Cover Image for Manushya Ka Param Dharma (मनुष्य का परम धर्म) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1920•16 मिनट

मनुष्य का परम धर्म

Manushya Ka Param Dharma

प्रेमचंद की 'मनुष्य का परम धर्म' धार्मिक पाखंड, रूढ़िवादिता और स्वार्थ के लिए धर्म के दुरुपयोग पर तीखा हास्य-व्यंग्य है। होली के दिन पंडित मोटेराम शास्त्री और उनके मित्र चिंतामणि इस बात से परेशान हैं कि कहीं से दावत का निमंत्रण नहीं आया। वे गंगा तट पर पहुँचकर अपनी भूख को धर्मोपदेश का रूप देते हैं। मोटेराम शास्त्रों की मनमानी व्याख्या करते हुए सिद्ध करते हैं कि चूँकि ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से निकले हैं, इसलिए मुख को सुख देना मनुष्य का परम धर्म है और ब्राह्मणों को उत्तम-से-उत्तम मिठाइयाँ खिलाना सबसे बड़ा धार्मिक कर्तव्य है। उनका पूरा तर्क वास्तव में मुफ्त भोजन प्राप्त करने का साधन है। जब चिंतामणि भी मिठाइयों की श्रेष्ठता को लेकर अपना अलग 'शास्त्रोक्त' सिद्धांत पेश करता है, तो दोनों पाखंडी धर्माचार्य तर्क-वितर्क से आगे बढ़कर हास्यास्पद शारीरिक झगड़े में उतर आते हैं। प्रेमचंद इस हास्य के माध्यम से सच्चे धर्म और स्वार्थपूर्ण धार्मिक प्रदर्शन के बीच का अंतर उजागर करते हैं।

पात्र:पंडित मोटेराम शास्त्री, चिंतामणि, मोटेराम की पत्नी, गंगा तट पर उपस्थित श्रोता
स्थान:होली के दिन उत्तर भारत का एक शहर, मोटेराम के घर से गंगा और नदी के किनारे एक भीड़भाड़ वाला धार्मिक सभा स्थल तक

मनुष्य का परम धर्म का मूल पाठ

होली का दिन है। लड्डू के भक्त और रसगुल्ले के प्रेमी पंडित मोटेराम शास्त्री अपने आँगन में एक टूटी खाट पर सिर झुकाये, चिंता और शोक की मूर्ति बने बैठे हैं। उनकी सहधर्मिणी उनके निकट बैठी हुई उनकी ओर सच्ची सहवेदना की दृष्टि से ताक रही है और अपनी मृदुवाणी से पति की चिंताग्नि को शांत करने की चेष्टाकर रही है।

पंडितजी बहुत देर तक चिंता में डूबे रहने के पश्चात् उदासीन भाव से बोले- नसीबा ससुरा ना जाने कहाँ जाकर सो गया। होली के दिन भी न जागा !

पंडिताइन- दिन ही बुरे आ गये हैं। इहाँ तो जौन ते तुम्हारा हुकुम पावा ओही घड़ी ते साँझ-सबेरे दोनों जून सूरजनरायन से ही बरदान माँगा करिहैं कि कहूँ से बुलौवा आवै, सैकड़न दिया तुलसी माई का चढ़ावा, मुदा सब सोय गये। गाढ़ परे कोऊ काम नाहीं आवत है।

मोटेराम- कुछ नहीं, ये देवी-देवता सब नाम के हैं। हमारे बखत पर काम आवें तब हम जानें कि कोई देवी-देवता। सेंत-मेंत में मालपुआ और हलुवा खानेवाले तो बहुत हैं।

पंडिताइन- का सहर-भर माँ अब कोई भलमनई नाहीं रहा ? सब मरि गये ?

