Cover Image for Hindi-Urdu Ki Ekta (हिन्दी-उर्दू की एकता) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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भाषण•1936•39 मिनट

हिन्दी-उर्दू की एकता

Hindi-Urdu Ki Ekta

लाहौर के आर्य भाषा सम्मेलन में प्रेमचंद का प्रसिद्ध भाषण, जिसमें उन्होंने हिन्दी और उर्दू की साझा विरासत और भाषाई एकता पर बल दिया।

Work Details

प्रकार: भाषण
वर्ष: 1936
पठन समय: 39 मिनट (5,815 शब्द)

सज्जनो, आर्य समाज ने इस सम्मेलन का नाम आर्य भाषा सम्मेलन शायद इसलिए रखा है कि यह समाज के अंतर्गत उन भाषाओं का सम्मेलन है, जिनमें आर्यम्रमाज ने धर्म का प्रचार किया है। और उनमें उर्दू और हिन्दी दोनों का दर्जा बराबर है। म॑ तो आर्यसमाज को जितनी धार्मिक संस्था समझता हूं उतनी तहजीवी ( सांस्कृतिक * संस्था भी समझता हूं। बल्कि आप क्षमा करें तो में कहूंगा कि उसके तहजीबी कारनाम उसके थार्मिक कारनामों से ज्यादा प्रसिद्ध और रौशन है। आर्य समाज ने साबित ऊर दिया है कि सेवा ही किसी धर्म के सजीव होने का लक्षण है। सेवा का ऐसा कौन

सा क्षेत्र है जिसमें उसकी कीर्ति की ध्वजा न उड़ रही हो। कौमी जिंदगी की समस्‍्णओ को हल करने में उसने जिस दूरंदेशों का सबूत दिया है, उस पर हम गर्व कर सकते हैं। हरिजनों के उद्धार में सबसे पहले आर्यसमाज ने कदम उठाया। लड़कियों को शिक्षा की जरूरत को सबसे पहले उसने समझा। वर्ण -व्यवस्था को जन्मगत न मानकर कर्मगत सिद्ध करने का सेहरा उसके सिर है। जाति भेद-भाव और खान-पान के छूत छात और चौके-चुल्हे कौ बाधाओं को मिटाने का गौरव उसी को प्राप्त है। यह ठीक है कि ब्रह्मसमाज ने इस दिशा में पहले कदम रखा, पर वह थोड़े से अंग्रेजी पढ़े-लिखा तक हो रह गया। इन विचारों को जनता तक पहचाने का बीड आर्यसमाज ने हों उठाया। अंधविश्वास और धर्म के नाम पर किये जाने वाले हजारों अनाचारों को केंत्र

उसने खोदी, हालांकि मुर्दे को उसमें दफन न कर सका और अभी तक उसका जहरीली दुर्गनध उड़-उड़कर समाज को दूषित कर रही है। समाज के मानसिक और बौद्धिक धरातल (सतह) को आर्यसमाज ने जितना उठाया है, शायद ही भारत कौ किसी संस्था ने कक हो। उसके उपदेशकों ने बेदों और वेदांगों के गहन विषयों को जन- साधारण की संपत्ति बना दिया, जिन पर विद्वानों और आचार्यों के कई -कई लीवर वाले ताले लगे हुए थे। आज आर्यसमाज के उत्सवों और गुरुकुलों के जलसों में हजारों मामूली लियाकत के स्त्री-पुरुष सिर्फ विद्वानों के भाषण सुनने का आनंद उठाने के लिए खिंचे चले जाते हैं। गुरुकुलाश्रम को नया जन्म देकर आययंसमाज ने शिक्षा को संपूर्ण बनाने का महान उद्योग किया है। सं|[र्ण से मे! आशय उस शिक्षा का है जो सर्वांगपूर्ण हो, जिसमें मन, बुद्धि, चरित्र और देह, सभी के विकास का अवसर मिले। शिक्षा का वर्तमान आदर्श यही है। मेरे ख्याल में वह चिस्सत्य है। वह शिक्षा जो सिर्फ अक्ल तक ही रह जाय, अधूरी है। जिन संस्थाओं में युवकों में समाज से पृथक्‌ रहने वाली मनोवृत्ति पैदा हो, जो अमीर और गरीब के भेद को न सिर्फ कायम रखे बल्कि और मजबूत करे, जहां पुरुषार्थ इतना कोमल बना दिया जाय (क उसमें मुशकिलों करा सामना करने की शक्ति न रह जाय, जहां कला और संयम में कोई मेल न हो, जहां की कलश! केवल नाचने गाने और नकल करते में ही जाहिर हो, उस शिक्षा का में कायल नहीं हूं। शायद ही मुल्क में कोई ऐसी शिक्षा संस्था हो जिसने कौम की पुकार का इतनी जवांमर्दी से स्वागत किया हो। अगर विद्या हममें सेवा और त्याग का भाव न लाये, अगर विद्या हमें आदर्श के लिए सीना खोलकर खड़ा होना न सिखाये, अगर विद्या हममें स्वाभिमान न पैदा करें, और हमें तमाज के जीवनप्रवाह से अलग रखे तो उस चिद्या से हमारी अविद्या अच्छी। और समाज ने हमारी भाषा के साथ जो उपकार किया है उसका सबसे उज्ज्वल प्रमाण यह है कि स्वामी दयानंद ने इसी भाषा में सत्यार्थ प्रकाश लिखा और उस वक्‍त लिखा जब उसकी इतनी चर्चा न थी। उनकी बारीक नजर ने देख लिया कि अगर जनता में प्रकाश ले ना है तो उसके लिए हिन्दी भाषा ही अकेला साधन है, और गुरुकुलों ने हिन्दी भाषा ४ शक्षा माध्यम बनाकर अपने भाषा प्रेम को और भी सिद्ध कर दिया है।

