Cover Image for Bohani (बोहनी) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1928•16 मिनट

बोहनी

Bohani

प्रेमचंद की कहानी 'बोहनी' एक पान-व्यसनी की हास्यप्रद कहानी है, जिसकी बोहनी (दिन की पहली बिक्री) एक तंबोलिन के लिए ऐसी शुभ और अनिवार्य बन जाती है कि उसका जीवन उलझ जाता है।

पात्र:लेखक, तंबोलिन
स्थान:मोहल्ले की सड़क और पान की दुकान

बोहनी का मूल पाठ

मैं जिस मुहल्ले में रहता हूँ, वहाँ पानों की कोई दूकान नहीं थी। मुझे बार-बार सड़क के उस नुक्कड़ पर जाना पड़ता था, जो शायद दो फुरलाॉग से कम न था। और मैं पान का लती। दिन में कई बार कवायद करनी पड़ती थी। कई बार कोशिश की कि एक पानदान रख लूँ, लेकिन एक तो नया पानदान खरीदना मेरे लिए हाथी मोल लेना है। दूसरे आठों पहर उसकी चिन्ता कौन करे-वक्त पर पान लावो, कपड़ा भिगावो, दिन में पाँच बार पानों को फेरो, चूना लाओ, कत्था लाओ, तम्बाकू लाओ-कहाँ तक गिनाऊँ, मुझे तो अगर मुक्ति भी मिलती हो, तो इतना सिरदर्द गवारा नहीं कर सकता। और सब समस्‍्याएँ तो हल भी हो सकती हैं, लेकिन छालियाँ कौन कतरे? मुझे तो, जनाब, सरोता पकड़ना ही न आया। डर लगता है, कहीं हाथ न कट जाय। जब कभी काम पड़ता है, तो छालियों को सिल पर लोढ़े से तोड़ लेता हूँ, और अगर दाताओं के आशीर्वाद और पुरुषों के पुण्य-प्रताप से यह बेड़ा भी पार लग जाय, तो चूने और कत्थे का अन्दाज़ कहाँ से लाऊँ ? कहीं चूना ज़्यादा हो गया तो सारे मुँह में छाले पड़ गये, चाट के लिए तरस-तरस कर रहूँ। जिन्दगी में दो ही चार बार मुझे पान लगाने का अवसर पड़ा है और हर बार मेरे मुँह में छाले पड़े हैं। एक बार कई दोस्तों को पान बनाकर खिलाए थे। वह दिन उनको अब तक याद है और शायद कभी न भूलेंगे।

खैर, तो जब मेरे पड़ोस में एक तम्बोली ने दूकान खोली तो मेरे आह्वाद का पारावार न रहा। उस पर तुर्रा यह है कि वह तम्बोली न था, तम्बोलिग थी। फिर क्या था, अपनी पाँचों उँगलियाँ घी में थीं। एक तो कवायद से बचे, दूसरे मनोरंजन का भी कुछ सामान हो गया। दो-चार पॉतियाँ लिखीं और पान की याद आयी, दूकान पर जा पहुँचा। दो ही चार दिनों में नियत मात्रा दुगुनी हो गयी। सच कहता हूँ, मुझे ऐसी निश्चिन्तता का अनुभव होने लगा, मानो किसी वीमे की पालिमी मच्योर हो रही हो।


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एक दिन मैं प्रातःकाल हाय-मुँह धोकर पान खाने जा पहुँचा | तम्बोलिन मेरी ओर मुख़ातिब न हुई। मैं एक मिनिट खड़ा रहा, फिर भी उसने पान बनाना न शुरु किया। तब मैंने अधीर होकर कहा, “क्यों, आज पान न खिलाओगी ?”