मोटेराम- सब मर गये, बल्कि सड़ गये। दस-पाँच हैं तो साल-भर में दो-एक बार जीते हैं। वह भी बहुत हिम्मत की तो रुपये की तीन सेर मिठाई खिला दी। मेरा बस चलता तो इन सबों को सीधे कालेपानी भिजवा देता, यह सब इसी अरियासमाज की करनी है।

पंडिताइन- तुमहूँ तो घर माँ बैठे रहत हो। अब ई जमाने में कोई ऐसन दानी नाहीं है कि घर बैठे नेवता भेज देय। कभूँ-कभूँ जुबान लड़ा दिया करौ।

मोटेराम- तुम कैसे जानती हो कि मैंने जबान नहीं लड़ाई ? ऐसा कौन रईस इस शहर में है, जिसके यहाँ जाकर मैंने आशीर्वाद न दिया हो; मगर कौन ससुरा सुनता है, सब अपने-अपने रंग में मस्त हैं।

इतने में पंडित चिन्तामणिजी ने पदार्पण किया। यह पंडित मोटेरामजी के परम मित्र थे। हाँ, अवस्था कुछ कम थी और उसी के अनुकूल उनकी तोंद भी कुछ उतनी प्रतिभाशाली न थी।

मोटेराम- कहो मित्र, क्या समाचार लाये ? है कहीं डौल ?

चिंतामणि- डौल नहीं, अपना सिर है ! अब वह नसीब ही नहीं रहा।

मोटेराम- घर ही से आ रहे हो ?

चिंतामणि- भाई, हम तो साधू हो जायँगे। जब इस जीवन में कोई सुख ही नहीं रहा तो जीकर क्या करेंगे ? अब बताओ कि आज के दिन अब उत्तम पदार्थ न मिले तो कोई क्योंकर जिये।

मोटेराम- हाँ भाई, बात तो यथार्थ कहते हो।

चिंतामणि- तो अब तुम्हारा किया कुछ न होगा ? साफ-साफ कहो, हम संन्यास ले लें।

मोटेराम- नहीं मित्र, घबराओ मत। जानते नहीं हो, बिना मरे स्वर्ग नहीं मिलता। तर माल खाने के लिए कठिन तपस्या करनी पड़ती है, हमारी राय है कि चलो, इसी समय गंगातट पर चलें और वहाँ व्याख्यान दें। कौन जाने किसी सज्जन की आत्मा जागृत हो जाय।

चिंतामणि- हाँ, बात तो अच्छी है; चलो चलें।

दोनों सज्जन उठकर गंगाजी की ओर चले, प्रातःकाल था। सहस्रो मनुष्य स्नान कर रहे थे। कोई पाठ करता था। कितने ही लोग पंडों की चौकियों पर बैठे तिलक लगा रहे थे। कोई-कोई तो गीली धोती ही पहने घर जा रहे थे।

दोनों महात्माओं को देखते ही चारों तरफ से ‘नमस्कार’, ‘प्रणाम’ और ‘पालागन’ की आवाजें आने लगीं। दोनों मित्र इन अभिवादनों का उत्तर देते गंगातट पर जा पहुँचे और स्नानादि में प्रवृत्त हो गये। तत्पश्चात् एक पंडे की चौकी पर भजन गाने लगे। वह ऐसी विचित्र घटना थी कि सैकड़ों आदमी कौतूहलवश आकर एकत्रित हो गये। जब श्रोताओं की संख्या कई सौ तक पहुँच गयी तो पंडित मोटेराम गौरवयुक्त भाव से बोले- सज्जनों, आपको ज्ञात है कि जब ब्रह्मा ने इस असार संसार की रचना की तो ब्राह्मणों को अपने मुख से निकाला। किसी को इस विषय में शंका तो नहीं है।

श्रोतागण- नहीं महाराज, आप सर्वथा सत्य कहते हो। आपको कौन काट सकता है।

मोटेराम- तो ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से निकले, यह निश्चय है। इसलिए मुख मानव शरीर का श्रेष्ठतम भाग है। अतएव मुख को सुख पहुँचाना, प्रत्येक प्राणी का परम कर्त्तव्य है। है या नहीं ? कोई काटता है हमारे वचन को ? सामने आये। हम उसे शास्त्रह का प्रमाण दे सकते हैं।

श्रोतागण- महाराज, आप ज्ञानी पुरुष हो। आपको काटने का साहस कौन कर सकता है ?

