Cover Image for Mahatma Ji Ka Viceroy Se Nivedan (महात्मा जी का वाइसराय से निवेदन) by Munshi Premchand - Non-Fiction
Cover Image for Mahatma Ji Ka Viceroy Se Nivedan (महात्मा जी का वाइसराय से निवेदन) by Munshi Premchand - Non-Fiction
सम्पादकीय•1930•5 मिनट

महात्मा जी का वाइसराय से निवेदन

Mahatma Ji Ka Viceroy Se Nivedan

प्रेमचंद का सम्पादकीय 'महात्मा जी का वाइसराय से निवेदन' दांडी मार्च से पूर्व वाइसराय को लिखे गए गांधीजी के ऐतिहासिक पत्र और शोषित जनता के अधिकारों का विश्लेषण करता है।

Work Details

प्रकार: सम्पादकीय
वर्ष: 1930
पठन समय: 5 मिनट (711 शब्द)

महात्माजी ने वाइसराय को जो पत्र लिखा हे, उसे ' अल्टीमेटम ' कहना उस पत्र के महत्व को मिटाना है। वह एक सच्चे आत्मदर्शी हृदय के उदगार हैं। उसमें एक भी ऐसा शब्द नहीं है, जिसमें मालिन्य, क्रोध, द्वेष या कटुता की गन्ध हो। उस पवित्र आत्मा में मालिन्य या द्वेष का स्थान ही नहीं है। वह किसी शत्रु नहीं, सबका मित्र है। अंग्रेजी शासन का ऐसा सम्पूर्ण इतिहास इतने थोडे-से शब्दों में, इतनी सद्‌-प्रेरणा के साथ महात्माजी के सिवा दूसरा कौन लिख सकता था। उस पत्र में जितनी जागृति, जितनी स्फूर्ति, जितना सत्साहस है, वह शायद भगवदगीता में हो तो हो, और तो हमें कहीं नहीं मिलता। भारत के ही इतिहास में नहीं, संसार के इतिहास में भी वह यादगार बनकर रहेगा। पाठक के हृदय पर एक-एक शब्द देव-वाणी- सा प्रभाव डालता है, प्रतिक्षण आत्मा ऊंची होती जाती है, यहां तक कि उसे समाप्त कर लेने पर आप अपने को एक नई दुनिया में पाते हैं। महात्मा गांधी ने स्पष्ट कह दिया है, कि हम पद के लिए, धन के लिए, अधिकार के लिए स्वराज्य नहीं चाहते, हम स्वराज्य चाहते हैं उन गूंगे, बेजबान आदमियों के लिए, जो दिन-दिन दरिद्र होते जा रहे हैं। अगर आज सभी अंग्रेज अफसरों की जगह हिन्दुस्तानां हो जायं, तब भी हम स्वराज्य से उतने ही दूर रहेंगे, जितने इस वक्‍त हैं। हमारा उद्देश्य तो तभी पूरा होगा, जब हमारी दरिद्र, क्षुधित, वस्त्रहीन जनता की दशा कुछ सुधरेगी।

मगर हमारे देश में हमारे ही कुछ ऐसे भाई हैं, जिन्हें इस निवेदन में कोई नयी बात, कोई नया सन्देश नहीं नजर आता। उन पर उसके ऊंचे, पवित्र भावों का जरा भी असर नहीं पड़ा। वह अब भी यही रट लगाये जा रहे हैं कि महात्माजी आग से खेल रहे हैं, समाज की जड़ खोदने वाली शक्तियों को उभार रहे हैं। जिन्हें अंग्रेजों के साथ मिलकर प्रजा को लूटते हुए अपना स्वार्थ सिद्ध करने का अवसर प्राप्त है, वे इसके सिवा और कह ही क्‍या सकते हैं। वे अपना स्वार्थ देखते हैं, अपनी प्रभुता का सिक्का जमते देखना चाहते हैं। उनके स्वराज्य में गरीबों को, मजदूरों को, किसौनों को स्थान नहीं है, स्थान है केवल अपने लिए, मगर जिस व्यक्ति के हृदय में गरीबों की दिन-दिन गिरती हुई दशा देखकर ज्वाला-सी उठती रहती हैं, जो उनकी मृक वंदना दख-देखकर तड्प रहा है, वह किसी ऐस स्वराज्य की कल्पना से सन्तुष्ट नहीं हो सकता, जिसमें कुछ ऊंचे दरजे क॑ आदमियों का हित हो और प्रजा की दशा ज्यों कि त्यों बनी रहे। हमारी लड़ाई केवल अंग्रेज सत्ताधारियों ही नहीं हिन्दुस्तानी सत्ताधारियों से भी है। हमें ऐसे लक्षण नजर आ रहे हैं कि दोनों सत्ताधारी इस अधार्मिक संग्राम में आपस में मिल जायेंगे और प्रजा को दबाने की, इस आन्दोलन को कुचलने की कोशिश करेंगे। लेकिन यह उन्हीं के हक में बुरा होगा। प्रजा की दशा तो अब जितनी बुरी है, उससे बुरी ओर हो ही क्या सकती है? हां, जो लोग प्रजा के मत्थे ऐश करते हैं, यूरोप में विहार करते हैं, मोटरों में बैठे हुए हवा में उड़ते हैं, उनकी खैरियत नहीं है। हम उन्हें धमकी नहीं दे रहे हैं, धांधली उसी वक्‍त तक हो सकतो है, जब तक जनता सोई हुई है। हम अब भी आशा रखते हैं कि महात्माजी का सदुद्योग सत्ताधारियों के विचारकोण में इच्छित परिवर्तन करेगा। विचारों का परिवर्तन अब तक तलवार से होता आया है, लेकिन विचार- जैसी सूक्ष्म वस्तु पर तलवार का असर या तो होता ही नहीं या होता है तो स्थायी नहीं होता। सूक्ष्म वस्तु पर सूक्ष्म वस्तु का ही

असर पडता है। भारत ने इसके पहले भी संसार के सामने आध्यात्मिक आदर्श रक्खे हैं, वही चेष्टा वह फिर कर रहा है। वह इतिहास की परम्परागत प्रगति को बदल देना चाहता है। वह सफल होगा या विफल, यह दैव के हाथ में है, लेकिन उसकी विफलता भी ऐसी होगी, जिस पर सैकड़ों सफलताएं भेंट की जा सकती हैं।

हमें आशा है कि वाइसराय के हृदय पर इस निवेदन का कुछ असर होगा, वह उस सौजन्य, विनप्रता और सच्चाई की कुछ कद्र करेंगे। पर वाइसराय की ओर से उसका जो जवाब दिया गया है, वह सिद्ध कर रहा है कि महात्माजी का सन्देश उनके हृदय तक नहीं पहुचा।


प्रकाशन इतिहास

[सम्पादकीय। 'हंस', मार्च, 1930 में प्रकाशित। 'साहित्य का उद्देश्य' (प्रथम संस्करण) में संकलित। परन्तु बाद के संस्करणों में इसे हटा दिया गया। 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य' खण्ड-2 में संकलित।]

इस रचना को उद्धृत करें

शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "महात्मा जी का वाइसराय से निवेदन." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1930, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/mahatma-ji-ka-viceroy-se-nivedan. Accessed 22 Sep. 2026.