सज्जनो, मैं यहां हिन्दी भाषा को उत्पात्त ओर विकास का कथा नहीं कहना चाहता, वह सारी कथा भाषा विज्ञान करी पोधियों में लिखी हुई है। हमारे लिए इतना ही जानना काफी है कि आज हिन्दुस्तान के पंद्रह -सोलह करोड़ लोगों के सभ्य व्यवहार और साहित्य की यही भाषा है। हां, वह लिखी जाती है दो लिपियों में भौर उसी एतबार से हम उसे हिन्दी या उर्दू कहते हैं। पर है वह एक ही। बोलचाल में तो उसमे हा कम फर्क है, हां लिखने में वह फर्क बढ़ जाता है। मगर उस तरद यद्र फक सिफ हिन्दी में हो नहीं, गुजराती, बंगला और मराठी वगैरह भाषाओं में भी कमाबरा के ॥ ही फक पाया जाता है। भाषा के विकास में हमारी संस्कृति का छाप होती है, और जहां संस्कृति में भेद होगा वहां भाषा में भेद होना स्वाभातिक है। जिस भाषा का हम और आप व्यवहार कर रहे हैं, वह देहली प्रांत की भाषा है। उसी तरह जैसे ब्रजभाषा, अवधी, मैथिली, भोजपुरी और मारवाड़ी आदि भाषाएं अलग -अलाग क्षेत्रों में बोली जाती हैं ओर सभी

साहित्यिक भाषा रह चुकी हैं। बोली का परिमार्जित रूप ही भाषा है। सबसे ज्यादा प्रसार तो ब्रज भाषा का है क्योंकि यह आगरा प्रांत के बड़े हिस्से की ही नहीं, सारे बुंदेलखंड की बोल-चाल की भाषा है। अवधी अवध प्रांत की भाषा है। भोजपुरी प्रांत के पूर्वी जिलों में बोली जाती है, और मैथिली बिहार प्रांत के कई जिलों में। ब्रजभाषा में जो साहित्य रचा गया है, वह हिन्दी के पद्य-साहित्य का गौरव है। अवधी का प्रमुख ग्रंथ तुलसीकृत रामायण और मलिक मुहम्मद जायसी का रचा हुआ पद्मावत है। मैथिली में विद्यापति की रचनाएं ही मशहूर हैं। मगर साहित्य में आमतौर पर मैथिली का व्यवहार कम हुआ। साहित्य में अवधी और ब्रजभाषा का व्यवहार होता था। हिन्दी के विकास के पहले ब्रजभाषा ही हमारी साहित्यिक भाषा थी और प्राय: उन सभी प्रदेशों में जहां आज हिन्दी का प्रचार है, पहले ब्रजभाषा का प्रचार था। अवध में और काशी में भी कवि लोग अपने कवित्त ब्रजभाषा में ही कहते थे। यहां तक कि गया में भी ब्रजभाषा का ही प्रचार होता था। तो यकायक ब्रजभाषा, अवधी, भोजपुरी आदि को पीछे हटाकर हिन्दी केसे सबके ऊपर गालिब आयी, यहां तक कि अब अवधी और भोजपुरी का तो साहित्य में कहीं व्यवहार नहीं है। हां, बत्रजभाषा को अभी तक थोडे-से लोग सीने से चिपटाये हुए हैं। हिन्दी को यह गौरव प्रदान करने का श्रेय मुसलमानों को है। मुसलमानों ने ही दिल्ली प्रांत की इस बोली को, जिसको उस वक्‍त तक भाषा का पद न मिला था, व्यवहार में लाकर उसे दरबार की भाषा बना दिया और दिल्‍ली के उमर और सामंत जिन प्रांतों में गये, हिन्दी भाषा को साथ लेते गये। उन्हीं के साथ वह दकिशन में पहुंची ओर उसका बचपन दक्खिन ही में गुजरा। दिल्ली में बहुत दिनों तक अराजकता का जोर रहा, और भाषा को विकास का अवसर न मिला। और दक्खिन में वह पलती रहो। गोलकुंडा, बीजापुर, गुलवर्गा आदि क॑ दरबारों में इसी भाषा में शेर -शायरी होती रही। मुसलमान बादशाह प्राय: साहित्य प्रेमी होते थे। बाबर, हुमायूं, जहांगीर, शाहजहां, औरंगजेब, दाराशिकोह सभी साहित्य के मर्मज्ञ थे। सभी ने अपने - अपने रोजनामचे लिखे हैं। अकबर खुद शिक्षित न हो, मगर साहित्य का रसिक था। दक्खिन के बादरशाहों में अकबर ने कविताएं कीं और कवियों को आश्रय दिया। पहले तो उनकी भाषा कुछ अजीब खिचड़ी-सी थी जिसमें हिन्दी, फारसी सब कुछ मिला होता था। आपका शायद मालूम होगा कि हिन्दी की सबसे पहली रचना खुसरो ने की है, जो मुगलां से भी पहले खिलजी राजकाल में हुए। खुसरों की कविता का एक नमूना देखिये जब यार देखा नैन भर, दिल की गयी चिंता उतर, ऐसा नहीं कोई अजब, राखे उसे समझाय कर। जब आंख से ओझल भया, तड़पन लगा मेरा जिया, हकक्‍का इलाहीं क्‍या क्या आंसू चले भरलाय कर।। तूं तो हमारा यार है, तुम पर हमारा प्यार है, तुझ दोस्ती बिसियार है, यक शब मिलो तुम आय कर। मेरा जो मन तुमने लिया, तुमने उठा गम को दिया, गम ने मुझे ऐसा किया जैसे पतंगा आग परा।

खुसरो की एक दूसरी गजल देखिये-.