तम्बोलिन ने मुँह फेर और सिर झुकाकर कहा, “बाबूजी, थोड़ी देर में फिर आइएगा, अभी बोहनी नहीं हुई है।”

मैंने जेब से पैसे खनखनाकर कहा, “तो मैं उधार कब माँग रहा हूँ। एक पैसे की बोहनी न अच्छी हो, तो दो की सही /”

तम्बोलिन ने फिर भी सिर गड़ा लिया। मैंने देखा कि उसके कपोलों पर लाली दौड़ गयी | वह हिचकती हुई बोली, “बुरा न मानो, बाबूजी, तुम्हारे हाथ की बोहनी अच्छी नहीं है। कल तुम्हारी बोहनी हुई, दिन भर में केवल आठ आने पैसे आए। परसों भी तुम्हारी ही बोहनी हुई थी, कुल छः आने मिले थे। नरसों पण्डित जी की वोहनी हुई थी, दोपहर तक सवा रुपए के पैसे आ गए थे। साँझ तक साढ़े तीन की बिक्री हो गयी |!”

इसमें तो कोई सन्देह ही नहीं कि दुभग्य पर मेरा एकाधिपत्य है। इस क्षेत्र में मेरा कोई दन्द्दी नहीं, लेकिन उस दिन तक मुझे न मालूम था कि मेरा दुर्भाग्य इतना सर्वव्यापी है। बहुत झैंपा, अपना-सा मुँह लिए लौटना ही चाहता था कि उस रमणी को मुझ पर दया आ गयी। तुरन्त पान बनाए और मुझे देती हुई बोली, “आप आए ही हो तो बाबूजी, पान खाते जाओ। भाग्य में जो कुछ होगा, मिलता ही रहेगा । किसी-किसी का हाथ ही ऐसा होता है।”

मैंने पान तो खा लिया, पर इतना बड़ा कलंक अपने माथे कैसे लगा रहने देता? मन में निश्वय किया कि इसे अवश्य मिटाकर छोड़ूँगा ।

अपने घर में आकर बैठा ही था कि एक मित्र आ गए। बाज़ार शाक-भाजी लेने जा रहे थे। मैंने उनसे अपनी तम्बोलिन की खूब तारीफ की। वह महाशय रसिक जीव थे। मेरी ओर शरारत से भरी हुई आँखें फेरीं और बोले, “इस वक्त तो मेरे पास पैसे नहीं हैं, और न अभी पानों की जरूरत ही है।'

मैंने कहा, “पैसे मुझसे ले लो ।”

“हाँ, यह मंजूर है, मगर कभी तकाज़ा मत करना ॥

“भाई, यह टेढ़ी बात है।'

“तो क्या सेंत ही में आँखें सेकना चाहते हो ?”

हारकर इन महाशय को एक ढोली पान के दाम दिए। इसी तरह जो-जो मुझसे मिलने आया, उससे मैंने अपनी तम्बोलिन की प्रशंसा की। मेरी खूब हँसी उड़ाई गयी, खूब फृब्तियाँ कसी गयीं, लेकिन मैंने सब-कुछ सहा। यह कलंक मिटाने की मुझे धुन सवार हो गयी थी।

दूसरे दिन जब मैं तम्बोलिन की दूकान १९ गया तो उसने तुरन्त पान बनाए और मुझे देती हुई बोली, “बाबूजी, कल तुम्हारी बोहनी बड़ी अच्छी थी। कोई साढ़े तीन रुपये आये। अब रोज बोहनी करा दिया करो |”


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तीन-चार दिन लगातार मैंने मित्रों से सिफारिश करके और अपनी जेब से पैसे खर्च करके अपने को सुर्खरू बनाए रक्खा, लेकिन इतने ही समय में मेरी जेब से कोई पाँच रुपये खर्च हो ग्ये थे। यह स्वॉग अब और न चल सकता था, इसलिए मैंने इरादा किया कि कुछ दिनों उसकी दूकान से पान लेना छोड़ दूँ। जब मेरी बोहनी ही न होगी, तो मुझे उसकी हानि-लाभ की क्या चिन्ता ? दूसरे दिन हाथ-मुँह धोकर एक इलायची खा ली और अपने काम में लग गया। सहसा किसी की आहट पाकर आँख उठाई, तो क्या देखता हूँ कि तम्बोलिन हाथ में गिलौरियाँ लिए खड़ी मुसकरा रही है। मुझे इस समय उसका आना अच्छा न लगा, लेकिन इतनी बेमुरौवती भी तो न हो सकती थी कि फटकार दूँ। बोला, “तुमने क्‍यों कष्ट किया, मैं तो आ ही रहा था !”

