Cover Image for Munshi Bishun Narayan Bhargav (मुंशी बिशुन नारायण भार्गव) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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संस्मरण•1931•11 मिनट

मुंशी बिशुन नारायण भार्गव

Munshi Bishun Narayan Bhargav

नवलकिशोर प्रेस के अधिष्ठाता मुंशी बिशुन नारायण भार्गव के व्यक्तित्व, उदारता और भारतीय प्रकाशन जगत में योगदान पर प्रेमचंद की श्रद्धांजलि।

Work Details

प्रकार: संस्मरण
वर्ष: 1931
पठन समय: 11 मिनट (1,523 शब्द)

मुंशी नवलकिशोर के प्रतिष्ठित घराने का यह सूरज ठीक मध्याह्न के समय डूबा। स्व० मुंशी बिशुननारायण के जीवन का एक-एक कण रईस था। खूबिया रा थों, ऐब एक भी नहीं। मुसैवत के पुतले थे। किसो याचक्र का निराश करना उ सीखा ही न था। किसी दोस्त का दिल तोड़ना उनको शक्ति से बाहर था। कर्मचारियों की

संख्या हजारों तक पहुंचती थी, मगर कभी किसी को तेज निगाह से न देखा। गबन के मामले सामने आए, अयोग्यता और काम ढीलेपन की शिकायतें रोज ही आती रहती थीं, स्पष्ट बदनीयती की घटनाएं भी बार-बार सामने आईं पर हमेशा दरगुजर कर जाते थे। यह खूबी उनमें कमजोरी को हद तक थी। इससे बहुत बार कारोबार को नुकसान पहुंचता था और जिन लोगों के सर पर जिम्मेदारी थी, उन्हें नीचा देखना पड़ता था।

दिवंगत की अवस्था अभी कुछ न थी। लखनऊ का यह विद्या-प्रेमी घराना अल्पायु हुआ है। स्व* मुंशी प्रयागनारायण साहब ने बयालीस साल की उम्र में इस संसार से प्रस्थान किया, उसने सुपुत्र ने कुछ और कमी कर दी, अभी चौतीसवां ही साल था।

मझोला कद, चकली हड़ी और दोहरे बदन के सुंदर आदमी थे। गंदुमी रंग, रौबदार मूंछें, बड़ी-बड़ी आंखों में सजजनता और क्षमा की झलक। रहन-सहन बिल्कुल सादा था। बाहर निकलते तो अचकन और चुस्त पाजामा बदन पर होता, सर पर फेल्ट केप। घर पर कुर्ता और धोती पहनते थे। हुक्के और पान का शौक था।

उनका दरबार हर आदमी के लिए खुदा रहता था। न कार्ड भेजने की जरूरत, न इत्तला कराने की पाबंदी। दीवानखाने के सामने बरामदे में बैठे हुक्का पी रहे हें। दोस्त और कर्मचारी, याचक और गरजमंद सभी आते हैं और अपनी जरूरत बतलाकर चले जाते हैं। सबसे यकसां प्रेम और सज्जनता से पेश आते हैं। स्वभाव में घमंड का नाम नहीं, दंभ की गंध नहीं, झूठे शिष्टाचार की छाया नहीं। अफसोस वह जगह हमेशा के लिए खाली हो गई।

स्वभाव में दानशीलता भरी हुई थी। साधनों से कहीं ज्यादा दिल के धनी थे। दौलत को लुयने की चीज समझते थे। उनके लिए इससे बहुत बड़ी रियासत की जरूरत थी। इस तंगी में उनका दया का हाथ अपने जौहर न दिखा सकता था, जैस नेपोलियन को बरकंदाजों की एक टोली का अफसर बना दिया गया हो, जैसे अरबी घोड़े को अहाते में बंद कर दिया गया हो।

कर्मचारियों के लोभ के हाथों को लंबा होते देखते थे, मगर शिकायत का हरफ ज़बान पर न लाते थे। स्वभाव वैराग्य की ओर झुका हुआ था। साधु-संतों के चमत्कारों पर उन्हें पूरा विश्वास था। खुदा साधु-संत न थे लेकिन स्वभाव में ये गुण अवश्य था। जहां तक बेलौस रहने और नफे-नुकसान से बेअसर रहने का संबंध है, वह साधु- संतों से कहीं ज्यादा साधु-संत थे। दुनिया से दिल कभी नहीं लगाया। जब तक जिए बेलाग जिए। नुकसान हुआ तो परवाह नहीं, फायदा हुआ तो परवाह नहीं। फायद। हुआ तो जरा मुस्कराए, नुकसान हुआ तो कहकहा मार कर हंसे। योग और किसे कहते हैं? योग गेरुए बाने और जटा में नहीं, स्वभाव में होता है।