बह गये बालम, वह गये नदियों किनार, आप पार उतर गये हम तो रहे अरदार। भाई रे मल्लाहो हम को उतारो पार हाथ का देऊंगी मुंदगी गल का देऊं हार।

मुसलमानी जमाने में अवश्य ही हिन्दी के तीन रूप होंगे। एक नागरी लिपि में ठेठ हिन्दी, जिसे भाषा या नागरी कहते थे, दूसरा उर्दू यानी फारसी लिपि में लिखी हुई, फारसी से मिली हुई हिन्दी और तीसरी ब्रजभाषा। लेकिन हिन्दी -भाषा मौजूदा सूरत में आते- आते सदिया गुजर गयीं। यहां तक कि सन्‌ 803 ई० से पहले कोई ग्रंथ नहीं मिलता। सदल मिश्रा को 'चन्द्रावती' का रचनाकाल 803 माना जाता है और सदल मिश्र ही हिन्दी के आदि लेखक ठहरते हैं। इसके बाद लल्लूजी, सैयद इंशा अल्लाह खां वगैरह के नाम हैं। इस लिहाज से हिन्दी गद्य का जीवन सवा सौ साल से ज्यादा' का नहीं है, और क्‍या यह आशचर्य की बात नहीं है कि सवा सौ साल पहले जिस जबान में कोई गद्य-रचना तक न थी वह आज सारे हिन्दुस्तान की कौमी जबान बनी हुई है? और इसमें मुसलमानों का कितना सहयोग है, यह हम बता चुके हैं। हमें संदेह है कि मुगलमानों का सहारा पाये बगैर हृमझो आज यह दरजा हासिल होता। जिस तरह हिन्दुओं की हिन्दी का रूप विकसित हो रहा था, उसी तरह मुसलमानों को हिन्दी का रूप भी बदलता जा रहा था। लिपि तो शुरू से ही अलग थी, जबान का रूप भी बदलने लगा। मुसलमानों को संस्कृति ईशान और अरब को है। उसका जबान पर असर पड़ने लगा। अरबी और फारसी के शब्द उसमें आ-आकर मिलने लगे, यहां तक कि आज हिन्दी और उर्दू दो अलग अलग जबानें-सी हो गयी हैं। एक तरफ हमारे मौलवी साहबान अरबी ओर फारसी शब्द भरते जाते हैं, दूसरी ओर पंडितगण, संस्कृत और प्राकृत के शब्द दूंस रहे हैं और दोनों भाषाएं जनता से दूर होती जा रही हैं। हिन्दुओं की खासी तादाद अभी तक उर्दू पढ़ती दा 'ही है, लेकिन उनकी तादाद दिन-दिन घट रही है। मुसलमानों ने हिन्दी से कोई सरो< ९ रखना छोड़ दिया। तो क्‍या यह तै समझ लिया जाय कि उत्तर भारत में उर्दू और हिन्दी दो भाषाएं अलग अलग रहेंगी: उन्हें अपने-अपने ढंग पर, अपनी-अपनी संस्कृति के अनुसार बढ़ने दिया जाय, उनको मिलने की और इस तरह उन दोनों की प्रगति को रोकने की कोशिश न की जाय? या ऐसा संभव है कि दोनों भाषाओं को इतना समीप लाया जाय कि उनमें लिपि के सिवा कोई भेद न रहे। बहुमत पहले निश्चप की और है। रां, कुछ थोड़े-से लोग ऐसे भी हैं जिनका ख्याल है कि दोनों भाषाओं में एकता लाई जा सकती है, और इस बढ़ते हुए फर्क को रोका जा सकता है; लेकिन उनको आवाज नक्कारखाने में तूतो की आवाज है। ये लोग हिंदी और उर्दू नामों का व्यल्डार नहीं करते, क्योंकि दो नामों का व्यवहार उनके भेद को और मजबूत करता है। यह लोग दोनों को एक नाम से पुकारते हैं और वह ' हिन्दुस्तानी' है। उनका आदर्श है कि जहां तक मुमकिन हो लिखी जाने वाली जबान और बोलचाल की जबान को सूरत एक हो, और वह थोड़े से पढ़े-लिखे आदमियों की जबान न रहकर सारी कौम की

जबान हो। जो कुछ लिखा जाय उसका फायदा जनता भी उठा सके, और हमारे यहां पढे-लिखों की जो एक जमाअत अलग बनती जा रही है, और जनता से उनका संबंध जो दूर होता जा रहा है, वह दूरी मिट जाय और पढ़े-बेपढ़े सब अपने का एक जान, एक दिल समझें और कौम में ताकत आवे। चूंकि उर्दू जबान अरसे से अदालती और सभ्य-समाज की भाषा रही है, इसलिए उसमें हजारों फारसी और अरबी के शब्द इस तरह घुल-मिल गए है, कि बज्र देहाती भी उनका मतलब समझ जाता है। ऐसे शब्दों को अलग करके हिन्दी में विशुद्धता लाने का प्रयत्त किया जा रहा है, हम उसे जबान और कौम दोनों ही के साथ अन्याय समझते हैं। इसी तरह हिन्दी या संस्कृत या अंग्रेजी के जो बिगड़े हुए शब्द उर्दू में मिल गए, उनको चुन-चुनकर निकासने और उनको जगह खालिस फारसी और अरबी के शब्दों के इस्तेमाल को भी उतना ही एतराज के लायक समझते हैं। दोनों तरह से इस अलगौझे का सबब शायद यही है कि हमारा पढ़ा-लिखा समाज जनता से अलग-थलग होता जा रहा है, और उसे इसकी खबर ही नहीं कि जनता किस तरह अपने भावों ओर विचारों को अदा करती है। ऐसी जबान जिसके लिखने और समझने वाले थोड़े-से पढे-लिखे ही हों, मसनुई बेजान और बोझल हो जाती है। जनता का मर्म स्पर्श करने की, उन तक अपना पैगाम पहुंचाने की, उसमें कोई शक्ति नहीं रहती। वह उस तालाब की तरह है जिसके घाट संगमरमर के बने हों जिसमें कलम खिलें हों, लेकिन उसका पानी बंद हो। कया उस पानी में वह मजा, वह सेहत देने वाली ताकत, वह सफाई है जो खुली हुई धारा में होती हैं? कौम की जबान बह है जिसे कौम समझे, जिसमें कौम की आत्मा शे जिसमें कौम के जज्बात हों। अगर पढे-लिखे समाज की जबान ही कौम की जवान है तो क्‍यों न हम अंग्रेजी को कौम की जबान समझें क्योंकि मेरा तजरबा है के आज पढा-लिखा समाज जिस बेतकल्ललुफी से अंग्रेजी बोल सकता है और जिस रवानी के साथ अंग्रजी लिख सकता है, उर्दू या हिन्दी बोल या लिख नहीं सकता बड़े-बड़े दफ्तगें में और ऊंचे दायरे में आज भी किसी को उद्‌- हिन्दी बोलने का महीनों, बरसों जरूरत नहीं होती। खानसामे और बैरे भी ऐसे रखे जाते हैं जा अग्र०! बालते और समझते हैं। जो लोग इस तरह की जिदंगी बसर करने के शीकीन हैं उनये लिए तो उर्द, हिन्दी, हिन्दुस्तानी का कोई झगड़ा ही नहीं। बह इतनी बुलंदी पर पहच गए हैं कि नीचे की धूल और गर्मी उन पर कोई असर नहीं कर सकती। वह गुअल्लक हवा में लटके रह सकते हैं। लेकिन हम सब तो हमारो कोशिश करने पर भी वहा तक नहीं पहुंच सकते। हमें तो इसी धूलल और गर्मी में जीना और मरना है। ॥लाएएा।ए० में जो कुछ शक्ति और प्रभाव है, बह जनता ही से आता है। उससे अलग रहका वे हाकिम की सूरत में हो रह सकते हैं, खादिम की सूरत में, अनता के होकर नहीं रह सकते। उनके अरमान और मंसूबे उनके हैं, जनता के नहीं। उनकी आबाज उनको है, उसमें जनसमूह की आवाज को गहराई और गरिमा और गंभीरता नहीं है। तह अपने प्रतिनिधि हैं, जनता के प्रतिनिधि नहीं। े