मोटेराम- अच्छा, तो जब यह निश्चय हो गया कि मुख को सुख देना प्रत्येक प्राणी का परम धर्म है, तो क्या यह देखना कठिन है कि जो लोग मुख से विमुख हैं, वे दुःख के भागी हैं। कोई काटता है इस वचन को ?

श्रोतागण- महाराज, आप धन्य हो, आप न्यायशास्त्रा के पंडित हो।

मोटेराम- अब प्रश्न यह होता है कि मुख को सुख कैसे दिया जाय ? हम कहते हैं- जैसी तुममें श्रद्धा हो, जैसा तुममें सामर्थ्य हो। इसके अनेक प्रकार हैं, देवताओं के गुण गाओ, ईश्वर-वंदना करो, सत्संग करो और कठोर वचन न बोलो। इन बातों से मुख को सुख प्राप्त होगा। किसी को विपत्ति में देखो तो उसे ढाढ़स दो। इससे मुख को सुख होगा; किंतु इन सब उपायों से श्रेष्ठ, सबसे उत्तम, सबसे उपयोगी एक और ही ढंग है। कोई आप में ऐसा है जो उसे बतला दे ? है कोई, बोले।

श्रोतागण- महाराज, आपके सम्मुख कौन मुँह खोल सकता है। आप ही बताने की कृपा कीजिए।

मोटेराम- अच्छा, तो हम चिल्लाकर, गला फाड़-फाड़कर कहते हैं कि वह इन सब विधियों से श्रेष्ठ है। उसी भाँति जैसे चंद्रमा समस्त नक्षत्रों में श्रेष्ठ है।

श्रोतागण- महाराज, अब विलम्ब न कीजिए। यह कौन-सी विधि है ?

मोटेराम- अच्छा सुनिए, सावधान होकर सुनिए। वह विधि है मुख को उत्तम पदार्थों का भोजन करवाना, अच्छी-अच्छी वस्तु खिलाना। कोई काटता है हमारी बात को? आये, हम उसे वेद-मंत्रों का प्रमाण दें।

एक मनुष्य ने शंका की- यह समझ में नहीं आता कि सत्यभाषण से मिष्ट-भक्षण क्योंकर मुख के लिए अधिक सुखकारी हो सकता है ?

कई मनुष्यों ने कहा- हाँ-हाँ, हमें भी यही शंका है। महाराज, इस शंका का समाधान कीजिए।

मोटेराम- और किसी को कोई शंका है ? हम बहुत प्रसन्न होकर उसका निवारण करेंगे। सज्जनो, आप पूछते हैं कि उत्तम पदार्थों का भोजन करना और कराना क्योंकर सत्यभाषण से अधिक सुखदायी है। मेरा उत्तर है कि पहला रूप प्रत्यक्ष है और दूसरा अप्रत्यक्ष। उदाहरणतः कल्पना कीजिए कि मैंने कोई अपराध किया। यदि हाकिम मुझे बुलाकर नम्रतापूर्वक समझाये कि पंडितजी, आपने यह अच्छा काम नहीं किया, आपको ऐसा उचित नहीं था, तो उसका यह दंड मुझे सुमार्ग पर लाने में सफल न होगा। सज्जनो, मैं ऋषि नहीं हूँ, मैं दीन-हीन मायाजाल में फँसा हुआ प्राणी हूँ। मुझ पर इस दंड का कोई प्रभाव न होगा। मैं हाकिम के सामने से हटते ही फिर उसी कुमार्ग पर चलने लगूँगा। मेरी बात समझ में आती है ? कोई इसे काटता है ?