तम्बोलिन ने मेरे हाथ में गिलौरियाँ रखकर कहा, “आपको देर हुई तो मैंने कहा, मैं ही चलकर बोहनी कर आऊँ। तीन-चार ग्राहक खड़े हैं, मुदा मैंने अभी किसी की बोहनी नहीं की ।”

क्या करता ? गिलौरियाँ खायीं और बोहनी करायी। जिस चिन्ता से मुक्त होना . चाहता था, वह जबरदस्ती सिर पर सवार हो गयी। फिर वही वला सिर पर सवार हुई। मैंने सोचा था, मेरे मित्र-लोग दो-एक बार इसके यहाँ पान लेंगे तो आप परिचित हो जायेंगे । मेरी सिफारिश की जरूरत न रहेगी, मगर तम्बोलिन शायद पानों के साथ अपने रूप का भी कुछ मोल करती थी, इसलिए जिसने एक बार उससे पान लिये, दोबारा उसकी दूकान पर न गया। हाँ, दो-एक रसिक जन अभी तक आते थे। वे एक पैसे में पान और रूप-दर्शन का दोनों ही का आनन्द उठाकर चले जाते थे। उस दिन मुझे अपने मुँह को लाली रखने के लिए पूरे डेढ़ रुपये खर्च करने पड़े। बधिया बैठ गयी।

दूसरे दिन मैंने द्वार अन्दर से बन्द कर लिया, मगर जब तम्बोलिन ने चीखना-चिल्लाना और द्वार खड़खड़ाना शुरु किया तो हारकर खोलना ही पड़ा। आँखें मलता हुआ नीचे गया, जिसमें मालूम हो कि आज नींद आ गयी थी। फिर बोहनी करानी पड़ी और फिर वही बला सिर पर सवार हुई। शाम तक डेढ़-दो रुपये का सफाया हो गया।

आख़िर मैंने इस विपत्ति से नजात पाने के लिए यही निश्चय किया कि यह घर छोड़ देना चाहिए।


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मैंने नख़ास में एक मकान ठीक किया और रातों-रात असबाब उठवाकर जा पहुँचा | वह घर छोड़कर मैं जितना खुश हुआ, शायद जेल से निकलकर कैदी भी उतना खुश न॑ होता होगा । रात को खूब गहरी नींद सोया। सवेरा हुआ तो मुझे किसी स्वाधीन पक्षी का-सा अनुभव हो रहा था। शान्तिपूर्वक सिगरेट पिया, मुँह-हाथ धोया, फिर अपनी जीजें ठिकाने से रखने लगा। महरी का अभी कोई प्रबन्ध न था। कोई होटल भी भोजन के लिए ठीक करना था, पर मुझे उन महान संकट पर विजय पाकर जो आनन्द हो रहा था, उसके सामने उन चिन्ताओं की कोई गिनती न थी। मुँह-हाथ धोकर कोई आठ बजे नीचे उतरा। आज की हवा में भी स्वाधीनता की महक आ रही थी। खुश-खुश टहलता हुआ एक दूकान पर जाकर पान खाया और जीने पर चढ़ ही रहा था कि देखा वह तम्बोलिन लपकी हुई चली आ रही है। कुछ न पूछो, उस वक्‍त दिल की क्‍या हालत हुई । बस, यही जी चाहता था कि अपना और इसका दोनों का सिर फोड़ लूँ। मुझे देखकर वह ऐसी प्रसन्न हुई, मानो कोई धोबी अपना खोया हुआ गधा पा जाय, और मेरी क्षुब्धावस्था का अनुमान भी उसी गधे की मानसिक दशा से कर लो। मैं इतना बौखला गया कि कोठे पर जाने की सुधि भी न रही। उसने दूर ही से कहा, “वाह बाबूजी, वाह ! आप ऐसा भागे कि किसी को ख़बर भी न हुई। उसी महल्ले में एक-से-एक अच्छे मकान हैं। मुझे क्या मालूम था कि उस मकान में आपको तकलीफ थी, नहीं तो मेरे पिछवाड़े ही एक बड़े आराम का घर खाली था। मैं आपको यहाँ न रहने दूँगी, जिस तरह बनेगा, आपको उठा ले जाऊँगी। आखिर आप इसका क्या किराया देते हैं?”