बेशक, यह बड़ा जोरदार जवाब है कि जनता के शिक्षा इतनी कम हैं, समझने की ताकत इतनी कम कि अगर हम उसे जेहन में रखकर कुछ बोलना या लिखता

चाहें, तो हमें लिखना और बोलना बद करना पड़ेगा। यह जनता साहित्य पढ़ने और गहन विषयों को समझने को ताकत अपने में लाए। लेखक का काम तो अच्छी-से-अच्छी भाषा में ऊंचे-से ऊंचे बिचागें को प्रकट करना है। अगर जनता का शब्दकोष सौ-दो सौ निहायत मामूली रोजमर्रा के काम के शब्दों के सिवा और कुछ नहीं है, तो लेखक कितनी ही सरल भाषा लिखे, जनता के लिए वह कठिन का 3 । इस विषय में हम इतना अर्ज करेंगे कि जनता को इस मनसिक दशा में छोड़ने को जिम्मेदारी भी हमारे ही ऊपर है। हममें जिनके पास इल्म है, और फुरसत है, यह उनका फर्ज था कि अपनी तकरीरों से जनता में जागृति पेदा करते, जनता में ज्ञान के प्रचार के लिए पुस्तकें लिखते और सफरी कतबखाने कायम करते। हममें जिन्हें मकदरत है, वह मदरसे खोलने के लिए लाखों रुपये खैरात करते हैं। मैं यह नहीं चाहता कि कौम को ऐसे मुहसिनों को धन्यवाद न देना चाहिए, मगर क्या ऐसा संस्थाएं न खुल सकती थीं और क्‍या उनसे कौम का कछ कम उपकार होता जो भाषणों और पुस्तकों से जनता में साहित्य और विज्ञान का प्रचार करतीं और उनको सभ्यता को ऊंची सतह पर लातों? आर्यसमाज ने जिस तरह कि विषयों का जनता में प्रचार किया है उन विषयों को साधारण पढ़ा-लिखा आर्यसमाजी भी खूब समझता है। अद,लती मामलों का, या मुक्ति और आवागमन जैसे गंभीर विषयों को गांव के किसान भी अगर ज़्यादा नहीं समझते, तो साधारण पढे -लिखों के बराबर तो समझ ही लेते हैं। इसी तरह अन्य बिपयों की चर्चा भी जनता के सामने होती रहती तो हमें यह शिकायत न होती कि जनता हमारे विचारों को समझ नहीं सकती। मगर हमने जनता की परवाह ही कब को हे? हमने केवल उसे दुधारु गाय समझा है। वह हमारे लिए अदालतों में मुक़दम लाती रहे, हमारे कारखानों की बनी हुई चांजें खरीदती रहे। इनके सित्रा हमने उसमे कोई प्रयोजन नहीं रखा, जिसका नतोजा यह है कि आज जनता को अंग्रेजों पर जितना विश्वास है उतना अपने पढे-लिखे भाइयों पर नहीं।

संयुक्त -प्रांत के साबिक से पहले के गवर्नर सर बिलियम मैरिस ने इलाहाबाद को हिन्दुस्तानी एकडेमी खोलते त्रक्‍्त हिन्दी उदूं के लेखकों को जो सलाह दी थी, उसे ध्यान में रखने की आज भी उतनी ही जरूरत हैं, जितनों उस वक्‍त थी. शायद और ज्यादा। आपने फरमाया कि हिन्दों के लेखकों को लिखते वक्‍त यह समझते रहना चाहिए कि उनके पाठक मुसलमान हैं। इसी तरह उर्दू के लेखकों को यह ख्याल रखना चाहिए कि उनके कारी हिन्दू हैं। ह

यह एक सुनहरी सलाह है और अगर हम इसे गांठ बांध लें, तो जबान का मसला बहुत कुछ तय हो जाय। मेरे मुसलमान दोस्त मुझे माफ फरमाएं अगर मैं कहूं कि इस मुआमले में वह हिन्दू लेखकों से ज्यादा खतावार हैं। संयुक्त-प्रांत “ कॉमन लैंग्वेज रीडरों +। दैखिए। आप सहल किम्म की उर्दू पाएंगे। हिन्दी की अदबी किताबों में भी अरबों और फारसी के सैकड़ों शब्द धडल्ले से लाए जाते हैं। मगर उर्दू साहित्य में फारसीयत को तरफ को ज्यादा झुकाव है। इसका सबब यही है कि मुसलमानों ने हिन्दी से कोई ताल्‍्लुक नहीं रखा है और न रखना चाहते हैं। शायद हिन्दी से थोड़ी-सी वाकफियत हासिल कर लेना भी

