Cover Image for Vardan (वरदान) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1921•26 अध्याय•5h 44m

वरदान

Vardan

प्रेमचंद का उपन्यास 'वरदान' प्रताप और विरजन की प्रेमकथा के माध्यम से बेमेल विवाह, सामाजिक सुधार, त्याग और समाज-सेवा के प्रश्नों को प्रस्तुत करता है।

पात्र:प्रताप, विरजन, सुवामा, कमलाचरण, माधवी, मुंशी संजीवन लाल, सुशीला
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में उत्तर भारत, विशेष रूप से बनारस और उसके आसपास का सामाजिक परिवेश

अध्याय 1 / 26

4 मिनट पठन • 511 शब्द

अध्याय 1: वरदान

भूमिका

अतिकाल हुए जननी शैव्या अपने प्राणप्रिय रोहिताश्व को गंगा के अंक में समर्पित करने के लिए ले गयी थी। रात्रि बड़ी भयानक था ओर शेव्या के नेत्र श्रावण-घन की भाँति बरस रहे थे। उसका विलाप सुनकर गंगा की लहरें उमड़ आईं ओर देवताओं के हृदय विदीर्ण हो गये, परन्तु शैव्या के प्रचंड अश्रुप्रवाह में भी हरिश्चन्द्र के पेर न डममगाये। उस समय देवताओं ने आकाश से पुष्पवृष्टि की ओर तीनों लोकों में जय-जयकार की ध्वनि निनादित हुई। वह दिन भारत के लिए परम धन्य था। यह तुच्छ रचना में उसी धर्म-वीर हरिश्चन्द्र के नाम पर प्रारम्भ करता हूँ।

  • प्रेमचंद

अध्याय 1: वरदान

विन्ध्याचल पर्वत मध्यरात्रि के निविड़ अन्धकार में काल देव की भाँति खड़ा था। उस पर उगे हुए छोटे-छोटे व॒क्ष इस प्रकार दृष्टिगोचर होतेथे, मानो ये उसकी जटाएँ है ओर अष्टभुजा देवी का मन्दिर जिसके कलश पर श्वेत पताकाएँ वायु की मन्द-मन्द तरंगों में लहरा रही थीं, उस देव का मस्तक हे मंदिर में एक झिलमिलाता हुआ दीपक था, जिसे देखकर किसी धुँधले तारे का मान हो जाता था।

अर्धरात्रि व्यतीत हो चुकी थी। चारों ओर भयावह सन्नाटा छाया हुआ था। गंगाजी की काली तरंगें पर्वत के नीचे सुखद प्रवाह से बह रही थीं। उनके बहाव से एक मनोरंजक राग की ध्वनि निकल रही थी। ठौर-ठोर नावों पर ओर किनारों के आस-पास मल्लाहों के चूल्हों की आँच दिखायी देती थी। ऐसे समय में एक श्वेत वस्त्रधारिणी स्त्री अष्टभुजा देवी के सम्मुख हाथ बांधे बेठी हुई थी। उसका प्रोढ़ मुखमण्डल पीला था ओर भावों से कुलीनता प्रकट होती थी। उसने देर तक सिर झुकाये रहने के पश्चात कहा --

“माता! आज बीस वर्ष से कोई मंगलवार ऐसा नहीं गया जबकि मैंने तुम्हारे चरणों पर सिर न झुकाया हो। एक दिन भी ऐसा नहीं गया जबकि मेंने तुम्हारे चरणों का ध्यान न किया हो। तुम जगतारिणी महारानी हो। तुम्हारी इतनी सेवा करने पर भी मेरे मन की अभिलाषा पूरी न हुई। में तुम्हें छोड़कर कहाँ जाऊँ? 'माता। मेंने सैकड़ों व्रत रखे, देवताओं की उपासनाएँ की, तीर्थयात्राएँ की, परन्तु मनोरथ पूरा न हुआ। तब तुम्हारी शरण आयी। अब तुम्हें छोड़कर कहाँ जाऊँ? तुमने सदा अपने भक्तों की इच्छाएँ पूरी की है। क्‍या में तुम्हारे दरबार से निराश हो जाऊँ?'

सुवामा इसी प्रकार देर तक विनती करती रही। अकस्मात उसके चित्त पर अचेत करने वाले अनुराग का आक्रमण हुआ। उसकी आँखें बन्द हो गयी और कान में ध्वनि आयी --

'सुवामा! में तुझसे बहुत प्रसन्न हूँ। माँग, क्या माँगती हे?

सुवामा रोमांचित हो गयी। उसका हृदय धड़कने लगा। आज बीस वर्ष के पश्चात महारानी ने उसे दर्शन दिये। वह कॉँपती हुई बोली 'जो कुछ माँगूँगी, वह महारानी देंगी?

हाँ, मिलेगा। '

'मैंने बड़ी तपस्या की हे अतएवं बड़ा भारी वरदान माँगूँगी।'

'क्या लेगी कुबेर का धन”?

“नहीं।

इन्द्र का बल।!

“नहीं। !

सरस्वती की विद्या?

“नहीं। '

'फिर क्‍या लेगी?

संसार का सबसे उत्तम पदार्थ।'

“वह क्‍या हे?

'सपूत बेटा। '

“जो कुल का नाम रोशन करे?

“नहीं।

“जो माता-पिता की सेवा करे?

“नहीं। !

'जो विद्वान ओर बलवान हो?

“हीं।

'फिर सपूत बेटा किसे कहते हें?

“जो अपने देश का उपकार करे।'

तेरी बुद्धि को धन्य है। जा, तेरी इच्छा पूरी होगी।'

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "वरदान." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1921, https://munshipremchand.com/works/novels/vardan. Accessed 22 Sep. 2026.