प्रथम संस्करण : मार्च 1934) में संकलित एवं प्रकाशित। देवनागरी लिप्यंतर “बारात” शीर्षक से 'सोलह अप्राप्प कहानियां' और प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य” खण्ड-1 में संकलित |]


बारात का सारांश

'बारात' मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित दांपत्य कलह, अहम् के टकराव, पुरुष सत्ता की संवेदनहीनता और उससे उपजी एक भीषण सामाजिक त्रासदी की मर्मभेदी कहानी है। पैंतालीस वर्षीय बाबू देवकीनाथ अपनी पंद्रह वर्ष पुरानी ब्याहता पत्नी फूलवती के रहते हुए दूसरा विवाह करने जा रहे हैं। घर में शहनाई बज रही है, रिश्तेदार सजे-धजे हैं और देवकीनाथ की माँ इस बात से हर्षित हैं कि अब पढ़ी-लिखी 'मेमसाहब' जैसी बहू के बदले उन्हें एक घरेलू, आज्ञाकारी बहू मिलेगी। पंद्रह वर्ष पूर्व जब देवकीनाथ और फूलवती का विवाह हुआ था, तब विचारों के बुनियादी टकराव के कारण पहले ही दिन दोनों में दूरी बन गई। देवकीनाथ पारंपरिक रूढ़ियों, पर्दा-प्रथा और सास की खिदमत के समर्थक थे, जबकि पढ़ी-लिखी और स्वाभिमानी फूलवती आत्मसम्मान और बराबरी की पक्षधर थी। कटुता और कलह के कारण फूलवती मायके चली गई और पंद्रह वर्षों तक दोनों के बीच स्थायी अलगाव बना रहा।

जब फूलवती को पता चलता है कि देवकीनाथ दूसरा विवाह रचा रहे हैं, तो उसका आत्मसम्मान और स्त्रीत्व आहत हो उठता है। वह यह बर्दाश्त नहीं कर सकती कि उसके जीवित रहते उसका पति दूसरी शादी करके उसकी छाती पर मूँग दले। वह चुपचाप ताँगे में बैठकर ससुराल पहुँचती है। बारात निकलने ही वाली होती है और फूलों से सजी मोटर चलने को तैयार होती है कि फूलवती मोटर के सामने आकर खड़ी हो जाती है और देवकीनाथ को दूसरा विवाह करने से रोकती है। दोनों के बीच तीखी बहस होती है। देवकीनाथ उसे अपशब्द कहते हैं, पर फूलवती कहती है कि वह सब कुछ सह सकती है किंतु अपना अपमान नहीं सहेगी।

देवकीनाथ ड्राइवर से मोटर चलाने को कहते हैं, लेकिन ड्राइवर एक स्त्री पर गाड़ी चढ़ाने से इनकार कर नौकरी छोड़ देता है। जनसमूह के सामने अपमानित होकर और गुस्से में अंधा होकर देवकीनाथ स्वयं स्टीयरिंग संभालते हैं। फूलवती मोटर के आगे सड़क पर लेट जाती है। क्रूरता और वहशीपन के उन्माद में देवकीनाथ हॉर्न बजाते हुए मोटर फूलवती के ऊपर से निकाल देते हैं, जिससे उसका शरीर कुचल जाता है और वह दम तोड़ देती है।

इस बर्बर और रोंगटे खड़े कर देने वाले कृत्य को देखकर उपस्थित जनसमूह का आक्रोश भड़क उठता है। सैकड़ों लोग दौड़कर देवकीनाथ को मोटर से खींच लेते हैं और उन पर टूट पड़ते हैं। पलक झपकते ही सेहरा बाँधे दूल्हा बने देवकीनाथ भी पीट-पीटकर मार डाले जाते हैं। दोनों की लाशें आमने-सामने पड़ी रह जाती हैं। देर रात बाजे-गाजे की जगह चीत्कार और विलाप के बीच दोनों के जनाज़े एक साथ उठते हैं, जो वास्तव में उस विवाह की भयावह 'नयी बारात' साबित होती है।


प्रकाशन इतिहास

यह कहानी सर्वप्रथम उर्दू कहानी संग्रह आखिरी तोहफा के प्रथम संस्करण (मार्च 1934) में प्रकाशित हुई थी। इसका देवनागरी लिप्यंतर बारात शीर्षक से सोलह अप्राप्य कहानियाँ तथा प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य (खण्ड-1) में संकलित किया गया।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • अहम् का टकराव और वैवाहिक विसंगतियाँ: कहानी यह स्पष्ट करती है कि दांपत्य जीवन में परस्पर संवाद, लचीलेपन और समझदारी के अभाव में जब दोनों पक्षों का झूठा अहंकार टकराता है, तो उसका अंत अत्यंत वीभत्स और त्रासद होता है।
  • पुरुष-सत्तात्मक अन्याय और बहुविवाह की प्रवृत्ति: पहली पत्नी के जीवित रहते हुए पुरुष का आसानी से दूसरा ब्याह रचा लेना और समाज द्वारा उसे मूक स्वीकृति देना उस युग की घोर विसंगति थी, जिसे प्रेमचंद ने निर्दयता से उजागर किया है।
  • स्त्री के स्वाभिमान और चरम प्रतिरोध का अंकन: फूलवती घुट-घुट कर जीने या पति द्वारा किए गए घोर अपमान को मूक दर्शक बनकर देखने के बजाय अपने प्राणों की आहुति देकर उस अन्याय के विरुद्ध दीवार बनकर खड़ी हो जाती है।
  • सामूहिक आक्रोश और अनियंत्रित भीड़ का न्याय: अत्याचार की पराकाष्ठा देखकर जनता का कानून अपने हाथ में लेना और अत्याचारी को उसी क्षण दंडित करना इस बात का प्रतीक है कि अमानवीय कृत्यों के विरुद्ध जनसाधारण का रोष कितना प्रलयंकारी हो सकता है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'बारात' प्रेमचंद के साहित्य की सबसे तीक्ष्ण और स्तब्धकारी त्रासदियों में से एक है। यह कहानी दांपत्य संबंधों के खोखलेपन, स्त्री-सम्मान की रक्षा और क्रूर स्वार्थपरता के आत्मघाती परिणामों का अत्यंत मार्मिक आख्यान प्रस्तुत करती है।

इस रचना को उद्धृत करें

शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "बारात." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1934, https://munshipremchand.com/works/short-stories/barat. Accessed 22 Sep. 2026.