नता का काम है कि वह

वह बरसरे-शान समझते हैं, हालांकि हिन्दी वह चीज हैं, जो एक हफ्ते में आ जाती है। जब दोनों भाषाओं का मेल न होगा,'हिन्दुस्तानी जबान की गाड़ी जहां जाकर रुक गई है, उससे आगे न बढ़ सकेगी। और यह सारी करामता फोर्ट विलियम की है जिसने एक ही जबान के दो रूप मान लिए। इसमें भी उस वक्‍त कोई राजनीति काम कर रही थी या उस वक्‍त भी दोनों जबानों में काफी फर्क आ गया था, यह हम नहीं कह सकते। लेकिन जिन हाथों ने यहां की जबान के उस वक्‍त दो टुकड़े कर दिए, उसने हमारी कौमी जिंदगी के दो टुकड़े कर दिए। अपने हिन्दू दोस्तों से भी मेरा यही मप्र निवेदन है कि जिन शब्दों ने जन-साधारण में अपनी जगह बना ली है और उन्हें लोग आपके मुंह या कलम से निकलते ही समझ जाते हैं, उनके लिए संस्कृत-कोष की मदद लेने की जरूरत नहीं। ' मौजूद ' के लिए 'उपस्थित', इरादा ', के लिए 'संकल्प', 'बनावटी ' के लिए 'कृत्रिम' शब्दों को काम में लाने की कोई खास जरूरत नहीं। प्रचलित शब्दों को उनके शुद्ध रूप में लिखने का रिवाज भी भाषा को कील कारण ही-कठिन बना देता है। खेत को क्षेत्र, बरस का वर्ष, छेद को छिद्र, काम को कार्य, सूटज को सूर्य, जमना को यमुना लिखकर आप मुंह ओर जीभ के लिए ऐसी कसरत का सामान रख देते हैं जिसे नब्बे फीसदी आदमी नहीं कर सकते। इसी मुश्किल को दूर करने और भाषा को सुबोध बनाने के लिए कवियों ने ब्रजभाषा और अवधी में शब्दों के प्रचलित रूप ही रखे थे। जनता में अब भो उन शब्दों का पुराना बिगड़ा हुआ रूप चलता है, मगर हम विशुद्धता की धुन में पडे हुए हैं।

मगर, सवाल यह है, कया हिन्दुस्तानी में क्लासिकल भाषाओं के शब्द के लिए ही न जाएं? नहीं, यह तो हिन्दुस्तानी का गला घोंट देना होगा। आज साइंस की नयी नयी शाखें निकलती जा रही हैं और नित नये शब्द हमारे सामने आ रहे है, जिल्‍ जनता तक पहुंचाने के लिए हमें संस्कृत या फारसी की मदद, लेनी पड़ती है। किस्से कहानियों में तो आप हिन्दुस्तानी जबान का व्यवहार कर सकते हैं, वह भी जब आप गद्य-काव्य न लिख रहे हों, मगर आलोचना या तनकीद, अर्थशास्त्र, राजनीति, दर्शन और अनेक साइंस के विषयों में क्लासिकल भाषाओं से मदद लिए बगैर काम नहीं चल सकता। तो क्या संस्कृत और अरबी या फारसी से अलग- अलग शब्द बन जाए: ऐसा हुआ तो एकरूपता कहां आई? फिर तो वही होगा जो इस वक्‍त हो रहा है। जरूरत तो यह है कि एक हो शब्द लिया जाय, चाहे वह संस्कृत से लिया जाय, या फारसी से, या दोनों को मिलाकर कोई नया शब्द गढ़ लिया जाय। $८४ के लिए हिन्दी में कोई शब्द अभी तक नहीं बन सका। आमतौर पर 'स्त्री-पुरुष संबंध इतना बड़ा शब्द उस भाव को जाहिर करने के लिए काम में लाया जा रहा है। उर्दू में 'जिंस', का इस्तेमाल होता है। जिंसी, जिसियत आदि शब्द भी उसी से निकले हैं। कई लेखकों ने हिन्दी में भी जिंसी, जिस, जिंसियत का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। लेकिन यह मसला आसान नहीं है। अगर हम इसे मान लें कि हिन्दुस्तान के लिए एक कौमी जबान की जरूरत है, जिसे सारा मुल्क समझ सके तो हमें उसके लिए तपस्या करनी पड़ेगी। हमें ऐसी सभाएं खोलनी पड़ेंगी जहां लेखक लोग कभी- कभी मिलकर साहित्य के विषयों पर या उसकी प्रवृत्तियों पर आपस में ख्यालात का तबादला कर सकें। दिलों की दूरी भाषा की दूरी का मुख्य कारण है। आपस