साधु-संतों के चमत्कारों की कहानियां बड़े चाव से सुनते थे। खुद भी बड़े विश्वास से बयान करते थे। कई योगियों से उन्हें बड़ी श्रद्धा थी। यहां तक कि कभी-कभी उनके इस चरम विश्वास पर आश्चर्य होता था। उनकी दृष्टि में अलौकिक शक्ति की कोई सीमा न थी। एक सिद्ध पुरुष एक ही समय दुनिया के अलग-अलग हिस्सों

में मौजूद हो सकते हैं-इस तरह की दंत-कथाएं वह अटल सच्चाई की तरह मानते और बयान करते थे। इसको मानने में किसी को शक हो सकता है, यह ख्याल शायद उन्हें आता ही न था। यह वैराग्य इसी साधु-प्रकृति का परिणाम न था। शायाद यही उनकी जिंदगी का सबसे गहरा पहलू था। खुद भी योग करते थे और इसमें उन्हें अच्छा अभ्यास हो गया था।

शादी कम उप्र में ही हो गई थी। उनकी मृत्यु के दो-ढाई साल पहले ही पत्नी का स्वर्गवास हो गया। जिस लगन और प्रेम से उनकी चिकित्सा में व्यस्त रहे, वह एक करुण दृश्य था। देवी जी स्वाभिमानी, समझदार और मामले की तह तक पहुंचने वाली स्त्री थीं। मुंशीजी की स्वच्छंदता उनके जीवनकाल में सीमाओं की पाबंद रहीं। उनकी मृत्यु इस वफा के पुतले के लिए कूच का पैगाम थी। मुश्किल से साल भरा गुजरा होगा कि बीमारियों ने आ घेरा। भीतर का दर्द बाहर निकल पड़ा। डॉक्टरों और वैद्यों पर विश्वास न था, होमियोपैथिक इलाज के कायल थे। लखनऊ में मुंशी महादेवप्रसाद साहब एक गरीब-दोस्त रईस हैं। जनता की सेवा के लिए ही उन्होंने होमियोपैथिक चिकित्सा का अध्ययन किया है और शहर के गरीबों की बहुत दिनों से निःस्वार्थ सेवा कर रहे हैं। मुंशीजी उनके गुणों से कायल थे। उनका इलाज शुरू किया। रोज-ब-रांज सेहत खराब होती जाती थी। चेहरा पीला पड़ गया था। कई महीने के बाद सेहत हुई मगर शोक सांघातिक था। कुछ महीनों के बाद फिर बीमार हुए और अबकी दुनिया से ही विदा हो गए। तेईस दिसंबर को मद्रास गए। इतने लंबे सफर के काबिल हरगिज न थे, मगर मिट्टी तो मद्रास में लिखी थी, धीरे-धीरे खींच ले गई।

गुस्सा बहुत आता था। या यों कहिए कि जब्त बहुत कर सकते थे। गुस्से को इंतहाई सूरत थी नीची आंखें होंठों पर खामोशी की मुहर।

प्रदर्शन से उन्हें घृणा थी, जो इस प्रदर्शन के युग में असाधारण बात है। 'नेकी ' कर और दरिया में डाल' के पाबंद थे। कोई सोसाइटी, कोई अजात या सभा ऐसी न थी जिसे उनके साथ हाथों लाभ न पहुंचता हो। जो कुछ देते ५ चुपचाप देते थे। मरने के बाद अब मालूम हो रहा है कि उनके दान कौ परिधि कितनी विशाल थी। पब्लिक लाइफ से उन्हें दिलचस्पी न थी, मगर राष्ट्रीय आंदोलनों के प्रशंसक थे। मित्र-मंडली में अपने राजनेतिक विचारों को निर्भीकता से व्यक्त करते थे। राजनीतिक आंदोलनों की सहायता करने में आगा-पीछा न करते थे। तकदीर ने उन्हें रियासत दो थो, हमदर्दियां जनता के साथ थों।

रईसों में हाकिमों का मुंह जोहने और खिताबों की भूख का मर्ज आम है। मर्ज क्यों कहो, प्रतिष्ठा की हवस किसे नहीं। विद्यार्थी परीक्षा में प्रतिष्ठा चाहता है, हुक्काम कारगुजारी में, रईस शुहरत में। मुंशीजी की % 'सक्‍त प्रकृति के लिए शुहरत और खिताब में कोई आकर्षण न था, यहां तक कि हुक्‍्काम से मुलाकात करना भी न पसंद करते थे।