श्रोतागण- महाराज ! आप विद्यासागर हो, आप पंडितों के भूषण हो। आपको धन्य है।

मोटेराम- अच्छा, अब उसी उदाहरण पर फिर विचार करो। हाकिम ने बुलाकर तत्क्षण कारागार में डाल दिया और वहाँ मुझे नाना प्रकार के कष्ट दिये गये। अब जब मैं छुटूँगा, तो बरसों तक यातनाओं को याद करता रहूँगा और सम्भवतः कुमार्ग को त्याग दूँगा। आप पूछेंगे, ऐसा क्यों है ? दंड दोनों ही हैं, तो क्यों एक का प्रभाव पड़ता है और दूसरे का नहीं। इसका कारण यही है कि एक का रूप प्रत्यक्ष है और दूसरे का गुप्त। समझे आप लोग ?

श्रोतागण- धन्य हो कृपानिधान ! आपको ईश्वर ने बड़ी बुद्धि-सामर्थ्य दी है।

मोटेराम- अच्छा, तो अब आपका प्रश्न होता है उत्तम पदार्थ किसे कहते हैं ? मैं इसकी विवेचना करता हूँ। जैसे भगवान् ने नाना प्रकार के रंग नेत्रों के विनोदार्थ बनाये, उसी प्रकार मुख के लिए भी अनेक रसों की रचना की; किंतु इन समस्त रसों में श्रेष्ठ कौन है ? यह अपनी-अपनी रुचि है; लेकिन वेदों और शास्त्रों के अनुसार मिष्ट रस माना जाता है। देवतागण इसी रस पर मुग्ध होते हैं, यहाँ तक कि सच्चिदानंद, सर्वशक्तिमान् भगवान् को भी मिष्ट पाकों ही से अधिक रुचि है। कोई ऐसे देवता का नाम बता सकता है जो नमकीन वस्तुओं को ग्रहण करता हो ? है कोई जो ऐसी एक भी दिव्य ज्योति का नाम बता सके। कोई नहीं है। इसी भाँति खट्टे, कड़ुवे और चरपरे, कसैले पदार्थों से भी देवताओं को प्रीति नहीं है।

श्रोतागण- महाराज, आपकी बुद्धि अपरम्पार है।

मोटेराम- तो यह सिद्ध हो गया कि मीठे पदार्थ सब पदार्थों में श्रेष्ठ है। अब आपका पुनः प्रश्न होता है कि क्या समग्र मीठी वस्तुओं से मुख को समान आनंद प्राप्त होता है। यदि मैं कह दूँ ‘हाँ’ तो आप चिल्ला उठोगे कि पंडितजी तुम बावले हो, इसलिए मैं कहूँगा, ‘नहीं’ और बारम्बार ‘नहीं’। सब मीठे पदार्थ समान रोचकता नहीं रखते। गुड़ और चीनी में बहुत भेद है। इसलिए मुख को सुख देने के लिए हमारा परम कर्त्तव्य है कि हम उत्तम-से-उत्तम मिष्ट-पाकों का सेवन करें और करायें। मेरा अपना विचार है कि यदि आपके थाल में जौनपुर की अमृतियाँ, आगरे के मोतीचूर, मथुरा के पेड़े, बनारस की कलाकंद, लखनऊ के रसगुल्ले, अयोध्या के गुलाबजामुन और दिल्ली का हलुआ-सोहन हो तो यह ईश्वर-भोग के योग्य है। देवतागण उस पर मुग्ध हो जायँगे। और जो साहसी, पराक्रमी जीव ऐसे स्वादिष्ट थाल ब्राह्मणों को जिमायेगा, उसे सदेह स्वर्गधाम प्राप्त होगा। यदि आपको श्रद्धा है तो हम आपसे अनुरोध करेंगे कि अपना धर्म अवश्य पालन कीजिए, नहीं तो, मनुष्य बनने का नाम न लीजिए।

पंडित मोटेराम का भाषण समाप्त हो गया। तालियाँ बजने लगीं। कुछ सज्जनों ने इस ज्ञान-वर्षा और धर्मोपदेश से मुग्ध होकर उन पर फूलों की वर्षा की। तब चिंतामणि ने अपनी वाणी को विभूषित किया-