के हेल मेल से उस दूरी को दूर करना होगा। राजनीति के पंडितों ने कौम को जिस दुर्दशा में डाल दिया है, आप और हम सभी जानते हैं। अभी तक साहित्य के सेवकों ने भी किसी-न-किसी रूप में राजनीति के पंडितों को अगुआ माना है, और उसके पीछे-पीछे चले हैं। मगर अब साहित्यकारों को अपने विचार से काम लेना पडेगा। सत्य, शिव, सुंदरम्‌ के उसूल को यहां भी बर्तना पड़ेगा। सियासियसत ने संपद्रायों को दो कैपों में खड़ा कर दिया है। राजनीति की हस्ती ही इस पर कायम है कि दोनों आपस में लड़ते रहें। उसमें मेल होना उसकी मृत्यु है। इसलिए वह तरह-तरह के रूप बदलकर और जनता के हित का स्वांग भरकर अब तक अपना व्यवसाय चलाती रही है। साहित्य धर्म को फिर्काबंदी की हद तक गिरा हुआ नहीं देख सकता। वह समाज को संप्रदायों के रूप में नहीं, मानवता के रूप में देखता है। किसी धर्म की महानता और फजीलत इसमें है कि वह इंसान को इंसान का कितना हमदर्द बनाता है उसमें मानवता (इंसानियत) का कितना ऊंचा आदर्श है, और उस आदर्श पर वहां कितना अमल होता है। अगर हमारा धर्म हमें यह सिखाता है कि इंसानियर और हमददी और भाईचारा सब कुछ अपने हो धर्म वालों के लिए है और उस दायरे से बाहर जितने लोग हैं, सभी गैर हैं, और उन्हें जिंदा रहने का कोई हक नहों, तो मैं उसे धागा से अलग शक: विधर्मी होना ज़्यादा पसंद करूंगा। धर्म नाम है उस रोशनी का जो कतरे को समुद्र में मिल जाने का रास्ता दिखाती है, जो हमारी जात को इमाओस्त में, हमारी आत्मा को व्यापक सर्वात्म में, मिले होने का अनृभूति या यकौन कराती है। और चूंकि हमारी तबीयतें एक-सी नहीं हैं, हमारे संस्कार एक-से नहीं हैं, हम उसी मंजिल तक पहुंचने के लिए अलग- अलग रास्ते अख्तियार करते हैं। इसीलिए शिल-भिन्‍न धर्मों का जहूर हुआ है। यह साहित्य-सेवियों का काम है कि वह सच्ची धार्मिक जागृति पैदा करें। धर्म के आचार्यों और राजनीति के पंडितों ने हमें गलत रास्ते पर चलाया है। मगर मैं दूसरे विषय पर आ गया। हिन्दुस्तानी को व्यागहारिक रूप में देने कु लिए दूसरी तदबीर यह है कि मेट्रिकुलेशन तक उर्दू और “( दी हरेक छात्र के लिए लाजमी कर दी जाय। इस तरह हिन्दुओं को उर्दू में और -ुसलमानों को हिन्दी में काफो महारत हो जायगी, और अज्ञानता के कारण जो 7दगुमानी और मंदेह है वह दूर हो जायगा। चूंकि इस वक्त भी तालीम का सीगा, हमारे मिनिस्टरों के हाथ में है और करिकुलम में इस तबदौलो से कोई जायद खर्च न होगा, इसलिए आए दोनों भाई मिलकर यह मुतालबा पेश करें तो गवर्नमेंट को उसके स्वोकार करने में कोई इनकार न हो सकेगा। मैं यकीन दिलाना चाहता हूं कि इस तजवौज में हिन्दी या उर्दू किसी से भी पक्षपात नहीं किया गया है। साहित्यकार के नाते हमारा यह धर्म है कि हम मुल्क में ऐसी फिजा, ऐसा वातावरण लाने की चेष्ट करें जिससे हमर जिंदगी के हरेक पहलू में दिन-दिन आगे बढ़ें। र डित्यकार पैदाइश से संदर्य का उपासक होता है। वह जीवन के हर आंग में, जिंदगी के हरेक शोबे में, हुसत का जलवा देखना चाहता है। जहां सामंजस्य या हम-आहंगो है वही सौंदर्य हे, वही पत्य है, वही हकीकत है। जिन तत्त्वों से जीवन की रक्षा होती है, जीवन का विकास शेता है, वही हुस्न है। बह वास्तव में हमारी आत्मा कौ बाहरो सूरत है। हमारी आत्मा

अगर स्वस्थ है, तो वह हुस्न की तरफ बेअखितयार दौड़ती है। हुस्न में उनके लिए न रुकने वाली कशिश है। और क्या यह कहने की जरूरत है कि नेफाक और हसद और संदेह और संघर्ष, यह मनोविकार हमारे जीवन के पोषक नहीं बल्कि घातक हैं, इसलिए वह सुंदर कैसे हो सकते हैं? साहित्य ने हमेशा इन विकारों के खिलाफ आवाज उठाई है। दुनिया में मानव-जाति के कल्याण के जितने आंदोलन हुए हैं, उन सभी के लिए साहित्य ने ही जमीन तैयार की है, जमीन ही नहीं तैयार की, बोज भी बोए और उसकी सिंचाई भी की। साहित्य राजनीति के पीछे चलने वाली चोज नहीं, उसके आगे-आगे चलने वाला 'एडवांस गार्ड' है। वह उस विद्रोह का नाम है जो मनुष्य के हृदय में अन्याय, अनीति, और कुरुचि से होता है। और लेखक अपनी कोमल भावनाओं के कारण उस विद्रोह की जबान बन जाता है। और लोगों क दिलों पर भी चोट लगती है, पर अपनी व्यथा को, अपने दर्द को दिल हिला देने के वाले शब्दों में वह जाहिर नहीं कर सकते। साहित्य का स्रष्टा उन चोटों को हमारे दिलो पर इस तरह अंकित करता है कि हम उनकी तीत्रता को सौ गुने वेग के साथ महसूस करने लगते हैं। इस तरह साहित्य की आत्मा आदर्श है उसकी देह यथार्थ चित्रण। जिस साहित्य में हमारे जीवन की समस्याएं न हों, हमारी आत्मा को स्पर्श करने की शक्ति न हो, जो केवल जिंसी भावों में गुदगुदी पैदा करने के लिए, या भाषा-चातुरी दिखाने के लिए रचा गया हो वह निर्जीव साहित्य है-सत्यहीन, प्राणहीन। साहित्य में हमारी आत्माओं को जगाने की, हमारी मानवता को सचेत करने की, हमारी रसिकता को तृप्त करने की शक्ति होनी चाहिए। ऐसी ही रचनाओं से कोौमें बनती हैं। वह साहित्य जो हमें विलासिता के नशे में डूबा दे, जो हमें वैराग्य, पस्तहिम्मती, निराशावाद की ओर ले जाय। जिसके नजदीक संसार दुःख का घर है और उससे निकल भागने में हमारा कल्याण है, जो केवल लिप्सा और भावुकता में डूबी हुई कथाएं लिखकर कामुकता को भड़काए, निर्जीव है। सजीव साहित्य वह है, जो प्रेम से लबरेज हो उस प्रेम से नहीं, जो कामुकता का दूसरा नाम है, बल्कि उस प्रेम से जिसमें शक्ति है, जीवन है, आत्म-सम्मान है। अब इस तरह की नीति से हमारा काम न चलेगा। रहिमन चुप ढ्वे बैठिए, देखि दिनने को फेर। अब तो हमें डॉ० इकबाल का शंखनाद चाहिए-

ब शाखे जिंदगिये मा नमीजे तिशना बसस्त

तलाशे चश्मए हैबां दलीले ब तलबीस्त।'