कुछ लोगों की स्वभावगत विशेषताएं बहुत स्पष्ट और खुली हुई होती हैं, और कहीं गिरी हुई, इतनी गिरी हुई कि उसे शर्मगाक कह सकते हैं, कहीं बुलंद, इतनी

बुलंद कि जल्दी कहीं देखने को नहीं मिलतीं। मुंशीजी का स्वभाव समतल था, चौरस मैदान की तरह जिसमें खुलापन है, हरियाली है, सरसता है, ऊंचे-खाने का नाम नहीं। उनकी जिंदगी में क्या चीज सबसे बड़ी थी इसका फैसला मुश्किल है। वह किसी तरह भी उद्धाम प्रेरणाओं के व्यक्ति न थे। जहां तक दिखाई पड़ता है, बीच का रास्ता ही उनका रास्ता था। झंझटों से भागते थे। दुनिया के मामलों में सोच-विचार करन की परवाह न थी। उनके दीवानखाने के नीचे ही बुक-डिपो है, जहां सैकडों लोग काम करते हैं, मगर शायद जिंदगी में एक-दो बार से ज्यादा डिपो में कदम नह रखा। लंबा-चौड़ा इलाका है मगर शायद ही किसी हिस्से में निगरानी के ख्याल से गए हों। चिंताओं और झंझटों से मुक्त जीवन व्यतीत करते थे। स्वामिभक्त सलाहकाग का आग्रह बेकार होता था। इसी बैराग्योचित निस्पृह्ठा को उनकी सबसे बड़ी विशेष कह लीजिए।

शिकार और घुड़दौड़ से बहुत शौक था। साल में दो बार हिमालय की तरा: में शिकार खेलने जरूर जाते थे। यहां तक कि बीमारी कुछ कम होते ही शिक' खेलने गए और वहीं बीमारी फिर बढ़ गई। निशाना अचूक था। घुड़दौड़ में इससे ४ ज्यादा दिलचस्पी थी। अच्छे - अच्छे असील घोड़ जमा कर रखे थे। म्रद्रास को पाणत+ यात्रा भी पर इन जीतो से क्‍या खुशी होती।

लखनऊ के आशिक थे। मामूली रईस 'भी गर्मियों में पहाड़ों की सैर +औते ' मुंशीजी मई-जून को गर्मियां लखनऊ हो में गुजार दते थे, पहाड़ की दिलचारगिय से उन्हें कोई बास्ता न था। उनका समतल रबभाव हर तरह की परेशानी 3गैर (िर, । से मबराता था। दोलत की हवस न सी यों एक बार सटे का भी शौक हक: दौलत उनके हाथों से छलनी का पी थी। दरबार के हितैषियों की आंखें बचा जो आदमी पहुच जाता, कुछ -न कुछ लेकर ही लौटता था।

व्यापार की मंदी कुछ दिना से प्रबधकों के लिए चिता का कारण हो २ « प्रस्ताव हुठग कि क्रमचारियों के वेतन मं कटौती कर दा जाय। इसका सका ७) हुआ, आपस में मवाहसे हुए और प्रस्ताव ने अमली सर्त अखि्तियार की। मगर मर ने चहल आग्रह किए जाने घर भी उसे पर उरतखत ने किए। बात वहाँ एम गई। उनका कलम परवरिश करने के लिए था, खून करने के लिए नहीं।

दिखगत को यादगार दो बट £ बड़े साहबजाद को उम्र सालह साल का € छोटे अभी चौथ -पायत् साल में है तीन बेटियां भी हैं। बट़ी बेटी की शादा हो प१ है। मां के प्यार से पहले ही वंचित हो चके थे, बाप का साया भी उठ गये!

मगर उनसे थी व्यादा दर्दनाक हालत उनको माँ की है जिनका लाल टतक गोद से हमेशा क लिए छीन लिया गया। खुशनसीय हैं वह जो नेकनाम जांते हैं नेकनाम मरते हैं। आज सारा शहर दिवंगत के लिए मातम कर रहा है ओर दुनय' एक आवाज होकर कह रहीं है

घरती माता का एक संपृत उठ गया।


प्रकाशन इतिहास

[उर्दू लेख। 'ज़माना', फ़रवरी, 1931 में प्रकाशित। हिन्दी रूप इसी शीर्षक से 'विविध प्रसंग' भाग-3 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "मुंशी बिशुन नारायण भार्गव." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1931, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/munshi-bishun-narayan-bhargav. Accessed 22 Sep. 2026.