‘सज्जनो, आपने मेरे परम मित्र पंडित मोटेराम का प्रभावशाली व्याख्यान सुना और अब मेरे खड़े होने की आवश्यकता न थी; परन्तु जहाँ मैं उनसे और सभी विषयों में सहमत हूँ, वहाँ उनसे मुझे थोड़ा मतभेद भी है। मेरे विचार में यदि आपके हाथ में केवल जौनपुर की अमृतियाँ हों तो वह पंचमेल मिठाइयों से कहीं सुखवर्द्धक, कहीं स्वादपूर्ण और कहीं कल्याणकारी होगा। इसे मैं शास्त्रोक्त सिद्ध करता हूँ।

मोटेराम ने सरोष होकर कहा- तुम्हारी यह कल्पना मिथ्या है। आगरे के मोतीचूर और दिल्ली के हलुवा-सोहन के सामने जौनपुर की अमृतियों की तो गणना ही नहीं है।

चिंता.- प्रमाण से सिद्ध कीजिए ?

मोटेराम- प्रत्यक्ष के लिए प्रमाण ?

चिंता.- यह तुम्हारी मूर्खता है।

मोटेराम- तुम जन्म-भर खाते ही रहे, किंतु खाना न आया।

इस पर चिंतामणि ने अपनी आसनी मोटेराम पर चलायी। शास्त्रीजी ने वार खाली दिया और चिंतामणि की ओर मस्त हाथी के समान झपटे; किंतु उपस्थित सज्जनों ने दोनों महात्माओं को अलग-अलग कर दिया।


मनुष्य का परम धर्म का सारांश

'मनुष्य का परम धर्म' कहानी धार्मिक पाखंड, रूढ़िवादिता और स्वार्थ सिद्धि के लिए धर्म व शास्त्रों के बेतुके दुरुपयोग पर प्रेमचंद की एक अत्यंत मनोरंजक हास्य-व्यंग्यात्मक रचना है। कहानी की शुरुआत होली के दिन से होती है। पंडित मोटेराम शास्त्री अपने घर में उदास बैठे हैं क्योंकि होली जैसे बड़े त्यौहार के दिन भी उन्हें कहीं से दावत (मुफ्त भोजन व मिठाई) का निमंत्रण नहीं मिला है। उनके मित्र पंडित चिंतामणि भी इसी गम में डूबे हैं और अच्छा भोजन न मिलने पर संन्यास लेने की बात करने लगते हैं। अंततः दोनों पंडित तय करते हैं कि वे गंगा तट पर जाकर लोगों को धर्मोपदेश देंगे, ताकि किसी सज्जन की आत्मा जागे और वह उन्हें उत्तम पकवानों की दावत पर आमंत्रित करे।

दोनों पंडित गंगा तट पर पहुँचते हैं, जहाँ हजारों लोग स्नान व पूजा-पाठ में मग्न हैं। एक पंडे की चौकी पर बैठकर वे पहले भजन गाते हैं और जब सैकड़ों लोगों की भीड़ जमा हो जाती है, तो मोटेराम शास्त्री अपना 'शास्त्रोक्त' भाषण शुरू करते हैं। मोटेराम अपनी भूख को धार्मिक रूप देते हुए कुतर्कों की झड़ी लगा देते हैं। वे कहते हैं कि चूँकि ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न हुए हैं, इसलिए 'मुख' ही मानव शरीर का सबसे श्रेष्ठ अंग है। अतः 'मुख को सुख देना ही मनुष्य का परम धर्म' है।