ता कुजा दर तहे वाले दिगरां मी बाशी,

दर हवायें चमन आजाद परीदन्‌ आमोज।

दर जहां बालो-परे खेश कुशूदन आपोज,

कि परीदन्‌ नतवां बा परो बाले दिगरां।

। मेरे जीवन की डाल्ली के लिए तृषा की तरी ही काफी है। अमृतकुंड की खोज में भटकना आकात्ञ के अभाव का प्रमाण है।

2 दूसरों के डैनों का आश्रय तुम कब तक लोगे? चमन की हवा में आजाद होकर उड़ता सोखा। मं

3 दुनिया में अपने डैने-पंखे को फैलाना सीखो। क्योंकि दूसरे के डैने-पंखे के सहारे उड़ना सभव नहीं है।

जब हिन्दुस्तानी कौमी जबान है, क्योंकि किसी-न-किसी रूप में यह पंद्रह- सोलह करोड़ आदमियों की भाषा है, तो यह भी जरूरी है कि हिन्दुस्तानी जबान में ही हमें भारतीय साहित्य की सर्वश्रेष्ठ रचनाएं पढ़ने को मिलें। आप जानते हैं, हिन्दुस्तान में बारह उन्‍नत भाषाएं हैं और उनके साहित्य हैं। उन साहित्यों में जो कुछ संग्रेह करने लायक है, वह हमें हिन्दुस्तानी जबान में ही मिलना चाहिए। किसी भाषा में भी जो-जों अमर साहित्य है, वह संपूर्ण राष्ट्र की संपत्ति है। मगर अभी तक उन साहित्यों के द्वार हमारे लिए बंद थे, क्‍योंकि, हिन्दुस्तान की बारह भाषाओं का ज्ञान बिरले को ही होगा। राष्ट्र प्राणियों के उस समूह को कहते हैं कि जिनकी एक विद्या, एक तहजीब हो, एक राजनैतिक संगठन हो, एक भाषा हो और एक साहित्य हो। हम और आप दिल से चाहते हैं। कि हिन्दुस्तान सच्चे मानी में एक कौम बने। इसलिए हमारा कर्त्तव्य है कि भेद पैदा करने वाले कारणों को मिटाएं और मेल पैदा करने वाले कारणों को संगठित करें। कौम की भावना यूरोप में भी दो छाई सौ साल से ज्यादा पुरानी नहीं। हिन्दुस्तान में तो यह भावना अंग्रेजी राज के विस्तार के साथ ही आई है। इस गुलामी का एक रोशन पहलू यही है कि उसने हममें कौमियत की भावना को जन्म दिया। इस खुदादाद मौके से फायदा उठाकर हमें कियत के अटूट रिश्ते में बंध जाना है। भाषा ओर साहित्य को भेद ही खासतौर से हमें भिन्‍न- भिन्‍न प्रांतीय जत्थों में बांटे हुए हैं। अगर हम इस अलग करने वाली बाधा को तोड़ दें तो राष्ट्रीय संस्कृति की एक धारा बहने लगेगी जो कौमियत की सबसे मजबूत भावना है। यही मकसद सामने रखकर हमने “हंस' नाम की एक मासिक पत्रिका निकालनी शुरू की है, जिसमें हरेक भाषा के नये और पुराने साहित्य की अच्छी -से -अच्छी चीजें देने को कोशिश करते हैं। इसी मकसद को पूण करने के लिए हमने एक भारतीय साहित्य परिषद्‌ या हिन्दुस्तान को कोमी अदबी सभा की बुनियाद डालने कौ तजबीज की है और परिषद्‌ का पहला जलसा 23, 24 (23, 24 अप्रैल, 926) को नागपुर में महात्ण गांधी को लष्रत में करार पाया है। हम कोशिश कर रहे हैं कि परिषद्‌ में सभी सूबे के साहि-पकार आए और आपस में ख्यालात का तबादला करके हम तजवीज को ऐसी सूरत दें, जिसमें वह अपना मकसद पूरा कर सके। बाज सूबों में अभी से प्रांतीयता के जज्बात पैदा होने लगे हैं। 'सूबा सूबे वालों के लिए' की सदाएं उठने लगी हैं। 'हिन्दुस्तान हिन्दुस्तानियों के लिए' की सदा इस प्रांतीयता को चौख-पुकार में कहीं डूब भ जाय, इसका अंदेशा अभो से होने लगा है। अगर बंगाल बगाल के लिए, पंजाब पंजाब के लिए की हवा ने जोर पकड़ा तो वह कौमियत को जो जन्नत गुलामी के पसीने और जिल्लते से बनी थी मादूम हो जायगी और हिन्दुस्तान फिर छोटे- छोटे राजों का समूह होकर रह जायगा। और फिर करामत के पहले उसे परभ्टेनता को कैद से नजात न होगी। हमें अफसोस तो यह हं कि इस किस्म को सदाए उस दिशाओं से आ रही हैं, जहां से हमें एकता की दिल बढ़ाने 3888 आर को उम्मीद थी। डेढ सौ साल की गुलामी ने कुछ कुछ हमारी आंखें खोलनी शुरू को थीं कि फिर वही प्रांतीयता की आवाजें पैदा होने लगीं और इस नयी: व्यवस्था