मैंने रोनी सूरत बनाए हुए कहा, “दस रुपये ।”

मैंने समझा था, किराया इतना कम बताऊँ कि यह दलील उसके हाथ से निकल जाय | इस घर का किराया बीस रुपये है। दस में तो शायद मरने को भी स्थान न मिलेगा, मगर तम्बोलिंग पर कोई असर न हुआ। बोली, “आप आठ ही दीजिएगा और घर इससे अच्छा न हो तो आपको अख़्तियार है, छोड़ दीजिएगा। चलिए, मैं उस घर की कुंजी लेती आयी हूँ।"

मैंने खिन्‍नन होकर कहा, “आप ही तो इस घर में आया हूँ। आज ही छोड़ कैसे सकता हूँ ? पेशगी किराया दे चुका हूँ।”

“दस ही रुपये तो दिये हैं। आपके लिए दस रुपया कौन बड़ी बात है ? यही समझ लीजिए कि आप न चले तो मैं उजड़ जाऊँगी। ऐसी अच्छी बोहनी वहाँ और किसी की नहीं है। आपके चलने में अड़चन होती हो तो कहिए मैं ही अपनी दूकान यहाँ उठा लार्ऊ ?”

मेरा दिल बैठ गया। यह अच्छी विपत्ति गले पड़ी। कहीं सचमुच यह चुड़ैल अपनी दूकान न उठा लाये। जी में तो आया कि एक फटकार सुनाऊँ, पर बात इतनी बेमुरौवत न हो सकी। बोला, “मेरा कुछ ठीक नहीं, कब तक रहूँ, कब तक न रहूँ ? आज ही बदली हो जाय तो भागना पड़े | तुम न इधर की रहो, न उधर की ।”

उसने निश्चल भाव से कहा, “आप चले जायेंगे तो मैं भी चली जाऊँगी। अभी आज तो आप जाते नहीं ।'

“मेरा कुछ ठीक नहीं है।”

“तो मैं रोज यहाँ आकर बोहनी कर लिया करूँगी |”

“इतनी दूर रोज आओगी ?”

“हाँ, चली आऊँगी। दो मील भी तो नहीं है। आपकी बोहनी तो छो जायगी। यह लीजिए, गिलौरियाँ लायी हूँ, बोहरी करा दीजिए।

मैंने गिलौरियाँ लीं, पैसे दिये और मूर्छित-सा ऊपर आकर अपने कमरे में लेट गया। अब मेरी समझ में नहीं आता कि इस मुसीबत से कैसे छुटकारा पाऊँ ? तब से इसी चिन्ता में पड़ा हुआ हूँ, अक्ल कुछ काम नहीं करती। सुर्खरू भी रहना चाहता हूँ, बेमुरीवती भी नहीं करना चाहता और इस विपत्ति से मुक्त भी होना चाहता हूँ। अगर कोई सज्जन पाठक मेरी दयनीय दशा पर दया करके कोई ऐसी युक्‍क्ति बता दे तो जीवन-पर्यन्त उनका कृतज्ञ रहूंगा।


बोहनी का सारांश

'बोहनी' मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित एक अत्यंत मनोरंजक, हास्यप्रद और व्यंग्यात्मक कहानी है, जिसमें एक पान-व्यसनी की मध्यमवर्गीय कमजोरी, झूठी प्रतिष्ठा और 'बोहनी' (दिन की पहली बिक्री) से जुड़े अंधविश्वास के कारण उत्पन्न हास्यास्पद परिस्थितियों का सुंदर चित्रण किया गया है। कथावाचक को दिन-भर पान खाने की तीव्र लत है, परंतु वे पानदान रखने, सुपारी कतरने या चूना-कत्था लगाने के झंझट से बचने के लिए बाहर दुकान से पान खाना पसंद करते हैं। जब उनके घर के ठीक सामने एक नई तंबोलिन पान की दुकान खोलती है, तो वे बेहद प्रसन्न हो जाते हैं।