इसके बाद मोटेराम सिद्ध करते हैं कि मुख को सुख देने के बाकी तरीके (ईश्वर-वंदना, सत्संग, मधुर बोलना आदि) द्वितीय श्रेणी के हैं; सबसे उत्तम तरीका है—मुख को श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ मिठाइयाँ खिलाना। वे तर्क देते हैं कि वेदों-शास्त्रों में भी मीठा रस ही सर्वोपरि है और सभी देवी-देवता केवल मीठा भोजन (मिष्टान्न) ही ग्रहण करते हैं। फिर वे जौनपुर की अमृति, आगरा के मोतीचूर, मथुरा के पेड़े, बनारस की कलाकंद, लखनऊ के रसगुल्ले, अयोध्या के गुलाबजामुन और दिल्ली के हलुआ-सोहन से सजे थाल की कल्पना करते हैं और घोषणा करते हैं कि जो भी साहसी व्यक्ति ब्राह्मणों को ऐसी उत्तम मिठाइयाँ खिलाएगा, वह सशरीर स्वर्ग प्राप्त करेगा। भीड़ उनके इस 'ज्ञान' पर मुग्ध होकर तालियाँ बजाती है और फूल बरसाती है।

तभी पंडित चिंतामणि खड़े होते हैं और कहते हैं कि वे मोटेराम की बात से सहमत हैं, परंतु उनके मतानुसार पंचमेल मिठाइयों के बजाय केवल 'जौनपुर की अमृतियों' का थाल ही सर्वोपरि और कल्याणकारी है। इस बात पर दोनों 'धर्माचार्यों' में शास्त्रार्थ छिड़ जाता है। मोटेराम आगरा के मोतीचूर को श्रेष्ठ बताते हैं और चिंतामणि जौनपुर की अमृति को। देखते ही देखते शास्त्रार्थ का आवरण उतर जाता है और दोनों पाखंडी पंडित अपनी-अपनी पसंद की मिठाई पर आपस में तू-तू, मैं-मैं और हास्यास्पद मारपीट पर उतर आते हैं। चिंतामणि अपनी आसनी मोटेराम पर फेंकते हैं और मोटेराम उन पर मत्त हाथी की तरह झपटते हैं, जिसे देख उपस्थित लोग बीच-बचाव कर दोनों को अलग करते हैं।


प्रकाशन इतिहास

प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • धार्मिक पाखंड और स्वार्थ सिद्धि का पर्दाफ़ाश: कहानी यह उजागर करती है कि कैसे ढोंगी पंडित और धर्म के ठेकेदार अपनी निजी वासनाओं और पेट की भूख को शांत करने के लिए धर्म, वेद और शास्त्रों का मनघड़ंत इस्तेमाल करते हैं।
  • रूढ़िवादी जनता का अंधविश्वास: गंगा तट पर एकत्र जनसमूह बिना तर्क और विवेक के मोटेराम के हास्यास्पद कुतर्कों को 'शास्त्रोक्त सत्य' मानकर तालियाँ बजाता है और फूल बरसाता है। यह समाज की अंधी श्रद्धा पर करारा व्यंग्य है।
  • ब्राह्मणवादी श्रेष्ठता के दंभ पर प्रहार: मोटेराम द्वारा स्वयं को 'ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न' बताकर समाज से मुफ़्त की मिठाइयाँ ऐंठने की वृत्ति पर प्रेमचंद ने तीखा प्रहार किया है।
  • सिद्धांतहीनता और हास्यास्पद दोहरा चरित्र: जो पंडित कुछ क्षण पहले 'मनुष्य के परम धर्म' का उपदेश दे रहे थे, वे ज़रा-सी मिठाई की पसंद पर अपना आपा खोकर एक-दूसरे से मारपीट करने लगते हैं, जिससे उनके तथाकथित ज्ञान और अध्यात्म का खोखलापन उजागर हो जाता है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'मनुष्य का परम धर्म' बाह्य धार्मिक ढोंग और पंडिताई के आडंबर पर एक कालजयी हास्य-व्यंग्य है। प्रेमचंद यह संदेश देते हैं कि धर्म का वास्तविक अर्थ स्वार्थ या पेट भरना नहीं, बल्कि निष्कपटता और विवेक है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "मनुष्य का परम धर्म." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1920, https://munshipremchand.com/works/short-stories/manushya-ka-param-dharma. Accessed 22 Sep. 2026.