ने उन भेदभावों के फलने-फूलने के लिए जमीन तैयार कर दी है। अगर 'प्राविंशल अटानोमी ' ने यह सूरत अखितियार की तो वह हिन्दुस्तानी कौमियत कौ जवान मौत नहीं, बाल मृत्यु होगी। और वह तफरीक जाकर रुकेगी कहां उसकी तो कोई ईति ही नहीं। सूबा सूबे के लिए, जिला जिले के लिए, हिन्दू हिन्दू के लिए, मुसलिम मुसलिम के लिए, ब्राह्मण ब्राह्मण के लिए, वैश्य वैश्य के लिए, कपूर कपूर के लिए, सक्सेना सक्सेना के लिए, इतनी दीवारों और कोठरियों के अंदर कौमियत के दिन सांस ले सकेगी ! हम देखते हैं कि ऐतिहासिक परंपरा प्रांतीयता की ओर है। आज जो अलग-अलग सूबे किए हुए हैं, जमाने में अलग-अलग राज थे, कुदरती हदें भी उन्हें दूसरे सूबों से अलग किए हुए हैं, और उनकी भाषा, साहित्य, संस्कृति सब एक हैं। लेकिन एकता के ये सारे साधन रहते हुए भी वह अपनी स्वाधीनता को कायम न रख सके, इसका सबब यही तो है उन्होंने अपने को अपने किले में बंद कर लिया और बाहर की दुनिया से कोई संबंध न रखा। अगर उसी अलहदगी कौ रीति से वह फिर काम लेंगे तो फिर शायद तारीख अपने को दोहराए। ह₹म॑ तारीख से यह सबक न लेना चाहिए कि हम क्‍या थे, यह भी देखना चाहिए कि हम क्या हो सकते थे। अक्सर हमें तारीख को भूल जाना पड़ता है। भूत हमारे भविष्य का रहबर नहीं हो सकता। जिन कुपथ्य से हम बीमार हुए थे, क्‍या अच्छ हो जाने पर फिर वही कुपथ्य करेंगे? और चूंकि इस अलहदगी की बुनियाद भाषा है, इसलिए हमें भाषा हीं के द्वार से प्रांतीयता की काया में राष्ट्रीयता के प्राण डालने पड़ेंगे। प्रांतीयता का सदुपयोग यह है कि हम उस किसान को तरह जिसे मौरूसी पट्टा मिल गया हो अपनी जमीन को खूब जोतें, उसमें खूब खाद उले और अच्छी-से-अच्छी फसल पैदा करें। मगर उसका यह आशय हर्गिज न हंग चाहिए कि हम बाहर से अच्छे बीज और अच्छी खाद लाकर उसमें न डालें। प्रांतीय अगर अयोग्यता को कायम रखने का बहाना बन जाय तो यह उस प्रांत जा दुर्भाय होगा और राष्ट्र का भी। इस नये खतरे का सामना करना होगा और वह मेल पैदा करने वाली और शक्तियों को संगठित करने से ही हो सकता है। सज्जनो, साहित्यिक जागृति किसी समाज की सजीवता का लक्षण है। साहित्य की सबसे अच्छी तारीफ जो की गई है, वह यह है कि अच्छे- से अच्छे दिल और दिमाग के अच्छे-से-अच्छे भावों और विचारों का संग्रह है। आपने अंग्रेजी साहित्य पढ़ा है। उन साहित्यिक चरित्रों के साथ आपने उससे कहीं ज्यादा अपनापा महसूस किया है जितना आप यहां के किसी साहब बहादुर से कर सकते हैं। आप उसक! इंसानी सूरत देखते हैं, जिसमें वही वेदनाएं हैं, वही प्रेम है, वंही कमजोरियां हैं, जो हममें और आप में हैं। वहां वह हुकूमत और गुरूर का पुतला महीं बल्कि हमारे और आपका-सा इन्सान है जिनके साथ हम दुखी होते हैं, हंसते हैं, सहानुभूति करते हैं। साहित्य बदगुमानियों को मिटाने वाली चीज है। अगर आज हम हिन्दू और मुसलमान एक-दूसरे के साहित्य से ज्यादा परिचित हों, तो मुमकिन है हम अपने को एक ४ दूसरे को कहीं ज्यादा निकट पाएं। साहित्य में हम हिन्दू नहीं हैं, मुसलमान नहीं है ईसाई नहीं हैं, बल्कि मनुष्य हैं, और वह मनुष्यता हमें और आपको आकर्षित करती

है। क्या यह खेद की बात नहीं हे कि हम दोनों जो एक मुल्क में आठ सौ साल से रहते हैं, एक-दूसरे के पड़ोस में रहते हैं, एक-दूसरे के साहित्य से इतने बेखबर हैं? यूरोपियन दे को देखिए। उन्होंने हिन्दुस्तान के मुतअल्लिक हर एक मुमकिन विषय पर तहकीकातें की हैं, पुस्तकें लिखी हैं, वह हमें उससे ज्यादा जानते हैं जितना हम अपने को जानते हैं। उसके विपरीत हम एक-दूसरे से अनभिज्ञ रहने ही में मग्न हैं। साहित्य में जो सबसे बड़ी खूबी है, वह यह है कि वह हमारी मानवता को दृढ़ बनाता है, हममें सहानुभूति और उदारता के भाव पैदा करता है। जिस हिन्दू ने कर्बला क मार्क को तारीख पढ़ी है, यह असंभव है कि उसे मुसलमानों से सहानुभूति न हो। उसी तरह जिस मुसलमान ने गामायण पढ़ा है, उसके दिल में हिन्दू मात्र से हृमदर्दी पैदा हो जाना यकौनी है। कम से- कम उन्ती हिन्दुस्तान में हरेक शिक्षित हिन्दू- पुसलिम को अपनी तालीम अधूरी समझनी चाहिए, अगर वह मसुलमान है तो हिन्दुओं के और हिन्दू है तो मुसलमानों क साहित्य से अपरिचित है। हम दोनों हो के लिए तनो लिपियों का और दोनों भाषाओं का ज्ञान लाजमी है। और जट हम जिंदगी के पंद्रह साल अंग्रेजी हासिल करने म॑ कुरबान करते हैं तो क्या महीने-दा महीने भी उम्र लिपि और साहित्य का ज्ञान प्राप्त करने म॑ नहीं लगा सकते, जिस पर हमारी जोमी तरक्की 6. नहीं, कौमी जिंदगी का दारोमदार है?


प्रकाशन इतिहास

[भाषण/लेख। आर्य-समाज के 'आर्य भाषा सम्मेलन' लाहौर में 11 अप्रैल, 1936 को दिया गया भाषण। 'हंस', फ़रवरी, 1937 में 'एक भाषण' शीर्षक से प्रकाशित। 'साहित्य का उद्देश्य' तथा 'कुछ विचार' में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "हिन्दी-उर्दू की एकता." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1936, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/hindi-urdu-ki-ekta. Accessed 22 Sep. 2026.