परंतु कुछ ही दिनों बाद तंबोलिन उन्हें सुबह पान देने में आनाकानी करती है और झिझकते हुए बताती है कि कथावाचक के हाथ की 'बोहनी' बहुत मनहूस है; जिस दिन वे पहली खरीदारी करते हैं, उस दिन दिन-भर दुकान में बहुत कम बिक्री होती है। अपने माथे पर लगे 'अपशकुनी बोहनी' के इस कलंक से कथावाचक के आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुँचती है। वे हर हाल में अपनी साख और बोहनी की प्रतिष्ठा बचाने की धुन सवार कर लेते हैं।

अपनी बोहनी को शुभ सिद्ध करने के लिए वे अपने मिलने-जुलने वाले मित्रों को अपनी जेब से पैसे देकर तंबोलिन की दुकान पर पान खरीदने भेजते हैं। अगले दिन तंबोलिन खुश होकर बताती है कि कल की बोहनी बहुत अच्छी रही। लेकिन रोज-रोज अपनी जेब से रुपये लुटाकर दोस्तों से पान बिकवाने के कारण कथावाचक का बजट बिगड़ने लगता है। जब वे इस आर्थिक तंगी और झंझट से पीछा छुड़ाने के लिए दुकान जाना बंद कर देते हैं, तो तंबोलिन स्वयं हाथ में पान की गिलौरियाँ लेकर उनके घर पर आ धमकती है और जिद करके बोहनी कराती है।

इस अवांछित आफत और रोज-रोज के खर्च से मुक्ति पाने के लिए कथावाचक रातों-रात अपना सारा सामान उठवाकर नखास के एक अज्ञात मोहल्ले में मकान बदलकर चले जाते हैं। नए घर में वे खुद को एक स्वतंत्र पंछी जैसा महसूस करते हैं। किंतु अगली ही सुबह जब वे टहलकर लौटते हैं, तो वही तंबोलिन खोजती हुई उनके नए मकान पर लपकती हुई आ पहुँचती है। वह कहती है कि वह अपनी दुकान भी इसी मोहल्ले में ले आएगी या रोज दो मील पैदल चलकर उन्हीं से बोहनी कराएगी। बेबस और लाचार होकर कथावाचक बिस्तर पर लेट जाते हैं और पाठकों से इस विचित्र संकट से बाहर निकलने का उपाय पूछते हैं।


प्रकाशन इतिहास

प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • सामाजिक प्रतिष्ठा और अंधविश्वास का तीखा हास्य: कहानी यह व्यंग्य करती है कि किस तरह लोग अपनी झूठी शान और बोहनी जैसे निरर्थक अंधविश्वासों को दिल से लगा लेते हैं और अपनी हँसी का पात्र बन जाते हैं।
  • मध्यमवर्गीय संकोच और बेमुरौवती से डर: कथावाचक तंबोलिन को साफ मना करने या डांटने के बजाय संकोच और लोक-लाज के कारण भारी आर्थिक व मानसिक कष्ट सहते हैं।
  • रोजमर्रा के जीवन का सजीव एवं मनोरंजक चित्रण: पान की लत, सुपाड़ी काटने का डर, कत्था-चूना का असंतुलन और तंबोलिन का चतुर व्यावसायिक व्यवहार मध्यमवर्गीय जीवन की सजीव झलक पेश करता है।
  • व्यावसायिक चतुरता और ग्राहक पर हावी होना: तंबोलिन का चरित्र एक चतुर दुकानदारी का उदाहरण है, जो ग्राहक की कमजोरी और संकोच का लाभ उठाकर अपनी बिक्री और बोहनी सुनिश्चित कर लेती है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: प्रेमचंद ने 'बोहनी' में दैनिक जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों के माध्यम से मानव स्वभाव की कमजोरियों, अंधविश्वास और झूठी प्रतिष्ठा की रक्षा में फँसे मनुष्य की विडंबना का बड़ा ही मर्मस्पर्शी और व्यंग्यात्मक चित्रण किया है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "बोहनी." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1928, https://munshipremchand.com/works/short-stories/bohani. Accessed 22 Sep. 2026.